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भगत सिंह! कुछ सिरफिरे-से लोग तुमको याद करते हैं

भगत सिंह की शहादत को प्रणाम के साथ कुछ कविताएँ युवा कवि त्रिपुरारि कुमार शर्मा की- जानकी पुल.
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भगत सिंह के लिए
भगत सिंह!
कुछ सिरफिरे-से लोग तुमको याद करते हैं
जिनकी सोच की शिराओं में तुम लहू बनकर बहते हो
जिनकी साँसों की सफ़ेद सतह पर
वक़्त-बेवक़्त तुम्हारे
ख़याल की बिजली कौंध जाती है
मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ भगत!
जो तुम्हारी जन्मतिथि पर
,
इंक़लाब-इंक़लाबचिल्लाते हैं और आँखों में
सफ़ेद और गेरुआ रंगों की साज़िश का ज़हर रखते हैं
जिसकी हर बूँद में
अफ़ीम की एक पूरी दुनिया होती है
जिसके नशे में गुम है आज सारा भारत
बड़े तूफ़ान की आशंका लगती है!
मैं उनकी बात कर रहा हूँ भगत!
जो समझते हैं कि तुम्हारी ज़रूरत आज भी उतनी ही है
जितनी उस वक़्त थी
(मुझे लगता है कि हर शख़्स में एक भगत सिंह होता है)
तुम्हारे और मेरे वक़्त में बहुत फ़र्क आया है
भगत
तुम ज़मीन में बंदूक बोते थे
बारूद की फसल तो हम भी काटते हैं
मगर हमारे उद्देश्य बदल गए हैं
तुम्हारा उद्देश्य दूसरों से ख़ुद को बचाना था
हमारा उद्देश्य दूसरों को ख़ुद से मिटाना है!
काश! कि यह बात हम सब समझ पाते
और अपने भीतर के भगत सिंह को जगाते!
आज जबकि
आज जबकि ज़िंदगी बिखरी हुई है
आज जबकि धड़कनें उखड़ी हुई हैं
आज जबकि रोशनी सिमटी हुई है
आज जबकि चाँदनी सहमी हुई है
आज जबकि आँख में जाले पड़े हैं
आज जबकि जीभ में छाले पड़े हैं
आज जबकि साँस में शीशे चुभे हैं
आज जबकि देह में तकलीफ-सी है
कुछ समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं
देश के हालात कुछ
अनबनहुए हैं
दोस्तों की शक्ल में दुश्मन हुए हैं
हर किसी को चाहिए कि अपने भीतर
नींद में धुँधले हुए ख़्वाबों से उठकर
एक ज़रा-सा अपने दिल के अंदर झाँके
और अपने
भगतको आवाज़ दे ले!
दोष
जब हमारी ही तरह दिखने वाले कुछ लोग
क्लोज-अपसे धोए हुए चमकदार दाँतों से
कुतर देते हैं बेज़ुबान साँस की पंखुड़ियाँ
या मासिक धर्म शुरू होने के एक दिन पहले
अपनी क्लासमेट की सिसकती हुई कोख में
पटक देते हैं अँधेरे का एक सफ़ेद टुकड़ा
तो ऐसों के बारे में क्या ख़याल है आपका
?
क्या आप मानते हैं कि वह दोषी है
?
या दोष उस तंत्र का है
जो उसे वैसा होने पर मजबूर करता है
कहते हैं अगर परवरिश अच्छी हो तो पेड़ अच्छे होते हैं।
देश के हालात  
तुम देश के हालात से वाकिफ तो होगे
हर तरफ एक शोर-सा बरपा हुआ है
कुछ लोग अपनी टोपियों में आँख भर कर
चाहते हैं कि नज़ारा ही बदल जाए अभी
कुछ कान में भर कर घंटियों की सदा
सोचते हैं कोई आ के बचाएगा उन्हें
कुछ हाथ में ले कर बस एक किताब
बोलते हैं कि
सवा लाखके बराबर हूँ
कुछ शक्ल अपनी सलीब की सूरत बना कर
कहते हैं कि उनके जैसा यहाँ कोई नहीं
हर तरफ एक शोर-सा बरपा हुआ है
तुम देश के हालात से वाकिफ तो होगे
कानून की देवी
कानून अंधा होता है
पुराना हो चुका है यह जुमला
अब तो कानून की देवी ख़ुद
सफ़ेदपोश लोगों के शयन कक्ष में
बिस्तर के सिलवटों की गवाह बनती है।
(बदन से
लेडी डायनाकी बू आती है)
बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में
तुम्हारा भारत
एक डंडे की नोक पर फड़फड़ाता हुआ तीन रंगों का चिथड़ा है
जो किसी दिन अपने ही पहिए के नीचे आकर
तोड़ देगा अपना दम
तुम्हारे दम भरने से पहले।
मेरा भारत-
चेतना की वह जागृत अवस्था है
जिसे किसी भी चीज़ (शरीर) की परवाह नहीं
जो अनंत है
, असीम है
और बह रही है निरंतर।
तुम्हारा भारत
सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर
महज कुछ लकीरों का समन्वय है
जो एक दूसरे के ऊपर से गुज़रती हुईं  
आपस में ही उलझ कर मर जाएँगी एक दिन।
मेरा भारत-
एक स्वर विहीन स्वर है
एक आकार विहीन आकार है
जो सिमटा हुआ है ख़ुद में
और फैला हुआ है सारे अस्तित्व पर।
तुम्हारा भारत
सरहदों में सिमटा हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा है
जिसे तुम
माँशब्द की आड़ में छुपाते रहे
और करते रहे बलात्कार हर एक लम्हा
लाँघकर निर्लज्जता की सारी सीमाओं को।
मेरा भारत-
शर्म के साए में पलती हुई एक युवती है
जो सुहागरात में उठा देती है अपना घुँघट
प्रेमी की आगोश में बुनती है एक समंदर
एक नए जीवन को जन्म देने के लिए। 
तुम्हारा भारत
राजनेताओं और तथा-कथित धर्म के ठेकेदारों
दोनों की मिली-जुली साज़िश है
जो टूटकर बिखर जाएगी किसी दिन
अपने ही तिलिस्म के बोझ से दब कर।
मेरा भारत-
कई मोतियों के बीच से गुज़रता हुआ
माला की शक्ल में वह धागा है
जो मोतियों के बग़ैर भी अपना वजूद रखता है।
बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में! 
 
      

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23 comments

  1. सभी भगत सिंह की याद दिलाती और उनका मान और ऊंचा करती हुयीं….

  2. शुक्रिया…अशोक भाई आपको पसंद आई कविताएँ!

  3. आज पुराना माल खंगालने बैठा तो जानकी पुल से कैसे-कैसे हीरे मिल रहे हैं. बधाई त्रिपुरारी जी

  4. सभी कवितायेँ बहुत मानीखेज है, गहरा प्रभाव छोड़ने में सक्षम, कुछ बिम्ब सहसा ही ध्यानाकर्षित करते हैं…….सार्थक कविताओं के लिए त्रिपुरारी जी को बधाई…….

  5. मेरा भारत-
    चेतना की वह जागृत अवस्था है
    जिसे किसी भी चीज़ (शरीर) की परवाह नहीं
    जो अनंत है, असीम है
    और बह रही है निरंतर।
    badhia kavitaye

  6. मुझे लगता है कि हर शख़्स में एक भगत सिंह होता है .

  7. विचारोत्तेजक और प्रभावशाली है ये कविताएं…खासकर पहली कविता मुझे बहुत पसंद आई …हां..धूमिल के मुहावरे का नया प्रयोग भी पसंद आया , जिसमे उन्होंने पूछा था …क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है / जिसे एक पहिया ढोता है / या इसका कोई खास मतलब होता है ….|…बधाई आपको

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