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मौलिकता की बात लेखिकाओं के सन्दर्भ में ही क्यों उठाई जाती है?

पढ़ने में जरा देर हुई. कुछ तो इच्छा भी नहीं हो रही थी. लेकिन मित्रों के फोन से, फेसबुक से यह पता चल रहा था कि एक अति-वरिष्ठ लेखक ने एक वरिष्ठ लेखक(मैं उनकी तरह महुआ मांझी जी को युवा लेखिका नहीं लिख सकता) के बारे में कुछ ऐसा लिख मारा है कि उसने उसके अति-प्रसिद्ध उपन्यास का कुछ लेखन-संशोधन नुमा किया था, जिसकी कहानी दरअसल उसकी अपनी लिखी हुई ही नहीं थी. उन्होंने हवाला अपनी डायरी का दिया है, प्रामाणिक सबूत के तौर पर.

लेकिन इसमें नया क्या है यही सोचता रहा, पुराने प्लॉट में लिखी एक नई कहानी भर है. इस पूरे प्रसंग में कौन सही है कौन गलत है इस इसके ऊपर अपना कोई मत नहीं देते हुए मैं एक दूसरा सवाल पूछना चाहता हूं- मौलिकता की बात हिंदी में लेखिका के सन्दर्भ में ही क्यों उठाई जाती है? लेखिकाओं के पीछे एक पुरुष प्रेत खड़ा किए जाने की हिंदी में सुदीर्घ परंपरा रही है. सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘झाँसी की रानी’ के असली रचयिता एक गुमनाम कवि को बताया जाता रहा. यह आजादी के पहले की बात है. हाल की बात करूँ तो नब्बे के दशक में जिन दो लेखिकाओं को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिले, उनके बारे में क्या कुछ लिखा गया इसको मैं यहां दोहराना नहीं चाहता. दोनों के पीछे पुरुष-प्रेत खड़े कर दिए गए. जबकि दोनों लेखिकाओं का एक बड़ा पाठक वर्ग है, दोनों ने निरंतर अच्छा लिखा है, लेकिन किस्से हैं कि चले जा रहे हैं. महुआ माझी के बारे में भी इस तरह के किस्से बहुत दिनों से सुने जा रहे थे, लिखा किसी ने पहली बार है. इसी तरह की कहानियां रस ले-ले कर झारखण्ड की एक कवयित्री के बारे में भी सुनाये जाते रहे हैं. बचपन से कहावत यह सुनी थी कि हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है, लेकिन हिंदी साहित्य में यह देखा है कि हर सफल लेखिका के पीछे एक पुरुष बिठा दिया जाता है. गोया महिलाओं को लिखना न आता हो, पुरुष न हों तो लेखिकाओं के लिए लिखना मुश्किल हो जाए.

मेरा सवाल यह है कि इस तरह के सवाल लेखकों के सन्दर्भ में क्यों नहीं उठाये जाते हैं? क्या पुरुषों की रचनाएँ कोई ठीक नहीं करता होगा, कोई उनका संपादन नहीं करता होगा. यह कोई नहीं लिखता कि कैसे देखते-देखते एक डॉक्टर को हिंदी के समकालीन प्रमुख लेखक साबित करने में एक ‘फैक्ट्री’ के लोग लगे हैं, जबकि उसकी सबसे बड़ी शिफत यह है कि वह एक बुजुर्ग लेखक का इलाज बढ़िया कर रहा है. लेकिन नहीं, पुरुषों के सन्दर्भ में इस तरह के सवाल उठाने से न तो सनसनी फैलेगी, न पढ़नेवाले चटखारे लेंगे, न सरगोशियाँ होंगी. यह दुर्भाग्य है कि हिंदी में अच्छी-अच्छी लेखिकाओं को भी आइटम नंबर की तरह देखा जाता है, उनका कोई सम्मान नहीं है. श्रवण कुमार गोस्वामी ने भी अपने लेख में संदर्भित लेखिका के ‘रूपसी’ होने की बात कही है. इस तरह के प्रसंग बताते हैं कि तमाम स्त्री विमर्श के बावजूद स्त्रियों के प्रति न नजरिया बदला न ही हिंदी में पुरुष वर्चस्व टूटा. 
असल में, मुझे यह लगता है कि इसके मूल में कारण यह है कि हिंदी में संपादक नाम की संस्था का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया है. अंग्रेजी में बड़े-बड़े लेखक भी संपादक के मुरीद होते हैं, जो उनकी रचनाओं को सन्दर्भों से जोड़कर एक ‘पर्सपेक्टिव’ दे देता है और साधारण रचनाओं को भी असाधारण बना देता है. हिंदी मौलिकता की इस कदर मारी हुई है कि कोई लेखक अपनी भाषा तक को दुरुस्त नहीं करने देता. जो संपादक को महत्व देता है उसके बारे में यह मान लिया जाता है कि जिसने संपादन किया है असली लेखक तो वही है. लिखने वाली अगर स्त्री है तो इस बात को कुछ और हवा मिल जाती है. दुर्भाग्य से तत्कालीन प्रसंग भी मुझे कुछ ऐसा ही लगता है.
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9 comments

  1. बिलकुल सही…दुर्भाग्यवश भारतीय…और खास तौर से कुछ हिन्दी साहित्यकार(???) अपने सामन्ती मानसिकता से बाहर ही नहीं आ पा रहे…| सब से पहले तो ऐसे लोग ये ही बर्दाश्त नहीं कर पाते कि कोई औरत `औरत' होने के बावजूद लिख कैसे रही है…और अगर अच्छा लिख रही है तो खुद…?
    लिखने वाली अगर सुन्दर हुई तो `कोढ़ में खाज़' की तरह खुजली और बढ़ जाती है, उसका चारित्रिक हनन करने की…|

  2. अच्छा कहा है।

  3. bilkul satik likha hai prabhat jee. purushon kee saari galti maaf aur katgahre me sirf mahilayen

  4. पहला तो इस मुगालते से बाहर निकला जाये के हिंदी साहित्य का " चरित्र" पर मूल अधिकार है जो कोई भाषाई कौशल दिखा कर इसके दायरे के भीतर आ गया वो चरित्रवान बन गया . . अब स्टैंड बड़ी चतुराई से नाप तोल नफा -नुक्सान कर लिए जाते है . बहुत कुछ निर्भर करता है किसके खिलाफ कहा गया वो कौन से वाद का व्यक्ति है लेफ्ट विचार धारा का या राईट विंग का ?संपादक है या नहीं ? साहित्य में क्या पोजीशन है क्या स्टेटस है ? पुराना पर्सनल हिसाब है या नहीं ? बाकी सबसे बड़ा हथियार तटस्थता तो है ही, जहाँ चाहे इस्तेमाल कर लो . लेखकीय धर्म से पहले दोस्ती निभाना ज्यादा जरूरी है
    ये गोस्वामी साहब क्या तब भी यही ज़ज्बा दिखाते जब मोहतरमा अपनी किताब में इनको श्रेय दे देती या वेज टेरियां पेस्ट्री खिला देती .क्या दो मुलाकातों में आप आदमी को पहचान नहीं लेते अच्छा बुरा कैसा है ?दरअसल यहाँ रिटायर मेंट के बाद लोगो में इमानदारी जगती है .सब अपने मतलब के लिए एक दुसरे का इस्तेमाल करते है
    आलोक धन्वा जैसे लोग जब अपने से दस बीस बरस छोटी महिला से शादी करके शादी की रात अपनी एक महिला मित्र के साथ एक घंटे रूम में बंद हो जाते है ओर लगतार प्रताड़ना सहकर उनकी पत्नी जब प्रतिरोध करती है तो बड़े बड़े लोग आलोक की सपोर्ट में आते है ये कहकर के मजदूरों ओर महिलाओं पर कविता लिखने वाला इतना महान कवि निजी जिंदगी में कैसे क्रूर हो सकता है ?गोया सौ पेज पर एक गुनाह फ्री . सच कहूँ तो देख सुन कर वित्रष्णा ओर उब होती है ये भी सोचता हूँ के यदि पूर्व में फेसबुक ओर इंटर नेट जैसी सूचनाओं का तंत्र गर पहले होता क्या पूर्ववर्ती लेखको के लिए हमारे भीतर इतना सम्मान रह पाता ?

  5. वैसे हंस में कई बार पुरुष लेखकों के बारे में भी चोरी के आरोप छपते रहे हैं. पर हमारे विमर्शवादी लोगों की निगाह उस पर शायद नहीं जाती. एक आलोचक ने हंस में छपी एक सेलिब्रेटी कहानीकार की कहानी के एक प्रसंग को किसी चीनी कथा की नक़ल बता दी थी तो उसे मुकदमे की धमकी दी गई थी. ध्यान रहे, दोनों पुरुष थे. मुझे एक मीडियाकर्मी कवि ने टीवी के लिए बनाये गए एक ऐसे प्रोग्राम के बारे में बताया था, जो साहित्यिक चोरी पर ही था, और उसमें भी पुरुष लेखकों के सन्दर्भ ज्यादा थे. मेरे पास कोई भौतिक तथ्य नहीं है, पर सुना कि महुआ जी की किताब को दुरुस्त करने में कई और पुरुष लेखकों की भूमिका रही है. यह गलत बात भी नहीं है. क्या यह पुरुषों के सहयोगी रवैये का उदाहरण नहीं है? मैं तो अपने लेख तक को मित्रों से पढ़वाता हूँ और उनके सुझावों के बारे में विचार कर उसे दुरुस्त करता हूँ. मान लीजिए, कई लोगों द्वारा किताब को दुरुस्त करने की बात सही न हो, और सिर्फ श्रवण जी ने ही उस किताब का प्रूफ वगैरह देखा हो, तब भी यह बात तो है ही कि श्रवण जी से लेके नामवर सिंह और राजकमल वाले सभी पुरुष ही हैं. उपन्यासकार के शुभचिंतकों में इतने सारे पुरूषों की भरमार है. पुरुषों ने उनकी किताब पर झूम झूम के समीक्षाएं लिखी हैं, तो एक पुरुष श्रवण कुमार गोस्वामी या एकाध फेसबुकी या ब्लौगिया टिप्पणीकारों ने अपने पिछड़े सामन्तवादी लहजे में कमेन्ट कर दिया तो इससे क्या घबडाना! जो लोग सहयोग कर रहे हैं, वे सब क्या बिना सम्मानभाव के ही सहयोग करते हैं? भाई जब ज्यादा पुरुष समर्थन और प्रोत्साहन में खड़े हैं तो थोड़े से पुरुष प्रेतों की क्या फ़िक्र करना!

  6. मैं बारिशाइल्ला कैसा उपन्यास है , बात इस पर होनी थी , जो न हुयी . और लेखिका के रूप – गुन पर बहस खत्म होने का नाम नहीं लेती . यह हिंदी -'जाति' की चिरकुंठा और हीनभावना का सबूत है .सनसनी के ज्वार पर उड़ने वाले हिन्दी ब्लॉगपत्रादि के पास झूठ , कुत्सा और गलाजत के सिवा बेचनेके लिए है क्या ? श्रवन कुमार गोस्वामी नाम के लेखक ने तो लिख कर , अपने भाषाप्रयोग से बता दिया है ,कि वे एक अभ्यासरत लेखिका से किस किस तरह की उम्मीदें पाले बैठे थे , जो , हां हंत, पूरी न हो सकीं .लेखिका का प्रत्युत्तर ठोस है . उसकी ओर से दी गयी चुनौती कायम है . देखना है इसे कौन उठाता है . बेहतर हो कि हिंदी लेखक साथी लेखिकाओं की साडियां गिनने के बजाय कुछ लिखने पढ़ने में मन लगाएं .

  7. purush pret…

  8. रचनात्मक प्रश्रय (प्रोत्साहन व परिष्कार) और रचना की चोरी में फर्क है। बात औरत-मरद के संदर्भ में क्यों होने लगती है, ज्यों ही किसी स्त्री का जिक्र आता है। इस लिंग विमर्श को कही तो आराम दिया जाय।

  9. एकदम सटीक लिखा है,बात उपन्यास और उसकी मौलिकता की है ही नहीं, बात उस मानसिकता की ही है पूरी तरह जो पहले तो उन बुज़ुर्ग लेखक के लेखक के लेख में है फिर बाद में और लेखकों की प्रतिक्रियाओं में

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