Home / ब्लॉग / तू परिधि से नहीं परिधि तुझसे है

तू परिधि से नहीं परिधि तुझसे है

हाल में ही युवा कवयित्री सुधा उपाध्याय का कविता संग्रह राधाकृष्ण प्रकाशन से आया है- ‘इसलिए कहूँगी मैं‘. उसी संग्रह से कुछ चुनी हुई कविताएँ- मॉडरेटर.
==============================

            
                              मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं
चौराहों से एक तरफ निकलती
     संकरी गली में
     स्थापित कर दी तुमने मेरी प्रतिमा
     लोग भारी भारी होकर आते हैं मेरे पास
     मुझे छू-छूकर दिलाते हैं विश्वास
     कि मैं हूं
     मैं हूं
     मैं हूं
     बस कभी हल्की नहीं होने पाती मैं
     ताकती रहती हूं
     चौराहे पर पसरी भीड़ को
     उपेक्षित गली को
     और सबसे ज्यादा
     अपने ईर्द गिर्द लगी
     लोहे की जालियों को
     जहां अब भी ढेर सारा चढ़ावा रखा है


(2)                               औरत
                        औरत
     तूने कभी सोचा है
     जिस परिधि ने तुझको घेर रखा है
     उसकी केंद्र बिंदु तो तू ही है
     तू कहे अनकहे का हिसाब मत रख
     किए न किए कि शिकायत भी मत कर
     तू धरा है धारण कर
     दरक मत
     तू परिधि से नहीं
     परिधि तुझसे है

(3)                   क्यों करती हो वाद-विवाद
     क्यों करती हो वाद-विवाद
     बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर
     जबकि लुभाते हैं तुम्हें
     पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान
     सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन
     जबकि वे क्षीण करते हैं
     तुम्हारे स्त्रीत्व को
     हत्यारे हैं भीतरी सुंदरता के
     घातक हैं प्रतिशोध के लिए।
     फिर क्यों करती हो वाद-विवाद।


           
(4)                               बोनजई
     तुमने आँगन से खोदकर
     मुझे लगा दिया सुंदर गमले में
     फिर सजा लिया घर के ड्राइंग रूम में
     हर आने जाने वाला बड़ी हसरत से देखता है
     और धीरे-धीरे मैं बोनज़ई में तब्दील हो गई
     मौसम ने करवट ली
     मुझमें लगे फल फूल ने तुम्हें फिर डराया
     अबकी तुमने उखाड़ फेंका घूरे पर
     आओ देखकर जाओ   
            यहां मेरी जड़ें और फैल गईं हैं।

(5)       विशिष्टों का दु:
                खुश्क हंसी लीपे पोते
          अपनी-अपनी विशिष्टताओं में जीते
          लोगों के कहकहे भी होते हैं विशिष्ट
          कृत्रिमता की खोल में
          जबड़ों और माथे पर कसमसाता तनाव
          उन्हें करता है अन्य से दूर
          कभी नहीं पता चल पाता
          मिल जुलकर अचार मुरब्बों के खाने का स्वाद
          कोई नहीं करता उन्हें नम आंखों से विदा
          या कलेजे से सटाकर गरम आत्मीयता
          विशेष को कभी नहीं मिलता
          शेष होने का सुख


(6)            भरोसा…उधार
उसने मांगा मुझसे उधार….भरोसा
लगा, लौटाएगा या नहीं
अपने सम्बन्धियों से मैंने मांगा…विश्वास
बदले में मिलता रहा बहाना
अब कुछ-कुछ समझने लगी हूं
किससे कितना और
क्या-क्या है छुपाना।

(7)      खानाबदोश औरतें
                सावधान ….
इक्कीसवीं सदी की खानाबदोश औरतें
तलाश रहीं हैं घर 
सुना है वो अब किसी की नहीं सुनतीं 
चीख चीख कर दर्ज करा रही हैं सारे प्रतिरोध 
जिनका पहला प्रेम ही बना आखिरी दुःख 
उन्नींदी अलमस्ती और
बहुत सारी नींद की गोलियों के बीच
     तलाश विहीन वे साथी जो दोस्त बन सकें 
     आज नहीं करतीं वे घर के स्वामी का इंतज़ार 
     सहना चुपचाप रहना कल की बात होगी 
     जाग गयी हैं खानाबदोश औरतें 
     अब वे किस्मत को दोष नहीं देतीं 
     बेटियां जनमते जनमते कठुवा गयी हैं

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-10 अंतिम

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात …

8 comments

  1. "कविता उसके लिए(स्त्री) अब प्रतिशोध का नहीं, प्रतिरोध का हथियार है, अब उसे(स्त्री) किसी से बदला नहीं लेना बल्कि अब वह सबकुछ बदल देने पर उतारु हैं। अब इस पर समाज उसे अज्ञेय, दुस्साहसी या नवोन्मेषी कहे, तो कहे—-" युवा कवि (प्रो.) सुधा उपाध्याय ने अपने लेख में ये पंक्तियां लिखी थीं। किसी साहित्यिक पत्रिका में पढा था उनका लेख।
    सुधा ने अपनी कविताओं के जरिए यही सबित भी किया है। कविता उसके लिए बिल्कुल यही है जो वह अन्य स्त्रियों के लिए बताती है…। सुधा का नया कविता संग्रह –इसलिए कहूंगी मैं–राधाकृष्ण प्रकाशन से छप कर आया है। उसमें बहुत ताकतवर कविताएं हैं…अपने समय से मुठभेड़ करती कविताएं—सुनिए-आभार कविता के कुछ अंश, जो मुझे भाए–
    "उन सबका आभार/ जिनके नागपाश में बंधते ही /यातना ने मुझे रचनात्मक बनाया/ आभार उनका भी/ जिनकी कुटिल चालें/ चक्रव्यूह ने मुझे जमाने का चलन सिखाया/ उनका भी हृदय से आभार/ जिनके घात प्रतिघात/ छल छदम के संसार में/ मैं घंटे की तरह बजती रही…."
    बधाई सुधा, नई किताब के लिए…तुम्हारे पहले संग्रह की तरह इसका भी पाठक स्वागत करेंगे, शुभकामनाएं… SHREE JI KI PANKTIYAN HAIN ISLIYE KAHUNGEE PAR …..

  2. बहुत खूब बधाई

  3. This comment has been removed by the author.

  4. This comment has been removed by the author.

  5. मेरा आपसे वायदा है कविता जिनके दुःख दर्द बयान करती है जिनके लिए लिखी गयी है उनतक ज़रूर पहुंचेगी सबका ह्रदय से आभार यंत्रणा स्त्री को सदैव रचनात्मक ही बनाती है विशेष आभार जानकीपुल का जिन्होंने यहाँ मेरी संवेदना को स्थान दिया

  6. सम्मोहन के नागपाश में बांध लेने वाली रचनाएँ …. 'औरत' के सन्दर्भ में – क्या केंद्र और परिधि का एक-दूजे से पृथक अस्तित्व है ? मेरी समझ से – सम्भवतः नहीं …

  7. तू परिधि से नहीं
    परिधि तुझसे है
    वाह!

    "आभार" कितनी सुन्दर कविता है… इस सुन्दर चयन और प्रस्तुति के लिए आभार जानकीपुल!

  8. सुन्दर .. चिल्लर और भरोसा .. उधार विशेष रूप से अच्छी लगी

Leave a Reply

Your email address will not be published.