तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-10 अंतिम

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आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। आज पेश है दसवाँ यानी अंतिम भाग – त्रिपुरारि ========================================================

अफवाहें देती रही ज़ख्मों पर हवा

कहाँ जाता है शोहरत की कीमत जरूर  चुकानी पड़ती है. प्रसिद्ध लोगों की आचार-व्यवहार से ही फ़िल्मी मीडिया का काम चलता है. उनका निजी जीवन निजी नहीं रह पाता. लोग जानना चाहते हैं कि परदे से बाहर, उनके प्रिय नेता कैसा जीवन जीते हैं, उनकी क्या गतिविधियाँ हैं. जब मीना के शराब के अत्यधिक सेवन की ख़बरें आ रही थी, उन्हीं दिनों नए अभिनेता धर्मेन्द्र का नाम भी उनसे जुड़ने लगा था और बाद में पंजाब के आए एक नवोदित कलाकार राहुल से भी.

पति कमाल अमरोही की बेवफाई, अपनों के दुःख मीना को रह-रह कर सताते. सिनेमा जगत की चमक के पीछे का सच मीना ने जान लिया था. पंजाब से आये कलाकार धर्मेन्द्र से मीना कुमारी का परिचय हुआ और मीना कुमारी के कारण ही उन्हें फिल्म ’फूल में पत्थर’ में काम मिला । इस फिल्म की शोहरत ने धर्मेन्द्र को निर्माताओं की पहली पसंद बना दिया। मीना कुमारी इन दिनों अपने जीवन की दुश्वारियों से जूझ रही थी उसी समय धर्मेन्द्र का उनके जीवन में आगमन हुआ। अति संवेदनशील मीना कुमारी को शराब की लत ने और अधिक भावुक बना दिया था। मीना कुमारी, धर्मेन्द्र का हाथ थम कर फ़िल्मी पार्टियों में जाती और उनका सबसे परिचय करवाती और अगले दिन ये ख़बरें फ़िल्मी गोसिप का हिस्सा बनती. उसी तरह गुलज़ार से मीना कुमारी की दोस्ती भी अफवाहें उडी हो सकता है कि कुछ समय तक धर्मेन्द्र मीना को अपने सबसे करीबी लगे, लेकिन मीना कुमारी के मन में कमाल अमरोही की छाप पड़ चुकी थी वह अंत तक रही.

मीना कुमारी अपने अभिनय की ऊँचाईयों के कारण पदम् श्री, पदम् विभूषण जैसे पुरस्कारों की हक़दार थी पर मीडिया की मेहरबानी से इस बेमिसाल अभिनेत्री का जीवन इतना विवादास्पद हो चला था कि मीना कुमारी का नाम  कमेटी ने अनुमोदित नहीं किया.

अपनी आंच को कभी बुझने नहीं दिया

मीना कुमारी के सारे दुःख, तकलीफ़ों का एकमात्र कारण उनका अपना अहम् था,  जिसे उन्होंने अंत तक अपने भीतर जिंदा रखा. वे अपने अति संवेदनशील स्वाभाव की कमज़ोरियों को अच्छी तरह से पहचानती थी और अपने इस स्वभाव के कारण ही अपने अहम् को टिकाये रखना काफी हौंसले का काम था. मीडिया  ने उन्हें आज़ाद खयाल वाली स्त्री के खिताब से नवाजा. यह भी सच है कि एक स्त्री के आज़ाद ख्याल को आज इक्कीसवीं सदी में भी गलत अर्थों में लिया जाता है. उनके बारे में यह लिखा गया कि मीना कुमारी पहली ऐसी अभिनेत्री थी जिन्होंने खुले आम पुरुषों के साथ बैठ कर शराब पी. उस समय जब संभ्रात वर्ग की स्त्रियाँ खुले में भी ऐसा नहीं कर सकती थी. जिससे व्यवहार में कोई दुराव- छिपाव नहीं था यह उनकी शक्सियत का अटूट हिस्सा था. अभिनय उन्हें सुहाता था क्योंकि लगभग चमत्कारिक स्तर पर उनके किरदार उनके जीवन से मेल खा रहे थे.

फिल्म ‘आरती’ में  आरती गुप्ता का किरदार निभा रही मीना कुमारी अपने पति दीपक ( प्रदीप कुमार ) से पुरुष के दोगले स्वभाव और स्त्री की कर्तव्यपरायणता पर करारी चोट करती हैं. ठीक ऐसी ही स्थिति मीना कुमारी के जीवन में भी सांस ले रही थी.

सात साल की उम्र से स्टूडियो की सीले वातावरण में सांस लेने वाली नायिका को हर चीज़ पर हस्तक्षे कैसे गवारा होता. जिसने गाहे-बगाहे न जाने कितने लोगों की आर्थिक रूप से मदद की हो, रिश्तेदारों की फौज हो पाला हो उसके पैसे को कब्जे में ले लिया जाये ?
वह दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास और संघर्ष की भावना का एक उदाहरण थी जो अपनी अंतिम सांस तक लड़ती रही ।

एक बार फिर से जीवन में लौटने की तैयारी

सितंबर 1968 में इलाज़ के बाद मीना कुमारी बम्बई आ गयी.  शराब से तौबा तो कर ली थी पर अब मीना कुमारी को पान की लत पड़ गयी थी वे एक दिन में चालीस पान तक खा लेती थी.   मीना कुमारी ठीक हो कर लौटी शायद अब  उन्हें जीवन की चाह फिर से हो गयी थी. लेकिन अभी भी तबियत बिलकुल सही नहीं कही जा सकती थी. अधिक दौड़-धूप से बचने के लिए ‘अभिलाषा’ की शूटिंग उनके बंगले पर ही हुयी.

उनकी सहेलियों जिसमें अचला सचदेव, वहीदा रहमान, नादिरा, रजनी पटेल थी ने उनके फिर से काम पर लौटने को शुभ संकेत माना. लेकिन यह बुझने से पहले की रोशनी ही साबित हुयी.

31 अगस्त 1973

अपने अंतिम दिनों में पाकीज़ा के निर्माण के समय मीना कुमारी के ठहरे हुए जीवन में जैसे हलचल सी हुयी, लेकिन तबियत उनकी चाह का साथ नहीं डे रही थी. वह रोते हुए अपनी बड़ी बहन खुर्शीद से कहती, “आपा मैं जीना चाहती हूँ”. लेकिन भीतर ही भीतर कहीं वह जान चुकी थी कि अब उसके भीतर की ऊर्जा समाप्ति की ओर है. तब उसने कोमा में जाने से पहले अपने पति कमाल अमरोही से कहा,

“चंदन मैं चाहती हूँ कि मेरी अंतिम साँस तुम्हारी बाँहों में निकले।” मीना कुमारी सेंट एलीजाबेथ अस्पताल में बारह घंटे तक अचेतन अवस्था में रही. उनका जीवन एक ऐसा त्रासदीपूर्ण रोल था जिसकी ‘हैप्पी एंडिंग’ नहीं था.

मीना कुमारी की फ़िल्में एक जीवित संग्राहलय मानी जा सकती हैं. जब हम भविष्य में अपने आने वाली पीढ़ियों को भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की एक प्रभावशाली अभिनेत्री मीना कुमारी के बारे में बताते हुए यह कह सकेंगे यह हैं मीना कुमारी जो अभिनय में अपने हृदय का इस्तेमाल सबसे अधिक करती थी. तभी शायद उनका जीवन उन लोगों के अधिक करीब है जो हृदय से जीने का मादा रखते हैं।

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