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भारतीय सिनेमा का लास्ट लियर

युवा लेखक कुणाल सिंह सिनेमा की गहरी समझ रखते हैं. हाल में ही दिवंगत हुए फिल्मकार ऋतुपर्णो घोष पर उनका यह लेख रेखांकित किये जाने लायक है. ऋतुपर्णो घोष पर इस लेख में अनेक नई जानकारियां हैं, बंगला सिनेमा परंपरा में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन भी. एक अवश्य पठनीय लेख- मॉडरेटर 
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13 अगस्त, 1963 को कलकत्ते में जनमे ऋतुपर्णो अर्थशास्त्र से स्नातक थे। पिता श्री सुनील घोष का सम्बन्ध फिल्मी जगत से था, सम्भवतः मां का भी, इसलिए ऋतुपर्णो बचपन से ही फिल्म-निर्माण की प्रक्रियाओं से वाकफियत रखते थे।

अपने समकालीन अंजन दत्ता की तरह ही उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन जगत में कॉपी राइटिंग से की। जिंगल लिखने में ऋतुपर्णो को महारत हासिल थी। उनके द्वारा लिखे गये कई विज्ञापनों ने मकबूलियत हासिल की। ‘बोरोलिन’ तो अब भी बंगाल में लगने वाले होर्डिंगों में ऋतुपर्णो के लिखे बेसलाइन ‘बोरोलीन: बंग समाजेर अंग’ का इस्तेमाल करता है। यह ऋतुपर्णो ही थे जिन्होंने ‘मार्गो’ साबुन के लिए ‘देखते खाराप, माखते भालो’ (देखने में बुरा, इस्तेमाल में लाजवाब) जैसे दुस्साहसी बेसलाइन लिखा। यह भी इत्तेफाक है कि उम्र में कोई एक दशक भर का फासला होने के बावजूद ऋतुपर्णो और अंजन ने एक ही वर्ष में निर्देशन शुरू किया, ऋतु ने बांग्ला में ‘हीरेर आंग्टी’ बनाई तो अंजन ने हिन्दी में मार्क रोबिन्सन, तारा देशपांडे अभिनीत ‘बड़ा दिन’।

टाॅलीवुड में ऋतुपर्णो का, बतौर फिल्म निर्देशक, आगमन बीती सदी के आखिरी दशक के शुरुआती वर्षों में हुआ था। 1992 में बांग्ला कथाकार शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय के उपन्यास पर उन्होंने ‘हीरेर आंग्टी‘ (हीरे की अंगूठी) नामक फिल्म बनाई, लेकिन उन्हें असली पहचान उनकी दूसरी फीचर फिल्म ‘उनीसे एप्रिल‘ (उन्नीस अप्रैल) से मिली, जो दो वर्ष बाद 1994 को रीलीज हुई थी। अपर्णा सेन और देबश्री राय अभिनीत इस फिल्म ने तब के बंगाली मध्यवर्ग को झकझोर कर रख दिया था। मां-बेटी के अन्तस्सम्बन्धों के विविध परतों को प्याज के छिलके की तरह शनैः-शनैः उतारती इस फिल्म की सबसे बडी खासियत यह थी कि पूरी कहानी एक घर के अन्दर परिघटित दिखाते हुए भी निर्देशक ने इसे बृहत्तर समाज के साथ नत्थी करने में कोई कोताही नहीं बरती थी। बाद के दिनों में ऋतुपर्णो की फिल्मों की यह खास अदा ही बन गयी कि बहुत जरूरत पडने पर ही वे कैमरे को आउटडोर में पैन करते, मूलतः वे इनडोर डाइरेक्टर ही बने रहे। वर्ष 2004 में बनी उनकी ‘रेनकोट‘ को इसका एक और सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है।

वैसे देखा जाए तो विजुअॅल मीडियम में ऋतुपर्णो का पहला काम ‘हीरेर आंग्टी’ नहीं था। इससे पेश्तर, सम्भवतः 1988-89 में उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘वन्देमातरम’ नामक एक डाॅक्यू-फीचर का निर्देशन किया था। दूरदर्शन पर एकाधिक बार प्रसारित होने वाले इस डाॅक्यू-फीचर में एक मां अपने बेटे को ‘वन्देमातरम’ का अर्थ व इस शब्द का हमारे जीवन में महत्त्व समझाती है। इसमें ऋतुपर्णो ने बंकिमचन्द्र के ‘आनन्दमठ’ के एक अंश को बड़ी खूबसूरती के साथ पिरोया था।

मैंने जान-बूझकर इसे प्रमुखता से रेखांकित किया कि सिने-जगत में ऋतुपर्णो का आगमन कब हुआ था। ध्यान रहे, बांग्ला सिनेमा का अतीत बहुत ही गौरवशाली है, जहां सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, तरुण मजूमदार, तपन सिंह और मृणाल सेन जैसे निर्देशकों ने न सिर्फ भारतीय, बल्कि अन्तरराष्टीय सिनेमा को भी प्रभावित किया। लेकिन 80 के दशक तक आते-आते वही बांग्ला सिनेमा फन्तासियों-मसालों के मकडजाल में फंस चुका था। रे-घटक-सेन जैसे निर्देशक नहीं रहे, न ही उत्तम कुमार, छबि बिश्वास जैसे अभिनेता। सौमित्र चैटर्जी, मिठुन चक्रवर्ती, रंजीत मल्लिक, विक्टर बैनर्जी, धृतिमान चैटर्जी, अपर्णा सेन जैसे सशक्त अभिनेता भी भला क्या कर सकते थे जब वैसा सिनेमा ही न हो। बुद्धदेब दासगुप्ता, गौतम घोष, अंजन दत्त जैसे निर्देशक भी क्लास और मास के द्वन्द्व में फंसे थे। अर्पणा ने ‘36 चैरंगी लेन’ और ‘परमा’ जैसी फिल्में बनाई अवश्य थीं लेकिन थीम की वजह से इन फिल्मों को वाहवाही तो मिली, पर फैमिली एक्सेप्टेंश नहीं। ऐसे में बांग्ला प्रबुद्ध जनमानस के पास कोई और विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि वे थिएटर जाना ही छोड दें।

ऐसे में ऋतुपर्णो की ‘उनीसे एप्रिल‘, ‘दहन‘ जैसी फिल्मों ने जब अपनी कलात्मकता को अक्षुण्ण रखते हुए भी भारी संख्या में दर्शकों को सिनेमा हालों में खींचा, तो एकाएक बांग्ला सिनेमा का परिदृश्य बदलता-सा दिखने लगा। ऋतुपर्णो ने कुछ नया नहीं किया, बल्कि अपने समकालीनों में अपेक्षाकृत वे सबसे पहले शख्स थे, जिन्होंने राय-घटक-सेन के व्यामोह को वेधा। उन्होंने यह अहसास दिलाया कि कलात्मकता का अकेला अर्थ यही नहीं कि आप राय-घटक-सेन सिंडोम में फंसे रहे, इनसे परे भी कलात्मकता की रहनवारी हो सकती है। ऐसा नहीं था कि बुद्धदेब, गौतम, अपर्णा जैसे निर्देशक कलात्मकता का अर्थ नहीं जानते थे, बस वे उस खास किस्म की ‘बंगाली कलात्मकता‘ से निकल नहीं पा रहे थे जिसे सत्यजीत या मृणाल ने सृजित किया था और क्रूरतम सचाई ये थी कि एक जमाने में वैश्विक स्तर पर पहचान अर्जित करने वाली उस ‘बंगाली कलात्मकता‘ ने आम बंगाली समाज में अब अपनी साख खो दी थी। जरूरत थी उस कलात्मकता के समानान्तर एक ‘अन्य कलात्मकता‘ को सृजित करने की, और यही काम ऋतुपर्णो ने अपने समकालीनों में सबसे पहले किया। मजेदार बात यह है कि अपने ‘लुक‘ में ऋतुपर्णो की यह कलात्मकता सत्यजीत या मृणाल की अपेक्षा ज्यादा बंगाली टच लिये हुए है। मसलन रवीन्द्र संगीत का सर्वाधिक प्रयोग अपनी फिल्मों में ऋतुपर्णो ने ही किया है, ‘चोखेर बाली‘, ‘नौकाडुबी‘, ‘चित्रांगदा‘ जैसी फिल्में तो रवीन्द्र साहित्य को अपना आधार बनाती ही हैं, टैगोर की आत्मकथा ‘जीबोन सृति‘ पर ऋतुपर्णो ने एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया, जिसका प्रदर्शन अभी होना है। प्रसेनजित-बिपाशा बसु अभिनीत हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘शब चरित्रो काल्पोनिक‘ में तो नायक स्वयं एक लेखक है और पूरी फिल्म उसकी श्रद्धांजलि सभा के इर्द-गिर्द घूमती है। इस श्रद्धांजलि सभा में बांग्ला के तमाम साहित्यकार मौजूद हैं (फिल्मी नहीं, सचमुच के साहित्यकार) और श्रद्धांजलि-स्वरूप स्टेज पर आकर अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं।

ऋतुपर्णो की फिल्मों की एक खास बात यह भी है कि उन्होंने अपनी फिल्मों में अभिनय के स्तर पर भी कोई खास परहेज नहीं दिखाई और अपनी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने उन्हीं मसाला ऐक्टरों को कास्ट किया, जिनसे कोई आर्ट फिल्म मेकर अपनी कलात्मक पहचान बनाये रखने की खातिर सहज ही दूरी मेंटेन कर सकता है। ‘उनीसे एप्रिल‘ में मुख्य अभिनेत्री देबश्री राॅय तब की मसाला फिल्मों की हाॅट केक मानी जाती थीं और कुछेक दृश्यों में मसाला फिल्मों के सुपरस्टार प्रसेनजित की एकदम अलहदा ढंग से एंटी है। पहली बार बांग्ला दर्शकों ने प्रसेनजित और देबश्री को पेडों के इर्द-गिर्द डांस या रोमांस करते नहीं देखा। विदित हो कि तब प्रसेनजित और देबश्री में रोमांस की खबरों से कलकत्ते के अखबार रंगे होते थे और बाद में दोनों ने शादी भी कर ली, अलग बात है कि दोनों में जल्दी ही तलाक भी हो गया। लेकिन ऋतुपर्णो की ढिठाई देखिए कि पूरी फिल्म में उन्होंने इस तरह के किसी प्रकरण का इस्तेमाल नहीं किया। किसी नये फिल्ममेकर के लिए यह जोड़ी खतरनाक साबित हो सकती थी, अगर वह मसाला फिल्म नहीं बना रहा; क्योंकि पोस्टर पर प्रसेनजित-देबश्री को देखकर दर्शक एक दूसरी उम्मीद लिये थिएटर में प्रवेश करेगा। आगे चलकर प्रसेनजित ऋतुपर्णो के प्रिय अभिनेता हुए, जिनको उन्होंने कई बार रीपीट किया। सौमित्र चैटर्जी, चिरंजीत, अभिषेक चैटर्जी, ऋतुपर्णो सेनगुप्ता, दीपंकर दे, ममता शंकर, जिश्नु सेनगुप्ता, अपर्णा सेन आदि सबके साथ ऋतुपर्णो ने काम किया। इसी तरह उन्होंने हिन्दी के अजय देवगन, ऐश्वर्या राय, अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, अर्जुन रामपाल, मनीषा कोईराला, राखी गुलजार, किरण खेर, बिपाशा बसु, प्रीति जिंटा, शर्मिला टैगोर, मिठुन चक्रवर्ती, जैकी श्राफ, अन्नू कपूर, कोंकणा सेनगुप्ता, राइमा सेन, रिया सेन, दिव्या दत्ता, सोहा अली खान, नन्दिता दास, शेफाली शाह आदि कई स्वनामधन्य अभिनेताओं को उनकी अब तक की अर्जित ख्याति और इमेज के लगभग विपरीत भूमिकाओं को न सिर्फ सौंपा, उनसे बेहतर काम भी लिया।

ऋतुपर्णो की स्मृति बड़ी विचक्षण थी। शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय की कहानी ‘साहेब भूत’ उन्हें बहुत पसन्द थी और वे इसी पर अपनी पहली फिल्म का निर्माण करना चाहते थे। उसका स्क्रिप्ट तैयार कर वे ‘चिल्ड्रेन्स फिल्म सोसाइटी’ गये थे, लेकिन वहां के अधिकारियों ने बच्चों के लिए हाॅरर फिल्म बनाने से साफ मना कर दिया। वहीं के वहीं ऋतु ने अधिकारियों को उन्हीं शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय की एक दूसरी कहानी ‘हीरेर आंग्टी’ सुना दी। अधिकारियों के बीच सम्मति बनती दिखी और ऋतु को कहा गया, वे इसका स्क्रिप्ट तैयार करें। जिस दिन स्क्रिप्ट को हरी झंडी मिली, घर वापसी में टैक्सी में ही स्क्रिप्ट छूट गया। सोचिए, किसी स्टगलर का स्क्रिप्ट पहली बार फाइनलाइज हुआ हो और उसी दिन उससे वह स्क्रिप्ट गुम हो जाए। तुर्रा यह कि ऋतु के पास उसकी कोई दूसरी काॅपी भी नहीं थी। लेकिन सिवाय ‘जाः बाबा, स्क्रिप्ट तो टैक्सी में ही भूल आया’ कहने के अलावा ऋतु ने कोई अफसोस जाहिर नहीं किया। कारण, दो दिन बाद ही पूरा का पूरा स्क्रिप्ट ऋतु ने अक्षरशः वैसा ही दुबारा तैयार कर लिया।

ऋतुपर्णो को मिस्टर पर्फेक्शनिस्ट भी कहा जाता है। वे अपनी फिल्मों के हर फ्रेम को लेकर पजेसिव थे। ‘चोखेर बाली’ में राइमा सेन को साड़ी पहनना ही नहीं सिखाया, कुछ दिनों तक इसके लिए राइमा को वर्कशाॅप भी करना पड़ा। वर्कशाॅप यह कि राइमा को ऋतु के घर पर साड़ी पहने रहना है, मिलने-जुलने वालों को चाय पिलानी है, बर्तन उठाने हैं इत्यादि। खासकर डबिंग को लेकर ऋतु ने बहुत बार इंडस्टी में तांडव मचाया है। फिल्म रीलीज होती और अक्सर ऐक्टर पाते कि उनकी आवाज बदल दी गयी है। ऐश्वर्या राय, बिपाशा बसु, राइमा सेन, जैकी श्राफ, किरण खेर आदि तो खैर बालीवुड से हैं, तो किसी हद तक चलायमान था, लेकिन ऋतु ने सुचित्रा मित्र, चिरंजित तक जाने-माने अभिनेताओं तक को नहीं बख्शा। मजेदार यह कि ऋतु डबिंग भी जाने-माने अभिनेताओं से ही कराते। श्रीला मजूमदार, सुदीप्ता चक्रवर्ती, सुमन्तो मुखोपाध्याय, चुर्णी गांगुली, सव्यसाची चक्रवर्ती आदि का इस्तेमाल ऋतु ने बतौर डबिंग आर्टिस्ट किया, जबकि ये सबके सब बांग्ला के जाने-माने अभिनेता हैं। यही हाल लाइटिंग, मेकअप इत्यादि को लेकर था। अपनी पहली फिल्म ‘हीरेर आंग्टी’ के एक दृश्य में लाइट मन-मुताबिक नहीं होने की वजह से ऋतु ने ज्ञानेश मुखोपाध्याय, बसन्त चैधरी, वरुण चन्द, दुलाल लाहिड़ी जैसे कलाकारों को पूरी तैयारी के बाद भी घंटों बिठाये रखा था। ‘नौकोडुबी’ में नदी में तैरते एक शव को दिखाना था, पूरी यूनिट किसी सचमुच के शव के साथ शूट करने को तैयार थी, लेकिन ऋतु को शव भी पर्फेक्ट दिखाना था, सो एक जूनियर आर्टिस्ट पर चार घंटे खर्च कर नकली शव तैयार किया गया और तब जाकर शूटिंग शुरू हुई।

21 वर्ष के अपने फिल्मी करियर में ऋतुपर्णो ने न सिर्फ निर्देशन, बल्कि स्क्रिप्टिंग, ऐक्टिंग आदि में भी हाथ-आजमाइश की। ‘रेनकोट‘ में उन्होंने गाने भी खुद लिखे, भले मूल बांग्ला में, जिसका अनुवाद प्रसिद्ध रंगकर्मी उषा गांगुली ने किया था। सिने-इतिहास में सम्भवतः पहली बार किसी मूल हिन्दी फिल्म के लिए संवाद और गाने अनूदित किये गये। चूंकि ऋतुपर्णो के समक्ष यह चुनौती थी कि वे बांग्ला सिनेमा को उसके खोये हुए दर्शक लौटाएं, उन्होंने ज्यादातर उन्हीं विषय-वस्तुओं का चयन किया, जो मध्यवर्गी जन-चेतना से सम्बद्ध हों। इसके लिए ऋतुपर्णो ने बडी बेरहमी से स्वयं को सेंसर किया। कोई आसानी से उन पर इल्जाम लगा सकता है कि उनके पास बडे मुद्दों और लार्जर कैनवास को डील करने का हौसला नहीं था, इसलिए उन्होंने न सिर्फ विषय-वस्तु के स्तर पर, बल्कि टीटमेंट में भी डोमेस्टिक टाॅमा को प्रश्रय दिया। लेकिन सिनेमा के गम्भीर अध्येता इस बात से मुतास्सिर होंगे कि ऋतुपर्णो ने एक जल्दबाज झलक में एकरैखिक-से लगते कथानक की तमाम जटिलताओं को सामने रखने में कहीं कोई कसर नहीं छोडी। ‘रेनकोट‘ में यों तो पूरा कथानक बरसात से सीलियाये पुराने ढब के एक घर में कैद है, लेकिन दो पुराने प्रेमियों, जिनकी जिन्दगी में उनका प्रेम अब अपनी तमाम उष्मा को छोडकर उस कमरे की तरह ही बन्द और सीलनदार हो गया है, के आपसी सम्बन्धों को जिस बारीकी से ऋतुपर्णो ने उकेरा है, वहां तक लार्जर दैन लाइफ का दावा करने वाली बडी-बडी फिल्में भी शायद ही पहुंचती हैं।

ऋतुपर्णो की फिल्मों की जिस एक खूबी की तरफ इशारा किये बगैर बात अधूरी रहेगी, वह है स्त्रियों के प्रति उनमें सम्मान का भाव। यह भाव फ्रेम दर फ्रेम उनकी फिल्मों में झलकता है। उनका खुद का मानना था कि पुरुष अब तक एक अविकसित प्रजाति है, कि जिस दिन यह प्रजाति पूर्ण रूप से विकसित हो जाएगा, उस दिन वह स्त्री बन जाएगा। यही कारण है कि जिन उदात्त भावनाओं की तारीफ करते हम अघाते नहीं–ममता, करुणा, दया, प्रेम आदि, उन सबकी रिहाइश अधिकतम स्त्रियों में ही होती है। यही कारण है कि जब हम नये मिलेनियम में प्रवेश कर रहे थे और पेज थ्री की सबसे बड़ी चिन्ता यह होने लगी कि शताब्दी का महानायक कौन है, ऋतुपर्णो ने शताब्दी की सबसे बड़ी मां महात्मा गांधी को माना और सबसे बड़ी प्रेमिका टैगोर को। यह एक बड़ी बात है, जहां तक एक औसत आदमी की निगाह जा ही नहीं सकती। ऋतुपर्णो भावनाओं का वर्गीकरण जेंडर के आधार पर नहीं करते थे। कई बार वे सार्वजनिक स्थलों पर स्त्रियों के लिए मानकीकृत वेशभूषा में चले जाते थे। लिपस्टिक, झुमके, बिन्दी, काजल आदि का इस्तेमाल वे उतनी ही सहजता से करते थे, जितनी कि स्त्रियां। अपने अन्तिम दिनों में उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय भी किया और समलिंगी सम्बन्धों अथवा टांसजेंडर कम्यूनिटी की जटिलताओं को खुलकर प्रश्रय दिया। वे मानते थे कि हमारा समाज अभी टांजिट पीरियड से गुजर रहा है और ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें खुलकर आना है। वे आएंगी और हमें उन्हें ग्रेसफुली अंगीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। अपने शुरुआती दौर में ही एक अंग्रेजी दैनिक को उन्होंने एक इंटरव्यू दिया था, जो हालांकि सत्यजित का उन पड़े प्रभाव की बाबत था, लेकिन ऋतुपर्णो का तेवर तो देखिए–“If somebody had influenced me to become a filmmaker, it was Ray. Ray set a masculine prototype for film directors. People were proud of his height and his English. People (like me) who wear danglers and kajol to parties (were regarded) as an insult to Ray.” ऋतुपर्णो के इस कथन में उनका विवादी स्वर साफ परिलक्षित है और राय-घटक-सेन सिंडोम से निकलने की वह बेचैनी व अकुलाहट भी, जिसकी तरफ मैंने उपर इशारा किया।

उनकी इस निराली वेशभूषा पर जब-जब टीका-टिप्पणी की गयी, उनका एक और रूप ही सामने आया। उनका मानना है कि परिधान के मामले में ‘यूनीसेक्स‘ के कान्सेप्ट को आज पूरी तरह से स्त्रियों ने हथिया लिया है। जब वे लड़कों के कपड़े भी पहन सकती हैं तो लड़के उनके कपड़े क्यों नहीं। ऋतुपर्णो मानते हैं कि काजल, टीका, नेकलेस, कान की बालियां, कड़े आदि प्राचीन काल से हमारे यहां पुरुषों के परिधान का अंग रहे हैं। जिन्हें हम पूजते हैं, राम, विष्णु आदि, वे भी इन्हें धारण करते हैं। इनकी वर्जना औपनिवेशिक मानसिकता के तहत हुई, जब स्त्रियां खरीदी-बेची जाने वाले पण्य के रूप में, अथवा बहुत हुआ तो प्रजनन की मशीन के रूप में देखी-माने जाने लगीं। एक प्रबुद्ध मनीषी के रूप में ऋतुपर्णो को इसका प्रतिवाद तो करना ही था, न सिर्फ कथनी के स्तर पर, करनी के स्तर पर भी।

स्त्रियों के प्रति पितृसत्ताक द्वेष का बेहतरीन नमूना ऋतुपर्णो की तीसरी फिल्म ‘दहन‘ में दिखता है, जहां कलकत्ते के भीड़-भाड़ वाले इलाके में सरेराह चलते कुछ शोहदे एक लड़की के साथ छेड़छाड़ करते हैं और पूरा बंगाली भद्रलोक हतप्रभ खड़ा है। ऐसे में एक दूसरी लड़की ही उसके बचाव में आती है। लेकिन ऋतुपर्णो इसे और आगे ले जाते हुए सड़क की हतप्रभता को बेडरूम तक (आलोचक कहेंगे, लौट के बुद्धू इनडोर में आये) घसीट लाते हैं। जिस लड़की ने पहली लड़की का बचाव किया था, आज उसकी खुद की जिन्दगी उस घटना की वजह से बदल जाती है जब उसके घर के लोग ही उस पर तोहमतों की बौछार करने लगते हैं। सड़क पर हो रहे जुल्म का प्रतिकार तो सहज है, कि वहां जो है, दिन की रोशनी में साफ-साफ गलत दिखता है; लेकिन घर की चाहारदीवारी के अन्दर अंधेरे में जब वही जुल्म दोहराया जाने लगे तो बाहर का कोई प्रतिकार इसलिए नहीं करेगा कि इसे हमने ‘फैमिली मैटर‘ का नाम दे दिया है। इस अर्थ में ऋतुपर्णो के लिए ‘इनडोर‘ कई बार ज्यादा कारआमद और पैना हो उठता है, जिसे हम लार्जर आउटडोर के लोभ में पड़ कर भोथरा कर देते हैं।

इस तरह ऋतुपर्णो के फिल्मी सफर को हम चाहें तो तीन पड़ावों में देख सकते हैं– पहला, जब वे बांग्ला शहराती मध्यवर्गीय समस्याओं को केन्द्र में रखकर फिल्में बनाते हैं, उनीसे एप्रिल, दहन, असूख आदि; इन्हीं फिल्मों के लिए मुख्य रूप से वे जाने भी जाते हैं। दूसरा दौर नयी सदी में शुरू मानें जहां भाषिक स्तर पर ऋतुपर्णो के फलक का विस्तार हुआ। ऋतुपर्णो ने हिन्दी में ‘रेनकोट‘ बनाई, जिसमें हिन्दी के कलाकार– अजय देवगन, ऐश्वर्या राय, अन्नू कपूर, समीर धर्माधिकारी, सुरेखा सीकरी आदि कास्ट किये गये, लोकेल के स्तर पर भी ऋतुपर्णो बंगाल से बाहर निकलें, हालांकि इस फिल्म का मूल कथाक्षेत्र कलकत्ता ही था, लेकिन फ्लैशबैक पद्धति से बिहार के भागलपुर के भी कुछ दृश्य फिल्माये गये। सारे चरित्र भी अ-बंगाली ही थे, मनोज (अजय देवगन) और नीरजा (ऐश्वर्या राय) ही नहीं, काइयां मकान मालिक (अन्नू कपूर) भी। इससे और आगे बढ़ते हुए ‘द लास्ट लियर‘ में ऋतुपर्णो ने भाषिक बन्धन को पूरी तरह नकार दिया; इसमें अंग्रेजी, हिन्दी और बांग्ला तीनों भाषाओं को बोलने वाले चरित्र हैं। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, प्रीति जिंटा और अर्जुन रामपाल जैसे हिन्दी फिल्मों के अभिनेता थे तो बांग्ला फिल्म से प्रसेनजित और जिश्नु सेनगुप्ता भी। अपने अन्तिम दिनों में ऋतुपर्णो ‘सनग्लास‘ नाम से एक और हिन्दी फिल्म पर काम कर रहे थे, जिसमें आर. माधवन, कोंकणा सेनगुप्ता, नसीरुद्दीन शाह, जया भादुड़ी, राइमा सेन आदि की मुख्य भूमिकाएं हैं। ऋतुपर्णो ने कई ऐसी बांग्ला फिल्में भी बनाई जिसमें हिन्दी अभिनेताओं को पहली बार बांग्ला में कास्ट किया, मसलन ‘बाड़ीवाली‘ में किरण खेर, ‘अन्तरमहल‘ में अभिषेक बच्चन, जैकी श्राॅफ, सोहा अली खान, ‘चोखेर बाली‘ में ऐश्वर्या राय, ‘खेला‘ में मनीषा कोईराला, ‘शब चरित्रो काल्पोनिक‘ में बिपाशा बसु आदि। इस सफरनामे में तीसरे पड़ाव के रूप में हम उन फिल्मों को देख सकते हैं जहां ऋतुपर्णो अपनी आइडेंटिटी और सेक्सुअॅलिटी को सेलीब्रेट करते-से दिखते हैं। मुख्यतः यही वह दौर है जब ऋतुपर्णो स्वयं क्राॅसडेसर की भूमिका में दिखने लगते हैं। ‘नौकाडुबी‘ में उन्होंने नायक की मां की भूमिका निभाई तो ‘आर एकटी प्रेमेर गोल्पो‘ (निर्देशक कौशिक गांगुली) में टांसजेंडर डाक्युमेंटरी फिल्म-मेकर और ‘चित्रांगदा‘ में समलिंगी की भूमिका। संजय नाग द्वारा निर्देशित हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘मेमोरीज इन मार्च‘ (दीप्ति नवल, राइमा सेन) में भी ऋतुपर्णो की भूमिका को लेकर बंगाली भद्रसमाज में खासा विवाद हुआ था।

कहना न होगा, ऋतुपर्णो अपने कृतित्व में ही नहीं, व्यक्तित्व में भी क्रान्तिकारी थे। ऐसे सिनेमादां बिरले ही होते हैं और जब होते हैं तो उस खास काल-खंड को उनके नाम से जाना जाता है। वैसे तो ऋतुपर्णो के समकालीन और भी महत्त्वपूर्ण फिल्म निर्देशक हुए, लेकिन बीती सदी के आखिरी और नयी सदी के पहले दशक को बांग्ला सिनेमा के इतिहास में निश्चित रूप से ‘ऋतुपर्णो-काल‘ के नाम से अभिहित किया जाएगा।

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6 comments

  1. ऋतुपर्णो घोष के बारे में आपने एक बढियां आलेख लिखा है

  2. dhanyavaad chandan aur vijay ji… pushyamitra ji aap sahi hain. antim dinon mein rituporno bahut jyada dawaiyan khane lage the. yahan tak ki un dawaon ki garmi se nijaat pane ke liye unke bedroom, jo thasathas bhara tha, mein do-do airconditioners hamesha chalte raha karte the. apne article se iska seedha seedha sambandh na thaharne ke kaaran, maine vistaar mein jana nahi chaha tha.anyways thanks.

  3. मैंने ऋतुपर्ण की कई फ़िल्में देखी और सराही हैं, वे अक्सर जमशेदपुर में अपनी फ़िल्में ले कर आते रहे हैं। कुणाल ने बहुत सारगर्भित लिखा है। लेख में जानकारी और विश्लेषण दोनों मार्के का है। बधाई जानकीपुल और कुणाल दोनों को।

  4. ऋतुपर्णो घोष के बारे में आपने एक बढियां आलेख लिखा है. खास तौर पर उनकी फिल्मोग्राफी के बारे में. मगर उनके जीवन के बारे में एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ छूट रहा है. वे खुद को एक मुकम्मल औरत में बदलना चाहते थे. इस कोशिश में उन्होंने हारमोन थेरापी का सहारा भी लिया. डाक्टरों का कहना है कि अतिशय हारमोन थेरापी की वजह से ही उनकी जान गयी है.

  5. A nice write up. Specially, parts of his understandings regarding the second sex. Kunal have not only understanding but full knowledge of subjects of cinema. Thanks.

  6. काफ़ी अच्छी जानकारी मिली है इस लेख से । सिनेमा के भीतर और बाहर को काफी संजीदगी से उकेरा है रितुपर्णो के बहाने … सिनेमा जगत के तनावों और दबावों के साथ साथ सामाजिक परिस्थितियों और संघर्षों को भी बखूबी यह आलेख उकेर रहा है …

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