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और हँसी निष्कासित है अपने समय से

वरिष्ठ पत्रकार-लेखिका गीताश्री इन दिनों ‘कविया’ गई हैं. पिछले कुछ सालों में कुछ(सारी नहीं) अच्छी कहानियां लिखने के बाद उन्होंने अभिव्यक्ति का खतरा कविता में उठाया है. अब देखिये न क्या तासीर है इन कविताओं की कि जबसे इनको जानकी पुल पर लगाने के बारे में सोचा है रात से ही दिल्ली में जबर्दस्त बारिश हो रही है- जानकी पुल.
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कविता-1
एक बेहतर सुबह के इंतजार में
कब से उस सुबह का इंतजार है, जिसके बेहतर होने से
जाती हुई सांसे लौट सकती हैं,
भय से कांपती हुई परछाईं थिर हो सकती है
जख्मों से रिसता मवाद सूख सकता है खुली हवा में
वह अपनी मुठ्ठियों से आजाद कर सकता है पिछली बारिश को
उल्लास से भर कर दूध वाले से ले सकूंगी दूध का पैकेट
धोबी को दे सकूंगी अपनी पोशाकें
कि वह इस्तरी करके किस्मत की सलवटें खत्म कर सके
झाड़ू पोछा वाली छमकती हुई आए तो पहली बार मुझे जंचे
कि मैं उसकी पगार उसे वक्त पर देकर उसकी मुस्कुराहट को
अपने हिस्से का इनाम मान सकूं,
सब्जीवाले को किलो के भाव से आर्डर देकर मस्त हो सकूं
कि चार दिन की हो गई छुट्टी,
मैं रोज उदासी से भरी अपनी बच्ची को
रोज स्कूल जाते समय हाथ हिला कर बोल सकूं-हैव ए नाइस डे,
मेड के लिए परेशान श्रीमती पांडे से पूछ सकूं उनका हाल
कि जरुरी हो तो मैं भेज दूं अपनी मेड,
सोसाइटी के गेट पर फोन करके गार्ड को हड़का सकूं कि क्या तमाशा है यहां कि कोई सुनता ही नहीं हमें
जैसे इन दिनों ईश्वर नहीं सुनता हमारी आवाजें,
हम चीखते बिलबिलाते रहते हैं सांतवीं मंजिल पर टंगे हुए
कि वह खुद ही किसी दर्द में डूबा हो जैसे,
मैं एक बार फिर लौटती हूं रोज के काम से,
क्या उसे शिकंजे और संदिग्ध ठहराए जाने का दर्द मालूम है
कोख की कैद के बाद क्या उसने कोई और कैद देखी है
क्या हवा कभी पूछ कर अंदर आती होगी।
किसी को डांटते वक्त उसे कभी मलाल हुआ होगा,
क्यों वह खुद को साबित करने की प्रतियोगिता में शामिल कर देता है,
किसी बेहतर सुबह के लिए रातों को दुरुस्त करना कितना जरुरी होता है,
हर रात मेरी नींद में आकर किसी उम्मीद में दम तोड़ती है
बेहतर होने की उम्मीद में कितनी अनमनी होती जाती है जिंदगी
कि हम अपने नुकीले पंजे से भी पीछा नहीं छुड़ा पाते और जख्मी करते और होते रहते हैं निरंतर…निरंतर….
कि कभी-कभी नैरंतर्य का न होना स्थगित होना कतई नहीं होता..।
कविता-2

अभी और क्या क्या होना बाकी है,
और कितने दिन ढोए जाएंगे सवाल,
कितनी बार हम नींदे करेंगे खौफ के हवाले,
सपनों को कब तक रखेंगे स्थगित,
अपनी जमीन पर कब तक कांपते खड़े रहेंगे ढहाए जाने के लिए,
कब तक बसो में चीखें कैद रहेगीं और बेरहम सड़को पर आत्माएं मंडराएंगी,
क्या कुछ देखना बाकी है अभी कि
हम दो जुबान एक साथ बोलेंगे,
और लोग समझेंगे हालात पहले से अच्छे हैं,
हम निजता को पैरो तले रौंद कर देंगे रिश्तों की दुहाई,
और छीन लेंगे उसके मनुष्य होने का पहला हक,
उसे उसकी औकात में रखने का करेंगे सारा जतन
कि दहशत का अदृश्य घेरा उसे कसे होगा,
जिन्हें वह उलांघ नहीं पाएगी कभी,
वह कटेगी अपनी ही जुबान की धार से,
वह बोलेगी-सुनो लड़कियों…अपनी आत्माओं को सिरों पर उठा कर चलो…
सारी दलीलों के वाबजूद ये दलदल तुम्हें लील जाएंगे…
ये चेतावनी ही उसका आखिरी संवाद माना जाएगा…।
कविता-3

तुम्हें याद है पिछली बार हम कब ठिठके थे अपने ही द्वार पर,
कब खोली थी सांकल अपने-अपने मन की
कब बज उठे थे कुछ शब्द घंटियों की तरह
और तुम लड़खड़ाए बिना ही धमनियों में रक्त की तरह घर में घुस आए थे,
छोड़ो, जाने दो, अपने प्रेमिल चेहरे को दीवारों पर चिपकने दो इश्तिहार की तरह
कि प्रेम का घोषणा-पत्र रोज पढना जरुरी है किसी अखबार की तरह
जहां घटनाओं की तरह खबरें दर्ज होती चलती हैं/ और हम
बांचते हैं रोज चश्मा चढाए,
मैं ये चश्मा नहीं उतारना चाहती/ कि मुझे धुंधली हुई इबारतों को फिर से तलाशना है,
मैं फिर से पढ़ना चाहती हूं वह पन्ना/ जहां छोड़ आई थी अपना करार और अपने उदास होने की वजहें,
गुत्थमगुत्था हथेलियों की झिर्री से आती हवा को आजाद करते हुए तुमने पूछा था / क्या हम फिर से पुनर्नवा हो सकते हैं,
हम फिर फिर फूलों को खिलते देखकर खुश हो सकते हैं / कि क्या तुम अब भी चूहों को बिल में घुसते देखकर तालियां बजा सकती हो,
जब चाहो कुछ दिन के लिए घर से लापता हो सकती हो,
हल्के अंधेरे में किसी शाम प्रीत विहार के फुटपाथ पर बैठकर कसाटा खा सकती हो,
बेखौफ हाथ थामकर जनवरी की धुंध में गुम होने को औपन्यासिक कथानक से जोड़ सकती हो,
मैंने चुपचाप थामा तुम्हारा हाथ और मैंने देखा / हम फिर से अपने द्वार पर खड़े थे
और घंटियों से झरते शब्दों को तुम सहेजने में जुट गए..।
 कविता-4

क्या तुम सचमुच लौट आई हो मेरे पास, पिछली सदी से,
तुम्हारे पास अब भी बचा है उतना ही ताप मेरे लिए, कि मैं नहीं बचा पाया अपने हिस्से की झोली,
जिसमें कभी तुम भर भर कर देती थी अपनी हँसी सबेरे सबेरे…
डब्बे में रोज भर भर कर देती थी अपना ढेर सारी चिंताएं,
कि इन दिनों खाली झोलियां हमेशा हवा से भरी होती हैं और हँसी निष्कासित है अपने समय से।
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11 comments

  1. हम फिर फिर फूलों को खिलते देखकर खुश हो सकते हैं / कि क्या तुम अब भी चूहों को बिल में घुसते देखकर तालियां बजा सकती हो,—-अच्छी लगी शुक्रिया ।

  2. "कि इन दिनों खाली झोलियां हमेशा हवा से भरी होती हैं और हँसी निष्कासित है अपने समय से"। आज के समय का यही सार व यथार्थ है। संवेदनाओं की गायब होती दुनिया में भी कहीं संवेदनाओं को बचा लेने का प्रयास जारी है जो भविष्य में दुनिया की बदलती शक्ल के प्रति उम्मीद से भर देता है। शुभकामनाएं हैं कि ऐसा लेखन जारी रहे।

  3. मित्र गीता श्री की कविताओं को पढ़कर कविता के प्रति अपने विश्वास का चेहरा मैं साफ़-साफ़ देख रही हूँ..जो बहुत आश्वस्त है..! पत्रकारिता जैसे बीहड़ रास्ते से गुजरते हुए भी गीताश्री ने जिस तरह अपनी संवेदना और सरोकारों को सहेजकर, बचाकर रखा है.. वह भविष्य के लिए एक बेहतर समय के लिए आशावान करता है..! मेरी हार्दिक बधाई इस प्रतीक्षा के साथ कि आगे आपकी और भी कवितायें पढने को मिलेंगी..!

  4. ''मैं फिर से पढ़ना चाहती हूं वह पन्ना/ जहां छोड़ आई थी अपना करार और अपने उदास होने की वजहें,
    गुत्थमगुत्था हथेलियों की झिर्री से आती हवा को आजाद करते हुए तुमने पूछा था / क्या हम फिर से पुनर्नवा हो सकते हैं,'…!

  5. गीता जी, ईमानदारी की बात ये है कि कविताएं मुझे कम ही समझ आती है। हां, लेकिन कविता लिखने की जटिलता को मैं समझता हूं। मेरे ख्याल से कविताएं सोच कर नहीं लिखी जा सकतीं, कविताएं विचारों में बहती हुई आती हैं और चली जाती हैं। अगर मेरी सोच सही है तो आपकी कविताओं में विचार का स्वछंद बहाव साफ समझ आता है। तीसरी कविता मुझे बहुत अच्छी लगी। प्रेमिल चेहरे को दीवारों पर चिपकने दो इश्तिहार की तरह कि प्रेम का घोषणा-पत्र रोज पढना जरुरी है किसी अखबार की तरह…खूबसूरत है। चूहों को बिल में घुसते देखा तो नहीं हैं लेकिन देखा होता तो ताली जरूर बजाता। इन कविताओं की एक खासियत मुझे ये भी लगी कि मैं इन्हें विजुअलाइज कर सकता हूं। आपको बधाई

  6. मनीषा पांडे जी , गीता की कविताओं के लिए कमेंट करते वक्त आपने खुद ही एक कविता लिख दी है …
    आपकी शैली भी कमाल की है . फेसबुक पर तो आपने बमबारी कर रखी है . पुरुषों को तो लहुलुहान कर रखा है आपने ………….हमें तो आपसे अब डर लगने लगा है …………वैसे आपके क्रांतिकारी विचारों के तो हम कायल हैं ………

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  10. यथार्थवादी कवितायेँ, बहुत अच्छा लगा इनसे गुजरना, एक बेचैनी है इनमें जो जानी-पहचानी सी है, मेरा ख्याल है इनसे को-रिलेट कर पाना सहज रहा मेरे लिए, उम्मीद है गीताश्री जी बकौल प्रभात जी ''कवियाना' जारी रखेंगी, ताकि हम कुछ और अच्छी कवितायों से रूबरू हो पायें …..गीताश्री जी और जानकी पुल दोनों को बधाई ……शुक्रिया प्रभात जी,

  11. बहुत सारे मुहाबरेदार बाक्य को अभिव्यक्ति के एक दांचे में जूटा देने का शलाघ्य प्रयास है …अब लगता है हिंदी कविता का हाजमा दुरुस्त हुआ है …चुन्चुनके बहुत सारे मुहावरेदार वाक्य रख दीजिए और आप उसके कविता होने पर सोहर गाईये ….कविता उदार हो रही है ..

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