Home / ब्लॉग / हिंदी सिनेमा के कुछ भूले बिसरे गीतकार

हिंदी सिनेमा के कुछ भूले बिसरे गीतकार

दिलनवाज़ जब फिल्म-गीतकारों पर लिखते हैं तो हमेशा कुछ नया जानने को मिलता है. इस बार उन्होंने हिंदी सिनेमा के कुछ ऐसे गीतकारों को याद किया है जिनको या तो हम भूल गए हैं या जिनके बारे में जानते ही नहीं हैं. पहले जब रेडियो का ज़माना था तो गीतों को सुनवाने से पहले उद्घोषक/उद्घोषिका गीत के साथ गीतकारों के नाम भी बताते थे. जिससे लोगों को उनके नाम याद रह जाते थे. अब तो लोग बिसरते जा रहे हैं. ऐसे में इस लेख के माध्यम से दिलनवाज़ ने उन गीतकारों तथा उनके लिखे गीतों को याद करने का बड़ा अच्छा काम किया है- जानकी पुल.


हिन्दी फ़िल्मो मे गीतकारों की सेवाएं लेने का प्रचलन पहली सवाक फ़िल्म आलम-आरासे अस्तित्त्व मे आया, और आज यह परम्परासी बन गयी है.  आर्देशिर ईरानी ने अपने साहसिक उद्यम से भारतीय सिनेमा मे संगीतकारोंएव गीतकारों के लिए नए अवसर खोल दिए.  गीत-संगीत की यह परम्परा उस समय से आज तक बरकरार है एवं हर सुपरहिट गीत और फ़िल्म अल्बम से मज़बूत हो रही है.  फ़िल्म की पटकथा मे परिस्थितियों के प्रति पात्रों की काव्यात्मक अभिव्यक्तिको गीतों के माध्यम से विस्तार मिला.  इस तरह एक प्रकार से सिनेमामे गीत-संगीत गीतकारजैसे रचनाधर्मी व्यक्तित्व के श्रम का सुपरिणाम है.  उर्दु परिदृश्य से आए जानकारों का फ़िल्म गीत लेखन की ओर रुझान रहा ,एक समय मे यह चलन सा हो गया कि उर्दु से संबंध रखने वाले ही इस क्षेत्र मे कामयाब होते थे.  इस भाषा ने फ़िल्मो को अनेक गीतकार दिए, पर सभी उल्लेखनीय व महत्त्वपूर्ण गीतकार उर्दु से ही आए ऐसा नही है. प्रगतिशील विचारधारा रखने वाले हिन्दी के जानकार गीतकार भी बेहद सफ़ल रहे— कवि प्रदीप, भरत व्यास, नीरज ,योगेश, पंडित नरेन्द्र शर्मा के उदाहरण इसकी ज़िन्दा मिसाल है|(1)
गीतकार का सृजन धर्म कहानी,पात्र,परिस्थिति का निरीक्षण व सूक्ष्म निरीक्षण से प्रेरित होकर अभिव्यक्त होता है. कोई गीतकार किसी बात को कितनी दक्षतासे व्यक्त करेगा, यह पूर्णतया: उसकी व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है.  सुंदर अभिव्यक्तियों से पूर्ण गीत किसी मामूली सी फ़िल्म संगीत को यादगार बना देता है. हिन्दी सिनेमा मे दर्जनो ऐसे उदाहरण हैं जहां गीत-संगीत तो सुपरहिटरहा किन्तु फ़िल्मो ने निराश किया, यह उदाहरण गीत-संगीत को प्रतिष्ठा प्रदान कर यह स्थापित करते हैं कि बेहतरीन संगीत कभी निराश नही करता. कोई सुपरहिट गीत सुनकर श्रोता फ़िल्म के बारे मे जानने को उन्मुख होते हैं, फ़िल्म प्रचारक भी भी इस बात को जानते हैं कि गीत दर्शकों को आकर्षित करेंगे. फ़िल्म प्रमोशन मे गीतों को महत्त्व मिला, विशेष कर रेडियो- टीवी मे फ़िल्म के गीतों के साथ उसकी मार्केटिंग की गयी. फ़िल्म वालों ने टीवी प्रमोशन मे गीत की प्रस्तुतिको गुणवत्तासे अधिक महत्त्व दे दिया, गानों मे फ़ूहडता छाने लगी फ़िर सब कुछ ठीक न हुआ. ऐसे हालात मे फ़िल्म-वालों को कल्याण की राह गुणवत्ता की शरण मे मिली, गीतकारों ने अपने कलम के जादु से गीत-संगीत का बेडा पार कर फ़िल्म संगीत मे लोगों की रुचि फ़िर से जगाई | गुलज़ार, जावेद अख्तर ने टीवी युग को चुनौती देकर श्रेष्ठ गीतों की रचना की, अपनी दूसरी पारियां शुरु कर आज भी मोर्चे पर कायम हैं| वह गुज़रा स्वर्णिम दौर फ़िर से जैसे महत्त्वपूर्ण हो गया, एक ऐसा समय जब शैलेन्द्र, शाहिर, मजरुह, हसरत, शकील बदायुनी, राज़ा मेंहदी अली खान, कैफ़ी आज़मी, नीरज, भरत व्यास, आनंद बक्शी ,गुलज़ार, योगेश के गीतों ने जन्म लिया. ये अनमोल गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय और बीते समय की पहचान हैं.
 पुराने गीतों का जादु कल की तरह बरकरार है, आज भी हमें संगीत-प्रेमी मिल जाएंगे जिन्हे नए गाने से ज़्यादा वही गीत पसंद है.  आजकल के गाने ज़बान पर ज़रूर चढ जाते हैं लेकिन दिल पर गुज़रा ज़माना ही राज करता है.  क्या ऐसे गाने नही बन रहे जो दिल तक पहुंचे?  अगर ऐसा है तो फ़िल्म संगीत को पुनरुत्थानकी बेहद ज़रुरत है.  तकनीकी सुविधाओं के स्तर पर बात करे तो सन 80 के आस-पास बहुत से लोगो के पास टेप या कैसेट रिकार्डर जैसे आधुनिक उपकरण नही थे, वह रेडियो पर फ़िल्म गीत-संगीत का आनंद लेते थे. इसके पूर्व स्थिति इस जैसी भी नही थी, सन 50-60 मे रेडियो होना भी एक बडी बात थी.  यदि हम इस लम्बे अंतराल का जायज़ा ले तो पाएंगे कि हिन्दी संगीत का स्वर्णिमयुग रेडियो पर लोकप्रिय हुआ.  जिस संगीत को लोगो ने रेडियो पर सुनकर याद कर लिया हो वह कितना प्रभावी रहा होगा यह स्पष्ट है. फ़िल्म निर्माता को समय की नब्ज़ पहचान कर संगीत के प्रति कामचलाऊनज़रिया को हटा कर बेहतर संगीत को लाना होगा| गीतकार के व्यक्तित्व को रचनाकी आज़ादी देकर गीतो मे फ़िर से जान डाली जा सकती है.  जब उसके नज़रिए को स्पेसमिलेगा तो गाने दिल तक ज़रूर पहुंचेंगे, यादगार गीतो का स्वर्णिम दौर फ़िर से रचा जाएगा.  गुलज़ार ,जावेद अख्तर, प्रसून जोशी,अमिताभ भट्टाचार्य,स्वानंद किरकिरे जैसे गीतकारो ने इस दिशा मे सकारात्मक कार्य कर कुछ बेहद दिलकश गीतो की रचना की.
हिन्दी फ़िल्म संगीत ने बेहतरीन गीतकारों की एक परम्परा देकर संगीत-प्रेमियों को यादगार तोहफ़ा दिया ,आलम-आरा से चला गीतो का कारवां कुछ उतार-चढाव के साथ चलता रहा और आज के दिन तक जारी है.  संगीत मे गुज़रे ज़माने के फ़नकारो ने कुछ ऐसा कमाल किया कि वह सदा के लिए अमर बन गए. संगीत के सफ़र मे अनेक शख्शियतें आईं, पर हर किसी को याद नही किया जाता. कुछ फ़नकार ऐसे आए जिन्हे सिरे से भुला दिया गया, इन लोगो ने काम तो अच्छा किया पर श्रोता हिन्दी फ़िल्म संगीत ने बेहतरीन गीतकारों की एक परम्परा देकर संगीत-प्रेमियों को यादगार तोहफ़ा दिया ,आलम-आरा से चला गीतो का कारवां कुछ उतार-चढाव के साथ चलता रहा और आज के दिन तक जारी है. संगीत मे गुज़रे ज़माने के फ़नकारो ने कुछ ऐसा कमाल किया कि वह सदा के लिए अमर बन गए. संगीत के सफ़र मे अनेक शख्शियतें आईं, पर हर किसी को याद नही किया जाता. कुछ फ़नकार ऐसे आए जिन्हे सिरे से भुला दिया गया, इन लोगो ने काम तो अच्छा किया पर श्रोता इन्हे नाम से नही पहचानते. इन फ़नकारों मे ऐसे बहुत से गीतकारोका नाम लिया जा सकता है जिनके गाने आज भी सुने जाते हैं पर स्वयंइन्हे भूला सा दिया गया और विमर्श का विषय नही बन सके| गीतकार कमर जलालाबादी, भरत व्यास, हसन कमाल, एस एच बिहारी, शहरयार ,असद भोपाली, पंडित नरेन्द्र शर्मा ,गौहर कानपुरी, पुरुषोत्तम पंकज ,शेवान रिज़वी ,अभिलाष, सरस्वती कु दीपक ,रमेश शास्त्री, बशर नवाज और खुमार बाराबंकवी जैसी शख्शियतें विमर्श का विषय नही हैं | इन गीतकारों फ़िल्म संगीत को एक से बढकर एक गीतो की सौगात दी हैं, संगीत का स्वर्णिम दौर इनके उल्लेख के बगैर अधुरा सा लगता है |
गीतकार कमर जलालाबादी ने अपने सिने कैरियर मे बहुत सुंदर गीतो की रचना की –- ‘दोनो ने किया था प्यार मगर’(महुआ) हावडा ब्रिजका आईए मेहरबान’(हावडा ब्रिज), मैं तो एक ख्वाब हूं (हिमालय की गोद मे) जैसे हिट गीत लिखे| हिन्दी से फ़िल्म मे आए भरत व्यास के गीतो मे हिन्दी कविताई का प्रयोग देखा गया यह कौन चित्रकार है’( बूंद जो मोती बन गई), ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो’(संत ज्ञानेश्वर)
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-10 अंतिम

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात …

2 comments

  1. achchhi jankari ke liye badhaie…

    sheshnath pandey

  2. atyant jaankari bhara lekh. kajra mohabbatvala.. ko main paramparagat lokgeet samajhata tha.

Leave a Reply

Your email address will not be published.