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कि रात का रंग सिर्फ काला नहीं होता

वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह का तीसरा कविता संग्रह हाल में ही आया है- ‘स्वप्न समय’. हिंदी में अपनी मौलिक और मुखर आवाज के लिए जानी जाने वाली इस कवयित्री की कुछ कविताएँ इसी संग्रह से- जानकी पुल.

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1.

कौन वह

लो रात अपनी स्याही में लिपटी हुई अकेली
रिक्त अपने सपनों से आ गयी
ओस उस पर ढुलमुल होती हुई
एक काले गुलाब की पंखुरी पर जैसे
मुझ जैसी हो गयी
दुनिया के कई रहस्यों में से एक
खुद को समझती हुई
मैं उसी की हो गयी
मगर कौन है यह सपनों सा दौड़ता हुआ
जो आता है
मेरी काली देह में समा जाता है
कौन जो मेरी रातों को फिर से
हिला जाता है 
2.
किसकी नींद स्वप्न किसका

एक दिन छूट जाने वाली चीज़ें हैं
नदी पहाड़ प्रिय का साथ
प्रेम, हर तरह की याद
स्वप्न और उन्माद
और यह जीवन भी जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन
तड़पना पत्थर की आत्मीयता के लिए ज्यूँ सदा
हल्के पाँव ही चलना श्रेयस्कर है इस धरती पर तभी
एक नींद की तरह है सब कुछ
नींद उचटी कि गायब हुआ
स्वप्न सा चलता यह यथार्थ
वैसे यह जानना कितना दिलचस्प होगा
किसकी नींद है यह
जिसका स्वप्न है यह संसार
3.
चाँद और बादल

बादलों से उबरता है चाँद
स्वप्न जैसे नींद से
हवा में डोलती है हौले-हौले घास
और लो निकल आया पूरा का पूरा चाँद
ठंढी रात और उसके सफ़ेद पखेरू
कब से सहते आये हैं
सौंदर्य के ऐसे अतिक्रमण
मूक अवाक् खड़ी नदी तट पर मैं
ताकती हूँ आसमान
हौले से लगती है किनारे एक नाव
किसको जाना है अभी कहीं और मगर…
4.
रात चूमती है

रात चूमती है उसको
बदहवास वह कुछ नहीं कहती
निर्वस्त्रा उसकी आत्मा उसी की हुई जाती है
कोई भाषा नहीं वहाँ कि वह कुछ कहे भी
एक चुप्पी में सब कुछ होता चला जाता है
सुवासित भोर में चाँद-सा कोई
उसके कानों में साँस की
आवाज़-भर छोड़ जाता है
जागने की कोई विवशता नहीं
जागती है फिर भी वह जैसे चिडि़या
दर्ज करने विश्व में अपनी उपस्थिति
शाश्वत-सा फैला रहता है रात का जादू
समेटती ख़ुद को वह उसी में धँसी जाती है
हवा आती है सारी छुपी अतृप्तियों को
उजागर करती
जगाती किन वासनाओं को, आह!
5.
ऐ हवा

आओ समा जाओ मुझमें हवा
खेलो मुझसे
देखूँ अपने चाँद, पहाड़, आकाश और चिडि़या
सँभालना मुझको
उमड़ी आती है भीतर सोन और गंडक नदियाँ
अंग-प्रत्यंग टूटता है जाने क्यों
बेमिल हो रही है चिरपरिचित भीतरी शालीनता
उठती हैं लहरें ये कौन सी
इतनी नयी
मिल जाओ मुझमें या कि
मिला लो खुद में मुझे
एक वेग बना दो मुझे
जान सकूँगी मैं कितने
जंगलों कितनी नदियों को फिर
जिनमें सोती है रात
मेरी प्रिया

6.
असर

नीले रंग और उसके असर में
अब कोई फर्क नहीं था
जो मेरा था वह नहीं था
एक देह थी गीली भीतर तक
आतंकित उस घटित से
जो घट कर भी नहीं घटा
क्या है जिसके लिए फिर भी
यूँ गिरती है देह अपने भीतर
7.
स्वप्न और प्यास

किसी ने सुनी है वह साँस हवा की
जिसमें चलती रहती है प्यास जीवन की
पैदल कोई लड़की किसी सुनसान में जैसे
किसी ने देखा है वह नीला गाढ़ा अंधकार
स्वप्न के भीगे चुम्बन से जिसका रंग बदलता है
8.
नीले को  प्रिय

क्या कोई जानता है
कि रात का रंग सिर्फ काला नहीं होता
कई रातें बेशक काली होती हैं
गहरी बैंगनी मगर
जिनके नीले रेशों में होती है
मेरी देह भी
नीले रंग में होते हैं और कौन-कौन से रंग
किन रंगों में घुलते हैं और कौन रंग
कौन बचे रह जाते हैं फिर भी अकेले
बेलाग अलग-थलग
मिल जाने की सारी मंशा-ओ-मशक्कत के बावजूद
वह कौन सा रंग है अकेला
नीले को प्रिय
क्या कोई जानता है

‘स्वप्न समय’ संकलन राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.
 
      

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3 comments

  1. प्रकृति के साथ एकाकार होते हुए बहुत से गूढ़ प्रश्‍न…

  2. जीवन के खालीपन में कुछ खोजने की चाहत! शुक्रिया प्रभात जी एेसी अच्छी रचनाओं को सामने लाने के लिए।

  3. बहुत कुछ खोजती आपकी कविताए अच्छी लगी शुक्रिया ।

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