‘कथादेश’ में शालिनी माथुर के लेख के प्रकाशन के बाद अनामिका और पवन करण की कविताओं पर वाद-विवाद-संवाद का लंबा सिलसिला चल रहा है. आज जानकी पुल पर इस बहस का समापन हम ‘कथादेश’ में ही प्रकाशित अनामिका के लेख से कर रहे हैं, जो ‘सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित’ है- त्रिपुरारि कुमार शर्मा
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कविता के कंधे : अनामिका
(सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित)
“Memory is personified as a profoundly benign feminine force which takes the place of god as the ringer of hope and tranquility at the moment of death.” (सुई चैपलिन, मेमरी, इमेजिनेशन एंड द मदर)
(स्मृतियाँ निरभ्र स्त्री चेतना का मानवीकरण हैं और मृत्यु के क्षण आशा और सुकून के स्रोत के रूप में ईश्वर का स्थानापन्न)
“Her dwelling is without physical boundaries of any kind… too wide for walls, too high for dome, hose floors are pure space.” (इरिगेरी, विलेट)
(भौतिक सीमाओं के पार खड़ा है उसका घर… दीवारों के पार, गुम्बदों के परे…दहराकश है उसका फर्श)
“Beloved looked at the tooth and thought this is it. Next would be her arm, her hand a toe. Pieces of her would rop, maybe one at a time, may be all at once.”
(बिलवेड ने दांत पर नजर गड़ाई और सोचने लगी! तो ये रहा! अब उसकी बांह झड़ेगी, फिर हाथ, फिर पैर का अंगूठा! एक-एक अवयव छितिर-बितिर हो जायेगा। क्या जाने एक-एक करके या एक झपाके में)
प्रिय शालिनी जी,
प्रेमचंद के ‘बड़े भाई साहब’ वाले भाव से आपसे दो बातें कहना चाहूंगी। पहली ये कि कविता का स्वाभाव औरत का स्वाभाव है, हबड़-दबड़ करने वाले हल्लाबाज लोगों के सामने वह खुलती ही नहीं।
और दूसरी ये कि कलपना और कोसना भाषा के हीनतर प्रयोगहैं जिनसे हमारे भीतर की दीनता रेखांकित होती है! कविता इनसे भरसक बचती है और स्त्रियों को भी बचना चाहिए! जहाँ तक मेरी समझ में आता है, भाषा के दो सार्थक प्रयोग हैं उद्बोधन और प्रश्नकालीन; उद्बोधन व्यक्ति मात्र में छुपे सम्यक बुद्धत्व का और प्रश्नकालीन भेद-भाव की भी संरचनाएँ प्रस्तावित करने वाले समस्त प्रबंधन का; उद्बोधन और प्रश्नकालीन ऐसे द्वेष-शून्य, उद्दात स्वर में कि सामने वाला चौंककर देखे अपने भीतर और बाहर भी,आत्मन की ओर तज्जन्य परिवेश की सारी असंगतियाँ एक कौंध में इस तरह उजागर हों कि एकदम से बदल जाने की और बदल देने की साध जगे मन में! ईसा मसीह तो यह कहकर सूली पर चढ़ गए कि हे ईश्वर उन्हें माफ़ कर देना कि ये नहीं जानते, ये क्या कर रहे हैं, और और उसके बाद विमर्श उठे, उन्होंने कहा, ‘ईसू, यदि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं तो इन्हें जानना चाहिए, हम दिखाएँगे इन्हें आईना कि इन्हें पता तो चले कि ये क्या कर रहे हैं’।
खौलते हुए पानी में चेहरा नहीं दीखता। भाषा भी पानी ही है! उसकी सतह शांत होगी, तभी वह परावर्तित कर पाएगी पहले अपना चेहरा, फिर सामने वाले का! आत्मान्वेषण के बाद ही दूसरों का छिद्रान्वेषण तर्कसंगत जान पड़ता है। रामकृष्ण परमहंस सने स्वंय गुड़ खाना छोड़ा, तभी उनकी वाणी में वह प्रकाश आ पाया जो बच्चे की दिनभर गुड़ चुभलाने की आदत छुड़वा दे!
काम, क्रोध, लोभ के अतिरेक से ग्रस्त अतिपुरुषों को अधिक मानवीय और काम्य, सम्यक पुरुष बनाने के यत्न तब तक परवान नहीं चढ़ सकते जब तक इन विचारों में अतिरेक से बचने की कोशिश स्वंय हम न करें। ‘हाइपर’ की काट ‘हाइपर’ नहीं होता, एक दमनचक्र का जवाब दूसरा दमनचक्र क्योंकर होग, ख़ासकर अब, आंदोलन के इस तीसरे चरण में मर्दवादी भाषा में क्योंकर डाँटना साथ चल रही बहनों और उन हमदर्द पुरुषों को जो परकाया प्रवेश की कोशिश कर रहे हैं? क्या आत्मघाती नहीं है उन्हें इतना गर्वित समझना कि वे बीमार व्यक्ति पर व्यंग्य करेंगे या उसकी बीमारी भुनाएँगे? खराब से खराब कविता भी किसी संघर्ष सिद्ध वंचित का मनोबल गिराने का कार्य नहीं करती! इस तरह की गर्हित कल्पना करने वाले का साथ वह छोड़ जाती है। स्वंय को श्रेष्ठ और दूसरों को नीच समझना क्या एक तरह का फासीवाद नहीं?
कविता कम सुखन विद्या है! जैसा कि पहले कहा। उसका स्वभाव स्त्री-स्वभाव से मिलता-जुलता है। वह बहुत ज़्यादा नहीं बोलती और बोलती है तो इंटेंस इशारों में! उसका अपोरिया, उसकी ब्रह्म गाँठ खोल पाना, उसे डीकोड कर पाना उसी सम्वेदनशील धैर्य की माँग करता है जो किसी परेशानहाल/वंचित (स्त्री-दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक-अश्वेत-निर्धन-निर्बल और बीमार) के अवचेतन की गाँठें खोलने में अपेक्षित है! पूरी आधुनिक कविता के बारे में आपने जिस भर्त्सनामूलक स्वर में बात की है, आप स्वंय पढ़कर देखें, वह कैसा है, ‘कविता ने शिल्प में अनुशासन से तो स्वंय को मुक्त कर लिया है। न छंद, न लय, न अलंकार, न छवियाँ, न बिम्ब, कविता अब गाई भी नहीं जाती, पढ़ ली जाती है (जैसे पढ़ लिया जाना अब खराब बात हो) तो क्या पढ़कर समझी भी जाए?’
समझने की योग्यता विकसित करनी पड़ती है! जैसे नए पुरुष को नई स्त्री के योग्य बनना पड़ता है, नए पाठक को कविता के योग्य! कहीं जो समझने में चूक हो रही हो, अर्थ खुल नहीं रहा हो तो अफरा तफरी में अर्थ का अनर्थ करने से तो बचना ही चाहिए! भाषा का डिस्मिसिव तेवर, एक पूरी विधा को उसकी औकात बता देने का यह प्रचंड तेवर मर्दवादी भाषा का तेवर है कि नहीं? उसी तेवर में, ठीक इसी तरह आधुनिक स्त्री को भी उसकी औकात बताई जाती है, “स्त्री ने हर तरह की नफासत से, बंधन से स्वंय को मुक्त कर लियाना पारम्परिक रीति-नीति, न लयात्मक माधुर्य, न अलंकार,न (मनहर) छवियाँ, न बिम्ब गुनगुनाती भी नहीं किसी तरह पढ़ जाती है… उसे समझना टेढ़ी खीर है!”
आधुनिक स्त्री का अकेलापन रामगुप्तों से घिरी ध्रुवस्वामिनी का अकेलापन है (हड़बड़िया पाठकों से घिरी कविता के अकेलपन जैसा-) पढ़-लिखकर उसके अपना जैसा नैतिक और बौद्धिक परिष्कार कर लिया है, ज़्यादातर स्थितियों में उसके साथी पुरुषों/प्रिय पाठकों में वह परिष्कार/वह धैर्य अभी आना है। वाई-फैक्टर दुर्दम्यता,मर्द-बच्चा दीखने के यत्न में मातृ-छवि से स्वंय को सायास अलग करने की मजबूरी सामाजीकरण की अन्य दुरूह प्रक्रियाएँ पुरुषों को अतिपुरुष बना जाती हैं। यदि कोई ध्रुवस्वामिनी के योग्य चंद्रगुप्त बनना चाहता हो या पद्मिनी नायिका के योग्य धीरोदत्त/धीरललित/धीर प्रशांत नायक तो उसे संकल्पपूर्वक अतिपुरुष के खाँचे से बाहर आकर सम्यक पुरुष यानी प्रजातांत्रिक/दोस्त पुरुष बनना होगा!
लड़कियों की जीन में (उग्रता प्रस्तावित करने वाला) कोई वाई फैक्टर नहीं होता, (यदि वो उग्र होती हैं तो किसी कुंठा से), जबरदस्ती मातृ-छवि से स्वंय को अलगाकर ‘अनजान सिंह’ वाली छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी भी बचपन में उनके साथ नहीं घटती, इसका स्पष्ट लाभ उनकी भाषा को होता है, वह अधिक सहज-प्रभावपूर्ण, बिम्बपरक, उच्छल, प्रसन्न, अकुण्ठ और विनीत होती है। विस्मय बोधकों, विस्मयादि बोधकों और तरह तरह के हँसमुख खिलवाड़ों से भरी हुई! ऐसा नहीं है कि भाषा उनके लिए युद्धभूमि नहीं और तरह तरह के हित निकायों की विकट भिड़ंत से संचित नहीं करतीं, लेकिन युद्धभूमि को लीलाभूमि बना लेने का कौशल उन्हें और उनकी भाषा, विशेषकर काव्यभाषा को अलगकर गरिमा देता है और एक हँसमुख उजास भी! विशेषकर स्त्रीत्ववादी, कविता का एक लोकप्रिय हथियार है ‘भ्रमरगीत’ और ‘लोकगीतों’ वाली व्यंजनापरक मिमिक्री! ग्रामवधुओं की परिहासपरकता से वे पुरुषों द्वारा स्वंय अपने नख-शिख वर्णन में प्रयुक्त सिद्ध उपमानों/रुपकों में अंतरपाठीय सम्वाद साधती हुई उन्हें सर के बल खड़ा कर देती हैं कि उनकारुमान झड़े : कालिदास से अंतरपाठीय सम्वाद करते हुए ‘ब्रेस्ट कैंसर’ के पहाड़ (भीतर ‘मौत चुहिया’ समेटे) ‘ब्रेस्ट’ से जुड़ा सारा रुमान झाड़ना चाहते है और ऐसा करते हुए वे यह भी बताना चाहते हैं कि स्त्री की अस्मिता किसी एक अंग में कीलित नहीं की जा सकती, वह उसके पार जाती है!
हर यौनांग का एक यौनेतर उपयोग भी होता है! अपनी टक्कर का पुरुष कितनी स्त्रियों को मिलता है? ज़्यादातर स्त्रियाँ तो बाल-बच्चों में मगन ही अपना जीवन काट देती हैं, बाल-बच्चे अपने हों या मुहल्ले के; वात्सल्य ही उनके जीवन का एकमात्र रस रह जाता है; बहुधा अपने पतियों को भी वे बालबुतरू मानकर पाल देती हैं, ‘पिया मोरा बालक, हम तरुनी/ पिया लेली गोदक चलली बजार’ भाव से। इसका नतीजा यह है कि उनके स्तन उन्हें यौनांग लगते ही नहीं, महाश्वेता देवी की ‘स्तनदायिनी’ हो या जॉन स्टीनबेक के ‘द ग्रेप ऑफ रोथ’ की नायिका दूध से भरी छाती जो अकाल में भूख से मर रहे परम अनजान व्यक्ति के मुँह में परम निर्विकार भाव से लगा देती है। ज़्यदातर स्त्रियाँ अपने अपने शरीर से इतनी ही निस्संग रहती हैं, शालिनी बाबू! मैं जिस मिथिला की हूँ, वहाँ तो अट्ठाइस-तीस की उम्र में ही माताएँ सासें ब्लाउज धारना बंद करके पूरी तरह मातृमय हो जाती हैं। पता नहीं आपने ऐसी औरतें कहाँ देखीं जो आपके ही शब्दों में बेध्यानी का अभिनय करते हुई जानबूझ कर सबके सामने पल्ला सरकाती हैं, और ध्यान से चारों ओर देखती है कि सबने उसे देखा या नहीं, किसी सामान्य औरत की कल्पना के परे है यह हरकत, हाँ, मानसिक रुग्णता हो तो बात अलग है। गाली तो मानसिक रुग्णता की स्थिति में भी उसे नहीं पड़नी चाहिए।
अरे भैया, शालिनी, कहाँ पैदा हुए हैं अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दे। यौनिकता अपने आप में कोई गर्हित चीज़ नहीं,मगर पढ़ी-लिखी, चेतन, परिष्कृत मन वाली स्त्री की यौनिकता जगा पाना इतना आसान नहीं। वैसे भी स्त्री-शरीर कोई पुपुही नहीं होता कि एक फूँक में बजने लगे। गम्भीर राग-रागनियों,श्रुतितों-अनुश्रुतियों से भरी हुई रुद्रवीणा है स्त्री-शरीर, उसका अंतर्संगीत जगा पाना लुच्ची-लम्पट पोर्नोग्राफिक कोशिशों के वश में है भी क्या?
पढ़ी-लिखी स्त्रियों के सामने पोर्नोग्राफिक का फार्स स्पष्ट है! वे ‘हार्डपोर्न’ की मिमिक्री कर सकती हैं, उपहासपरक स्वर में उसे सर के बल खड़ा कर सकती हैं, स्वंय क्यों ‘हार्डपोर्न’ लिखने लगीं, किस पुरुष-पुंगव के लिए? विज्ञापन आदि में भी पुरुष-पुंगव के अंग-विशेष के फूहड़ प्रदर्शन की भी ज़रूरत उन्हें नहीं पड़ती! ख़ासकर स्त्रीत्ववादी कविताओं में,कितना भी खुला वर्णन हो अंगों का, एक व्यंगाधार वहाँ होती है जिसे अभिधा के रूप में बाज़ारवादी आग्रहों के साथ पढ़ना हास्यास्पद है; अब जैसे अश्वेत कवि, ग्रेस निकोलस की ही यह कविता कहाँ से अश्लील है, कोई बताए हमें
“आओ और देख लो मुझे
वृहद्वक्ष हूँ मैं, उत्तेजक है मेरे दुद्धू
इतने बड़े और आश्वस्त
जितने कि तरबूज
दोनों हाथों से पकड़ोगे, फिर भी ये
पकड़ में नहीं आएँगे पूरे!
सील मछलियाँ हैं मेरी जाँघें
जुड़वाँ और स्वस्थ,
उनके बीचो-बीच झबरा कुत्ता है
जामुनी चेरी पड़ी उसके मुँह में!
मेरी ही नीलिमा में है हहाता काला सागर
नाभि के नीचे का!”
वृहद्वक्ष हूँ मैं, उत्तेजक है मेरे दुद्धू
इतने बड़े और आश्वस्त
जितने कि तरबूज
दोनों हाथों से पकड़ोगे, फिर भी ये
पकड़ में नहीं आएँगे पूरे!
सील मछलियाँ हैं मेरी जाँघें
जुड़वाँ और स्वस्थ,
उनके बीचो-बीच झबरा कुत्ता है
जामुनी चेरी पड़ी उसके मुँह में!
मेरी ही नीलिमा में है हहाता काला सागर
नाभि के नीचे का!”
‘फैट ब्लैक वुमन’ नामक काव्य-श्रृंखला का एक अंश है यह कविता ‘न्यौता’, इतने खुलेपन के बावजूद यह अश्लील नहीं, क्योंकि इसका परिपेक्ष्य बृहत्तर है। एक ख़ास तरह की पीड़ा में, आलोड़न में अश्वेत स्त्री यहाँ अपना अनावरण करती है। मायावती जी की ‘मुर्तियाँ बनवाकर, स्वंय उनका अनावरण करने वाली उत्सवधर्मी, आत्ममुग्धता से इसकी संगति बैठाना अश्लीलता की पराकाष्ठा है कि नहीं, आप स्वंय सोचिए!
आख़िर एकांगिता ही तो अश्लीलता है! शरीर का मात्र एक सीढ़ी या पेप्सीकोला की एक बोतल-मात्र के रूप में अवमूल्यन अश्लीलता है। किसी का शरीर है तो उसका एक मन भी होगा जिसके दुख-सुख से एकात्म हुए बिना उस तक पहुंचा ही नहीं जा सकता, पहुंचने की कोशिश की तो अश्लील होगी यह कोशिश। और किसी की मन: सामाजिक परिस्थितियों समझे बिना उसके नंगे घावों पर टुस्स से हँस देना या उसका अवमूल्यन तो अश्लीलता की पराकाष्ठा है!
‘मर्यादा’ शब्द थोड़ा अभिशप्त है, फिर भी नैतिकता और मर्यादा की कोई एक परिभाषा गढ़ने की कोशिश करें तो वह होगी—मानवीय गरिमा की रक्षा! कोई भी स्त्री या कोई हमदर्द पुरुष कलम उठाता है तो यह संकल्प उसके मन में ज़रूर थहाटे मारता है कि समाज में सारे उपेक्षितों और अनादृतों के साथ आजीवन मुझको खड़ा रहना है, वंचितों और परेशान लोगों का पक्ष ही मेरा पक्ष होगा।
लेकिन, हाँ, कविता चूंकि भाषण नहीं झाड़ती, कंधे पर हाथ रखकर घरेलू ढंग से दुख-सुख बतियाती है वह भी एक ही कौंध की इसे कई तरह की व्यंजनामूलक तकनीकों का सहारा लेना पड़ता है। जिन्हें धैर्य से समझने की ज़रूरत होती है। स्त्रीवादी कविता की प्रिय तकनीक अंतरपाठीय, मिमिक्री है जो ध्रुवांतों (कॉस्मिक–कॉमनप्लेस, देहाती-शहराती, पौरात्य-पाश्चात्य, निजी-समवेत आदि) के बीच एक नाटकीय चुप्पी घटित करने से सम्भव होती है।
स्त्री कविता, मेटाफिजिकल-कनफेशनल, कबीराना-फकीराना और सुफियाना कविता की तरह, भावों की शुद्धता में यक़ीन नहीं करती और गम्भीर से गम्भीर बात बड़े विनोदी स्वर में कह सकने की हिम्मत रखती है। वर्ण-वर्ग-लिंग और नस्लगत पदानुक्रम भी तोड़ने के इसके कथ्यगत संकल्प का प्रतिविम्बन ही इसके इस शिल्पगत संकल्प में होता है और एक कौंध में ‘गम्भीर’ और ‘हँसमुख’ के बीच का पदानुक्रम टूट जाता है। फूटता-टूटता और भी बहुतकुछ है, जैसा कि अलग-अलग छींकों पर टँगे नौ रसों के घड़े फूट जाते हैं और कभी करूणा में हास्य बहता है, कभी वीर में वात्सल्य। एल ख़ास तरह की क्रीड़ाधर्मिता के साथ ही सत्य समग्रता में देखा जा सकता है। स्त्रियाँ ठीक से समझती हैं और यह भी कि भावों की शुद्धता की रुमानी धारणा इंसान के दिमाग की क्लिष्ट बनावट के प्रतिकूल पड़ती है। अब जैसे प्रेम में पड़ा व्यक्ति दिन-रात सिर्फ़ प्रेम के बारे में नहीं सोचता, सच्चे से सच्चे प्रेमी को भी कभी पैसे की चिंता सता सकती है, नई दुनिया के कुछ और क्रूर यथार्थों की। इसीलिए उसकी मन: स्थिति का स्पष्ट चित्रण केंद्रीय और अपकेंद्रीय दोनों संवेगों की बहुआयामी प्रस्तुति से ही सम्भव है। यही हाल बीमार व्यक्ति का भी होता है, उसे एक ख़ास तरह की रोती-बिसूरती बेचारगी में कीलित करना ठीक नहीं। उसे उसकी उद्धुर जिजिविषा के साथ चित्रित करना ही युक्तिसंगत है। सोल्जे नित्सियन का कैंसर-वार्ड हो या ‘आनंद’, सफ़र’, ‘मिली’ जैसीफ़िल्में, रेखांकित यही करती हैं कि संकल्प बड़े हों तो मनुष्य जाकर नहीं जाता, स्मृतियों में अमर रहता है। कम से कम स्त्री चेतना वैयक्तिक और जातीय स्मृतियों का दूध,ग्राइपवाटरऔर बतरस का शहद पिलाकर पालती है उसे, स्त्री चेतना जो किसी एक अंग में कीलित की ही नहीं जा सकती। वैसे तो किसी को भी मात्र एक अंग में अवमूल्यित (रिड्यूस) करके नहीं देखा जा सकता, पर स्त्री तो ख़ासकर क्योंकि स्मृतियाँ उसके जीवन की मुख्य अभियोजक (प्राइम मूवर) होतीहैं और राकस की टीक की तरह हर जगह गड़ी हुई!
आपने अपने लेख में साहित्य के बहुतेरे अवांतर उद्देश्यों की चर्चा की है, पर जहाँ तक मेरी समझ में आता है, कविता का मुख्य उद्देश्य है चिर परिचित प्रसंगों का अपरिचित कोण, उसके जुड़ी विडम्बनाएँ एक कौंध में इस तरह उद्घाटित करना कि वंचितों/रोगियों/परेशानहाल लोगों की जिजिविषा, उनकी संघर्षवृत्ति रेखांकित हो, उसका आत्मबल परवान चढ़े और जो प्रभुत्व सम्पन्न हैं, उनकी आँखों का आँखपन, कानों का कानपन बढ़े, पूर्वग्रहों का मोतियाबिंद हटे, तभी तो वे देख समझ पाएँगे कि जाने-अनजाने वे क्या कर रहे थे, शर्मिंदा होंगे और आत्म-परिष्कार की ओर प्रवृत्त भी! जानना ही मानना है! पेड़ लगाते ही नाटकीय ढंग से शहर की जलवायु बदल नहीं जाती,ठीक इसी तरह कविता पढ़ते ही मन का मौसम बदल नहीं जाता, पर भीतरी तहों में किछ तो ऐसा होताही है जो पेड़ लगाने पर हुए सूक्ष्म, तिर्यक और दूरवर्ती परिवर्तन का समतुल्य माना जाना चाहिए। कथा साहित्य में चरित्र हमारी कल्पना के स्थायी नागरिक बनकर हमारा मनोबल ऊँचा करते हैं और कविता/नाटक आदि स्थितियों, सम्वादों और बिम्बों में अनुस्यूत विडम्बनाएँ विभ्रम में पड़े चित्त पर प्रकाश की एक रेखा खींच जाती है।
बहनापा कला माध्यमों में भी होता ह! आधुनिक कविता ने गाना छोड़ा तो इसलिए कि विश्वयुद्ध हो या हिंदुस्तान का वटवारा, ख़ूनमख़ून हो गई थी बीसवीं सदी के आरम्भ की दुनिया! हर तीसरे घर में एक लाश थी। ऐसे में गाया कैसे जाता? एफ. आर. लीविस ने जिस ‘music of meaning’ (अर्थ संगीत) की बात की बात की थी, वह तो कविता में बचा रहा, सहज बातचीत की लय भी बची रही, पर संगीत से ज़्यादा चित्रकला वास्तुकला और नाट्यकला से अपना गठबंधन कविता ने अधिक मजबूत किया। बिम्बों, सम्वादों और संदर्भित आख्यानों के चुनिंदा ऋणों में जीवन-जगत की विडम्बनाएँ वह फ़्लैश करने लगी। फोटोग्राफी और सिनेमेटोग्राफी की ‘क्षिप्त फोकल शिफ्ट’, ‘जूम’, ‘मोंताज’ आदि तकनीकों का भी अत्याधिक सर्जनात्मक उपयोग हर अच्छी कविता ने ढंग से किया।
तो भाई, यह तो कोई मत ही कहे कि शिल्प सजग नहीं आधुनिक कविता और लोक प्रचलित हृदयहीन मुहावरों से भी उसकी कच्ची-पक्की तुलना न करे। विदेशी विदुषियों के उद्धरण यहाँ असम्बंध और असंगत हैं क्योंकि वे कविता के ख़िलाफ़ नहीं जाते, गालियों के ख़िलाफ़ जाते हैं। कविता गाली नहीं है,गालियों के ख़िलाफ़ प्रतिश्रुत कवच-कुंडल है।
रोग, हादसा या विक्लांगता एक दुर्योग है जो क्सिई के भी साथ घट सकता है। प्रकृति चूँकि क्षतिपूर्ति के सिद्धांत में विश्वास करती है,रोगी या विक्लांग या हादसे का शिकार लोगों का बौद्धिक और आत्मिक ऐंटीना आम लोगों से अधिक सम्वेदनशील हो जाता है। इसलिए उन्हें किसी करुणा की ज़रूरत नहीं होती; अक्सर उनसे गपशप करते हुए आप अपनी ही आत्मा का कोष समृद्ध करते हैं। हाँ, कभी-कभी उनका मनोबल गिरता है, जैसे हममें से किसी का गिर सकता है, तो उनको उनकी उद्धुर शक्ति याद दिलाने के कविताएँ लिखी जाती हैं।
“औरन की द्वै द्वै भई
व्है अँखियाँ केहि आज
तेरी एक ही आँख में
कोटि आँख की लाज”
व्है अँखियाँ केहि आज
तेरी एक ही आँख में
कोटि आँख की लाज”
ब्रेस्ट कैंसर ऐसा कैंसर है जिसपर कुछ हद तक विजय पा ली गई है! ब्रेस्ट काटकर निकाल लिया जाए तो जीवन लम्बा चल सकता है पर अपेंडिक्स कातकर फेंक देने पर जैसे आदमी दुखी नहीं होता। क्योंकि वह अपना वजूद उसमें कीलित नहीं देखता। स्त्रियों को भी ब्रेस्ट नामक बहुचर्चित अंग में अपने वजूद की सार्थकता कीलित देखने की ज़रूरत नहीं! ऐसी वस्तुनिष्ठता स्त्रियों में पैदा हो, यही अभीष्ट है। पूँछ की उपयोगिता ख़त्म तो पूँछ झड़ गई, इसी तरह दूध पिलाने का चरण गया तो ये उन्नत पहाड़ (उन्नत चीज़ें विशाल भी हों, ये ज़रूरी नहीं) बोझ ही हैं, जाएँ तो जाएँ! (इसी लय में यह भी पढ़े कि ऋतु-मुक्ति भी एक मुक्ति ही है, दुखी क्या होना!)
जॉन डन, सिल्विया प्लाथ ने तो अपनी बीमारियों से जूझते हुए ख़ुद अपना उद्बोधन कविता में किया; मृत्यु पर जीवन की ऊर्ध्वबाहु विजय की घोषणा की। : ‘डेथ दाउ शैल्ट डाई’
सिल्विया प्लाथ की ‘डैडी’ शीर्षक कविता मनोचिकित्सक के कहने पर ही लिखी गई। स्वंय को डैडी कहलाने वाला ‘हिटलर’, असमय ही गुज़र गए। उनके अपने प्रोफ़ेसर ‘पिता’ और दूसरे के प्रेम में पड़े ‘पति’, रेड ह्यूज जिनमें अपने पिता की छवि उन्होंने ढूँढी थीसिल्विया प्लाथके अवचेतन में इन सबके प्रतिएक ख़ास तरह का प्रतिरोध दर्ज़ था। और इन सबके प्रति इनके मन में एक ख़ास तरह का आकर्षण भी था ही! मनोचिकित्सक ने राय दी थी कि कविता में इसका एक पुतला बनाकर जला दीजिए, आपका प्रतिशोध पूरा हो जाएगा। प्यार के ‘सरप्लस’ की समस्या की तरह प्रेम में ‘सरप्लस’ की समस्या सध जाएगी। अर्थशास्त्र में ‘सरप्लस’ की भी यह कथा निराली है, जिसका प्यार,जिसकीस्मृतियाँ ‘टॉर्चर’ करें, वह एक तरह का हिटलर ही तो हुआ। आत्मा पर भी किसी का शासन हम उस तरह नहीं चाहते। वशीभूत करना जड़ीभूत करना ही है।
पीढ़ियों के संधर्ष की तरह स्त्री पुरुष में हित निकायों की टकराहट दुरुहतर स्थितियाँ इसलिए भी पैदा करती हैं, क्योंकि इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में हमें उन्हें से उजझना होता है जिन्हें हम प्यार भी करते हैं। ग़रीब-अमीर, काले-गोरे, अवर्ण-सवर्ण के बीच में शक्ति-संधर्ष का व्याकरण स्त्रीवादी संधर्ष के व्याकरण से अलग है, क्योंकि यहाँ आप प्रत
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अव्वल तो अनामिका जी, उसके बाद विनीत कुमार यह समझाएं कि कविता की समझ की फसल की क्या परिभाषा है, उसे पैदा कैसे किया जाता है, उसे कैसे सींचा जाता है, उसे कैसे बढ़ाया जाता है, उसे कैसे काटा जाता है, और उसे कैसे परोसा और खाया जाता है…
खासतौर पर "…दूधो नहाएं/ और पूतो फलें/ मेरी स्मृतियां!" के संदर्भ में विनीत कुमार अनामिका जी की ओर से यहां के पाठकों-दर्शकों को यह समझाने की कृपा करें कि इसका अर्थ क्या हो सकता है…
दूसरों की समझ पर सवाल उठाने के पहले खुद समझने की कोशिश की जाए तो ये सवाल आसानी से हल किए जा सकते हैं… इसके लिए यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी देवता के प्रति भक्तिभाव दिमागी आंख छीन लेता है।
डॉ अनुराग… आपका बेहद शुक्रिया…
सुन रहे हैं "…दूधो नहाएं/ और पूतो फलें/ मेरी स्मृतियां!" वाली पुत्री-विरोधी "मिस्टर" अनामिका…
(संदर्भः इनकी कविता और इसी लेख में प्रयुक्त "शालिनी बाबू… अरे भैया, शालिनी")
दरअसल, हम जिस मूर्तिपूजकों के समाज में जीते हैं, वहीं भक्ति या फिर हताशा में अपने "दुश्मन" के ही रूप में कन्वर्ट हो जाना उसकी त्रासदी है…
दुर्भाग्य पूर्ण है बेहद दुर्भाग्यपूर्ण !!!
कवियों के पास सामान्य व्यक्ति के अपेक्षा एक बेहद सतर्क संवेदनशील दृष्टि होती है .इस्मत चुगतई ,सुधा अरोड़ा जी ,पद्मा सचदेव ,म्रणाल पण्डे ओर शिवानी के आलावा जिस लेखिका ने मुझे सबसे ज्यादा मुतासिर किया था वो अनामिका जी है ."ईसामसीह तुम अगर होते स्त्री "जैसी अनेक कविताएं आज भी प्रासंगिक है .बीजाक्षर आज भी मेरी लाइब्रेरी में है .इसलिए उनसे उम्मीद कुछ ज्यादा थी .
शुलामिथ फायर स्टोन ने 1960 में कहा था स्त्री की असली स्वतंत्रता तब घटित होगी जब वैज्ञानिक प्रगति उसे गर्भाशय जनिक दायित्वों से मुक्त कर देगी पर इस वक्तव्य पर भी" सुमन राजे" ने "हिंदी साहित्य का आधा इतिहास "में लिखा था" ये हास्यापद वक्तव्य है जैसे ये कहना मानव मस्तिष्क ही पीड़ा का स्रोत है इसलिए उससे छुटकारा पा लेना चाहिए ये छध बिजुका खड़ा करके भ्रमित करने की मंशा है .
वैसे यहाँ भी असहमतिया न स्त्री स्वतंत्रता पर थी न " स्त्री विमर्श पर न बहस "कविता में अश्लीलता" पर नहीं थी . केंद्र बिंदु था उस "संवेदना की अनुपस्थिति " जो संदर्भित कविता के उद्देश्य के लिए आवश्यक थी . इन कविताओ में दुःख" रिड्यूस" है ,इकहरा है . अंग विशेष दूसरी "गैर जरूरी वज़हो" से हाईलाईट है.
याद रहे यहाँ हम किसी "सामान्य स्वस्थ नारी के मन को नहीं नहीं "असाध्य रोग से पीड़ित " एक स्त्री के दुःख को टटोल रहे है .
पर ये लेख कुछ जरूरी प्रशन उठाता है फिर दोहराता हूँ
क्या कवि का कविता के प्रति कोई" लेखकीय धर्म" नहीं होता ?
क्या किसी कविता की गुणवत्ता अब कवि के "निजी ओर सामाजिक सम्बन्ध" तय करते है ?
क्या हिंदी साहित्य भी समाज की तरह "असहिष्णुता" की ओर बढ़ रहा है ? इसकी "टोलरेंस" कम हो रही है ?
ऐसा क्यों है वही पाठक जो कवि की रचनाओं को सर आँखों पे रखते है जब वे किसी एक रचना से असहमति जताते है तब उनकी "समझ "पर सवाल उठाया जाता है ?
यदि अनामिका जी के अलावा ये कविता किसी अनजान कवि ने लिखी होती तो क्या बहुदा लोगो की यही प्रतिक्रिया होती ?
जिस पेशे से जुड़ा हूँ उसमे जननांगो के कैंसर से पीड़ित लोगो की तकलीफ को देखा है ओर इस "अंग विशेष "रोग के पीडितो की भी .
मुआफ कीजिये शमशान में खड़े होकर चुटकुला सुनाने वाला व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान ,ज्ञानी ,ओर सम्मानीय हो तो आप उसके " सेन्स ऑफ़ ह्यूमर" की तारीफ नहीं करेगे .
"ब्रैस्ट कैंसर" पर लिखी गई दोनों कविताओं में स्त्री के सौंदर्य को मापने के वही पुराने पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी तथा बाजारवादी यंत्र प्रयोग किये गए है. जिसमें किसी स्त्री की सुंदरता व उपयोगिता उसके शरीर के अंगो की सुंदरता से मानी जाती रही है। दलित सौंदर्यशास्त्र के पास सुंदरता नापने का पैमाना व्यक्ति की श्रमशीलता व-संघर्षशीलता है। वह इन दोनों गुणों के आईने में किसी की सुंदरता देखता है. इसलिए जिस तरह निराला की "तोडती पत्थर" वाली स्त्री बहुत सुंदर है. प्रेमचंद की 'घासवाली' कहानी की घास छीलती दलित नायिका मुलिया खूब सुंदर है। उसी तरह ब्रैस्ट कैंसर की जूझती और जीतती स्त्रियां भी उतनी ही सुंदर है और रहेगी। उनके किसी अंग के रहने या रहने से उनकी सुंदरता या महत्ता रतिभर भी कम नही हो जाती है। सुंदर वही है जो श्रमशील है। संघर्षशील है।
बहरहाल, अगर पवन करण को स्त्री के स्तन "अमानत" लगे, तो "अपने भीतर स्त्री" को वे किस निगाह से देख रहे थे। क्या यहां अर्थ यह है कि स्त्री एक पुरुष के भीतर है, "अमानत" के तौर पर सुरक्षित है, तो सब कुछ ठीक है? जिन धारणाओं और व्यवस्थाओं ने स्त्री को संपत्ति और दोयम बना दिया, उसकी पुष्टि करके पवन करण और उनके वकील आखिर जिस सत्ता को निबाह रहे हैं, उस पर आश्चर्य इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे तो प्राकृतिक रूप से और प्रकृति में वही हैं।
एक सामाजिक प्रश्न- दो आदमियों के बीच जो कुछ घटित होता है, उसका हिसाब कोई और नहीं रख सकता, न उसे रखना चाहिए।
ठीक है, स्त्री के सिर में दर्द होता है। घर में कोई नहीं है। वह खुद उस तकलीफ में भी सड़क पर निकल कर दवा के दुकान में जाती है और दवा ले आती है। शाम को उसका पति आता है, उसे पता चलता है कि पत्नी सड़क पर गई थी। वह कहता है कि दवा दुकान वाला क्या तुम्हारा यार है और पत्नी की हत्या करने को उद्धत होता है। यह दो व्यक्तियों के बीच घटित हो रहा है, इसका हिसाब कोई नहीं रख सकता, न किसी को नहीं रखना चाहिए।
इस देश की सरकार न जाने कहां से टपकी है और वह घरेलू हिंसा, बलात्कार आदि के खिलाफ कानून-पर-कानून बनाए जा रही है। इस मूर्ख सरकार को यह छोटी-सी बात समझ में नहीं आती। उसे मंगल ग्रह पर भेज दिया जाना चाहिए।
# खुला हुआ मन अगर खिल्ली उड़ाने का काम आता है तो सोचना चाहिए कि आपके दिमाग का विकास कितना हुआ है। एक सामंती व्यवस्था अपने साथ एक समूचा मनोविज्ञान भी लिए होती है और ऐसे आकलन वहीं से निकलते हैं।
# जहां संवेदनहीनता एक सामाजिक विशेषता हो, वहां मानवीयता को सांस लेने के लिए हाइपर संवेदनशीलता की ही जरूरत है। वही रेड्यूस होकर सहज संवेदनशीलता में कन्वर्ट होगी। इससे व्यवस्था और यथास्थितिवाद का विनाश होगा और यह मानवीयता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी अभियान पाखंड होगा।
# शालिनी माथुर और दीप्ति गुप्ता को कृष्णा सोबती के लघु उपन्यास "ऐ लड़की" का पाठ महीने में एक बार आमने-सामने बैठ कर करने की सलाह एक सामंती मानसिकता का परिचय देती है और सामने वाले के दोयम होने की घोषणा करता है। खासतौर पर तब, जब किसी सामाजिक वर्ग के अस्तित्व को लेकर अपनी राय जाहिर की गई हो।
उपरोक्त तीनों का समुच्चय आखिरकार किसी व्यक्ति के पोर्नोग्राफिक होने की सूचना देता है या फिर उसकी रचना करता है।
पोर्नोग्राफी केवल स्त्री-पुरुष के यौन-संबंधों का वीभत्स चित्रण नहीं है। पोर्नोग्राफी समाज में विभेद पैदा करने वाली या उसकी व्यवस्था रचने वाली हर उस प्रक्रिया कहना चाहिए जो व्यक्ति को शरीर और संपत्ति रूप में स्थापित करता है, उसे वंचना का शिकार बनाता है, हाशिये के बाहर करने की साजिश के बतौर काम आता है और वंचित तबकों (शूद्रों और स्त्रियों) को आखिरकार सामाजिक सत्ताधारी तबकों (पुरुषों और सवर्णों) के रहमोकरम पर छोड़ देता है।
"स्त्रीवादी" कवयित्री अनामिका की कविता को तो, बाकी दूसरी चीजों को छोड़ भी दें तो, उनकी सिर्फ इन पंक्तियों के लिए खारिज़ किया जाना चाहिए, जो केवल और केवल स्त्री विरोधी है-
"…दूधो नहाएं
और पूतो फलें
मेरी स्मृतियां!"
पुत्री-विरोधी अनामिका…
पवन करण की कविता का बचाव करते हुए आशुतोष कुमार या राजकिशोर ने बहुत चालाकी से कुछ लाइनों को चुरा जाना जरूरी समझा और यही उनकी बेईमानी और अनैतिकता का सबूत है। "शहद के छत्ते" और "दशहरी आमों की जोड़ी" जैसे रूपकों और दूसरी लाइनों को छोड़ दीजिए। पवन करण की कविता की पंक्तियां है- "अन्तरंग क्षणों में उन दोनों को/ हाथों में थाम कर वह उस से कहता/ ये दोनों तुम्हारे पास अमानत हैं मेरी/ मेरी खुशियाँ , इन्हें सम्हाल कर रखना"
गर्भ धारण करने की मजबूरी का फायदा उठा कर पितृसत्ता जब अपना मौजूदा शक्ल अख्तियार कर रही थी तो स्त्री को सबसे पहले उसने संपत्ति ही घोषित किया था, यानी पुरुष सत्ता की "अमानत"। उसके बाद उसने उस "अमानत" के भीतर भी कई-कई "अमानत" गढ़े। जैसे पवन करण इस कविता में कहते हैं कि "ये दोनों तुम्हारे पास अमानत हैं मेरी…", जिसे कई दफे सबके बीच भी… कनखियों से वे देख लेते हैं और घर पहुंच कर जांच लेने को कहते हैं। फिर "बचे हुए एक" को देख कर "कसमसा कर रह" जाने वाले पुरुष का हाथ जब एक स्तनविहीन स्त्री की "देह पर घूमते हाथ" कुछ "ढूंढ़ते हुए मन से भी अधिक मायूस हो जाते" हैं, उस वक्त यह कविता क्या कहती है?
क्या यह अनायास है कि आज भी पुरुष की मांग "उन्नत उरोज" वाली स्त्री है और "उन्नत" से कमतर स्तन वाली स्त्री आधुनिक चिकित्साशास्त्र की मदद से अपने स्तनों को पुष्ट करवा कर खुश हो रही है? हालत तो यह है साहब कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारी का शिकार होकर भी अगर स्त्री अपना एक स्तन गंवा देती है तो वह पुरुष के हाथों के "मायूस होने" के वजह बन जाती है। यह कुंठा कहां से आई? हिंदी साहित्य में "उन्नत उरोज", "कदली खंभ जैसी जांघें", "धवल गोरा रंग", "पुष्ट नितंब" और "पतली कमर" जैसे न जाने कितने उदाहरण भरे पड़े हैं, जिसके बिना स्त्री "अधूरी" हो जाती है। "अक्षत-यौवना" या "वर्जिनिटी" भी पुरुष सत्ता के लिए स्त्री के "सुरक्षित" होने के सबूत और "पवित्र अमानत" ही हैं। साइकिल चलाने, रस्सी फांदने, दौड़ने, व्यायाम करने, भारी सामान उठाने या किसी वजह से अपनी "वर्जिनिटी" को "गंवा चुकी" स्त्री की जगह इस समाज में क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। ब्याह की पहली रात "सफेद चादर" बिछा कर सोने करने की परंपरा ऐसी "अमानतों" की परीक्षा की प्रक्रिया है, जिसमें फेल होने के बाद स्त्री चरित्रहीन घोषित कर दी जाती है। हालांकि पुरुष के लिए ऐसी परीक्षा तय नहीं है। और तमाम ऐसे "गुणों" से हीन पुरुष भी पूज्य होगा। (महात्मा तुलसीदास की जय…)
बहुत से लोग इन दोनों कविताओं पर शालिनी माथुर के लेख पर "कविता के प्रति बन रही सपाट किस्म की सोच और कविता न समझे जाने का संकट" जैसी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। इस तर्क के प्रति मेरा सवाल यह है कि कविता, कविता के लिए, न कि समझने के लिए (यानी रोटी खाने के लिए नहीं, बस, रोटी के लिए) वाली थ्योरी क्या अब भी लोगों को प्रभावित और लीड करती है।
वैचारिक असहमति के बावजूद हम जैसे लोगों के लिए ये जरुरी लेख है जो वर्चुअल स्पेस पर खुले में/बंद में रचना पाठ जैसे आयोजनों को किट्टी पार्टी की शक्ल दिए जाने पर आजीज आकर अपने को कविता विरोधी घोषित करता है. वो फेसबुक पर लगातार लिखता है- मुझसे कविता संबंधी किसी भी तरह की जानकारी शेयर न करे. समय-समय पर ऐसे ही लेखों से गुजरना तात्कालिक खीज के असर को कम करके दोबारा से कविता के प्रति संवेदनशील और प्रेरित करता है. हमें उसके लिखे जाने के पीछे के उद्देश्य को ध्येय और नीयत( हालांकि बड़ा हिस्सा इसी आधार पर हो सकता है)तक रिड्यूस करके देखने से रोकता है.
अनामिकाजी के इस लेख में(माफ कीजिएगा इसे जानकीपुल पर आ जाने के बावजूद भी पोस्ट नहीं कह रहा. ऐसा इसकी तासीर और मिजाज को पढ़कर ही किया है)शालिनीजी से असहमति या उनके लिखे का प्रत्युत्तर कम बल्कि कविता के प्रति बन रही सपाट किस्म की सोच और कविता न समझे जाने का जो संकट है, उसकी चिंता ज्यादा है. हां इस तर्क को रीडर रिस्पांस थिअरि की चौखट पर ले जाएं तो अलग बात है. लेकिन उन्होंने कहीं नहीं लिखा कि जिस तरह से उनकी और पवन करण की कविता को लेकर लोग बबाल काट रहे हैं,उन्हें कविता की समझ नहीं है लेकिन अंडरटोन ये जरुर है कि असहमति का स्वर तीखा और धारदार तर्क रखने की कोशिश में भाषा की धार बड़ी ही हड़बड़ी और आनन-फानन में चढ़ाई गई है..ऐसी भाषा अक्सर मौत का कुआं देखनेवाले दर्शकों जैसा थोड़े वक्त के लिए रोमांच तो पैदा जरुर करती है लेकिन उस अमानवीय करतब की तरफ सोचने को विवश नहीं करती जहां आधे घंटेभर के खेल से मानव सभ्यता के विकास और आधुनिक परिदृश्यों में होने और जीने के दावे के बीच छेद करके वापस आदिम युग की बर्बरता की तरफ धकेल देती है.
अनामिकाजी का शुक्रिया कि हम जैसे लोग जब लैपटॉप की कोबोर्ड छूते हैं तो लगता है कुछ लिखने के लिए नहीं,दागने के लिए सींक गर्म कर रहे हैं,मैच्योर तरीके से, ऐसी अबिव्यक्ति से गुजरकर थोड़ा ठहरकर अपनी बात कहने के लिए प्रेरित करती है..बाकी इस मुद्दे को लेकर बनी सहमति-असहमति में न तो अपनी कोई पुख्ता समझ है और न अब तक दिलचस्पी बन पायी है.
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yeh beloved बिलवेड kaise ho gaya?
'लड़कियों की जीन में (उग्रता प्रस्तावित करने वाला) कोई वाई फैक्टर नहीं होता, (यदि वो उग्र होती हैं तो किसी कुंठा से),जबरदस्ती मातृ-छवि से स्वंय को अलगाकर ‘अनजान सिंह’ वाली छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी भी बचपन में उनके साथ नहीं घटती, इसका स्पष्ट लाभ उनकी भाषा को होता है, वह अधिक सहज-प्रभावपूर्ण, बिम्बपरक, उच्छल, प्रसन्न,अकुण्ठ और विनीत होती है'…..
यहाँ थोड़ा सा विवाद है बाकी सब
दूध का दूध पानी का पानी…..सब एक साथ एकदम साफ़ ..जय हो इस तल्खी की……
'जजमेण्टल होने से भरसक बचना चाहिए…..'
… अब पटाक्षेप….|