गौहर रज़ा की ‘खामोशी’ गौहर रज़ा की नज्में

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गौहर रज़ा एक संजीदा वैज्ञानिक हैं, शायर हैं. हिन्दुस्तान की धर्मनिरपेक्ष परम्परा की एक जीती जागती मिसाल. अभी हाल में राजपाल एंड संज से उनके नज्मों-गजलों का संकलन आया है ‘खामोशी’. ऐसे समय में जब विविधता की आवाजों को खामोश किया जा रहा है. इस संकलन की नज्मों का अपना अर्थ है. उसी संकलन से कुछ नज्में-मॉडरेटर

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खामोशी

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

लो मैंने आँखें बंद कर लीं

लो परचम सारे बांध लिए

नारों को गले में घोंट दिया

एहसास के ताने बाने को

फिर मैंने हवाले दार किया

इस दिल की कसक को मान लिया

एक आखरी बोसा देना है

और अपने लरज़ते हाथों से

खंजर के हवाले करना है

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

इलज़ाम ये आयद था मुझ पर

हर लफ्ज़ मेरा एक नश्तर है

जो कुछ भी लिखा, जो कुछ भी कहा

वो देश विरोधी बातें थीं

और हुक्म किया था ये सादिर

तहज़ीब के इस गहवारे को

जो मेरी नज़र से देखेगा

वो एक मुलजि़म कहलायेगा

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

जो इश्क के नगमे गायेगा

जो प्यार की बानी बोलेगा

जो बात कहेगा गीतों में

जो आग बुझाने उट्ठेगा

जो हाथ झटक दे कातिल का

वो एक मुजरिम कहलायेगा

 

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

खामोश हूँ मैं सन्नाटा है

क्यों सहमे, सहमे लगते हो

हर एक ज़बाँ पर ताला है

क्यों सहमे, सहमे लगते हो

लो मैंने कलम को धो डाला

लो मेरी ज़बाँ पर ताला है

 

हाँ सन्नाटे की गूँज सुनो

हैं लफ्ज़ वही, अंदाज़ वही

हर ज़ालिम, जाबिर, हर कातिल

इस सन्नाटे की ज़द पर है

 

खामोशी को खामोश करो

यह बात तुम्हारे बस में नहीं

 

खामोशी तो खामोशी है

गर फैल गई तो फैल गई

प्रिटोरिया, 9.10.2016

(ज़ी न्यूज़ के मेरी कविता पर हमले के जवाब में)

 

 

गर टूट गए तो हार गए

 

जब मेरे वतन की गलियों में

ज़ुल्मत ने पंख पसारे थे

और रात के काले बादल ने

हर शहर में डेरा डाला था

जब बस्ती-बस्ती दहक उठी

यूँ लगता था, सब राख हुआ

यूँ लगता था, महशर है बरपा

और रात के ज़ालिम साए से

बचने का कोई यारा भी ना था

सदियों में तराशा था जिस को

इंसान के अनथक हाथों ने

तहज़ीब के उस गहवारे में

हर फूल दहकता शोला था

 

जब नाम-ए-खुदा ईंधन की तरह

भट्टी में जलाया जाने लगा

और ‘नेक खुदा’ के सब बन्दे

‘मरदूद-ए-हरम ठहराये गए’

जब खून की होली, रस्म बनी

और मकतल गाहें आम हुईं

बरबरीयत, वहशत फन ठहरी

इस फन की बज़्में आम हुईं

 

जब शौहर, बेटे, भाई, पिदर

सब नाम-ए-खुदा के काम आए

आवाज़ थी इक इंसान की भी

इस शोर के बीहड़ जंगल में

जो मिटने को तैयार न थी

जो ज़हनों को गरमाती रही

जो छलनी जिस्म से कहती रही

उठ, हाथ बढ़ा हाथों को पकड़

लाखों हैं यहाँ तेरे जैसे

 

इस जंग को जारी रखना है

गर टूट गए तो हार गए

दिल्ली, 18.02.2001

(अफगानिस्तान में तालिबान के हाथों एक महिला कार्यकर्ता के कत्ल पर)

 

सुबह

 

सुना है रात के परदे में सुबह सोती है

सवेरा उठ के दबे पाँव आएगा हम तक

हमारे पाँव पे रखेगा भीगे, भीगे फूल

कहेगा उठो के अब तीरगी का दौर गया

बहुत से काम अधूरे पड़े हैं, करने हैं

इन्हें समेट के राहें नई तलाश करो

 

नहीं, यकीन करो,

यूँ कभी नहीं होता

सवेरा उठ के दबे पाँव

खुद ना आएगा

ना हो जो शम्मा,

तो हरगिज़ सहर नहीं होती

अगर शुआओं के भाले ना हों

हमारा नसीब

तो नहरें दूध की, ख्वाबों में बहती रहती हैं

ज़मीं घूम के सूरज को चूमती है ज़रूर

शुआएँ फटती हैं,

लेकिन सहर नहीं होती

 

मुंबई, 15.04.2001

 

मेरी तलवार है ये मेरा कलम

 

एक नज़्म, एक गज़ल

उलझा, उलझा सा कोई

शेर कहीं

एक अफसाना, कहानी

या कोई एक किताब

कोई तस्वीर

कोई खाका

कोई एक ख्याल

दिल के एक कोने में कहीं

कलियों के चटकने की सदा

सुबह दम ओस में भीगे हुए

फूलों की महक,

दूर धुँधलाये हुए

रंगों के परदे से परे

डूबते और उभरते हुए

नगमों की सदा

गहरी आँखों में कहीं

आँसू छलकने से भी पहले का समाँ

 

गर कभी ऐसे ही

कुछ नर्म से जज़्बात को

अल्फाज़ का पैराहन दूँ

हथकड़ी हाथ में पड़ जाती है

और कागज़ पे किसी

पर्दा-ए-सीमीं की तरह

एक, एक कर के

उभरते हैं

हज़ारों चेहरे,

बैन करते हुए

बेआसरा, गुमनाम सवाल

पूछते हैं के ये इंसाफ

लहू में कब तक

 

तेरी तलवार है ये तेरा कलम

 

और फिर दिल के किसी कोने से

आती है सदा

कितने ही हाथ हैं जो

नर्म से जज़्बात रकम करते हैं

 

यह कलम तीशा-ओ-तलवार है

इन हाथों में

अमन-ओ-इंसाफ की

बेबाक तमन्ना के लिए

फिर से एक बार इसे वक्फ करो

 

दिल्ली, 13.04.2016

(अपनी दोस्त वृन्दा ग्रोवर के लिए जो एक बहुत हस्सास वकील हैं)

 

शिद्दतपसंद

मुझे यकीन था कि मज़हबों से

कोई भी रिश्ता नहीं है उनका

मुझे यकीन था कि उनका मज़हब

है नफरतों की हदों के अंदर

मुझे यकीन था वो ला-मज़हब हैं,

या उनके मज़हब का नाम हरगिज़

सिवाये शिद्दत1 के कुछ नहीं है,

 

मगर ऐ हमदम

यकीन तुम्हारा जो डगमगाया,

तो कितने इंसान जो हमवतन थे,

जो हमसफर थे,

जो हमनशीं थे,

वो ठहरे दुश्मन

तलाशे दुश्मन जो शर्त ठहरी

तो भूल बैठे,

के मज़हबों से

कोई भी रिश्ता नहीं है उनका,

कि जिसको ताना दिया था तुमने,

के उसके मज़हब की कोख कातिल उगल रही है,

वो माँ कि जिसका जवान बेटा,

तुम्हारे वहम-ओ-गुमाँ की आँधी में गुम हुआ है,

तुम्हारे बदले कि आग जिसको निगल गई है,

वो देखो अब तक बिलख रही है,

 

वो मुन्तजि़र है

कोई तो काँधे पर हाथ रखे

कहे कि हमने भी कातिलों की कहानियों पर

यकीन किया था,

कहे कि हमने गुनाह किया था,

कहे कि माँ हमको माफ कर दो,

कहे कि माँ हमको माफ कर दो।

 

दिल्ली 15.11.2008

(मक्का मस्जिद केस में पकड़े गए बेकुसूर नौजवानों के छूटने पर)

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