संवाद युग में रेणु के संवदिया की याद

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कल विश्व डाक दिवस था. मुकुल कुमारी अमलास ने उसी बहाने संवदिया पर यह लेख लिखा है- मॉडरेटर

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कल फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी संवदिया पढ़ रही थी। पढ़ कर आँखों में आँसू आ गये और मैं उनके सामने नतमस्तक हो गई। रेणु जी के बारे में कुछ लिखने की मैं अपनी औकात तो नहीं समझती, लेकिन प्रशंसा के दो शब्द तो लिख ही सकती हूँ। उनकी रचनाओं को पढ़ कर कभी कभी मुझे लगता है जैसे कि उनकी तुलना अगर किसी से हो सकती है तो वो सिर्फ और सिर्फ प्रेमचंद हैं।

याद है मुझे कि जब मैं ने प्रेमचंद की गोदान पढ़ी थी तो एक दो नहीं कई-कई बार हिचकी ले कर रोई थी। धनिया और होरी के दुःख मेरे अपने दुःख और उनकी खुशियाँ मेरी खुशियाँ बन गये थे। एक रचनाकार की सफलता शायद इसी में मानी भी जाती है। आज जब मैं रेणु जी की कहानियों को पढ़ रही हूँ तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अपने गाँव पहुँच गई हूँ और वहीं की किसी गली की कोई कहानी सुन रही हूँ। रेणु जी पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है विशेष कर उनकी आंचलिक शैली और बोलचाल की भाषा के प्रयोग पर। मुझे उस पर कुछ कहना भी नहीं है मैं तो संवदिया की बात कर रही थी।

हाँ तो मैं सोच रही थी कि आज के युग में अगर मैं अपने बच्चों या छात्रों से पूछूँ कि आपको पता है संवदिया कौन होता था तो वे आश्चर्य में पर जायेंगे। यह बात उन्हें किसी आदम युग की बात लगेगी। कैसे धीरे धीरे युग बदला है और भावनाओं की जगह तकनीक और मशीनों ने ले ली है जरा इस पर गौर करें। जब हम पत्र लिखते थे तो कम से कम उसमें कुछ हमारा निज छुपा होता था। हमारी लिखावट, जो कागज़ हमने प्रयोग किया, जिस स्याही से हमने लिखा, जो आँसू हमने बहाये उस पर, जो खुशबू हमने बिखेरा और सबसे बढ़ कर जिस तरह से हमने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया उस ख़त में, वह सब मिल कर कहीं न कहीं लिखने वाले के व्यक्तित्व का चित्रांकन कर ही देते थे। हम कैसे भूल सकते हैं सरस्वती चंद फिल्म का वह गाना -‘फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है’। कहीं न कहीं संवेदना के स्तर पर हमारे ख़त हमें जोड़ते थे। लेकिन आज हम मैसेज करते हैं वो भी अधिकतर दूसरों द्वारा फॉरवर्ड किया हुआ। इसमें हमारा अपना क्या है! व्हाट्सअप, ई मेल, और एस एम एस भी हमारी बातें दूसरों तक पहुंचाते हैं परंतु मैकेनिकल तरीके से। संक्षेप में इसे भावनाओं का यंत्रीकरण कहें। कहीं न कहीं हम संवेदना के तल पर कमजोर होते जा रहे हैं। हमारी भावनाओं में अब वह उद्वेग नहीं रहा जो पहले हुआ करता था।

अब फिर संवदिया पर आते हैं। संवदिया वह होता था जो एक व्यक्ति का संवाद दूसरे तक पहुंचाता था और बदले में उसे कुछ पारिश्रमिक मिला करता था। एक अच्छा संवदिया वही माना जाता था जो सिर्फ संवाद ही नहीं पहुंचाता था वरन संवाद भेजने वाले की बातें हूबहू उसी के शब्दों में और उसी संवेदना और भावना के साथ संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाता था। अगर संवाद भेजने वाले ने रो-रो कर अपनी बात कही है तो संवदिया भी वह संवाद रो कर ही सुनायेगा अर्थात् संवदिया का काम सिर्फ संवाद पहुंचाना नहीं बल्कि भावनाओं का संप्रेषण भी था और जो व्यक्ति इस काम में जितना ही माहिर होता था वह उतना ही बड़ा संवदिया समझा जाता था। मुझे लगता है कि संवदिया की अहमियत इसलिए भी बहुत थी क्योंकि उस जमाने में साक्षर लोगों की संख्या, जो खुद पत्र लिख सकें , काफी कम थी। अब तो गाँवों में भी संवदिया नहीं मिलते संभवतः ब्रिटिश काल में ही डाक और तार के आविष्कार के साथ इस आदमजात का अंत हो गया।

निरक्षर लोग दूसरों से पत्र लिखवाते थे इस बाबत भी कई कहानियाँ हमलोगों ने सुन रखी है विशेष कर सिनेमा के कई प्रसिद्ध गीत रहे हैं जो लोगों की जुबान पर चढ़ चुके हैं जैसे- ‘ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू वो जान जाएंगे पहचान जाएंगे’। लेकिन संवदिया नामक संचार माध्यम तो इतिहास के इस दौर से भी पहले की बात है। सोचिये जरा आज के दौर में  अगर ऐसा कोई संवदिया हो तो क्या हम उस पर भरोसा करेंगे और उसके माध्यम से अपनी निजी बातों को दूसरों से साझा करेंगे! आज कोई किसी पर विश्वास नहीं करता। रेणु जी का संवदिया सिर्फ संवाद ही नहीं पहुंचाता वरन कहीं न कहीं संवेदना के स्तर पर जुड़ कर लोगों की भावनाओं को भी उन तक पहुँचाता है। उस संवदिया की निश्छलता तो देखिये की लौटने के लिये उसके पास पैसे नहीं पर वह बड़ी दुल्हिनजी के भाई से पैसे नहीं मांगता सिर्फ यह सोच कर कि कहीं बहू जी की वास्तविक स्थिति का आभास न हो जाये उनके मायकेवालों को। वह संवेदना के स्तर पर इस तरह जुड़ा हुआ है बड़ी दुल्हिन से, अपने गाँव से कि उनके मायके वाले को उनकी हालात की भनक तक नहीं लगने देता है यह सोचकर कि ये लोग क्या सोचेंगे –  कैसा गाँव है जो एक अकेली महिला की भी परवरिश नहीं कर सकता! एक अनपढ़ संवदिया की कहानी ने मुझे झकझोड़ दिया लगा आज हम भले ही सुसंस्कृत और सभ्य कहे जाते हों,  विकास की दौड़ में आगे बढ़ गये हों पर संवेदनात्मक स्तर पर अपंग हो गये हैं और पिछड़ गये हैं। पहले हम लोगों से ,परिवार से, समाज से अपने गाँव से जुड़े होते थे, सब उनके अपने होते थे आज हम अपने स्व में डूब कर कितने अकेले हो गये हैं। वो आत्मीयता जिसकी चर्चा रेणु अपनी कहानी में करते हैं अगर वह ख़त्म हो रही है तो कहीं न कहीं यह एक चिंता का विषय है जो हमें भावनात्मक रूप से असुरक्षित बना रहा है। शायद यही वज़ह है कि हम किसी से आज खुल कर अपने दिल की बात नहीं कर पाते और मनोविकार के शिकार होते जा रहे हैं। फ़ेसबुक या व्हाट्सअप फ्रेंड क्या एक आत्मीय मित्र का स्थान ले सकता है जिससे हम बातचीत और पत्रों के माध्यय से जुड़े होते थे। आज के युग में संवदिया तो अप्रासांगिक हो ही गया है परंतु पत्रों की अनुपस्थिति हमें और भी एकांगी बना रहा है। कुछ दिनों पहले डाक तार सेवा को भारत से सदैव के लिए बंद कर दिया गया। इसकी अब आवश्यकता भी नहीं है पर हमारे व्यक्तिगत पत्र हमारी पूँजी हुआ करते थे जो हम तक अपनों का प्यार, बड़ों का आशीर्वाद पहुंचाते थे। कभी किसी दुःख की घड़ी में हमारा संबल बन जाते थे तो कभी हमारी प्रेरणा बन कर हमारी जिंदगी बदल देने की क्षमता रखते थे। हमारे जीवन से उनका अंत जीवन को कितना कंगाल बना गया है यह वही अनुभव कर सकते हैं जिन्होंने चिट्ठी और पाती से जुड़े सुख-दुख को भोगा है। मानव को मानव बने रखना है और मशीन बनने से बचाना है तो हमें अपने बच्चों को पत्र की महत्ता बतानी पड़ेगी और उनको पत्र से जुड़ना सिखाना होगा कहीं ऐसा न हो कि हमारे बच्चे पत्र को सिर्फ अपने सिलेबस का हिस्सा समझ कर उसे रटते न रह जाएं, जैसाकि आज हो रहा है।

आज 9 अक्टूबर जब संपूर्ण विश्व डाक दिवस मना रहा है रेणुजी के संवदिया के बहाने मन में उठते भाव को व्यक्त तो कर दिया पर आज की परिस्थिति में एक आह सी तो उठती ही है और दिल जार-जार कह उठता है—

दर्द था, कशिश थी या थे दबे जज़्बात

कुछ तो था जिससे भूलती नहीं वो बात

हाय वो चिट्ठी अब क्यों नहीं आती

जो लाती थी अपने संग ख़ुशियों की सौगात।

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