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कभी ‘नक़्श’ दिल का कहा तो करो

नक़्श लायलपुरी एक ऐसे शायर हैं जिन्होंने फिल्मों में भी कई अर्थपूर्ण गीत लिखे. आज उनकी कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें- मॉडरेटर.
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1.
तुझको सोचा तो खो गईं आँखें
दिल का आईना हो गईं आँखें
ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें
कितना गहरा है इश्क़ का दरिया
उसकी तह में डुबो गईं आँखें
कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का
कितनी वीरान हो गईं आँखें
दो दिलों को नज़र के धागे से
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें
रात कितनी उदास बैठी है
चाँद निकला तो सो गईं आँखें
नक़्शआबाद क्या हुए सपने
और बरबाद हो गईं आँखें
2.
वो आएगा दिल से दुआ तो करो
नमाज़े-मुहब्बत अदा तो करो
मिलेगा कोई बन के उनवान भी
कहानी के तुम इब्तदा तो करो
समझने लगोगे नज़र की ज़बां
मुहब्बत से दिल आशना तो करो
तुम्हें मार डालेंगी तन्हाईयाँ
हमें अपने दिल से जुदा तो करो
तुम्हारे करम से है ये ज़िंदगी
मैं बुझ जाऊँगा तुम हवा तो करो
हज़ारों मनाज़िर निगाहों में हैं
रुकोगे कहाँ फ़ैसला तो करो
पुकारे तुम्हें कूचा-ए-आरज़ू
कभी
नक़्शदिल का कहा तो करो
3.
ज़हर देता है कोई, कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मेरा दर्द बढ़ा देता है
किसी हमदम का सरे-शाम ख़याल आ जाना
नींद जलती हुई आँखों की उड़ा देता है
प्यास इतनी है मेरी रूह की गहराई में
अश्क गिरता है तो दामन को जला देता है
किसने माज़ी के दरीचों से पुकारा है मुझे
कौन भूली हुई राहों से सदा देता है
वक़्त ही दर्द के काँटों पे सुलाए दिल को
वक़्त ही दर्द का एहसास मिटा देता है
नक़्शरोने से तसल्ली कभी हो जाती थी
अब तबस्सुम मेरे होटों को जला देता है
4.
मेरी तलाश छोड़ दे तू मुझको पा चुका
मैं सोच की हदों से बहुत दूर जा चुका
लोगो! डराना छोड़ दो तुम वक्त़ से मुझ
यह वक्त़ बार बार मुझे आज़मा चुका
दुनिया चली है कैसे तेरे साथ तू बता
ऐ दोस्त मैं तो अपनी कहानी सुना चुका
बदलेगा अनक़रीब ये ढाँचा समाज का
इस बात पर मैं दोस्तो ईमान ला चुका
अब तुम मेरे ख़याल की परवाज़ देख़ना
मैं इक ग़ज़ल को ज़िंदगी अपनी बना चुका
ऐ सोने वालो नींद की चादर उतार दो
किरनों के हाथ सुब्ह का पैगाम आ चुका
पानी से नक़्शकब हुई रोशन ये ज़िंदगी
मैं अपने आँसुओं के दिये भी जला चुका
5.
अपना दामन देख कर घबरा गए
ख़ून के छींटे कहाँ तक आ गए
भूल थी अपनी किसी क़ातिल को हम
देवता समझे थे धोका खा गए
हर क़दम पर साथ हैं रुसवाइयां
हम तो अपने आप से शरमा गए
हम चले थे उनके आँसू पोंछने
अपनी आँखों में भी आँसू आ गए
साथ उनके मेरी दुनिया भी गई
आह! वो दुनिया से मेरी क्या गए
नक़्शकोई हम भी जाएँ छोड़ कर
जैसे
मीरो‘ ‘ग़ालिबो‘ ‘सौदागए
6.
माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने-तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं
ये भी नहीं के उठती नहीं हम पे उँगलियाँ
ये भी नहीं के साहबे किरदार हम नहीं
कहते हैं राहे इश्क़ में बढ़ते हुए क़दम
अब तुझसे दूर
, मंज़िले दुशवार हम नहीं
जानें मुसाफ़िराने रहे-आरज़ू हमें
हैं संगे मील
, राह की दीवार हम नहीं
पेशे-जबीने-इश्क़ उसी का है नक़्शे पा
उस के सिवा किसी के परस्तार हम नहीं
7.
अपनी भीगी हुई पलकों पे सजा लो मुझको
रिश्ता-ए-दर्द समझकर ही निभा लो मुझको
चूम लेते हो जिसे देख के तुम आईना
अपने चेहरे का वही अक्स बना लो मुझको
मैं हूँ महबूब अंधेरों का मुझे हैरत है
कैसे पहचान लिया तुमने उजालो मुझको
छाँओं भी दूँगा, दवाओं के भी काम आऊँगा
नीम का पौदा हूँ
, आँगन में लगा लो मुझको
दोस्तों शीशे का सामान समझकर बरसों
तुमने बरता है बहुत अब तो संभालो मुझको
गए सूरज की तरह लौट के आ जाऊँगा
तुमसे मैं रूठ गया हूँ तो मना लो मुझको
एक आईना हूँ ऐ! नक़्शमैं पत्थर तो नहीं
टूट जाऊँगा न इस तरह उछालो मुझको
8.
कोई झंकार है, नग़मा है, सदा है क्या है?
तू किरन है
, के कली है, के सबा है, क्या है?
तेरी आँख़ों में कई रंग झलकते देख़े
सादगी है
, के झिझक है, के हया है, क्या है?
रुह की प्यास बुझा दी है तेरी क़ुरबत ने
तू कोई झील है
, झरना है, घटा है, क्या है?
नाम होटों पे तेरा आए तो राहत-सी मिले
तू तसल्ली है
, दिलासा है, दुआ है, क्या है?
होश में लाके मेरे होश उड़ाने वाले
ये तेरा नाज़ है
, शोख़ी है, अदा है, क्या है?
दिल ख़तावार, नज़र पारसा, तस्वीरे अना
वो बशर है
, के फ़रिश्ता है, के ख़ुदा है, क्या है?
बन गई नक़्श जो सुर्ख़ी तेरे अफ़साने की
वो शफ़क है
, के धनक है, के हिना है, क्या है?
9.
जब दर्द मुहब्बत का मेरे पास नहीं था
मैं कौन हूँ
, क्या हूँ, मुझे एहसास नहीं था
टूटा मेरा हर ख़्वाब, हुआ जबसे जुदा वो
इतना तो कभी दिल मेरा बेआस नहीं था
आया जो मेरे पास मेरे होंट भिगोने
वो रेत का दरिया था
, मेरी प्यास नहीं था
बैठा हूँ मैं तन्हाई को सीने से लगा के
इस हाल में जीना तो मुझे रास नहीं था
कब जान सका दर्द मेरा देखने वाला
चेहरा मेरे हालात का अक्कास नहीं था
क्यों ज़हर बना उसका तबस्सुम मेरे ह़क में
नक़्शवो इक दोस्त था अलमास नहीं था
10.
तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया
तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया
तेरे ख़याल ने पहना शफ़क का पैराहन
मेरी निगाह से रंगों का सिलसिला न गया
बड़ा अजीब है अफ़साना-ए-मुहब्बत भी
ज़बाँ से क्या ये निगाहों से भी कहा न गया
उभर रहे हैं फ़ज़ाओं में सुब्ह के आसार
ये और बात मेरे दिल का डूबना न गया
खुले दरीचों से आया न एक झोंका भी
घुटन बढ़ी तो हवाओं से दोस्ताना गया

किसी के हिज्र से आगे बढ़ी न उम्र मेरी
वो रात बीत गई
नक्श़रतजगा न गया
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One comment

  1. Prem ke kai rangon me doobi in Nayaab gazlon ke liye Jankipul ko dhnyvaad.

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