Home / ब्लॉग / कहानी हीर-रांझा की पुरानी थी, पुरानी है

कहानी हीर-रांझा की पुरानी थी, पुरानी है

हिंदी गज़लों का अपना मिजाज रहा है, उसकी अपनी रंगों-बू है और उसकी अपनी ‘रेंज’ भी है. वह जिंदगी के अधिक करीब है. श्रद्धा जैन की गज़लों को पढते हुए इसे महसूस किया जा सकता है- जानकी पुल.
————————–

1.
जब हमारी बेबसी पर मुस्करायीं हसरतें
हमने ख़ुद अपने ही हाथों से जलाईं हसरतें
ये कहीं खुद्दार के क़दमों तले रौंदी गईं
और कहीं खुद्दरियों को बेच आईं हसरतें
सबकी आँखों में तलब के जुगनू लहराने लगे
इस तरह से क्या किसी ने भी बताईं हसरतें
तीरगी, खामोशियाँ, बैचेनियाँ, बेताबियाँ
मेरी तन्हाई में अक्सर जगमगायीं हसरतें 
मेरी हसरत क्या है मेरे आंसुओं ने कह दिया 
आपने तो शोख रंगों से बनाईं हसरतें
सिर्फ तस्वीरें हैं, यादें हैं, हमारे ख़्वाब हैं 
घर की दीवारों पे हमने भी सजाईं हसरतें
इस खता पे आज तक श्रद्धाहै शर्मिंदा बहुत 
एक पत्थरदिल के क़दमों में बिछायीं हसरतें
2.
नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए 
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए 
तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम 
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए
फ़ज़ा में देर तलक साँस के शरारे थे
कहा है कान में कुछ उसने पास आते हुए
हरेक नक्श तमन्ना का हो गया उजला 
तेरा है लम्स कि जुगनू हैं जगमगाते हुए
दिल-ओ-निगाह की साजिश जो कामयाब हुई 
हमें भी आया मज़ा फिर फरेब खाते हुए 
बुरा कहो कि भला पर यही हक़ीकत है 
पड़े हैं पाँव में छाले वफ़ा निभाते हुए
3.
जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी 
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी 
भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी
धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर 
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी 
बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी 
आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है 
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी 
नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी 
जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना 
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी 
वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं श्रद्धा 
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी
4.
अपने हर दर्द को अशआर में ढाला मैंने
ऐसे रोते हुए लोगों को संभाला मैंने 
शाम कुछ देर ही बस सुर्ख़ रही, हालांकि
खून अपना तो बहुत देर उबाला मैंने 
बच्चे कहते हैं कि एहसान नहीं फ़र्ज़ था वो
अपनी ममता का दिया जब भी हवाला मैंने 
कभी सरकार पे, किस्मत पे, कभी दुनिया पर
दोष हर बात का औरों पे ही डाला मैंने 
लोग रोटी के दिलासों पे यहाँ बिकते हैं 
जब कि ठुकरा दिया सोने का निवाला मैंने
आप को शब् के अँधेरे से मुहब्बत है, रहे
चुन लिया सुबह के सूरज का उजाला मैंने 
आज के दौर में सच बोल रही हूँ श्रद्धा 
अक्ल पर अपनी लगा रक्खा है ताला मैंने 
5.
काश बदली से कभी धूप निकलती रहती
ज़ीस्त उम्मीद के साए में ही पलती रहती
एक पल को भी अगर तेरा सहारा मिलता 
ज़िंदगी ठोकरें खा के भी संभलती रहती 
फ़र्ज़ दुनिया के निभाने में गुज़र जाते दिन
और हर रात तेरी याद मचलती रहती
पाँव फैलाए अँधेरा है घरों में, फिर भी 
शम्म: हालाँकि हर इक बाम पे जलती रहती
शांत दिखता है समुन्दर भी लिए गहराई
जब कि नदिया की लहर खूब उछलती रहती
तू अगर होती खिलौना तो बहुत बेहतर था
तुझसे श्रद्धाये तबीयत ही बहलती रहती
6.
वो सारे ज़ख़्म पुराने, बदन में लौट आए
गली से उनकी जो गुज़रे, थकन में लौट आए
हवा उड़ा के कहीं दूर ले गई जब भी
सफ़र तमाम किया और वतन में लौट आए
जो शहरे इश्क था, वो कुछ नहीं था, सहरा था
खुली जो आँख तो हम फिर से वन में लौट आए
बहार लूटी है मैंने कभी, कभी तुमने
बहाने अश्क़ भी हम ही चमन में लौट आए
ये किसने प्यार से बोसा रखा है माथे पर
कि रंग, ख़ुशबू, घटा, फूल, मन में लौट आए
गए जो ढूँढने खुशियाँ तो हार कर “श्रद्धा”
उदासियों की उसी अंजुमन में लौट आए
7.
बना लें दोस्त हम सबको, ये रिश्ते रास आएँ क्यूँ
बने सागर अगर दुश्मन किनारे फिर बचाएँ क्यूँ
बजे जो साज़ महफ़िल में, हमारे हो नही सकते
हम इन टूटे हुए सपनों को आखिर गुनगुनाएँ क्यूँ
लहू बहता अगर आँखों से तो लाता तबाही, पर
मेरे ये अश्क के कतरे किसी का घर जलाएँ क्यूँ
बचेंगे वो कि जिनमें है बचे रहने की बेताबी
जिन्हें मिटने की आदत हो उन्हें हम फिर बचाए क्यूँ
ये शबनम तो नहीं श्रद्धातेरी ग़ज़लें हैं शोलों सी
किसी को ये रिझाएँ क्यूँ किसी के दिल को भाएँ क्यूँ
8.
पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़
क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़
नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भर
सड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़
कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़ 
ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से भर देगा 
किताब-ए-ज़िस्म को पढ़ना, ज़रा बुझा के चराग़
करो जो इनसे मुहब्बत, तो हो जहाँ रोशन
यतीम बच्चे नहीं, ये तो हैं ख़ुदा के चराग़
उजाला बाँटना आसान तो नहीं श्रद्धा
चली हैं आँधियाँ जब भी रखे जला के चराग़
9.
अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया 
नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं 
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया
सहर
 
      

About Prabhat Ranjan

Check Also

तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-10 अंतिम

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात …

One comment

  1. Attractive section of content. I just stumbled upon your
    web site and in accession capital to assert that I acquire actually enjoyed account
    your blog posts. Anyway I will be subscribing to your augment and even I achievement you access consistently rapidly.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *