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‘पापा, डायवोर्स क्या होता है?’


यह मेरी नई लिखी जा रही किताब का एक अंश है. पढ़कर राय दीजियेगा- प्रभात रंजन 
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डायवोर्स

‘पापा, डायवोर्स क्या होता है?’
किसने बताया? मम्मा ने?’
‘हाँ, लेकिन क्या होता है?’
‘जब दो लोग साथ नहीं रहते हैं!’
‘डायवोर्स क्या इंसानों में ही होता है?’
‘हूँ…’
‘जैसे रात आने पर सूरज छिप जाता है…’
‘लेकिन वो तो फिर निकल आता है अगले ही दिन!’
‘मतलब जब कोई जाए और फिर अगले दिन न आये?’
‘नहीं, जैसे कोई जाये और फिर चला जाए…’
‘तब तो भगवान के यहाँ चले जाते हैं इंसान. जहाँ से कभी नहीं लौटते.’
‘ऐसा नहीं है, डायवोर्स होने के बाद भी दोनों यहीं रहते हैं. मतलब एक दूसरे…’
‘जैसे हमने अपने डॉगी पिंटी को सुनील अंकल को दे दिया था? हम उससे मिलने तो जाते हैं न…’
‘नहीं ऐसा भी नहीं होता!’
‘पापा, मुझे एक डॉगी चाहिए?’
‘बेटा, उसकी बहुत केयर करनी पड़ती है. पिंटी की केयर हम नहीं कर पाए थे तभी तो उसको अंकल को देना पड़ा था.’
‘मतलब जब मैं डॉगी की केयर करने वाली हो जाउंगी तो तुम डॉगी दिलवा दोगे?’
‘हाँ.’
‘मैं डॉगी की खुद से केयर करने लायक कब हो जाउंगी?’
‘जब फिफ्थ क्लास में जाओगी.’
‘फिफ्थ में मैं कब जाउंगी?’
‘बेटा अभी तो तुम सेकेण्ड में हो.’
‘तो मैं फिफ्थ में कब जाउंगी?’
‘तीन साल बाद. जब तुम दस साल की हो जाओगी.’
‘मतलब दस साल के होने पर बड़े हो जाते हैं?’
‘बड़े नहीं हो जाते हैं. लेकिन तब तुमको डॉगी का ध्यान रखना आ जायेगा.’
‘फिर डॉगी से हमारा डायवोर्स नहीं होगा?’
‘अरे बेटा, डायवोर्स का यह मतलब नहीं होता है.’
‘अच्छा, जैसे हम मनाली गए थे और वहां हमारी दोस्ती उस मोटू खरगोश से हुई थी. जब हम आये थे तो डायवोर्स होना ही हुआ न. हम उससे फिर तो नहीं मिले अभी तक.’
‘बात मिलने की नहीं होती है बेटा.’
‘फिर क्या होती है?’
‘देखो, समझ लो कि एक घर को छोड़कर दूसरे घर में जाते हैं. घर तो वहीं रहता है हम कहीं और चले जाते हैं. उस घर में कभी नहीं लौटते.’
‘समझ गई! जैसे हम गोवा घूमने गए थे. लौट कर आ गए. गोवा तो वहीं है हम फिर वहीं नहीं गए.’
‘अरे नहीं बेटा, वहां हम फिर कभी तो जा सकते हैं.’
‘हाँ, लेकिन मम्मी हमारे साथ नहीं होगी न. फिर हम वैसे तो नहीं जा पायेंगे.’
‘फिर तो यह भी है बेटा कि जब तुम गोवा गई थी तब छह साल की थी. अगली बार जब वहां जाओगी तो तुम्हारी उम्र कुछ और हो जायेगी. तब भी तो हम उस तरह से नहीं जा पायेंगे.’
‘पापा, मम्मा क्या अब हमारे साथ कभी नहीं रहेगी?’
‘किसने कहा?’
‘मम्मा ने.’
‘हूँ…’
क्या डायवोर्स इसी को कहते हैं?’
‘हाँ बेटा, जब मम्मी-पापा अलग-अलग रहने लगते हैं.’
‘जैसे तुम और मम्मा?’
‘हाँ.’
‘लेकिन पापा, फैमिली में तो मैं भी हूँ. फिर मेरा डायवोर्स किसके साथ हुआ?’
‘बेटा, डायवोर्स बड़ों में होता है.’
‘पापा, लेकिन बड़े बच्चों से पूछे बिना क्यों अलग हो जाते हैं?’
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13 comments

  1. सरल से दिखने वाले प्रश्न-उत्तर के बीच बड़ी सफ़ाई से एक गंभीर मुद्दा उठाया है आपने।
    ~ इस किताब के लिये प्रतीक्षारत एक और पाठक।

  2. सरल से दिखने वाले प्रश्न-उत्तर के बीच बड़ी सफ़ाई से एक गंभीर मुद्दा उठाया है आपने।
    ~ इस किताब के लिये प्रतीक्षारत एक और पाठक।

  3. This comment has been removed by the author.

  4. Touching!

  5. हा हा हा हा… बड़े बच्चों से पूछे बिना क्यों अलग हो जाते हैं..!! वाह..!!

  6. बच्चे आज नही तो कल समझ ही जायेंगे सारे मतलब पर बड़े शायद कभी नही समझना चाहते और सूखते संबंधों के साथ समाज के अभिन्न अंगों का अधूरापन पलता रहेगा.
    किसी उपन्यास के कथानक को अभिव्यक्ति देने के लिए काफी तो नही पर एक गहरी उत्कंठा जाग्रत करती हैं इंतजार रहेगा …

  7. इंतज़ार रहेगा मुझे।

  8. Bhai aapka banti ki yaad aayi. Ummeed hai ki apne antim roop mein yah kitaab apni alg jagaha banayegi…Shubhkaamnayen!!
    – Kamal Jeet Choudhary .

  9. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

  10. छोटे से अंश ने ही पूरी किताब पढने की उत्कंठा जगा दी है। वैसे खेद है कोठागोई अभी नहीं पढ़ पाया। तलाश रहा हूँ।

  11. कुछ अनसुलझे से सवाल…बहुत बढ़िया…!

  12. मार्मिक। चुभते सवाल

  13. बहुत भावपूर्ण । मन भर आया और मन्नू भंडारी की 'आपका बंटी' की याद हो आई ।

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