तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-6

ऊँची पसंद जिस पर कायल था ज़माना

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आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। आज पेश है छठा भाग – त्रिपुरारि ========================================================

कद्दावर नायक, जो मीना कुमारी के कद से ऊपर नहीं उठ सके

पिता और पति के बीच  अपने अस्तित्व को तलाशती मीना कुमारी हमेशा अपने काम के प्रति समर्पित रही। किरदारों की आड़ में खुद को भुला देना, उन्हें बखूबी आता था। अपने सभी साथी कलाकारों के  साथ उनका सामंजस्य कमाल का था।

भारत भूषण के साथ अपनी पहली हिट फिल्म‘ बैजू बावरा’ की जोड़ी को खूब सराहा गया था मगर बाद में उन्हें साथ में काम करने का अवसर नहीं मिल पाया.

सबसे ज्यादा उनकी जोड़ी अभिनेता अशोक कुमार के साथ पसंद की गयी. इस जोड़ी ने ग्यारह फिल्मों में अभिनय किया. पहली फिल्म ‘परिणीता’ में ही दोनों की केमिस्ट्री जम गयी थी फिर उस समय के नामी निर्देशकों ने उन्हें बार- बार दोहराया. परिणीता में ही मीना कुमारी को ‘ट्रेजेडी क्वीन’ का ख़िताब मिला था. बेनजीर, पाकीज़ा, जवाब, आरती, बहु बेगम, सवेरा, एक ही रास्ता, भीगी रात, शतरंज, बंदिश इस जोड़ी की प्रमुख फ़िल्में थी.  इसी तरह प्रदीप कुमार के साथ मीना कुमारी की जोड़ी खूब पसंद की गयी. इन दोनों की यह जोड़ी एक बेहद लोकप्रिय और आदर्श  जोड़ी मानी गयी. फ़िल्मी-पर्दे पर मीना कुमारी-प्रदीप कुमार की उपस्थिति, एक आदर्श दम्पति का आभास देती थी. ऐसी ही एक फिल्म थी ‘आरती’ जिसमें गंभीर विषयों को बड़े परदे पर लाया गया और यही वह फिल्म भी थी जिसमें स्त्री की आवाज़ की प्रतिध्वनि को सुना गया। दोनों ने बतौर नायक-नायिका आठ फिल्मों में काम किया. इसके अलावा दिलीप कुमार और मीना कुमारी की जोड़ी को एक साथ देखने का अनुभव दर्शक को भीतर तक भीगो देता है.

गुरुदत्त के साथ मीना कुमारी ने ‘सांझ और सवेरा’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ अभिनीत की. धर्मेन्द्र के साथ आठ फ़िल्में, राजेंद्र कुमार के साथ छः फ़िल्में, राज कुमार के साथ पांच फ़िल्में प्रदर्शित हुयी और दिलीप कुमार के साथ चार फ़िल्में. राज कुमार, किशोर कुमार, राजेंद्र कुमार, धर्मेन्द्र की जोड़ी भी यादगार मानी गयी.

धीमी चाल से चलती और प्रखर व्यक्तित्व की धनी यह नायिका अपनी सभी फिल्मों में अपने समय के सभी प्रसिद्ध अभिनेताओं से टक्कर लेती दिखती और अभिनय के मामले में हमेशा उनका ही पलड़ा भारी रहा.

राज कुमार और दिलीप कुमार जैसे दिग्गज कलाकार मीना कुमारी जैसे प्रभावशाली व्यक्तिव के समक्ष अपने वाक्य भूल जाते थे. दिलीप कुमार ने खुद एक इंटरव्यू में मीना कुमारी को एक बुलंद व्यक्तित्व कहा था. साथी कलाकारों के अलावा निर्माता निर्देशक, संगीतकार और गायक मीना कुमारी के व्यक्तित्व और अभिनय से प्रभावित थे। महान निर्देशक सत्यजीत राय, संगीतकार खय्याम, गीतकार साहिर लुधियानवी मीना कुमारी के अभिनय की गहराईयों और जीवन की सादगी से अच्छी तरह से वाकिफ़ थे.

जीवन की मांग कुछ और ही थी मगर

 मीना कुमारी के अभिनय- जीवन में 1962 और 1963 सबसे सक्रिय वर्ष थे जब  मीना कुमारी ने एक वर्ष में आठ फिल्मों तक में अभिनय किया. यही वह समय भी था जब दुःख उनके संवेदनशील मन की सतह पर अपनी धार तेज़ कर रहा था. अवसाद की एक-एक बूँद उनके कोमल मन पर देर तक ठहरी रहती और वह घंटों बैचन रहती.

जिंदगी, अँधेरे और उजाले दोनों को साथ ले कर चल रही थी। उनके चाहने वाले परदे के सामने थे और उन्हें परेशान करने वाले पर्दे के पीछे.

उस समय की नामचीन अदाकारा मीना कुमारी हर बड़े फ़िल्मी समारोहों की शान होती, वहां जब भी थोडा बहुत बोलने को कहा जाता, तो वह अपनी लरजती आवाज़ में ‘फैज़ अहमद फैज़’ और ‘ग़ालिब’ के शेर पढ़ती। जैसे-जैसे जीवन में हंसी-खुशी दूरजाने लगी थी वैसे-वैसे शायरी- कविता नज़दीक आने लगी.उनके बैड रूम में  शायरी की किताबों संख्या बढ़ने लगी

अपने कैरियर के इस पड़ाव पर जब मीना कुमारी एक के बाद एक बेहतरीन फ़िल्में दे रही थी उसी समय उसके निजी जीवन की ज़मीन दरकने लगी थी. मानो ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के ख़िताब का अवसाद, उनका सफ़ेद पल्लू पकड़ कर साथ चलते-चलते उनके घर तक भी आ गया हो  उदासी ने जीवन के चारों कोने पकड़ लिए थे । प्रेम की जिस डोर पर अपने सपने बाँध कर उन्होंने आकाश में छोड़े थे वह कहीं पर जाकर अटक गयी थी. मीना ने बड़े मन से इस रिश्ते को अपने रूह की नरमी दी थी पर वह रिश्ता इतना सख्त हो गया था कि एक बार जो कड़ा हुआ तो उसे चमड़ेका नाम  ही दिया जा सकता था. जिसे पाँव में पहना तो जा सकता था मगर सीने से नहीं लगाया जा सकता था।

मीना एक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र इंसान थी, लेकिन उन्हें नियम कानूनों में बंद कर रखने की कोशिश की गयी। समय पर घर आने की पाबन्दी और सिर्फ कमाल की पसंद की फिल्मों को ही साइन करने की जिद. ‘चित्रलेखा’ फिल्म में उन्हें काम करने से रोका गयाh. इसके अलावा कमाल अमरोही, मीना के बहनोई महमूद और निर्देशक अबरार अल्वी को नापसंद  करते थे, इसीलिए उन्होंने  मीना  कुमारी  को अबरार अल्वी की फिल्म‘ साहब,बीवी और गुलाम’ में काम   करने के लिए मना कर दिया था, पर मीना ने कमाल अमरोही की जिद के उस पार जा कर दोनों फ़िल्में की और ये दोनों ही मील का पत्थर फ़िल्में साबित हुयी। ग्यारह साल तक चली गृहस्थी अब थम सी गयी थी, रिश्तों में कडवाहट घुलने लगी थी.

वह अपने किरदारों के दुःख और खुद के आंसुओं को मजबूती से संभाल रही थी.  उनके भीतर आंसुओं का खारा समुन्द्र था, यही कारण था कि उन्हें आंसुओं की जगह कभी ग्लिसरीन इस्तेमाल करने की जरुरत नहीं पड़ी.

ऊँची पसंद जिस पर कायल था ज़माना

मीना कुमारी ने पाकीज़ा फिल्म की वस्त्र-सज्जा खुद तैयार की. पाकीजा फिल्म में भड़कीले रंगों और बढ़िया चिकनकारी का काम आज भी याद किया जाता है। फिल्म में मीना कुमारी का ‘ मुज़रा’ परिधान बेहद खूबसूरत था. लम्बें गोल कट के कुर्ते के साथ, कोटी और जरीदार दुपट्टा मीना कुमारी की पहली पसंद थी. उस समय वे ट्रेंड सेटर थी.  तकिये पर खुले बालों को फ़ैलाने का प्रचलन भी सबसे पहले मीना कुमारी के जरिये ही प्रसिद्ध हुआ, जिसे बाद में अनेकों बार बॉलीवुड में फिल्माया गया. अधिकतर फिल्मों में मीना कुमारी अपने लंबे कुरते और शरारे के साथ नज़र आयी या फिर साड़ी या सूट पजामी में दिखी. अपने मेकअप मैन को मीना कुमारी ने हिदायत दे रखी थी कि उनकी आँखों के मेकअप के लिए सबसे बढ़िया आई मेकअप का इस्तेमाल किया जाये .

वे सबसे अलग थी और जाहिर था कि उनकी वेशभूषा और मेकअप भी खास ही होता. एक दुर्लभ प्रतिभा, मृदुभाषी महिला, जिसे साहिर लुधियानवी ने सफ़ेद साड़ी में  लिपटी एक ऐसी शानदार कलाकार की संज्ञा दी थी जिसकी आत्मा कवि जैसी निर्मल और संवेदनशील थी. सादा फैशन में लिपटी मीना कुमारी, जिनके निभाये किरदार भी अपनी द्रढ़ता और साफ़गोई के लिए जाने जाते हैं. उनकी साड़ी पहनने का तरीका, माथे पर बिंदी लगाने का सलीका सब कुछ अनोखा था.  कुछ ऐसा जिसके बारे में लोग बातें करें.

मीना कुमारी को सफेद रंग से बहुत प्रेम था । घर में  वह मेकअप का इस्तेमाल नहीं करती थी और गहने भी नहीं पहनती थी। अक्सर वह साधारण सफेद साड़ी में पार्टियों या शादियों में जाती थी और अपने बालों को एक गाँठ में इकट्ठा कर जुड़ा बांधती थी. उनका सबसे पसंदीदा काम बगीचे के फूलों से गुलदस्ता बनाना और बाग़ को संवारना था। उनकी बेडरूम में एमिली ब्रोंटे की बहुत सारी किताबें थी. एमिली भी मीना कुमारी की तरह ही एकांत की साधिका रही थी.

मीना को रंगीन पत्थर एकत्र करने का भी शौक था. बहुत बचपन से ही मीना कुमारी को बासी रोटी खाने की आदत थी, यह आदत बड़े होने तक भी रही. दरअसल काम खोजने के सिलसिले में उनकी माँ बहुत सारी रोटी बना कर चली जाती थी ये रोटियां दो तीन दिन तक काम में आती. मीना कुमारी को छोटे बच्चों से भी बहुत लगाव था। उन्हें टेबल टेनिस खेलने का भी शौक था, उनके बहनोई हास्य अभिनेता महमूद ने मीना कुमारी को टेबल टेनिस सिखाया था.

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