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अरुंधति सुब्रमणियम की कविताएँ

अंग्रेजी की जानी-मानी कवयित्री अरुंधति सुब्रमणियम की ये कविताएं लोकमत समाचार साहित्य वार्षिकीमें पढ़ी थी. गहरे इंगितों वाली इन कविताओं को जाने कब से साझा करना चाहता था. आज बरसाती सुबह में कर रहा हूँ. पढियेगा शकुन्तला को संबोधित इन कविताओं को. अनुवाद कुमार सौरभ ने किया है- प्रभात रंजन 
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1.
तो तुम ही हो
एक और वर्णसंकर बालिका
एक ऋषि और अप्सरा की बेटी,
अनभिज्ञ
हमारे समान ही
अपने ठिकाने से-
आश्रम या प्रासाद
धरती या गगन
लोक या परलोक.
तुमने क्या सोचा था?
आधे-अधूरे के अतिरिक्त
अंततः तुम
क्या हो सकती थी?
बस एक
बेचारा मनुष्य ही न?
2.
 
शकुन्तला, युक्ति यह नहीं है
कि इसे माना जाए
एक छल
जब आसमान सिकुड़ कर
घेरता जाता हो
जैसे गवाक्षहीन चार दीवारें
फ्रिज के दरवाजे पर लगे
टूटे मिकी माउस चुम्बक के साथ
या एक घर निकाला
जब छत भरभरा गई हो
और तारों भरी रात में
तुम विचरने लगो
3.
 
हाँ, एक हैं वृद्ध ऋषि कणव
उनकी स्पष्टता
जो तुम्हारी हड्डियों में कुलबुला
रही है
जैसे जाड़े की शाम में
गर्माहट
जब तुम
शांत, बादलों द्वारा
आच्छादित
मालिनी नदी की
दूधिया उछाल देख रही हो
और एक घर है
जो सदा जीवंत
गुंजरित
तितलियों से
बना रहेगा
पर्यटन पुस्तिकाओं की किंवदंतियों में
पर उन रातों का क्या
जब तुम बस चाहती हो
अनुरक्त सांसें
अविरत, अनवरत
झीने परदे से आता तारों का मंद प्रकाश
और अतिशय ज्ञान से
छुटकारा?
 
 
4.
 
आखिर दुष्यंत के आकर्षण से कौन
परिचित नहीं है?
स्वेद-गंध
क्षीणता का
खट्टा-तीखा आरम्भ
जो कभी भी उसे नहीं छोड़ता
जिसने दरबार और रणांगण
की हवा में साँस लिया है
गहरी मदिर आँखों वाला पुरुष जो जानता
है
परदे से घिरे अन्तःकक्ष के
मदहीन मदिरा और नीरव अट्टहासों को
एक पुरुष जिसकी मुस्कान
भरमाने और खरोंचने वाली है, जिसकी
निगाहें जरा सूख चुकी हैं.
गर्म हवाओं से उलझे
जिसके केश अभी भी
चटकते हैं दूरस्थ संसार के
वाकयुद्धों से
कौन नहीं जानता है
कामनाओं से
ठूंठ
छालों भरी जुबान वाले आदमी को
और अचूक बर्छे को
इतिहास के?
5.
 
वही हास्यास्पद कहानी
वही पुराने पात्र
बसंत
और अंतहीन पूर्वाभिनय
दीप्त आँखों वाली एक औरत
एक हिरन, दो दोस्त,
कमल, भंवरा,
एक अनिवार्य पुरुष,
ह्रदय का सहसा राग
कुछ भी मौलिक नहीं
परन्तु यह आशा
कि अधखुले होंठों के मध्य
कुछ नया होगा.
एक चुम्बन—
मधुराधर चंद्रक्षेप.
और सन्निकट ही
उसी पुरानी हिचक के साथ,
यह वृन्दगान,
(संस्कृत, यूनानी जो भी हो) :
और नैकट्य
और दैर्घ्य
और आप्ति
और
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