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‘एयरलिफ्ट’ को ऐतिहासिक घटना से जुदा कर फिल्म रूप में देखा जाना चाहिए

प्रसिद्ध लेखिका अनु सिंह चौधरी ने ‘एयरलिफ्ट’ फिल्म पर लिखा है. वह बहुत संतुलित लिखती हैं. फिल्म को हर पहलू से देखते-समझते हुए. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 
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एयरलिफ्ट देखते हुए मैंने दो काम किए, पहला फ़िल्म के दौरान ही कुवैत इवैकुएशन गूगल किया और दूसरा, अपने फ़ोन में सीवान के उस एक शख़्स का नंबर तलाशने की कोशिश की जिसने एक बार एक स्टोरी के सिलसिले में मुझे खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत से भाग आने की कहानी सुनाई थी। नंबर तो मिला नहीं, लेकिन कुवैत इवैकुएशन पर जितनी जानकारी मिली उसने एयरलिफ्ट देखने के अनुभव को और रोमांचकारी ज़रूर बना दिया।
एयरलिफ्ट को एक ऐतिहासिक घटना से जुदा कर पहले सिर्फ़ और सिर्फ़ एक फ़िल्म के रूप में देखना ज़रूरी है क्योंकि फिक्शन फिक्शन ही होता है – अतिशयोक्ति और ओवरसिम्पलिफिकेशन, दोनों में रंगा हुआ। अक्षय कुमार अपने करियर, और अपनी उम्र के उस मोड़ पर हैं जहां उनसे किसी भी किस्म के किरदार में जान डाल देने की उम्मीद करना बेजां नहीं है। इस लिहाज़ से अक्षय ने यहां भी निराश नहीं किया। लेकिन जिस निमरत ने द लंच बॉक्स में इरफ़ान के साथ कहीं भी स्क्रीन स्पेस शेयर न करने के बावजूद उनके साथ एक ग़ज़ब की केमिस्ट्री दिखाई, या फिर जो निमरत आमिर बशीर के साथ चॉकलेट के एक ऐड में ऐसी ढली ही नज़र आती हैं जैसे कि ये दोनों स्पेस उन्हीं के लिए रचे गए हों, वही निमरत एयरलिफ्ट में उस स्पार्क के बिना दिखाई पड़ती है। ख़ासतौर पर फ़िल्म के शुरुआत में मुझे लगा कि अक्षय और निमरत के बीच के तनाव के अंडरकरेन्ट और उससे उपजनेवाले लम्हों की गुंजाईश को सिर्फ़ एक आइटम सॉन्ग डालने के चक्कर में पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया है।
पूरब कोहली, प्रकाश बेलावड़ी, सुरेन्द्र पाल सिंह और क़ैज़ाद कोतवाल (जिनमें से तकरीबन सभी मंझे हुए थिएटर कलाकार भी हैं) अपनी अपनी भूमिकाओं में कमाल हैं। बस इराकी मेजर के तौर पर, बल्कि इराकी मेजर का एक कैरिकेचरनुमा किरदार जितनी बार स्क्रीन पर आता है, उतनी बार ग़ुस्सा आता है। इस लिहाज़ से शायद इसे कास्टिंग डायरेक्टर की सफलता ही मानी जानी चाहिए।
एक थ्रिलर के तौर पर हालांकि ये फ़िल्म फर्स्ट हाफ में निराश नहीं करती। आर्ट डिपार्हटमेंट ने हर बारीक डिटेलिंग पर ग़ौर फरमाया है। एक पीरियड फ़िल्म, वो भी किसी दूसरे देश को बेस बनाकर बनाई गई पीरियड फ़िल्म में, ग़लतियां बड़ी आसानी से हो सकती हैं। हालांकि फिर भी कहीं कहीं पर सेट जमता-सा नहीं लगता, ख़ासतौर पर साउथ ब्लॉक, विदेश मंत्रालय और विदेश मंत्री का दफ्तर तो बिल्कुल नहीं। क्या पता प्रोड्यूसर ने विदेश में शूटिंग करते हुए अपने बजट के बाहर जाकर सारे पैसे खर्च कर दिए हों, और हिंदुस्तान आते ही प्रोडक्शन बजट में कटौती करने का ख़्याल सताने लगा हो!
थ्रिलर का साउंड डिज़ाइन और बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म के संगीत से कहीं ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाता है। अमाल मल्लिक और अंकित तिवारी के गानों की इस फ़िल्म में आख़िर क्या ज़रूरत थी, मुझे बिल्कुल समझ नहीं आया। उससे कहीं अच्छा होता अगर ये पूरी एनर्जी अच्छा बैकग्राउंड स्कोर तैयार करने में लगाई गई होती। इस फ़िल्म में अच्छे साउंड डिज़ाइन की कैसी ज़बर्दस्त संभावना थी! और उतने ही शार्पनेस के साथ एडिटिंग का काम होना चाहिए था, जो हुआ नहीं। इंटरवल के बाद फ़िल्म एकदम प्रेडिक्टेबल हो जाती है – इतनी कि थ्रिलर रह नहीं जाती। कम से कम तीन प्लॉट प्वाइंट्स ऐसे हैं जिनके अंजाम का अंदाज़ा लगाना बहुत आसान है।
एयरलिफ्ट के साथ फ़ैन्स दो खेमे में ज़रूर बंट गए हैं – एक खेमा व्हॉट्सएप्प और सोशल मीडिया पर अक्षय कुमार को सबसे बड़ा राष्ट्रप्रेमी बताते हुए उनके औदार्य के गुणगान में लगा है तो दूसरा खेमा अपने राष्ट्रवाद के नाम पर इतिहास की दुहाई देते हुए फ़िल्म की धज्जियां उड़ाने में लगा है। जो भी हो, इसका फ़ायदा फ़िल्म को तो मिला ही है। और हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि फ़िल्म चाहे सत्य घटना पर ही क्यों न आधारित हो, होती फ़िल्म ही है और फ़िल्मकार अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए वैसी एक कहानी कहता है जिसमें वो ख़ुद यकीन करता है। इस लिहाज़ से मुझे राजा मेनन की ये कोशिश सार्थक लगती है क्योंकि उन्होंने कम से कम एक ऐतिहासिक घटना में एक ऐसे नायक की कल्पना कर ली जिसका हौसला हमें हिम्मत देता है। हमें इस बात का यकीन दिलाता है कि जिस देश, जिस सिस्टम और जिस ब्यूरोक्रैसी की नाकामियों पर हम दिन में कम से कम दस बार छाती पीटकर करुण क्रंदन करते हैं, उसी ब्यूरोक्रैसी का एक छोटा-सा हिस्सा बिना किसी शोहरत की आकांक्षा के अपना काम करता रहता है। अगर फ़िल्म के बेसिक प्रेमाइस पर यकीन करते हुए इस एक कहानी समझकर फ़िल्म देखी जाए तो एक बार को उस अस्थिर सरकार पर भी फ़ख्र होता है जिसने अपनी ओर से मुश्किल में पड़े मुल्कवासियों को वापस अपनी मिट्टी पर लाने के लिए इतनी बड़ी कोशिश की। उन दिनों सोशल मीडिया की ताक़त लोकतंत्र के पास थी भी नहीं, बावजूद उसके।
रंजीत कात्याल का किरदार काल्पनिक हो सकता है, ये तथ्य तो है ही कि एयर इंडिया अपने किस्म के अभूतपूर्व रेस्क्यू ऑपरेशन के ज़रिए वॉर ज़ोन में फंसे एक लाख दस हज़ार हिंदुस्तानियों को वापस ले आया था। मेरी तरह आपको भी ये सवाल ज़रूर परेशान कर सकता है कि डायरेक्टर ने बहुसंख्यकवाद का दामन पकड़कर एक उत्तर भारतीय हिंदू का काल्पनिक किरदार ही क्यों गढ़ा, एक दक्षिण भारतीय कैथोलिक को हीरो बनाने की हिम्मत क्यों नहीं की। लेकिन ये फ़िल्म अक्षय कुमार या किसी एक रंजीत कात्याल के नाम नहीं की जा सकती। ये फ़िल्म कोहली जैसे उन सैंकड़ों गुमनाम लोगों के नाम होनी चाहिए जिनकी वजह से पच्चीस साल पहले का वो इतना बड़ा ऑपरेशन मुमकिन हो सकता होगा। इब्राहिम भले कोई असली किरदार न रहा हो कोई, लेकिन फ़िल्म में इंसानियत को एक किरदार तो मिला है।

और एयरलिफ्ट की इस कहानी पर भरोसा बिना अम्मान एयरपोर्ट में तिरंगा फहराए भी हो सकता था।
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3 comments

  1. बहुत अच्छी समीक्षा। कोई भी दर्शक इस समीक्षा से जुड़ा महसूस करेगा।

  2. @Prabhat Sir aapki baat se poorntaya sahmat.

  3. बहुत बेहतरीन समीक्षा.

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