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गीताश्री की नई कहानी ‘दमिश्क की भूलभुलैया और अलादीन का चिराग’

गीताश्री मेरी बड़ी बहन हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके लिखे को भी मैं उसी तरह से देखता हूँ. बल्कि उनकी कई चर्चित कहानियों का मैं घनघोर आलोचक रहा हूँ. बहरहाल, जो बात उनकी कहानियों के सन्दर्भ में रेखांकित किये जाने के लायक है वह यह है कि उन्होंने लगातार अपने मुहावरे को बदलने की कोशिश की है, समकालीनता को समझने की कोशिश की है. उदहारण के लिए यही कहानी. पढ़िए कितनी समकालीन है- प्रभात रंजन
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परी हो, बला हो, क्या हो तुम
-गीताश्री
नक्काशीदार चिराग किसी खुदाई से निकला हुआ प्रतीत हो रहा था। मानो उसे कई बार घिसा गया हो, घिस घिस कर अरमान निकाले गए हो। जाने उनमें कितने अरमान पूरे हुए हों। वजनी चिराग था, भारी भरकम जिन्न की उपस्थिति से भरा हुआ। चिराग को उलटते पुलटते हुए वह देख रहा था. न जाने कितनी कही-अनकही छिपाए हुए था अपने मन में! वह चाहता तो बहुत कुछ कह सकता था उससे! मगर वह कहीं सका था. वह चाहता तो था कि उसका हिजाब थोड़ा हटा दे! मगर यह भी नहीं हो सकता था! सिर से हिजाब हटाने की बहुत कोशिश की, उसके बालों को आज़ाद हवा में उड़ाने की कोशिश की. हिजाब के खिलाफ तर्को का जखीरा खोल दिया, दुनिया भर की आजाद औरतो का हवाला दिया, मगर वह सबमें असफल रहा.
जैनब! यही नाम था उसका. दिल्ली से जब आकर्ष रंजन ने सफर शुरू किया था तो क्या पता था कि वह प्रेम के मिथक में फंस कर खुद ही आख्यान में बदल जाएगा।
उसे मिथकों पर काम करने का शौक था. मगर वह नहीं जानता था कि मिथकों पर काम करने का शौक उसे ही एक दिन मिथक बना देगा. वह मिथक ही बनकर रह जाएगा, अलाद्दीन यहीं रह जाएगा और सिर्फ चिराग को ही अपने साथ ले आएगा. उसे बचपन से ही पुरा और लोक कथाएं, ऐतिहासिक आख्यान सुनना, संग्रह करना बहुत पसंद था. वह उन इलाको में जाना चाहता था, जहां के किस्से बहुत मशहूर। वह मिथक और इतिहास में भटकता हुआ जहाँ जा सकता था, वहां गया.
फिर उसे ध्यान आया अलादीन का! वही अलादीन, जिसके पास जादुई चिराग था. आकर्ष की मम्मी हमेशा कहती थी कि काश कोई जादुई चिराग होता तो वह उसे उसी चिराग में बांधकर रख देती. उसमें बंद कर देती और अपने पास रखती हमेशा! वह खंडहरों में तो नहीं भागता ! वह हंसता और कहता- “मम्मा, चला जाऊंगा एक दिन, देखना चिराग लेने और एक जीनी ले आऊँगा तुम्हारे लिए! तुम्हारी हर मांग पूरी कर देंगी। सारे अरमान निकाल लेना।
रोटी बेलती हुई माँ आटा लाकर उसके मुंह पर लगा देती-
और, तेरे लिए? तेरे लिए क्या होगी?
वह झेंप जाता. मम्मी की पीठ पर सिर टिका देता ! मगर मम्मी से बचना सरल न होता!
वैसे तुम कहो तो बात चलाऊँ किसी से? यहीं से ले आ! अलादीन के देश से न जाने क्या ले आए? सलमा, रोजा, आयशा!”
मम्मी हँसते हुए उसकी मनपसन्द अरहर की दाल परोसती जाती.
वैसे सुना है, मीडिल ईस्ट की लड़कियां सबसे सुंदर होती हैं। मैंने लेबनान और जार्डन की लड़कियां देखीं हैं…गजब की बला…
मम्मी रीझती हुई हंसती। मम्मी को तब गौर से देखता। अपने जमाने में मम्मी भी बला की खुबूसूरत रही होंगी।
मॉम, अलादीन की जीनी से तड़का लगवा देना !
वह मम्मी से ठिठोली करने में पीछे न रहता था.
अलादीन और उसका चिराग आकर्ष के मन में बचपन से बैठ गए थे! वह क्या खाता होगा, वह क्या पहनता होगा, ये सब उसने केवल पढ़ा था, और अब उसका मन होता था उसका अहसास करने का! उसके जिन्न की पोटली खोलने का. जैसे ही वह पोटली खोलने चलता वैसे ही मम्मी न जाने क्या क्या बातें करने लगती! कभी कभी तो उसे लगता कि मम्मी को ही जिन्न बना दे! मगर वह ऐसा नहीं कर सकता था. वह जिन्न की खोज में था। जिन्नों के किस्से ने उसे दीवाना बना रखा था।
दमिश्क जाकर अलादीन को खोजने की उसकी चाह ने अंतत: उसे एक दिन एयर इंडिया की फ्लाइट में बैठा ही दिया! फ्लाइट में बैठा बैठा वह लोक कथाओ के नायको के साथ, खासकर आल्हा ऊदल, शीत बसंत, तोता मैना के साथ अपनी मुठभेड़ के बारे में सोचता रहा! वह कथाओं से भिड़ा, वह किवदंतियों से भिड़ा मगर न जाने क्यों मीडिल ईस्ट की तरफ मन खिंच रहा था? वह भी तब, जब उस इलाके में आतंक के साए मंडराने लगे थे.
सीरिया में विनाश की परिभाषा लिखी जाने लगी थी. मगर वह चला आया था! उसे हमेशा लगता कि ऐसा न हो कि कहीं उस विध्वंस में उसका अलादीन खो जाए! और खो जाए कहवे की सुगंध! खो जाएं अनेकों किस्से! वह नहीं खोना चाहता था. हाकावती कला की वीडियो रिकार्डिंग लेकर अपने वतन लौटना चाहता था।
अलादीन, उसका जिन्न और उसकी बीवी का देश होगा! न जाने कब उसकी आँख लग गयी थी! और सपने में वह जिन्न और जीनी के सपने ही देखता रहा!
दमिश्क पहुँच कर वहां की हवाओं को महसूस करना चाहता है! वह जेनोबिया क्वीन के देश में पहुंच गया है। क्लियोपेट्रा सी खूबसूरत और अनगिन किस्सों से भरी हुई रहस्यमयी रानी। संभव हुआ तो उसके शहर पालमायरा के खंडरो में भटकेगा, किस्सो के सूत्र वहां बिखरे होंगे, उन्हें उठा लाएगा।  
आकर्ष हवाओं में किरदारों को खोजता है! वह घूम घूम कर आसमान पर उन किरदारों को पढता है! हवाओं और आसमान से जब उसे फुरसत मिलती है तो लोगों के चेहरों पर लगे पर्दे हटाने की कोशिश करता है और कभी कभी उसे किरदार मिल जाते है, झन्न से उसके सामने आ जाते हैं तो कभी एकदम से खोजे ही नहीं मिलते! मगर किरदार तो हैं ही! किरदार हैं, तभी वह काम करने आया है. तभी उसका काम चल रहा है. उसका मन हो रहा है, जिन्न के साथ साथ गुलाबी गुलाबी नाज़ुक-सी जीनी खोजने का! कुछ इतिहासकार आर्यों को यहीं से आया हुआ बताते हैं! उसका मन हो रहा है आर्यों की ख़ूबसूरती वाली लड़की को देखने का. वह एक पल को दमिश्क की सड़कों पर रूककर देखता है!
मगर उसे कहीं कुछ नहीं दिखता. उसे कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती. आकर्ष के लिए होटल की बुकिंग पहले से ही हो गयी थी. मौसम भी भारत से अलग था, वातावरण भी! भाषा तो एकदम ही अलग थी.
अब समय था अरबी के साथ गुफ्तगू करने का. मगर कैसे? उसे तो अरबी आती ही नहीं थी. शाम को अपनी अंग्रेजी के साथ ही अरबी सड़कों पर निकल पड़ा था. दमिश्क की सड़कें बहुत गुलज़ार रहती हैं. वहां पर एक तरफ बच्चों के कपड़े टंगे थे तो एक तरफ औरतों के! उसे लगा जैसे वह कनाट प्लेस में जनपथ से होकर गुजर रहा है. वही लडकियां! वही औरतें! और वही बच्चे! सब कुछ तो वही था! कहां कुछ अलग था. कुछ लडकियां जींस, टॉप में, कुछ स्कर्ट में तो कुछ बुर्के में! कुछ हिजाब में। नन्हीं नन्हीं लडकियां अपनी माँ का हाथ थामे हुए, कुछ जिद्द करती हुई, तो कुछ अपनी माँ की अच्छी बच्ची बनी हुई. उसका मन आइसक्रीम खाने का हुआ. आकर्ष को ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा, जल्द ही उसे आइसक्रीम वाला मिल गया. मगर समस्या तो फिर भी थी, उसे अरबी नहीं आती थी, आइसक्रीम वाले को इंगलिश नहीं। स्थानीय  कैसे लोगो से संवाद में यह दिक्कत तो बनी रहेगी। कोई सिस्टम बनाए कि वह दिल में बोली जाने वाली भाषा समझ जाए! कैसे कोई दिल का अनुवादक बन जाए?
वह पार्क के किनारे बनी आईसक्रीम पार्लर पर लगी आइसक्रीम की लिस्ट देखने लगा। पढ़ना मुश्किल था।
आपको किस फ्लेवर की आइसक्रीम चाहिए?”
अंग्रेजी में मीठी आवाज़ थी! जैसे मुंह में ही स्ट्राबेरी फ्लेवर की आइसक्रीम घुल गयी हो. वैसे उसे टूटीफ्रूटी पसंद थी, मगर उसे लगता था कि लड़कियों को जरूर ही स्ट्राबेरी पसंद होती होगी.
उसने अचकचा कर सिर उठाया! उसकी आँखों के सामने जींस और टॉप पहने मगर सिर पर हिजाब बांधे एक लड़की खड़ी थी.उसकी आंखें चौंधिया गईं। पलक झपकना भूल गया। काली काली आंखें, सफेद संगमरमरी चेहरा, तांबई होठ…
जी, आपको कौनसी आइसक्रीम चाहिए? आपने जबाव नहीं दिया!” उसने फिर पूछा.
आकर्ष के दिल में यशराज फिल्म्स के नायक की तरह कोई चुपके से गिटार बजा रहा था!
वह भूल गया कि वह अनजान देश में अनजानों के बीच खड़ा हुआ है! अगर कुछ भी गड़बड़ की तो उसका सीधे सर कलम होगा.
वह सतर्क हो गया।
मम्मी ने फोन पर ख़ास हिदायत दी थी, कि लड़कियों से दूर रहना! मगर यह देश तो कहीं से भी इस्लामिक देश लग ही नहीं रहा था. वह तो बिलकुल भारत जैसा ही था. या कहें दिल्ली ही था. उसे तो ऐसे लग रहा था जैसे वह दिल्ली में ही कहीं है!
मगर वह दिल्ली में नहीं था, वह था कहीं कोसों दूर दिल्ली से, अपना दिल संभाले! जो उस अंग्रेजी भाषा पर फिदा हुए जा रहा था.
अजीब हैं आप, कुछ बोल ही नहीं रहे!” आप भारत से हैं या पाकिस्तान से?”
वह फिर अंग्रेजी में बोली.
जी, माफ करियेगा, मैं कहीं खो गया था, मैं टूटीफ्रूटी लूँगा” उसने इशारा करते हुए कहा. जुबान में थोड़ी कंपन थी।   
ये नहीं, हमारी स्पेशल कच्चे बादाम की आइसक्रीम ट्राई करिए, आपका मन वाह वाह न कर उठे, तो दमिश्क का नाम बदल दीजिएगा!” वह चहकी.
जी, तो तो ठीक है मगर आपका नाम है क्या?” उसने आइसक्रीम खाते हुए बोला. थोड़ा सहज हो गया था।
वैसे यह आइसक्रीम है बहुत स्वादिष्ट! आपने बनाई है?” आकर्ष ने स्वाद में खोते हुए कहा.
जी नहीं, मेरे भाई ने! वही यहाँ काम करता है! मैं तो उसकी मदद कराने कभी कभी आती हूँ.
उसने अपने भाई को उसके दिए गए पैसे सौंपते हुए अरबी में कुछ समझाया.
अपना नाम नहीं बताया, मेरा पूछ रही है…अजीब है…”  वह बड़बड़ाया।
“लड़की चिंहुकी-
ओह! हिंदी…तुम इंडिया से हो! लैंड ऑफ शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान..अमिताब बच्चन.. वह हंसी.
तुम हिंदी जानती हो ?”
वह चौंका। बाप रे तब तो खतरा है, कुछ भी बोलने से पहले सोचना पड़ेगा। अच्छा हुआ पहले ही पता चल गया…संभल गया.
थोड़ा..थोड़ा…..अरबी में डब हिंदी फिल्में देखती हूं। आई लव इट…माई गॉड, कितनी ग्रांड शादी होती है वहां, दुल्हन के कपड़े नायाब, कितना खुल कर नाचते हैं सब…कलरफुल्ल फिल्मस…
वह चहक रही थी।
“आकर्ष हंस रहा था। ये लड़की तीनों खान को जानती है, अमिताभ को भी जानती है…बॉलीवुड फिल्मों की दीवानी लग रही है…अच्छी जमेगी इससे।
उसने देखा कि वह उसे ही देख रही है! उस समय वह उसे एक चुलबुली गौरैया लगी, जो एक पल के लिए रुक कर देख रही है और सोच रही है कि अब आगे क्या?
उसने जब उसे मन भर कर देख लिया तो पूछा – “तुम हिन्दू हो?
उसने हां में सर हिला दिया.
नाम बता दो…
आकर्ष …आप आशु कह सकती हैं…
मैं जेनोबिया, आप जैनब कह सकते हैं…वह खिलखिला पड़ी..
आकर्ष को लगा, वह घने पेड़ के नीचे खड़ा है और पत्तों पर ठहरा हुआ बारिश का पानी झरझरा कर उसके ऊपर गिर रहा है. वह पेड़ के प्रति कृतज्ञता महसूस करने लगा। सूखी जमीन से कोई सोंधी गंध उठ रही थी जो उसके पूरे जिस्म को गमका रही थी।
आकर्ष, मिन्स…समथिंग दैट इज डिवाइन, आई नो जेनोबिया….क्वीन जेनोबिया…
वह संजीदा हो गया था। नाम के अर्थो के आदान प्रदान के बाद झिझक की दीवार गिरने लगी थी। जैनब कुछ फुर्सत में दिखाई दे रही थी। आकर्ष को लगा, वह उसमें कुछ दिलचस्पी ले रही है। अजनबी होकर भी अजनबीयत गायब है।
आकर्ष मौका देखकर बोल पड़ा-
आप मुझे अपना शहर दिखाएंगी, चिरागों का शहर, यह लैंड ऑफ लैम्प है!
हां, अलादीन वाले चिराग…
वह गदगद हो गया, जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो। उसे लगा कि जीनी मिल गई, जिन्न भी यही खोज कर देगी।  
उस पल वह मम्मी की हिदायत एकदम भूल गया. वह भूल गया कि मम्मी ने उसे लडकियों से दूर रहने के लिए कहा था. वह तो ये गया कि वह गया. उस शाम उसने दमिश्क के ओल्ड सूक की गलियों में खूब चिराग देखे. एक से बढ़कर एक! रंगीन चिराग! रंगहीन चिराग, जलने वाले चिराग तो केवल शो पीस वाले चिराग! कसमसाती हुई गलियों में दिल्ली के सदर बाजार का नजारा था। लेकिन वैसी अराजकता नहीं थी। शोरगुल नहीं था। भव्य और ग्लौमरस साथ था। वह न जाने लंबी गलियों में भटकता रहा, रात को उसे टिपिकल सीरियन रेस्तरां ले गई। वहां पर हुक्का देखकर वह हैरान रह गया! और हिजाब में हुक्का पीती हुई लडकियां! हिजाब में लड़कियों का बैंड? इंग्लिश गाने, तमाम वही चकाचौंध जो दिल्ली में है. ये सब एक मुस्लिम देश में? उसके लिए पर्दा उठ रहा था! हर तरफ नए नए चिराग थे!
ये सब उसके लिए एकदम नया था! उसे लग रहा था जैसे वह परियों की दुनिया में था. उसमें वह भी हुक्का पी रही थी. वह भी गाना गा रही थी! रेस्तरां में बैली डांसर का उत्तेजक नृत्य चल रहा था।
क्या हुआ, कभी लड़कियों को नाचते-गाते हुए नहीं देखा?
उसने उसके कंधे पर हाथ मारा.
देखा तो है, मगर यहाँ उम्मीद नहीं थी!” उसने शोर से बचते हुए कहा.
क्यों, मुस्लिम देश है इसलिए?” उसने हुक्का गुडगुडाया और धुंए के गोल गोल छल्ले बना कर ऊपर की तरफ उड़ाती रही। छल्ले नहीं, तरह तरह की आकृतियां बन बिगड़ रही थीं।
हां, ये भी कह सकती हो!” आकर्ष ने गर्दन नीचे कर लिया।
कितने दिनों के लिए हो?”
एक वीक, उसके बाद टर्की जाना है। वहां से वतन वापसी। 
वापसी की बात करते करते आकर्ष की आवाज में रोशनी कम हो गई जिसे शायद जैनब ने नोटिस किया।
ठीक है, फिर कल मिलते हैं!” कल हम हाकावती सुनने यहां के सबसे फेमस कहवा घर में चलेंगे। वहां आपको बहुत किस्से कहानियां मिलेंगी। मैं ट्रांसलेट कर दूंगी, बिदाउट फीस मिस्टर इंडिया..। चेहरे के सामने सुंदर कलाईयां लहरा कर चली गई। नेलपॉलिश का नीला रंग अंधेरे में चमकता देखा उसने। हिजाब का पिछला हिस्सा हवा में हौले हौले झूल रहा था। मन हुआ, पीछे से एक सिरा पकड़ कर खींच दे। वह दूर जा चुकी थी।  
दमिश्क की सड़को पर दोनों अलग अलग दिशाओं में मुड़ गए। गनीमत थी कि पूरे एक वीक का साथ मिल गया था। आकर्ष ने टैक्सी रोकी और होटल की तरफ चला गया।
वह तो यहां अलादीन के किस्से खोजने आया था और वह यहां उसके एक चिराग से जल गया! सही कहती थी मां- तू जीनी ले ही न आना!
क्या उसे जीनी मिल गयी है? हा हा, ये तो पहली मुलाकात है! पहली मुलाक़ात में ही यह हाल कर गयी!
धीरे धीरे जैनब के ख्यालों में खोता हुआ नींद के आगोश में चला गया। वह सपने में पाल मायरा के खंडहरो में भटकता रहा। महल की टूटी मेहराबें दिखतीं और लोप हो जातीं। दूर कहीं मंदिर की ध्वस्त इमारत दिखी..रेत की आंधी से घिरी हुई। वह रेतीली आंधी में घिर गया। कुछ दिखाई देना बंद हो गया है। काले काले लंबे बालों ने उसे अपने में लपेट लिया है…वह कसता जा रहा है… अचानक सुरीली धुन सुनाई दी…पकड़ से निजात मिली, झट से आंखें खोल दी।  
मोबाइल पर सुरीला रिंग टोन बज रहा था। वहां के समय के अनुसार दस बज गए थे ! वह एकदम से उठा ! होटल के रिसेप्शन से फोन था कि जैनब उसका इंतजार कर रही है!
तुम? यहाँ?तुम्हें कैसे पता चला कि मैं किस कमरे में हूँ?” जल्दी जल्दी वह नीचे उतर कर भागता हुआ आया।
ओह! ये जो रिसेप्शन पर है न, उससे मैंने कहा था कि किसी इन्डियन टाइप को देखा क्या? तो उसने तुम्हारा कमरा नंबर बता दिया! और देखो तुम ही निकले! अब अपना नाम बताने का कष्ट करेंगे!” वह धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती जा रही थी.
मगर आकर्ष अभी तक खंडहरों में खोया हुआ था। काले लंबे बालों से उसका जिस्म अभी तक लिपटा हुआ था। आज उसके सिर पर काला नहीं, रंगीन हिजाब बंधा हुआ था। सुबह सुबह दूधिया चेहरा दमक रहा था। उसने गौर से देखा, आंखों में काजल खूब गहरी लगी हुई थी।
क्या देख रहे हो मिस्टर इंडिया..ओह…काजल…पता है, हमारे धर्मगुरु क्या कहते हैं, लड़कियों, अल्लाह के लिए, आंखों में काजल लगाना कम करो, ताकि कत्ल के जुर्म से तुम बच सको…होहोहो…
वह उन्मुक्त ठहाके लगा रही थी। वह उसकी हंसी में साथ न दे सका। वह तो  
हिजाब में छिपे हुए बालों में उलझ गया था! उसका मन हुआ कि वह उसके बाल देखे! उसका हिजाब हटा दे, मगर वह इतनी हिम्मत नहीं कर सका!
टैक्सी में बैठते बैठते उसने हिम्मत जुटा ली।
मैं आपके बाल देखना चाहता हूं जैनब..क्या यह संभव है?”
थोड़ी देर वह चुप रही। आकर्ष ने चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया। दो दिन की मुलाकात में वह इतना फ्रेंक कैसे हो गया..खुद पर ही चकित था।
मैं पांच साल तक किसी के इश्क में थी। मैंने अपने ब्वाय फ्रेंड को अपने खुले बाल कभी नहीं दिखाए। वह चला गया…फिर भी नहीं. हमारे यहाँ हिजाब नहीं हटाते, खुले बाल निकाह के बाद केवल अपने हसबैंड को ही दिखाते हैं! सो, सॉरी!
वह हंसी! उसकी हंसी, उसे भीतर तक जमा गयी! एक पल में अंदर के सारे तरल पदार्थ, ठोस में बदल गए थे।
उस दिन जैनब उसे दमिश्क की ऐतिहासिक गलियों में लेकर गयी! वह गलियों के इतिहास से परिच
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8 comments

  1. वाह …क्या बात है ..एक अलग लोक में ले जाती कहानी

  2. उनके होने में ही उनकी सार्थकता होती है.” bahut khoob ,bahut sunder ,rgrds

  3. बहुत बढ़िया

  4. Wow…speechless

  5. kahin kho gai …bahut khoob

  6. बहुत बढ़िया कहानी

  7. सुंदर प्रेम कहानी… किसी को खोजते हुए खो जाना… इश्क और क्या है आखिर

  8. There’s definately a great deal to know about this topic.
    I like all the points you have made.

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