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नवम्बर की हलकी ठंढ और खुशगवार शाम

उपासना झा की भावप्रवण कविताओं की तरफ ध्यान गया तो पता चला कि वह ‘मन-अमृता’ नाम से एक उपन्यास लिख रही हैं. आज उसका अंश पहली बार जानकी पुल के लिए- मॉडरेटर 
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मनु की नींद टूटी तो शाम के छह बज रहे थे, घडी पर नजर गयी तो बहुत तेज़ गुस्सा आया अपने ऊपर ही। कर लिया न ऑफ का कबाड़ा, पूरे हफ्ते इंतज़ार करती है सन्डे का और आज खुद ही सो गयी, बड़बड़ाते हुए फोन चेक किया तो पता चला की अमृत के कई मिस्ड कॉल्स थे और मेसेज भी।
तैयार रहना, मूवी चलेंगे, फोन क्यों नहीं उठा रही हो और भी इसी तरह के।

फोन किया अमृत को तो उसने फोन ही नहीं उठाया, शायद बाइक चला रहा हो, सोचकर मनु हाथ मुँह धोने चली गयी।
वापिस कमरे में आई तो फिर से मोबाइल में मिस्ड कॉल दिखी, फोन आया तो रिंग की आवाज़ क्यों नहीं आई? चेक करने पर पता चला कि फोन साइलेंट पर जो था।
खीज़ से उसका मन हुआ, सर दीवार पर पटक ले। उसको पता था अब अमृत को बहुत गुस्सा आ गया होगा। डरते हुए उसने फोन मिलाया और इंतज़ार करती रही की अमृत फोन उठाये। आज लेकिन जाने क्यों अमृत ने गुस्सा नहीं किया और प्यार से बोला -अमृता, ठीक हो न तुम
आवाज़ सुनकर उसकी साँस वापिस आई
-कितना सोती हो तुम, और फोन क्या साइलेंट करके सोई थी, तुम ठीक तो होना, तुम दिन में तो सोती नहीं जल्दी सिवा बीमार होने के?
सवालों की बौछार के साथ उसके होंठो पर हँसी भी लौट आई।
-ठीक हूँ मैं मन, बिल्कुल ठीक, बस सफाई करते और कपडे धोते-धोते थक गयी थी बहुत, लेटी कि कुछ पढ़ भी लेती हूँ तो नींद आ गयी।
-अच्छा, ठीक है। मैं पाँच-दस मिनट में पहुँच जाऊँगा, नीचे ही मिलना।
-ओके
मनु जल्दी जल्दी तैयार होने लगी, कपड़ो की आलमारी खोलते ही उसका पुराना द्वंद्व शुरू हुआ कि मनु का प्रिय नारंगी रंग पहने की अपना प्रिय नीला रंग।
अमृत कहता है कि वो नारंगी रंग पहने तो टेसू के फूल सी लगती है और साथ में उजले मोती पहन ले कानों में तो हरसिंगार।
उसने जल्दी से एक नारंगी कुर्ता खींचा और उजले मोती के कर्णफूल जो अमृत ने ही उसके जन्मदिन पर दिए थे। उसका चाय पीने का भी मन था, लेकिन उतना समय नहीं था।
तैयार होकर सीढ़ियां उतरती मनु ने आवाज़ लगायी
-आंटी, बाहर जा रही हूँ, 11 बजे तक आ जाउंगी।
-ठीक है बेटा, बहुत अच्छी लग रही है।
-थैंक यू आंटी
दो मिनट बाद ही अमृत आ गया और उसको देखते ही मनु का जी खुश हो गया। उसकी पल्सर पर पीछे बैठते ही अमृत ने उसे कहा कि आज फ़िल्म कैंसिल करते हैं और जवाहर कला-केंद्र चलते हैं, मनु को आश्चर्य भी हुआ और ख़ुशी भी।
-क्या बात है मन, तुम तो पसन्द नहीं करते शिल्प मेले और नाटक तो आज कैसे?
– सोचा कि जब तुम मेरे संग हॉलीवुड मूवीज देख लेती हो तो क्यों न मैं भी आज तुम्हारी पसन्द का कुछ देखूं।
-हूँ! आज फोन नहीं उठाने पर भी नहीं लड़े और पसन्द की मूवी छोड़कर लोक नृत्य देखने चल रहे हो, आखिर बात क्या है
-कुछ नहीं बाबा, बस आज सब कुछ तुम्हारी पसन्द का होगा
मनु मुस्कुरा कर अमृत की पीठ पर सर टिकाकर बैठ गयी, और ठंडी हवा के झोंके अपने चेहरे पर महसूस करती रही। जयपुर में नवंबर में हल्की ठंडक हो जाती है और शामें ख़ुशगवार हो जाती हैं। सुकून से उसने आँखे मूंद ली और दाहिनी कलाई पर बने टैटू को सहलाने लगी, जिसपर मनखुदा हुआ था। ऐसा ही एक टैटू अमृत की कलाई पर भी था जिसपर अमृतालिखा हुआ था।
ऑफिस के कुछ सहकर्मी और दोस्त जानते हैं असलियत वरना सबको कौतुहल ही होता। सब पूछ ही बैठते की उसका नाम तो मनु है, मनस्विनी पांडे, अपने पिता की प्यारी बेटी मनस्विनी, तो कलाई पर मनक्यों बनवाया, वह जवाब में कहती मनकिया बस इतना ही। लेकिन इसके पीछे की कहानी बेहद प्यारी थी। उसे वो शाम याद आ गयी
-मनस्विनी पांडे, इतना बड़ा नाम!
-क्यों! अमृत सिंह राठौर छोटा है क्या?
-तो तुम मुझे मनु बुला सकते हो, ये छोटा है न!
-उस नाम से तो सब बुलाते हैं।
-तो तुम कोई नाम रख दो जिससे तुम बुलाना बस, तुनकते हुए मनु बोली
-हाँ, वही मैं भी सोच रहा हूँ (मनु को चिढ़ाने के टोन में उसने कहा) बोली
-ठीक है। लेकिन ये शोना-मोना टाइप कुछ मत बोल देना
-अच्छा सुनो! मैं तुम्हें अमृता कहूंगा आज से, अभी से, तुम हुई अमृत की अमृता। और मैं मनु का मन,
अपनी बोली में अपनी आँखो का शहद मिलाते हुए अमृत ने कहा।
और उस दिन से वो एक दुसरे के लिए मन-अमृता थे।
बाइक के ब्रेक्स लगने पर मनु की विचार-श्रृंखला टूट गयी, जवाहर कला केंद्र की रौनक देखकर अमृत भी बोल उठा -“आज तो यहाँ अलग ही रंग है”
शिल्प मेले में घूमते हुए दोनों को ऑफिस के भी एक-दो लोग दिख गए। दुआ-सलाम के बाद सब इधर उधर घूम घूमकर सामान देखने लगे। मनु को बार-बार यही लग रहा था कि आज अमृत कैसे यहाँ आ गया, कुछ अलग व्यवहार कर रहा है, कोई बात तो नहीं, पता नहीं कैसे उसके दिल की बात भाँपकर अमृत बोला
-अरे ज्यादा मत सोचो, नहीं आता हूँ तो शिकायत करती हो, आज लाया हूँ तो तुम कुछ देख ही नहीं रही।
कैसे समझ जाता है उसके मन की बात अमृत, उसे अक्सर हैरानी होती। एक आध छोटी-मोटी चीज़े लेकर दोनों अंदर चलने को हुए ताकि लोक नृत्य देख सकें तो पता चला कि उसमें समय है, आठ बजे से शुरू होगा। समय काटने दोनों अंदर बने कॉफ़ी हॉउस पहुँचे। वहां पहुँचते ही मनु को दो बिल्लियाँ दिख गयी जो बरामदे में आलस से बैठी हुई दिख जाती थी।
कॉफ़ी और इडली का आर्डर देकर दोनों दुनिया-जहान की बातें करने लगे। मनु ने महसूस किया था इधर की जब बात उनदोनो तक पहुँचती तो दोनों ही चुप हो जाते थे जैसे जवाब से बचने का प्रयास कर रहे हों। जबसे शादी की बात उठी थी दोनों जैसे असहज हो उठे थे। आज भी वही हुआ,
बात करते-करते दोनों चुप हो गए और इंतज़ार करने लगे की कब सामनेवाला बोले और ये पसरा हुआ असहज वातावरण बदले।

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11 comments

  1. Bahut sundar saandar bikul tumhari tarah upasana …

  2. Sahaj,saral aur sundar bhasha 🙂 Best of luck,Dear Sister

  3. मन गदगद हो गया।अब सम्पूर्ण उपन्यास की प्रतीक्षा है। उपासना जी को अग्रिम शुभकामनाएं…

  4. प्यारा सा लगा!

  5. उपासना झा के 'मन-अमृता' उपन्यास के अंश की प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद!

  6. Bhaut accha lga padh kar nice…

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  8. अत्यन्त सहज और पठनीय लेखन। अमृता के लिये शुभकामनायें। 🙂

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