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गुवाहाटी के गले से चीख निकली है


युवा कवि त्रिपुरारि कुमार शर्मा की कविता. इसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है, कविता अपने आप में सब बयान कर देती है- जानकी पुल.
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गुवाहाटी के गले से
चीख निकली है 
चीख, जिसमें दर्द है, घुटन भी है
चीख, जिसमें रेंगती चुभन भी है
चीख, जिसमें सर्दसी जलन भी है
चीख, जिसमें लड़की का बदन भी है

उस चीख के सन्नाटे में महसूस करता हूँ 

कि मोहल्ले की सभी लड़कियाँ असुरक्षित हैं  
बोझ से झुक रहा है मेरा माथा
माथे से काले धुएँ का एक सोता फूट पड़ा है

मैं शर्मिंदा हूँ अपने कानों पर 

मुझे झूठे लगते हैं उस मुँह से निकले हुए शब्द
जो कहते हैं कि हमने
कृष्ण
, बुद्ध, महावीर, नानक और कबीर को जन्म दिया है   

मुझे इस धरती पर यक़ीन नहीं आता 

(कि जिसपर मेरे पाँव अब भी जमे हैं)
जो सोना उगलने की बात करती है
मैं भतीजे को कभी ये क़िस्सा नहीं सुनाऊँगा
कि सिकंदर भारत से क्यों लौट गया था

मेरी पुतलियों पर गर्भ में मरी बच्ची का चेहरा उभरता है 

पीली पड़ती जाती है सिसकती हुई एक काली कोख
मैं अपनी साँस छिड़क रहा हूँ अंधी आग में
और कुछ गीदड़ मेरी बरौनियों पर नाच रहे हैं

मैंने अपनी बहन से कहा है 

हो सके तो मेरे सामने मत आना कुछ रोज़
छोटा भाई, घर के सारे आईने फेंक रहा है
माँ ने मेरे बालों में तेल डालने से इंकार कर दिया है
मैं नहीं सोच पाता हूँ
कि बाबूजी होते तो क्या कहते/करते इस वक़्त


दिल्ली 
14 जुलाई 2012 
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9 comments

  1. कविता जी…_
    ऐसा हो सकता है भला…आपकी तो कोई भी बात मेरे लिए उपयोगी ही होगी…हाँ कभी-2 नेटवर्क की नीयत बदल जाती है…शायद इसीलिए डिलिट हो गया होगा। आपका बहुत शुक्रिया…ये देखिए अभी तो दिखाई दे रहा है…

  2. This comment has been removed by the author.

  3. रचना की पूर्णतया प्रशंसा ही की गई थी, परंतु तब भी मेरी टिप्पणी डिलीट क्यों कर दी गई ?

  4. रचना भावुक कर देने से अधिक, आक्रोश उपजाए यह उसकी सार्थकता है। जिस विसंगत समाज के हम प्रतिनिधि हैं वह विसंगतियों के प्रति विरोध से अधिक समझौता सिखाता है, यह उसकी सब से बड़ी विसंगति है।
    कविता की बुनावट में जो अलिखित छोड़ा गया है वह बहुत कुछ कहता है जैसे
    `जो सोना उगलने की बात करती है' के पश्चात् सीधे `मैं भतीजे को कभी ये क़िस्सा नहीं सुनाऊँगा' के मध्य जो फँसा है वह अलिखित है, चीख उसी की प्रतिध्वनि है, उसे महसूसा जा सकता है। मुझे अपनी एक बहुत पुरानी कविता "चीख से ऊँचा हमें कहना कभी आया नहीँ" बार बार याद आती रही।
    बधाई त्रिपुर !

  5. दर्द से डूबी रचना,दर्द को पिरोती रचना ,बस कोई न था उस वक्त ……..हैं सभी भाव शून्य ………
    त्रिपुरारी जी,आभार आपका अपनी रचना को साझा करने के लिए….

  6. oh main khud ko itna lachaar mahsoos kar rahi hoon.. 16 varsh kee bachchi aur itne saare log.. kya unme se ek bhi baap ya bhai nhi tha..

  7. मैंने अपनी बहन से कहा है
    हो सके तो मेरे सामने मत आना कुछ रोज़
    छोटा भाई, घर के सारे आईने फेंक रहा है
    माँ ने मेरे बालों में तेल डालने से इंकार कर दिया है
    मैं नहीं सोच पाता हूँ
    कि बाबूजी होते तो क्या कहते/करते इस वक़्त!

    एक बेहद जरूरी कविता, अंतिम पंक्तियाँ सीधे दिल में घर कर गयी…..सोच को एक जाम की स्थिति पर लाकर छोडती कविता….आगे का रास्ता हमें खुद तय करना होगा……

  8. यह कविता कहती है कि कवि-कर्म ही पर्याप्त नहीं है ,कुछ और भी करणीय है हमारे लिए और जो जब-जब नहीं हो पाता है तो उस लाचारी से उत्पन्न आक्रोश और जुगुप्सा खुद ही को खाने लगती है !

    एक झकझोरने वाली कविता ,लेकिन इस झकझोरे जाने का परिणाम ? हमें खुद में ढूँढना पड़ेगा !

  9. tripurari ….पूरा पढते पढते मै भावशून्य हो गई और अंत में तो मरने की सी स्थिति ……
    …..
    मैंने अपनी बहन से कहा है
    हो सके तो मेरे सामने मत आना कुछ रोज़
    छोटा भाई, घर के सारे आईने फेंक रहा है
    माँ ने मेरे बालों में तेल डालने से इंकार कर दिया है
    मैं नहीं सोच पाता हूँ
    कि बाबूजी होते तो क्या कहते/करते इस वक़्त!

    हलक में कुछ फंसा सा है शायद आँसू जो आँख से बह कर तुम्हारी कविता पर गिरना नही चाहते …..

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