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उपासना झा की कहानी ‘महुआ घटवारिन’

उपासना झा ने हाल के दिनों में कविता, अनुवाद जैसे क्षेत्रों में अपनी जबर्दस्त रचनात्मक पहचान दर्ज करवाई है. आज उनकी नई कहानी ‘महुआ घटवारिन’- मॉडरेटर 
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दूरी रे गबनमा से ऐलनी सुंदर दूल्हा,
ऐलनी सुन्दर दूल्हा…
द्वार पीछे भय गेलनि ठार रे गबनमा…
ये गीत उसने अभी अपनी सहेली के ब्याह में सीखा था, कोहबर का गीत। उसे बहुत पसंद आया था और जब-तब गुनगुनाती रहती। उसकी मीठी आवाज़ नदी के किनारे लहराती रहती, राही-बटोही उसकी आवाज़ पहचान लेते थे। जेठ की दुपहरिया में गर्मी से अकुलाए लोग जब ठाकुरों की गाछी में सुस्ता रहे होते तो उसकी मिश्री जैसी आवाज़ उनको नींद के दरवाज़े पर छोड़ आती। गाँव के कई पाहुन और नवकनिया भी उसकी आवाज़ चीन्ह जाते थे। गला ही ऐसा था उसका-महुआ का। और वैसा ही था उसका रूप; चमकते पीतल जैसे रंग की दुबली-पतली देह और बड़ी-बड़ी दमकती आँखे, कमर तक लहराते घने केश। कोसी नदी में बाढ़ की तरह उसपर यौवन आया था जिसका वेग उसे ही डराता था।
कोसी की कछार पर बसा उसका गाँव शहर जाने के रास्ते में आखिरी पड़ाव था। शहर जाने के लिए कोसी पार करनी ही पड़ती और घटवारों का दल उसी काम में लगा रहता। आस-पड़ोस के पचासों गाँव उसी होकर शहर जाते थे। कोसी घटवारों के लिए केवल नदी नहीं थी वो उनकी कलिका मायथी जो उनका जीवन चला रही थी। मुँह अंधेरे से ये लोग घाट पहुँच जाते और संझा की दीया-बाती की बेला तक वहीँ रुके रहते।
सूरज उगने से भी एक पहर पहले महुआ की सौतेली माँ उसे उठा देती

महुआ.. गे महुआ..उठ न गे.. बड़ देर भेल जाइ छउ.. कतेक काज छई.. उठे नै

उइठ गेल छि माँ 

महुआ एक हाँक पर ही उठ जाया करती थी, बचपन में जब उसकी नींद नहीं खुला करती थी तो दूसरी आवाज़ देते देते माँ उसकी खाट के पास आ जाती थी और उसकी नींद चोट से ही खुलती थी। रोज़ की पिटाई और गन्दी गालियाँ उसके हिस्से में आती थी और प्यार-दुलार सौतेले भाई-बहनों के हिस्से। अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से अपनी आँखे रगड़कर आँसू पोंछ लेती और जुट जाती काम-काज में। चूल्हा लीपने से लेकर गाय का गोबर उठाने तक सब उसी के जिम्मे कर माँ आराम से सोती रहती। अपने बच्चों को सौतेली माँ खूब दुलार करती तो उसका मन होता कि उसे भी एक बार गले लगा लें माँ। कभी-कभी जब मन बहुत दुखी हो जाता तो दालान पर बंधी गाय के पास बैठकर खूब रो लेती और गाय उसे चाटती रहती। उसने जीवन में इतना ही प्रेम और दुलार जाना था।

बचपन से ही उसे तैरना अच्छा लगता था, घर के कामों से जैसे ही फुर्सत पाती घाट की तरफ आ जाती। कोसी नदी की धार उसे माँ की गोद जैसी लगती। बचपन में तो इस कारण भी बहुत मार खायी थी उसने लेकिन जब नाव चलाना सीख गई और बाप के बीमार पड़ने पर उसने नाव खेना शुरू किया तो माँ को ऐतराज़ न रहा। उसे सब पहचानने लगे थे धीरे-धीरे।
समय बीता जा रहा था, महुआ पन्द्रह साल की हो गयी थी। उसकी कई हमउम्र साथिनें ब्याह कर अपने घर चली गयी थी और कई गौने के इंतज़ार में बैठी थी। एक वही रह गयी थी जिसके ब्याह की चिंता किसी को न थी। सौतेली माँ को अपनी बेटी की शादी की चिंता थी जो महुआ से तीन बरस छोटी थी। अब तो लोग गाहे-बगाहे टोकने भी लगे थे। माँ ऐसी मुफ़्त की नौकरानी को जाने नहीं देना चाहती थी।
उड़ते-उड़ते सबने सुना की महुआ की शादी एक बूढ़े आदमी से तय कर दी गयी। महुआ सुखी रहेगी- उसकी माँ कहती सबसे जबकि सब जानते थे कि ये शादी नहीं सौदा था। महुआ को उसकी माँ ने बेच दिया था। महुआ मेघ समेटे बादलों की तरह भरी रहती लेकिन कुछ नहीं बोलती। जिन लड़कियों की माँ उनके जन्मते ही मर जाएँ उनका भगवान भी नहीं होता। शादी अगहन में तय हो गयी थी। महुआ रोज़ दिन गिनती और काँपती रहती।
गिरिजा-कुमार!, करऽ दुखवा हमार पार;

ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी…

गाँव की एक दो स्त्रियों और भले लोगों ने उसकी माँ को समझाने का प्रयास किया लेकिन लालच ने उसे अँधा कर दिया था।
एक दिन सुबह से ही मौसम बहुत खराब था, खूब पानी बरस रहा था, कोसी में भयंकर उफान आया हुआ था, लोग सहमकर अपने-अपने घरों में बैठे थे। महुआ घाट आयी और उसने नाव खोल ली। कोसी की धार में भयंकर भँवरे पड़ रही थी। नदी का पानी लाल-काला लग रहा था। घाट पर खड़े एक दो घटवारों ने रोका भी लेकिन अपने मन के अंधेरे से उसे नदी का पानी कम डरावना लगता था। पार आकर उसने देखा कि एक नौजवान सामान की गठरियों के साथ खड़ा है पानी से भीगा हुआ। उसने पूछा;

ओइ पार जैब की?

हाँ, एक घड़ी से ठार छि, बड्ड थाकल छि। नेने चलूँ ओइ पार

आऊ, बैसु

युवक सौदागर नाव पर अपनी गठरियाँ रख कर बैठ गया। महुआ ने नाव बढ़ाई, और उसके गले से गीत भी फूट पड़ा
रोपेया गिनाई लिहलऽ, पगहा धराई दिहलऽ;

चेरिया के छेरिया बनवलऽ हो बाबूजी।

साफ क के आँगन-गली, छीपा-लोटा जूठ मलिके;

बनि के रहलीं माई के टहलनी हो बाबूजी।

गोबर-करसी कइला से, पियहा-छुतिहर घइला से;

कवना करनियाँ में चुकली हों बाबूजी।

बर खोजे चलि गइलऽ, माल लेके घर में धइलऽ;

दादा लेखा खोजलऽ दुलहवा हो बाबूजी।

उसके गले से गीत के बोल झरते रहे और युवक की आँखों से आँसू। ऐसा अपरूप रूप, ऐसी मीठी आवाज़ और इतना भीषण दुःख! उसने तय कर लिया मन ही मन कि इस लड़की को वह अपनी दुल्हन बनाकर ले जायेगा। कोसी के उस छोर से इस छोर तक आते-आते महुआ को जीवन की सबसे अमूल्य निधि मिल गयी थी। युवक ने उसके घर जाकर उसकी माँ से बात की। सौतेली माँ की आँखे डाह से जल उठी। इस अभागी के ऐसे भाग। ऐसे सुदर्शन से तो वे अपनी बेटी का विवाह कराना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि वे तो पैसे ले चुकी हैं किसी और से। युवक ने उनसे वादा किया कि वह कातिक की पुर्णिमा  तक लौट आएगा और उनके पैसे भी चुका देगा और महुआ को भी ले जायेगा।
महुआ अब खुश रहती, हँसती-गुनगुनाती। एक-एक दिन उसे बहुत लंबा लगता। उसके गीत भी अब बदल गए थे
अहिं प्रभु पहिरन, अहिं प्रभु ओढ़न

अहाँ बिनु दिन नहीं जायत रे गबनमा।

कातिक का महीना आ गया था। भोर में ओस पड़ती थी। महुआ ऐसी सुंदर पहले कभी नहीं लगी थी। उसके चेहरे पर एक स्निग्धता आ गयी थी। गाँव की औरतें उसे खूब आशीष देतीं। बिन माँ की उस बेटी पर सबको स्नेह आता था। पूर्णिमा में चार दिन बाकी थे, महुआ का मन बहुत बेचैन रहता था। कभी-कभी अनहोनी की आशंका उसे डरा देती थी। उसके देह से सरसों-दूब के उबटन की गंध आती थी अब। रोज़ शाम की उसकी सहेलियाँ गीत गाने बैठ जाती थी।
पूर्णिमा के दिन भोर में ही वह उठ गई थी। घर का सब काम निपटाकर बैठी ही थी की गाँव की औरतें उसे गौरी पूजा और मातृका पूजा करवाने ले गयी। उसके मन में बहुत ख़ुशी के बीच एक अज्ञात डर भी आ रहा था। दिन से शाम हुई। विवाह का सब इंतज़ाम हो गया था। पीली साड़ी पहने महुआ सरसों का फूल लग रही थी। सौदागर

नहीं आया था अबतक। उसका मन कर रहा था कि वह घाट तक जाकर देख आये। सब कहने लगे काजल लगने के बाद दुल्हनें घर से नहीं निकलती, अपशगुन होता है। लेकिन महुआ घर से निकल पड़ी। घर, ठाकुरबाड़ी, खेत और गाँव की चौहद्दी को पारकर घाट पर पहुँची। चंद्रमा की रौशनी में कोसी का पानी चमक रहा था। एक पेड़ के नीचे बैठ महुआ इंतज़ार करती रही। एक एक कर तीन पहर बीत गए। अब थोड़ी देर में आसमान में लाली छाने लगेगी। महुआ एकटक कोसी के उसपार देखती रही। 

उधर सूरज निकला और घटवार घाट पर आने लगे तभी महुआ पानी में कूद गयी। कोसी के गहरे पानी ने उसे दुलार से अपनी बांहों में समेट लिया। 

लोगों ने जब उसे पानी से निकाला तबतक सूरज की रौशनी और गाँव भर के लोग घाट पर इकट्ठे हो गए थे। 

कहते हैं आज भी कोसी के घाटों पर उसकी आवाज़ लोगों को कातिक पूर्णिमा के दिन सुनाई पड़ती है।

सुनऽ हो गोसइयाँ, परत बानी पइयाँ, रचि-रचि कहिहऽ बिपतियाँ बटोहिया।

छोडि़ कर घरवा में, बीच महधारवा में, पियवा बहरवा में गइलन बटोहिया।

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14 comments

  1. हमारे देश की लोकगाथाएँ कितनी मर्मस्पर्शी, कितनी मनोहारी होती हैं उसे यूँ ही राष्ट्रीय साहित्य नहीं कहते! कहानी पढ़ कर लगा जैसे एक बार फिर से रेणू जी की महुआ घटवारिन जीवित हो उठी हो ।

  2. मिथिलाक मिठास कहानी पढैत काsल मोन के ओहिना मीठ करि दैत छै । कथाकार के किस्सा सुनैबाक नैसर्गिक गुण प्राप्त अछि …

  3. Marm sparshi….

  4. एक सुन्दर रचना जिसमें भारतीय लोक कथा संस्कृति का प्रवाह दिखाई देता है

  5. Itni dukhad anth ..:( bahut sundar rachna kho gai me un gaon ki galiyoo me

  6. बहुत खूबसूरती से दर्द को पिडोया गया है

  7. मर्मस्पर्शी, सहज प्रवाह…बधाई, शुक्रिया…

  8. आंचलिकता का सहज चित्रण पर क्षमा करें आतँ को अतार्किक रूप स्E भावुक करने का प्रयास अवांछनीय ।

  9. इसका जिक्र रेणु की तीसरी कसम में भी है।

  10. दर्द समेटे, सुन्दर आंचलिक कहानी !!

  11. अनिर्वचनीय!!!

  12. Bahut bahut sundar rachana…heart touching story !

  13. बढिया!ह्रदयस्पर्शी !

  14. बहुत बढ़िया☺
    महुआ का अंतहीन विरह के मिठास से मिलन।

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