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ताली बजाएगा पागल सा कलकत्ता


युवा लेखक प्रचंड प्रवीर को हम ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ के प्रतिभाशाली उपन्यासकार के रूप में जानते हैं. लेकिन कविताओं की भी न केवल वे गहरी समझ रखते हैं बल्कि अच्छी कविताएँ लिखते भी हैं. एक तरह का लिरिसिज्म है उनमें जो समकालीन कविता में मिसिंग है. चार कविताएँ- जानकी पुल.
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कलकत्ता
पीपल का पत्ता,
काला कुकुरमुत्ता,
निशा, जायेंगे हम
गाड़ी से कलकत्ता

आसिन की बरखा,
कातिक में बरसा,
निशा, आओगी तुम?
पूना से कलकत्ता

आरती की थाली,
चंदन और रोली,
निशा, देखोगी तुम?
पूजा में कलकत्ता

छोटा सा बच्चा
खट्टा आम कच्चा,
निशा, तुमको ढूँढेगा
सारा शहर कलकत्ता

छोटी ​सी​ मोमबत्ती,
केवड़े की अगरबत्ती,
निशा, तुम आओगी
महकेगा पूरा कलकत्ता

​बादल ​का टुकड़ा
​हवा से झगड़ा
निशा, भूलेंगे सब
इतना बड़ा कलकत्ता

दुलहिन का बियाह,
बाराती सफेद सियाह,
निशा, कैसा होगा
आँसू भरा कलकत्ता

प्राची की रश्मि,
चन्दा और तारे,
निशा, जब जाओगी
उनींदा होगा कलकत्ता

किस्सों की रानी
आँखों में पानी
निशा, भूल जाना
खोया हुआ कलकत्ता

अनार का दाना,
खायेगा एक मुन्ना,
निशा, ताली बजायेगा
पागल सा कलकत्ता!​


कब लगाओगी काजल
पहाड़ पर रिमझिम
सतरंगी टिमटिम
पीली सा छाता,
पारो,
बचपन का अहाता

मद्धम सा सूरज,
अमावस का चंदा,
देहरादून की बिल्ली,
पारो,
कब चलोगी दिल्ली

दिल्ली की हलचल,

देखे घड़ी पलपल,
घड़ी की टिकटिक​
पारो,
कब लगाओगी लिपस्टिक​
मेट्रो की बॉगी,
झट से भागी,
दोपहर में निंदिया
पारो,
कब लगाओगी बिंदिया
आँखों में ऐनक,
बाजार की रौनक,
ब्रांडेड कपड़ा,
पारो,
कब तक करोगी झगड़ा
शब्द की महिमा,
गीतों की गरिमा,
नाच और ठुमका,
पारो,
कब पहनोगी झुमका

गुड़िया की पायल,
बारिश का आँचल,
छत पर बादल,
पारो,
कब लगाओगी काजल?​

तुम बनोगी दुल्हन
शहतूत और शरीफा,
अरब का खलीफा,
किताबों में उड़हुल
छोटी दी,
तुम चली स्कूल
सहेली की चिट्ठी,
सत्तू की लिट्टी,
शकरकंद या आलू
छोटी दी,
नन्हा सा भालू,
लता और गीता,
रेडियो और रंगोली,
पायल की छमछम,
छोटी दी,
किशोर की सरगम
पतझड़ की पवन,
सूना सा गगन,
समान बाँधे अपना,
छोटी दी,
तुम गयी​ पटना
पटना या टाटा,
पेंगुइन का पराठा​,
पराठा था बासी,
छोटी दी,
तुम बनी मौसी​
आंगन में लावा
​बाँस का मड़वा,
झुमके और कंगन,
छोटी दी
तुम बनोगी दुल्हन

वेरोनिका

​मेरी मित्र मेरी निंदक
आशुकवि, शुभचिंतक
मेरी शत्रु मेरी सखा
वेरोनिका,
भूली सी कथा

मैं भीषण विष का गागर
कठोर पाषाण सा भीतर
वह अमृतमयी शीतल
वेरोनिका,
निष्ठुर पर कोमल

मैं शब्दों में उलझाता
किसी गुत्थी को सुलझाता,
स्मित हासित प्रतिपल
वेरोनिका,
प्रगल्भा किंतु चंचल

अभिमान की संज्ञा पर,
अज्ञान और प्रज्ञा पर
संध्या निशा दोपहर
वेरोनिका,
उपहास करती यायावर

गरल ताल का उद्धार
शब्द बाण का प्रहार
सहमति का प्रयास
वेरोनिका, हुआ
अहंकार का न्यास​

मैं शेषनाग के ज्वाल में,
अनंत में और पाताल में,
प्रिय के विनाश में
वेरोनिका, बचो
कि मैं सबके सर्वनाश में

प्रलय के विहान पर,
नूतन विश्व के निर्माण पर,
मुझे किंचित बिसराती
वेरोनिका,
मेरी मित्र मेरी सखा

सुदूर किले के प्रासाद में,
आमोद में, विषाद में
रश्मि पुँज सी प्रखर
वेरोनिका,
निर्विघ्न, सहज, सुंदर!​

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11 comments

  1. ज़िंदगी मैं यह सब कभी मत छोड़ना… हमारे लिए और अपने लिए 🙂 . Poetry, रोटी, कपडा और मकान से पहले थी और पहले रहेगी …

  2. There is a certain sense of belonging that one feels…a connect…creates a canvas full of imagination.

  3. सावन की फुहार भादो के अ़ंधियार,भीगो दिया सारा कपड़-लत्ता ,कैसे जाउँ कलकत्त्ता ?

  4. mithi runjhun kavitayen.

  5. Yeah true..! 🙂

  6. Very simple yet very intriguing lyrics… read the poem many times….. 🙂

  7. बरसात के बाद खुशनुमा मौसम और ये कविताएँ एकदम ताजगी भर देती है,सभी कविताओं में नयेपन के साथ पुराना स्वाद !!! बधाई…. जानकीपुल का आभार

  8. awesome lines….Hindi needs fresh quality poems like these ones…

  9. amazing poems .. shabd sach me ek lyricism ka effect daalte hai
    badhayi praveer ko

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