एक कलाकार के शब्दों में सर्बिया का चित्र

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चित्रकार, कलाकार सीरज सक्सेना बहुत आत्मीय गद्य लिखते हैं. यह उनकी सर्बिया यात्रा का वृत्तान्त है. पढियेगा- मॉडरेटर

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कागज़ ,केनवस और कपड़े से बनी अपनी कलाकृतियों की दो एकल प्रदर्शनी के लिए सर्बिआ जाना सुखद तो है ही अति उत्साह इस बात का है कि अपनी कला को नए देश,नई संस्कृति,नई भाषा,नए संस्कार व नए दर्शकों के बीच दिखा पा रहा हूँ। ऐसे अवसर भाग्यशाली कलाकारों को ही मिलते हैं। प्रसिद्ध सिरेमिक कलाकार यास्मीना हवाई अड्डे पर मुझे लेने आईं। उनका घर और स्टूडियो नोवी साद में हैं। नोवी साद सर्बिया का दूसरा बड़ा शहर हैं। मुझे उनके घर ही ठहरना है,लगभग एक सवा घंटे में हम बेलग्रेड से नोवी साद पहुंचे। टेक्सी ड्राइवर ने हमें नेपाल में आए भूकम्प और उससे हुए हुए विनाश की खबर दी। विमान से अपनी यात्रा कर रहा था तब ही यह प्राकृतिक घटना हुई।  में भी इस खबर से अनभिज्ञ था।  रास्ते भर  दोनों ओर लम्बे लम्बे खेत उन पर पसरे तरह तरह के हरे रंग उनसे निर्मित ज्यामितीय आकार खुले और साफ़ नीले आकाश के तले एक रोमांचित कर देने वाला दृश्य रच रहे थे। मन में आया कि आकाश का घरेलू नाम मिला रख दूँ। दुनव नदी पर बने सेतु को नोवी साद पहुंचे। सड़क के दोनों ओर मकान हैं। कुछ चार पांच अमंजिला इमारतें भी हैं। एक इमारत के सामने हमारी टेक्सी रुकी। पांचवी मंजिल पर यासमिना के फ्लेट में हम दोने दाखिल हुए। पूरा घर जैसे स्वागत कर रहा हो। एक शेल्फ पर सिर्फ छोटे सिरेमिक शिल्प रखे हैं। ड्राइंग रूम खुला और बड़ा है इसका एक दरवाजा बड़ा और पारदर्शी है। यहाँ से चन कर दिन की रोशनी पुरे ड्राइंग रूम में फ़ैल रही है। सोफे के सामने राखी मेज़ पर यास्मीना की बनाई मिटटी की ऐश ट्रे राखी है। छोटी चार लोगो की डाइनिंग टेबल पर पास्ता, सर्बियन लेट्यूस सलाद, और ताज़ा सफ़ेद चीज़ खाते हुए पूरे घर को निहार रहा था। सामने बैठी यास्मीन के चेहरे पर मुस्कान थी और उनकी आँखे मुझे निहार रही थी। यात्रा की साड़ी थकान भुला कर मैं घर की हर छोटी बड़ी वस्तु को देख रहा था। यास्मीना सर्बिया के कला संसार और कला के आज के परिवेश के बारे में विस्तार से बताने लगीं। इन दिनों सर्बिया की आर्थिक स्थिति नाजुक हैं। यहाँ बहुत से कलाकार संशय में हैं इन दिनों। कला की जरुरत अब समाज में उतनी नहीं या शायद लोग पहले अपनी अनिवार्य जरूरतें पूरी करना चाहते हैं। कला अब यहाँ अनिवार्य नहीं। हूबहू भारत की तरह।

दिन की रौशनी यहाँ देर शाम तक रहती हैं।

आज यास्मीना अपने स्टूडियो में क्लास लेंगीं। एक लड़की हफ्ते में दो बार यास्मीन से सिरेमिक कला सिखने आती है। यास्मीन का स्टूडियो इसी इमारत के भूतल पर हैं। स्टूडियो दो भागो में बंटा है। दाखिल होते ही बैठक है। महाराष्ट्र की महिलाऐं, गाय, गाँव का एक घर और कुछ बच्चे बड़े बड़े पोटोग्राफ़्स में इस बड़ी दिवार पर लगे हैं। यह दिवार यास्मीन ने भारत को समर्पित की हैं। अन्य दीवारों पर यास्मीन के चित्रकार मित्रों के चित्र है। यास्मीना के शिल्प भी यहां बिखरे हैं। उनके शिल्पों का आकार सरल ज्यामितीय और प्राकृतिक है। राकू पद्धति में पके यासमिना के शिल्प सुर्ख और मटमैले हैं। यही टेबल के पास यासमिना की बीस बरस पुरानी सायकल भी है यह यास्मीना की सहेली भी है और वाहन भी पुरे शहर में यासमिना इसी पर सवार होकर सफर करती हैं। इसका वाहन का नाम हॉलैंड हैं यह एक लेडीज़ सायकल है। इसके हेंडल बार पर एक बास्केट लगी है। सायकल इस स्टूडियो का अहम हिस्सा है और यासमिना की जीवन का भी।

इस बैठक के बाद यास्मिना की कर्मस्थली है। कमरे के बीचोबीच एक बड़ी और लम्बी टेबल है। जिस पर कुछ छोटे चाक, ब्रश, सिरेमिक के औज़ार और गीली मिटटी रखी है। दिवार पर ग्लेज़ छोटे बड़े डिब्बों में बंद है। एक कोने में फ्रंट लोडिंग बिजली से चलने वाली भट्टी रखी है। यासमीना की छात्रा मिटटी से कुछ अमूर्त अकार गढ़ रही है सेर्बिायां भाषा में दोनों बात कर रहीं हैं। एफ. एम. पर गीत बज रहे है। हम तीनो के अलावा  रेडिओ भी अपनी उपस्थिति यहां दर्ज़ करवा रहा है।

सायकल देख खुद को रोक न सका एक कागज़ पर उनकी ही भाषा में उनके घर का पता लिखवाया और उस पर्ची को जेब में रख सायकल पर सवार हो कर सडकों से होता हुआ दुनव नदी के किनारे पहुंचा। घर से अधिक दूर नहीं है यह किनारा दुनव का यह घात पांच किलोमीटर लंबा है। यहाँ दौड़ने, चलने और सायकल के लिए अलग पथ हैं। स्केट करती कुछ लडकियां तेज़ी से आती और ओझल हो जाती। स्केटिंग यहां युवाओं में लोकप्रिय खेल है। छोटे  छोटे पहिओं पर तेज़ी से भागना रोमांचित करने वाला अनुभव है। स्केटिंग मैंने भी देर से ही सही पर दिल्ली सचिवालय की सड़क पर ही सीखी है। ट्रेक पर महिलाएं -बुजुर्ग,युवक युवतियां सायकल चला रहे हैं। कुछ युवा माताएं भी अपने बच्चो को सायकल के पीछे सीट पर बैठा कर सैर करा रही हैं यह शहर सायकिल प्रेमी शहर है। दोपहर के साढ़े तीन बजे भी यहाँ काफी रौनक हैं। नदी पर कुछ बड़े जहाज भी तैर रहे हैं।  नदी के किनारे बंधी एक बड़ी कश्ती एक रेस्तरां है तो उससे बड़ी एक और नौका करों का एक शो रूम है। चमचमाती नै कारें यहां बिकने के लिए तैयार हैं।

नदी के दूसरे किनारे पर पेट्रोवारादीन शहर है। नोवी साद दुनव पर बने तीन बड़े सेतुओं से नदी पार करता है पेत्रोवरादीन का महल यहां से बहुत सुन्दर लग रहा है। एक ट्रेन मेरे पास ही बने सेतु से हौले हौले शहर में प्रवेश कर रही है। दुनव जैसे शहर में प्रवेश करने वाले का अभिवादन कर रही हो। दुनव साफ़ और बहती हुई नदी है। पूरा नोवी साद इसी का पानी पीता है। कुछ बुजुर्ग अपनी छोटी कुर्सियों पर बैठे नदी की और मुह किए बैठे हैं। जैसे किसी गहरी सोच में डूबे हों। पर उन्हें सिर्फ अपने कांटे में  मछली के फ़साने की प्रतीक्षा है। धीरे धीरे युवाओं की भीड़ जमा हो रही हैं। दो चार ओए अधिक संख्या में समूहों में पूरा किनारा अब युवामयी है। यास्मीन की सायकल से  के दो फेरे लगाए। कुछ देर दुनव के किनारे बैठने के बाद जिस रास्ते आया उसी रास्ते लौटने के लिए फिर सायकल पर सवार हुआ। अंदेशा था कि शायद मैं रास्ता भटक जाउंगा पर मई अपनी मंजिल यासमिना के स्टूडियो पहुंच गया। स्टूडियो में दोनों अपने अपने काम में व्यस्त थीं। हाथ में थोड़ी मिटटी ले एक लघु गणेश बनाए। इस शहर में रहना आरम्भ किया। यासमीना से कहा कि तुम्हारा शहर सुन्दर हैं।

छात्रा भी कुछ छोटे शिल्प बना चुकी थी। यासमीना से मुझसे साझा किया की इस छात्रा का हाथ अच्छा है। अपनी एप्रेन उतार कर अब यह युवा छात्रा जाने को तैयार हैं। यासमीना टूल्स समेट रहीं हैं टेबल साफ़ कर रहीं हैं मिटटी ढ़क रहीं हैं। टेबल के एक कोने में बैठ अब यासमीना अपनी सिगरेट सुलगाती हैं। हमारे बीच एक लम्बी टेबल काम करने की जगह रचने और गढ़ने की मिटटी है। हमारे बीच यही एक सृजन सेतु है। यह स्टूडियो मुझे अपना सा लगने लगा। यह स्टूडियो स्टूडियो इस बिल्डिंग का सबसे सृजनशील कोना है। यहाँ न आवाजाही न ही शोर हैं। स्टूडियो की रौनक में एक साधा हुआ गाम्भीर्य हैं। पुराने कैटलॉग देखता तो कभी सिरेमिक इवेंट्स के पोस्टर निहारता तो कभी किसी टूल को उठाता पुरे स्टूडियो के हर कोने को अच्छे से देखा। यासमीना बिना रुके अपने शहर ,अपने युवा दिनों ,वैवाहिक जीवन ,बच्चों,अपने माता-पिता ,मित्रों के बारे में बताती रहीं। यासमीना के माता-पिता भी इसी शहर में रहतें हैं। २८ वर्षीय बेटी दूनिया दुबई में रहती है। बेटा मिवोश यहीं यासमीना के साथ रहता हैं। १८ साल के बाद यहां यूवा पीढ़ी अपने माता पिता से अलग रहना शुरू कर देतें हैं। वे अपना निजी जीवन अपने साथ ही रखना चाहते हैं। माता- पिता से जब चाहे वे मिल सकतें हैं। पर हर समय मुंके साथ रहने में उन्हें जैसे कोई असहजता है। यासमीना कहती है मुझे भी अपना समय चाहिए मई पत्नी हूँ ,माँ हूँ पर एक कलाकार  हूँ  ग्रहणी नहीं ,उनके उत्साह और आत्मविश्वास की कद्र करते हुए मई अपनी गर्दन हिलाता हूँ। वे मुस्कुराती हैं।

दोपहर का नीला आकाश साफ़ व स्वच्छ है गंगा की तरह यह नीली पवित्र गगन गंगा हैं जो ऊपर बहती है। बिल्डिंग से नीचे उतर कर हम लोग शहर के मुख्य चौक की तरफ चल रहे हैं। सामने से आती हवा से सेन्ट्रल की ओर चलती यासमीना  के खुले अनुभवी बाल उड़ रहें हैं फूटपाथ छोटा है कभी वे आगे चलतीं तो कभी मैं उन्हें अपने आगे चलते हुए देखना ज्यादा सुखकर हैं। थोड़ी ही दूर पर एक फिल्म एंड टेलीविज़न संस्थान के प्रोफ़ेसर अपनी किसी मित्र के साथ बाहर खड़े थे। यासमीना ने उन्हें देख अभिवादन किया वे करीब आकर यासमीना को चूमते हैं। गाल पर लिया गया चुम्बन अच्छी दोस्ती का प्रतीक हैं यासमीना की बेटी दूनिया इन्ही की स्टूडेंट रही हैं। दूनिया की बनाई छोटी फिल्म संस्थान द्वारा सराही गयी दूनिया के हुनर से प्रभावित होकर लन्दन में उच्च शिक्षा के लिए उन्हें छात्रव्रत्ति भी मिली। दो वर्ष वहां पढ़ाई करने के बाद दूनिया अब दुबई में काम करती हैं।

मुख्य चौक के रास्ते कुछ कैफे दुकाने हैं दो रेड लाइट पार करने के के बाद अब हम मुख्य चौक के गिरजाघर की पीछे पहुंचे। गिरजाघर की गगनचुम्बी तिकोनी मीनार नीली गंगा से मुखातिब हैं। मौसम साफ़ और हवा में गुनगुनी ठण्ड हैं।

मोमबत्ती लेकर यासमीना गिरजाघर में प्रवेश करती हैं उनके पीछे मै भी। मेरे हाथ में भी उन्होंने दो मोमबत्ती थमा दी। लम्बी और पतली मोमबत्ती। गिरिजाघर चित्रों और मध्यम रोशनी में शांत हैं। ऊँची चाट पर चित्रित देवदूत अपनी अपनी कहानी में लीन हैं। बैठने के लिए कुछ लम्बी लकड़ी की बेंच हैं। दो वृद्ध महिलाएं प्रार्थना में लीन हैं।  मोमबत्ती कछ जगमगा रहा हैं। नीचे वाले शेल्फ में मृत करीबियों की आत्मा शान्ति के लिए मोमबत्ती प्रज्वलित की और ऊपर वाले हिस्से में अपने प्रियजनों के उत्तम भविष्य और स्वास्थ्य के लिए कामना स्वरुप मोमबत्ती हमने जलायी। लोहे की एक बड़ी ट्रे पर रेत और पानी की पतली परत पर कई मोमबत्ती जगमगा रही हैं।

गिरजाघर के बाहर सड़क पर खुले रेस्तरां में कॉफी और सिगरेट पीते हुए अपने बारे में बताते हुए यासमीना भावुक हो गयी। उनकी पीठ पर हाथ रख मैंने उन्हें ढाढ़स देने की सफल कोशिश की।हमारे सामने साबुन के पानी के बड़े बड़े गुब्बारे बना कर उन्हें हवा में उड़ाता एक आदमी बच्चों को खुश करते हुए अपना करतब दिखा रहा था यह आदमी कुछ बेचता नहीं बस बच्चो को महीन गुब्बारे रच कर खुश करता है हर शाम यह आदमी यही गिरजाघर के सामने नियमित यही कृत्य करता है। बच्चों के साथ उनके माँ बाप भी  पारदर्शी गुब्बारों को पकड़ने की कोशिश करते हैं। निश्चित ही पृथ्वी के हर हिस्से के बालक इसी तरह खुश होतें हैं ,यहां किसी भाषा का अधिकार नहीं सिर्फ भाव ही यहां प्रमुख और शुद्ध हैं। अपने डेढ़ माह के प्रवास में इस आदमी को कई बार बच्चों से घिरा देखा हैं। बच्चो को खुश करना भी एक प्रार्थना की तरह ही हैं। कुछ ही देर चलने के बाद हम नोवी साद के रविन्द्र नाट्य गृह (रंगमंच के लिए सभागार ) के सामने पहुंचे। यह एब बड़ा दो मंजिला सभागार हैं। सभागार के प्रथम ताल पर एक सुन्दर रेस्तराँ है शहर में और भी सभागार हैं। यासमीना के आग्रह पर उन्होंने मेरी कुछ तस्वीरें इस सभागार की पृष्ठभूमि में लीं। यासमीना के साथ उनका शहर देखना उनके साथ यहां की गलियों में घूमना जैसे उनके अपने निजी समय में गोता लगाना हैं। यूरोपियन स्थापत्य,ये घर,ये गलियां,नदी,सेतु,रेस्तराँ आदि देखना ऐसा है जैसे में उनके साथ उनके बीस बरस पहले के समय में चला आया हूँ। उनके साथ उनके समय में टहलना एक अविस्मरणीय अनुभव है। मेरी उपस्थित जैसे उनके बीते कल को मेरे आज में ले आई हो।  शहर के इस भाग में काफी चहल पहल हैं ,सभी रेस्तराँ लोगो से भरे हैं। सायकल ही एक ऐसा वाहन हैं जो हर जगह बिना आवाज है। लोगों के साथ उनका यह वाहन भी यहां हैं। इसी वाहन पर फूल और चाबी के चले बेचती महिला हमें अपने फूलों और छल्लों के बारे में कुछ कहती हैं।

लौटते हुए एक युवक मुझे देख ठिठक गया दूर  हाथ हिलाते हुए उसने नमस्ते कहा। वह पास आया और पूछा आप इंडिआ से हैं मैंने कहा हा में भारतीय हूँ। तिबोर—— नाम बताते हुए उसने कहा मैं टेनिस कोच हूँ और हैदराबाद मैं सानिया मिर्ज़ा का  हूँ। उनसे मिलकर हम दोनों को ख़ुशी हुई मैंने उन्हें अपनी प्रदर्शनी के उदघाटन समारोह में आने के लिए निमंत्रित किया।

यासमिना के घर के पास ही एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में कुछ खरीदने के लिए हम पहुंचे। यहां के सभी महिला पुरुष कर्मचारी यासमीना को भली भाँती जानते हैं। यहां का दही दूध चीज़ बहुत अच्छा हैं। यस्मीना की रसोई में कुछ भारतीय मसाले देख तुरंत ही उनसे पूछा की ये कहा से आए ?उन्होंने कहा उन्हें ये मसाले पुणे से मिले वे भारत तीन बार जा चुकी हैं। उनसे अनुमति लेकर मैंने उनकी रसोई में प्रवेश किया और दही आलू और पुलाव बनाया यासमीना को ध्यान में रखकर मिर्च मसालों का प्रयोग काम ही किया। उन्होंने बड़े चाव से भोजन किया  मेरा भी खूब पेट भरा।

कुछ देर बाद ईवना आयीं। उन्हें मेरे चित्र देखने हैं। नोवी साद में वे ही मेरे चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित कर रहीं हैं। वे स्वयं भी चित्रकार  और ग्राफिक कलाकार हैं।  इस शहर में एक कलाकारों के समूह की संचालिका हैं ,उनकी अपनी भी एक निजी कला वीथिका है पर इस वक्त वह पूर्णतः तैयार नहीं है इसलिए मेरी यह प्रदर्शनी शहर की एक शासकीय कला वीथिका गैलरी पोदरम में हो रही हैं। अपने कमरे में रखे बड़े सूटकेस में रखे अपने चित्रों को लेकर ड्राइंग रूम में बारी बारी लाकर रखने लगा देखते ही देखते यासमिना का पूरा ड्राइंग रुम मेरी एकल चित्र प्रदर्शनी में बदल गया। दोनों दर्शक मेरे चित्र देख हतप्रभ थे उनके चेहरे पर उभरे भावों से मुझे यह भान हुआ।  सोफे कुर्सियों ज़मीन पर दीवारों के सहारे खाने की टेबल पर भी चित्र बिखरे थे। यास्मीना मेरे चित्रों को पहली बार हूबहू देख मुग्ध थी। िवना को सभी काम पसंद आए।  दो बड़े केनवस रोल लेकर हम पोदबरा इलाके की एक आर्ट मटेरियल शॉप पर गए।  अपनी उम्र के साठं साल पर चुके दम्पत्ति इस दूकान के मालिक हैं। ट्यूब व जार में रंगों को बड़ी तरतीब से सजा रखा है। तरह तरह के ब्रश,पेन तरह के टूल्स भी यहां है। दूकान छोटी है पर कला सम्बंधित सारी सामग्री यहां उपलब्ध है। अपने केनवस चित्रों के स्ट्रेचर यहीं बनेंगे।

 बाद इस देश में मेरी पहली एकल प्रदर्शनी शाबात्श शहर में हैं।

शाबात्श नोवी साद से सवा घंटे की दुरी पर एक शहर है। अपने चित्रों को बड़े सूटकेस में रख कर मैं यास्मीन के साथ नोवी साद बस स्टेण्ड पहुंचा। रेलवे स्टेशन भी यही हैं। लगभग एक ही प्रांगण में। यहां भीड़ अधिक नहीं हैं। टिकिट ले कर हम अपने प्लेटफॉर्म पर बस की प्रतीक्षा करने लगे।  लगी कुर्सी पर यासमीना बैठी। बस आते ही हम अपनी सीट पर बैठे तय समय मुताबिक़ बस चल पड़ी। न कोई शोर और न ही कोई धक्का मुक्की। शहर पार करते ही यहां की पर्वत श्रृंखला फ्रुष्कागोरा के घुमावदार रास्ते पर हमारी बस चढ़ने उतरने लगी। यहाँ एक राष्ट्रीय उद्यान भी है। तरह तरह के पक्षी यहाँ दीखते हैं। ईसाई मठ भी है यहाँ। जहां साधु अपनी प्रार्थना और साधना में लीन रहते हैं।  रूमा शहर के  कर और कुछ नए यात्रियों को लेकर हमारी बस अब शाबात्श की और पुनः  बढ़ चली।अब सावा नदी पार कर हम अपने गंतव्य शाबात्श शहर में दाखिल हुए। छोटे और साफ़ सुथरे बस स्टेण्ड पर बस से उत्तर कर शहर के सिटी थिएटर पहुंचे इसी थिएटर की कला वीथिका में मेरी प्रदर्शनी हैं। यह इस शहर का प्रसिद्द थिएटर हैं। यहाँ स्लोबोदन हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे भी कलाकार और यासमीना के पुराने मित्र हैं। इस शहर  संतान के अधिकारी भी है। थिएटर के कोफ़ी हॉउस में उन्होंने टर्किश कोफ़ी से हमारा स्वागत किया। थोड़ी ही देर में उनके दो सहायकों की मदद से हम लोगो ने पूरी प्रदर्शनी तैयार कर दी। स्लोबोदान भी मेरे चित्रों की प्रशंसा करने लगे अब में लगभग संकोच की मुद्रा में हूँ। दोपहर के भोजन के लिए स्लोबोदान हमें अपनी दो सहायिकाओं के साथ शहर से कुछ दूर एक प्रसिद्द रेस्तराँ ले गए। यह एक पुराना लकड़ी का यूरोपियन घर हैं जिसे इसके मालिक ने खूबसूरत रेस्तराँ में तब्दील किया हैं। इस घर का सर्बियन नाम है चारदक। आसपास खुला उद्द्यान एक पुराना कुआँ हरे भरे फूलों से लड़े पौधे। बड़ी बडी लकड़ियों से भीतर रेस्तराँ का विभाजन भारतीय ग्रामीण घर की याद दिलाता हैं। रेस्तराँ के बीच हम लोग एक बड़ी टेबल पर बैठे। यहाँ का प्रसिद्द पेय राकिया  गया। शीशे के पतले और छोटे से पात्र में इसे पीया जाता है। राकिया पिने के पहले जिवेली (चियर्स) कहा जाता हैं। यहां स्लोबोदान के कुछ भारतीय मित्र भी हैं। दोपहर का यह भोजन शाबात्श शहर की एक सुन्दर याद है।

थिएटर की बाहरी दीवार पर नाटकों के बड़े बड़े पोस्टर लहरा रहे हैं। इसी दीवार पर मेरी प्रदर्शनी के भी दो सुंदर पोस्टर लगे हैं ,स्लोबोदान ने ही इन पोस्टरों को तैयार किया है।

कपडे से बानी दो बड़ी कृतियों को यहां उपयुक्त जगह मिली। कागज़ के चित्रों को भी सलीके से लगाया। स्लोबोदान हैं यह प्रदर्शनी यहां के दर्शकों एक नया अनुभव होगी।थिएटर में आज एक नए नाटक की प्रतुति हैं। नाट्य प्रेमी सुबह से ही टिकट खरीद रहे हैं। हमारे यहां एक आध महानगरों को छोड़ नाट्य प्रेमी विशह निमंत्रण पास से ही नाटक देखने में अपनी शान समझते हैं। टिकट खरीद कर नाटक नृत्य  आदि देखने सुनाने का चलन अभी हमारे यहां नहीं हैं।   ठीक सात बजे स्लोबोदान ने प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन किया। अपनी भाषा में उन्होंने मेरे और मेरे चित्रों के बारे में विस्तार से बताया। मुझे भी कुछ कहने को कहा गया सबसे पहले मैंने शहर यासमीना ,स्लोबोदान और यहाँ के कला प्रेमियों का आभार माना फिर अपनी कला दृष्टि की बात कही। इस औपचारिकता के बाद दर्शकों में से सीता नाम की एक बुजुर्ग महिला मुझसे मिलने आयीं। उन्हें मेरे चित्रो का भूगोल बेहद पसंद आया। ववे सर्बियन भाषा में बोलती रहीं। उनके मुख से रामायण ,महाभारत सीता आदि सुनना मेरे लिए सुखद अनुभूति रहा। एक चित्र के करीब उन्हें ले जाकर  चित्रों में रचा अरण्य उन्हें दिखाया वे देर तक प्रदर्शनी में रहीं, कुछ युवा चित्रकार और कला विद्यार्थी  मुखातिब हुए। मेरी कार्य शैली,तकनीक  जिज्ञासावश कुछ प्रश्न भी किए। कला शिक्षक,कलाकारों के कलाकार मित्र और कुछ कला समीक्षक भी मिले।

 लिलिया कुछ देर से पहुँची लिलिया यस्मीना की बचपन की मित्र हैं और दोनों एक दूसरे के सुख दुःख की सहेली हैं। यहीं पास एक छोटे शहर श्रमशकमित्रोवित्सा में रहतीं हैं। हम डॉन एक दूसरे से मिलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। कल एक मई है ,यहां इस दिन को छुट्टी मस्ती और पिकनिक दिवस के रूप में मनाते हैं। लोग अपने परिवार मित्रों के साथ नदी के किनारे ,खेत में ,खुले मैदान में,इकठ्ठा होते हैं सब  भोजन बनाते हैं और खाने पिने का पूरा दिन आनंद लेते हैं। सुबह से साम तक यह पार्टी चलती रहती हैं। नए मित्र आते हैं और इस तरह लोग एक दूसरे से दिन भर मिलते हैं। हर कोई खाने या पिने के लिए घर की बानी रकिया ले कर आता है। आज रात हम लिलिया के श्रमशकमित्रोवित्सा गाँव के पुराने पुश्तैनी घर में ही रहेंगे। कल लिलिया ने यहां अपने मित्रों को बुलाया हैं ,कल का दिन पार्टी का दिन हैं। गैलरी बंद होते ही लिलिया के साथ हम दोनों उन्ही की कर से उनके साथ चल पड़े ,अपनी छोटी पुरानी कर से  ड्राइव कर हमें ले जा रही हैं। दोनों सहेलियां आगे बैठी और में अपने बेग के साथ पीछे। रास्ते में सन्नाटा हैं ,रात हो चली है एक्का दुक्का गाड़ी ही कभी सामने से तो कभी  ओवरटेक  चली जाती। सड़क पतली और दोनों और अंतहीन खेतों के बीच बनी हैं। पुरे रास्ते दोनों सखियाँ बातें करती रहीं बीच बीच में यास्मीन के जोरदार ठहाके भी आते रहे।  खुश देख मैं भी प्रफुल्लित हूँ।

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