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बीएचयू के रस्ते बनारसी ठाठ के किस्सों की दुनिया है ‘बनारस टॉकीज’

‘जानकी पुल’ पर साल की आखिरी पोस्ट किताबों की दुनिया की नई उम्मीद के नाम. सत्य व्यास का उपन्यास ‘बनारस टॉकीज’, जिसका प्रकाशन 7 जनवरी को होना है amazon.in की बेस्टसेलर सूची में 41 वें स्थान पर दिखाई दे रहा है. किताबों को पाठक से जोड़ने की जो मुहिम हिन्द युग्म प्रकाशन ने शुरू की थी उसका यह नया मुकाम नए साल की एक बड़ी उम्मीद के रूप में दिखाई दे रहा है. ‘बनारस टॉकीज’ के लेखक सत्या व्यास से जानकी पुल ने बीएचयू, बनारस, मोदी के बहाने उपन्यास पर बातचीत की. एक बात है सत्य व्यास ने जिस दमदार लहजे में ख़म ठोककर बात की है उससे लगता है कि लेखक में दम तो है. आप भी पढ़िए और बताइए- जानकी पुल.
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1) यह उपन्यासकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय के होस्टल जीवन की कहानी है? जरा कुछ झलक देंगे?
प्रभात जी, B.H.U में कुल 62 हॉस्टल हैं, जिनमें से 38 लड़कों के हॉस्टल हैं। आप यदि वहां गऐ हों तो आपने देखा होगा कि वहां के लड़कों की दिनचर्या, मस्तियाँ, रुमानियत, समस्याएँ और भविष्य की चिंता तक कमोबेश एक सी ही हैं।

बनारस टॉकीज़ ऐसे ही एक हॉस्टल भगवानदास हॉस्टलकी कहानी के मार्फत सारे होस्टलों की कहानी कहती है। कहानी की अगर बात करें तो यह तीन ऐसे दोस्तों की कहानी है जो मिज़ाज़ और लिहाज़ से तो एक-दूसरे से अलहदा हैं लेकिन हर पल को मस्ती और बेखयाली से जीते हैं। क्लासेज़, पढाई, भविष्य सब वह कल पर टालते जाते हैं। अर बस आज में जीते हैं। उनका यही अल्हड़पन और उनकी यही लापरवाही उन्हें एक दिन सबक देती है जब……..सस्पेंस है। यह जानने के लिए बनारस टॉकीज़ पढ़नी होगी।
2) आजकल बनारस बहुत चर्चा में है। प्रधानमंत्री जी का चुनाव क्षेत्र है, कहीं इसलिए तो आपने नहीं आपने अपने उपन्यास के शीर्षक में बनारस, कथानक में बनारस का प्रयोग किया है?
उपन्यास का नाम तब ही निश्चित हो चुका था जब माननीय प्रधानमंत्री, इस पद के उम्मीदवार भी नहीं थे- लगभग 2012 में।

आपको एक आपबीती सुनाता हूँ। बनारस प्रवास के दिनों में एक दिन तुलसी घाट पर बैठा यू. जी, कृष्णमूर्ति की एंथोलोजी पढ़ रहा था। तभी अचानक मेरी बग़ल में एक मैला-कुचैला व्यक्ति आकर बैठ गया। मैं अभी उठने को ही था कि उसने कहा- यू. जी, कृष्णमूर्ति को पढ़ रहे हो? पेज नम्बर (शायद) 31 निकालो। मेरे उस पेज को पलटते ही उस व्यक्ति ने त्रुटिहीन अंग्रेजी में मुझे दो पैराग्राफ सुनाए; जबकि किताब मेरे हाथ में थी। स्वभाव से मिलनसार उस आदमी ने मुझे (शायद) विपश्यनाका अर्थ समझाने की कोशिश भी की। उसने मुझे यह भी बताया कि वह अररिया में किसी महाविद्यालय में रिटायर्ड प्रोफेसर रहा है। उसने मुझसे ढेर सारी बातें की और कुछ सेल्फ हेल्प किताबों के नाम भी बताएँ। लेकिन जैसे ही मैंने उनसे पूछा कि आप बनारस क्या करने आए हैं तो उनके चेहरे के तेवर बदल गए। वो बिल्कुल मेरे चेहरे के पास आए और चिल्लाकर कहा- मरने आए हैं। इतना कहकर मुझे सकते में छोड़कर वह उठकर चले गए। कहने का अर्थ है कि शब्द बनारसमें अपने आप में ही एक एनिग्मा है। एक रहस्य है और चूँकि मेरी कहानी भी एक रहस्य के गिर्द चलती है, इसलिए इसका नाम बनारस टॉकीज़रखा। आप बनारस टॉकीज़ पढ़ने के बाद इसका कोई दूसरा नाम सोच ही नहीं पाएँगे।
(3) यह बनारस की कथा है या काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की?
B.H.U को बनारस से अलग कर सोचा ही नहीं जा सकता। आप यहाँ से पढ़े किसी भी व्यक्ति से बात कर देखें तो वह विश्वविद्यालय में बिताए सालों को जीवन का स्वर्णिँम अध्याय बताएगा और खुद को बनारसी बताने में गर्व महसूस करेगा। वह लंका, संकटमोचन, कबीरचौरा, गौदौलिया, दुर्गाकुंड तथा अस्सी घाट का ज़िक्र ऐसे करेगा जैसे यह उसके पाठ्यक्रम का विषय हो। बनारस के इतर B.H.U का अस्तित्व सोचा भी नहीं जा सकता। संक्षेप में, ‘बनारस टॉकीज़विश्वविद्यालय की परिधि में बनारस की कहानी कहती है।
(4) आपकी भाषा को लेकर एक सवाल? आपने उपन्यास में रोमन लिपि का भी प्रयोग किया है। क्या आपको नहीं लगता है भाषा के शुद्धतावादी आपत्ति करेंगे? असल बात यह है कि आप इस तरह के भाषा प्रयोग को जस्टिफाई कैसे करते हैं?
देखिए, यह बहुत पुराना सवाल है जिसका जवाब समय-समय पर तारीख देती आई है। तुलसीदास ने जब रामचरितमानस लिखी तब इसकी भाषा पर आँखें टेढी हुईं। फ़ारसी की दरम्यान जब उर्दू अपनी जगह बनाने लगी तब भी इसकी पाकीज़गी पर बवाल मचा।  उर्दू के साथ-साथ हिन्दी पाँव फैलाने लगी तो कुछ नाकिदों और अदीबों के कानों में यह भाषा सुनकर शीशे घुलने लगे; लेकिन देखिए, गुज़स्ता वक्त के साथ इन भाषाओं ने अपनी जगह बनाई कि नही! अब यही बात हिन्दी में रोमन के प्रयोग को लेकर भी हो रही है। हिन्दी तो वैसे ही सर्व ग्राह्य भाषा रही है।

अपना मोर्चा में एक जगह टाँट कसनेका ज़िक्र है। मुझे तीन दफा पढ़ने के बाद समझ आया कि यह दरअसल अंग्रेजी के taunt की बात हो रही है। सोचिये जरा कि यदि मुझे daunting task लिखना हो तो क्या मैं डांटिंग टास्कलिखूँ?
यदि हम अंग्रेजी के शब्द का प्रयोग कर सकते हैं तो लिपि क्यों अछूत रहे? एक पूरी पीढी आ चुकी है जिसे यह प्रयोग स्वीकार्य है। जरूरत बस साहस करने की है।
(5) अगर आपको कहा जाए कि आप हिंदी के लोकप्रिय लेखक हैं तो आप आपत्ति तो नहीं करेंगे? असल में हिंदी में लोकप्रियता से गुरेज करने का चलन है। इसलिए यह पूछ रहा हूँ।
मुझे खुशी होगी यदि मुझे लोकप्रिय लेखक वर्ग में रखा/समझा/माना/जाना जाए।

प्रभात जी, हिन्दी लेखकों को लोकप्रियता से नहीं वरन उस छद्‍म बुद्धिजीविता के हनन से गुरेज़ है जो लेखन के साथ-साथ आ जाती है। मनोहर श्याम जोशी, डॉ. राही मासूम रज़ा और एक वक्त में मंटो तक को बाज़ारू बताने के पीछे इनका यही तर्क है जो अब अपनी ही बातों से पीछे हटते हैं।
मुझे अपने बुद्धिजीवी होने का कोई भ्रम नहीं है। लोकप्रिय हो जाऊँ, इससे ज्यादा क्या चाहिए!
बहुत कठिन है मुसाफ़त नई ज़मीनों की क़दमक़दम पे नये आसमान मिलते हैं
(6)  कुछ हिन्द युग्म प्रकाशन के बारे में बताइए। आपने इसी प्रकाशन का चयन क्यों किया? और आपका अनुभव कैसा रहा?
प्रभात जी, हिन्दी लेखन की जो परिपाटी चली आ रही है उसके अनुसार या तो आपको साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपकर नज़र में आना होता है या फिर किसी नवलेखन जैसे पुरस्कार जीतकर पहचान बनानी होती है। मुझ जैसे मध्यम वर्गीय युवाओं के लिये स्थायित्व की कीमत पर यह कर पाना मुश्किल होता है। एक फिल्म से यदि संवाद उधार लूँ तो कहूँगा हमें घर भी चलाना होता है साहब!
दूसरी बात- जिस तरह का विषय, लहज़ा और भाषा मेरी कहानी की माँग थी उस लिहाज़ से हिंद युग्म से बेहतर कोई अन्य प्रकाशन हो ही नहीं सकता। इस प्रकाशन ने उद्यमिता के नये आयाम गढे हैं। इस प्रकाशन ने प्रकाशन व्यवसाय को नया बाज़ार दिखाया है। इस प्रकाशन ने मुझ जैसे युवा लेखकों पर भरोसा दिखाया है और सबसे बढ़कर, इस प्रकाशन ने हिंदी के पाठकों को नया रास्ता दिखाया है। इस प्रकाशन ने युवाओं में लिखने का साहस भी जगाया है।
(7)  आखिर में यह बता दीजिए कि मेरे जैसे 40 पार लोगों के लिए क्या है उपन्यास में? कहीं यह सिर्फ युवाओं के लिए तो नहीं है? उपन्यास तो ऐसी विधा रही है कि वह सबके पढ़ने वाली कथा कहती रही है।
बनारस टॉकीज़ दरअसल हर उस व्यक्ति की कहानी है जिसने छात्र-जीवन, दोस्ती, प्रेम, अल्हड़पन और आने वाली भविष्य की चिंताओं के बीच गुजारा हो। आप या आपकी जेनेरेशन ने क्रिकेट न खेली हो ऐसा हो नहीं सकता। ओपेनिंग के झग़ड़े न हुए हो ऐसा मानना भी मुश्किल है। क्लास में किसी ने प्रॉक्सी न मारी हो यह भी संदेहास्पद है। क्वेश्चन पेपर आउट होने की झूठी अफवाहें भी किसी ने जरूर उड़ाई होंगी। छात्र जीवन की रुमानियत से भी रू-ब-रू हुए होंगे। इस लिहाज से जितनी यह कहानी मेरी है उतनी आपकी भी।

और इन सब से इतर आप यदि संकट मोचन ब्लास्ट पर एक लेखक की कल्पनाशक्ति देखना चाहते हैं तो बनारस टॉकीज़ जरूर पढ़नी चाहिए।
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4 comments

  1. aap to maha gyani ho satya ji
    thank you hindyugam

  2. अच्छा लगा यह साक्षात्कार। लेखक के नजरिये को जानने का अवसर भी मिला…

  3. aap to maha gyani ho satya ji
    thank you hindyugam

  4. अच्छा लगा यह साक्षात्कार। लेखक के नजरिये को जानने का अवसर भी मिला…

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