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गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ की कहानी ‘बड़ी अम्मा का फ्यूनरल’

आज मार्केज़ की इस कहानी की याद आ गई. कुछ साल पहले इसका अनुवाद अपर्णा मनोज ने किया था. कैसे यथार्थ जादुई हो जाता है इसके लिए पढ़िए- मॉडरेटर

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दुनिया के तमाम लामजहब लोगों के लिए बडम्मा की यह सच्ची कहानी – जो मेकोंडो मुल्क की तानाशाह सुल्ताना थी। बानवे साल तक जो जिंदा रही और पिछले साल सितंबर के मंगलवार को जिसकी मुक्कदस रूह दुनिया से फना हुई। जिसकी गमी में पोप ने शिरकत की।

मुल्क जिसकी चूलें हिली हुई थीं, अब खुद को सँभालने की कोशिश में था; सैन जैसिंटो के मशक बीन वादक,गुआजीरा के तस्कर, सीनो के धान उगाने वाले ठेकेदार, कॉकामयाल की वेश्याएँ, सीअर्पे के जादूगर, अरकंटका के केले बागानों के मालिकों ने थका देने वाले रतजगों के बाद अपने बिस्तर समेट लिए थे और खोए सुकून को पाने की जद्दोजहद में थे। गणतंत्र का राष्ट्रपति, उसके मंत्री, आवाम के नुमाइंदे और तमाम अलौकिक ताकतें जो उस भव्य जनाजे के साथ थीं और जिनका नाम तवारीख में मुनक्कश हो जाना चाहिए, अब अपनी खोई रियासतों को पाने में लगे थे; पवित्र पुजारी अपने जिस्म और रूह के साथ जन्नत की आरजू में थे; और अब मेकोंडो की गलियों से गुजरना मुसीबत की तरह था चूँकि गलियाँ खाली बोतलों से अटी पड़ी थीं, जहाँ-तहाँ जली सिगरेट के टुकड़े बिखरे थे;चबाई हड्डियों, कबाड़ कनस्तरों और फटे चीथड़ों का अंबार लगा था, जिसे गम में शिरकत करने वाली भीड़ वहीं छोड़ गई थी। यह वह समय था कि किसी तारीखनवीस के तामीर लिख लेने से पहले ही सामने के दरवाजे पर तिपाई टिकाकर शुरू से आखीर तक कौमी गदर को लिख लेना था।

चौदह सप्ताह हुए इस बात को, कभी न खत्म होने वाली रातों तक सुल्ताना को पुल्टिस बाँधा गया, सरसों की पट्टी रखी गई और जोंक से उसका दर्द दूर करने की कोशिश की गई, लेकिन मौत के उन्माद और यातना ने उसे बहुत कमजोर बना दिया था; बडम्मा ने फरमान जारी किया कि उसे बेंत की आराम कुर्सी पर बैठाया जाए ताकि वह अपनी आखिरी ख्वाहिश बता सके। मरने से पहले एक यह काम वह पूरा करना चाहती थी। उस सुबह उसने फादर एंटनी इसाबेल के सामने अपने मन की बातें कह डालीं और अब वह अपने नौ भतीजे-भतीजियों यानी अपने वारिसों के सामने दुनियावी मामलातों को भी निपटा देना चाहती थी, जो उसे घेरे खड़े थे। पुजारी उम्र की सौंवी दहलीज पर था। कमरे में बैठा हुआ वह खुद कलामी कर रहा था। बडम्मा के कमरे तक उसे लाने में दस लोगों की जरूरत पड़ी थी, इसलिए यह तय किया गया था कि अंतिम घड़ी तक उसे वहीं उसी कमरे में रहने दिया जाए।

सबसे बड़ा भतीजा निकानू नोटरी की तलाश में निकल गया। उसने खाकी रंग के कपड़े और काँटेदार जूते पहने थे। देखने में भीमकाय और खूँखार था। उसकी कमीज में पिस्तौल का खोल रहता जिसमें ३८ कैलिबर की लंबी नली वाली पिस्तौल रहती। विशालकाय दो मंजिला हवेली जो कभी राब और अजवाइन से महका करती, जिसके कोठारे चार पुश्तों की तरह-तरह की तिजोरियों से भरे होते; धूल-धूसरित दीखती थी। किसी होनी के डर से एक सप्ताह पहले ही वहाँ सन्नाटा पसर गया था। बीच के लंबे गलियारे में जहाँ कभी उनींदे अगस्त के इतवारों में हुकों पर सूअर और हिरण लटके होते, उस फर्राशखाने में नौकर-चाकर औजारों और नमक के बोरों के इंतजामात के साथ फर्श पर सोए पड़े थे। उनके खच्चर जीन के साथ तैयार थे कि न जाने कब उन्हें खबर रियासत के चारों कोनों तक पहुँचानी पड़े। बाकी का परिवार अपनी बैठक में था। उनकी औरतें विरासत से चली आ रही कारगुजारियों से थकी-हारी, गुनूदगी में हैराँ और पस्त जान पड़ती थीं, जैसे सालों से इकठ्ठा मातम उन्होंने ओढ़ रखा हो। बड़म्मा की मातृसत्तात्मक सख्ती ने उसके नाम और होनी की ऐसी सांस्कारिक दीवार खड़ी कर दी थी कि जिसमें चाचा अपनी भतीजियों की बेटियों से शादी कर सकता था, मौसेरा भाई अपनी मौसी से विवाह करने की छूट लेता और भाई अपनी भाभियों से। सगोत्रता का ऐसा जाल बिछ गया था जिसने पैदाइश को अनैतिक दायरे में फेंक दिया। सबसे छोटी भतीजी मैगडलिन इससे खुद को बचा सकी थी। डरावने ख्वाबों ने उसकी जान सोख ली थी। उसने फादर ईसाबेल से झाड़-फूँक करवाई। अपना सिर मुँडवा लिया और सांसारिक सुखों को छोड़कर नव-दीक्षित मिशन डिस्ट्रिक्ट में शामिल हो गई। अपने किसी भी नौकर की बीवी के साथ जमीदार इच्छानुसार रात गुजार सकता था; आदमियों ने कोख को जानवरों का बाड़ा बना दिया। अपने समझौतों और तरीकों से उन्होंने जारज संतानों की जमात खड़ी कर दी जो बिना उपनाम के नौकरों को दे दिए जाते थे। वे भगवान के बच्चे कहलाते और बडम्मा के आश्रय में कभी उनके प्यारे बनकर रहते तो कभी सेवक बनकर।

सिर पर मंडराती उसकी मौत ने बुझती हुई उम्मीद को फिर से रोशन कर दिया। मरती हुई इस औरत की आवाज को सजदे और फर्माबरदारी की आदत थी। एक बंद कमरे में उसकी आवाज तुरही से भी ज्यादा बुलंद थी जो रियासत के दूर-दराज के कोनों तक सुनाई देती। उसकी मौत से कोई बेरुख न हो सकता था। इस सदी में भी बडम्मा मेकोंडो की धुरी थी, ठीक उसी तरह जैसे कभी उसके भाई, उसके माँ-बाप, उसके नाना-नानी या दादा-दादी हुआ करते थे और दो सदियों से इस मुल्क के बागपैराँ थे। शहर का नाम उसी के खानदानी नाम से आबाद हुआ। रियासत के पास कितना है, उसकी क्या कीमत है – कोई जानता नहीं था, लेकिन लोगों को ये भरोसा हो चला था कि बडम्मा ही यहाँ के रुके या बहते पानी की मालकिन हैं। वही बरसात और सूखे की मल्लिका हैं। वही रियासत की तमाम सड़कों, तार के खंबों, अधिवर्ष, गर्मी की लहरों की हाकिम हैं। इससे भी एक कदम बढ़कर उन्हें जिंदगी और मिलकियत पर बाप-दादों से हुकूमत का हक मिला है। अक्सर ठंडी दोपहर में जब वह अपनी बालकनी में पुरानी बेंत की आरामकुर्सी पर रुतबे और पेट के पूरे भार के साथ बैठी होती तो कुर्सी इस भार से नीचे धँस जाती। तब सचमुच ऐसा लगता कि वह दुनिया की अकूत दौलत की सबसे ताकतवर स्वामिनी है।

किसी के लिए भी यह सोचना मुश्किल था कि बड़ी अम्मा भी कभी दुनिया से रुखसत ले सकती हैं। यह केवल बड़ी अम्मा और उनके कबीले को पता था कि उनके मरने का पूर्वाभास बूढ़े पादरी ईसाबेल को हुआ है, जबकि बडम्मा को पूरा यकीन था कि अभी उन्हें सौ साल से भी ऊपर जीना है – ठीक वैसे जैसे उनकी नानी ने लंबी उम्र देखी। उनकी नानी ने १८८५ की जंग में कर्नल ओरिलिआनो बूइंडिआ की गश्ती टुकड़ी को अपनी रसोई से आगे नहीं जाने दिया था। लेकिन इसी महीने के अप्रैल महीने में बडम्मा को इस सच्चाई का इल्म हुआ कि परवरदिगार ने उसे उतने भी खास अधिकार नहीं दे दिए हैं कि वह अकेले ही संघियों के गिरोहों और उनकी खुले झगड़ों को यूँ कुचल सके।

पहले सप्ताह जब दर्द उठा तो परिवार के डॉक्टर ने सरसों की पट्टी बाँध कर गरम जुराबें पहना दीं। यह उनका पुश्तैनी डॉक्टर था। उसने मोन्टपेलिए से पढाई की थी। किसी तरह के दर्शन में उसकी आस्था नहीं थी। विज्ञान को वह तरक्की के लिए जरूरी मानता था। बड़ी अम्मा ने उसके साथ साँठ-गाँठ कर रखी थी। उसे अपनी रियासत में जीवन भर रहने का हक दिया था और बदले में यह भरोसा कि मेकेंडो में और कोई डॉक्टर नहीं रह सकता सिवा उसके। शाम पड़े घोड़े पर सवार वह आता, बीमार जरूरतमंदों के पास जाता और एक ही गश्त में सारे शहर का हाल चाल ले लेता। कुदरत बदले में उस पर खूब मेहरबान रहती। वह यहाँ कई बच्चों का पिता था। पर गठिया के कारण उसने बिस्तर पकड़ लिया था, इसलिए अब वह अपने मरीजों के पास नहीं जा पाता था और अपना रोज का काम पयाम और अटकलों से पूरा करता। बड़ी अम्मा ने उसे बुला भेजा था। उसे जाना पड़ा। पायजामा पहने, अपनी दो लाठियों पर झुकता-झुकाता नगर के चौक को पार करते हुए वह बडम्मा के पास पहुँचा। बीमार औरत के कमरे में उसने अपना डेरा डाल लिया। वहाँ जाकर ही उसे पता चला कि बड़ी अम्मा की जान आफत में है। तरह तरह के मल्हमों वाला लातिनी चीनी मिट्टी का जार उसने मँगवाया और तीन हफ्ते तक मौत से लड़ती औरत को वह अंदर-बाहर सब जगह लेप लगाता रहा। उसने नाना मरहम लगाए। शानदार उत्तेजक दवाइयाँ दीं और कारगर बत्तियाँ लगाईं। उस पर भी जब दर्द न घटा तो उसने मोटे ताजा मेंढकों को दर्द की जगह लगाया। गुर्दों पर जोंक बैठाई। अगली सुबह होने तक वह तमाम इलाज करता रहा – तब तक जब तक वह इस दुहरी मुश्किल में न उलझ गया – कि अब और क्या चारा बचा है। या तो नाई को चीरा देने के लिए बुलवा भेजा जाए या फिर पादरी एंटनी ईसाबेल से झाड़-फूँक करवा दी जाए।

निकानू को पुजारी के पास भेजा गया। दस सबसे काबिल लोग पादरी को उसके उजाड़ मकान से उठकर लाए और बडम्मा के शयन कक्ष में बैठा दिया। बडम्मा चरमर चरमर करती बेंत की लचकदार कुर्सी पर विराजमान थीं। कुर्सी फफूँद लगी छतरी के नीचे पड़ी थी। यह शामियाना नुमा छतरी खास मौकों पर ही काम आती थी। यह वायारक्रम था जहाँ मरणासन्न व्यक्ति से मिलने भीड़ जुटती थी। सितंबर की उस गुनगुनी सुबह को मोकेन्डो की आवाम ने वायारक्रम से आने वाली छोटी घंटियों की आवाज सुनी जो सुबह उठने वाली सबसे पहली चेतावनी की पुकार थी। सूरज उठते-उठते नगर के उस छोटे से चौक के पास बड़ी अम्मा के घर के सामने जैसे मेला जुट गया।

ये जैसे किसी और जमाने की यादें थीं। सत्तर साल की होने तक बड़ी अम्मा अपनी सालगिरह पुरशोर तरीके से मनातीं जो किसी त्योहार की तरह लंबी चलती। रम के डेमिजोन (सुराहीनुमा लंबी गर्दन की बोतलें) लुटाए जाते। शहर के चौक में जानवरों की कुरबानी दी जाती। तीन दिन तक बिना रुके बैंड बजता। बादाम के धूसर पेड़ के नीचे जहाँ कभी शताब्दी के पहले सप्ताह में कर्नल ओरिलिआनो बूइंडिआ और उसके सिपहसालारों ने अपनी छावनी बनाई थी, वहीं उसी जगह पर केले की शराब, रोल्स, खूनी गुलगुलों, बारीक कटे तले-भुने गोश्त, गोश्त कचौड़ियों, लंगूचे, यूका पावरोटी, क्रॉलर्स, मकई पाव, मछली के पफ, लोंगानीसास, आँतें, नारियल न्यूगा, रम टोडीज के साथ तरह तरह के छोटे-मोटे सामान, मुर्गों की लड़ाई लॉटरी टिकट्स की दुकानें सजतीं। इस शोर-गुल के बीच स्कैपुलर (कफ्तान या लबादा) बिकते जिन पर बड़ी अम्मा का चित्र छपा होता। इस तरह सालगिरह के शुरू होने के दो दिन पहले से और खत्म होने तक गहमा-गहमी बनी रहती। पटाखों के शोर और पुराने पियानो की धुन पर थिरकते लोगों के नाच-गाने से बड़ी अम्मा का महल थर्राता रहता। खास मेहमान, घर के लोगों के आलावा नाजायज औलादें भी नाचती-गातीं। सदारत बडम्मा करतीं। वह दालान के पिछले हिस्से में अपनी मलमल के तकियों वाली आराम कुर्सी डाल कर बैठ जाती। मौका देखकर बीच-बीच में अपने दाएँ हाथ से हिदायतें देती जाती। उसकी सारी उँगलियाँ अँगूठियों से दमकती रहतीं। उसी रात आने वाले साल की शादियों के फैसले हो जाते। इसमें प्रेमी जोड़ों की मिलीभगत रहती; लेकिन सलाह अम्मा की होती। जब सब खत्म हो जाता तो बडम्मा राज चिह्न और जापानी लालटेनों से सजी बालकनी में आ जाती और खूब सिक्के लुटाती।

लेकिन इधर कुछ ऐसा हुआ कि रवायतें गुमनामियों में दफ़्न गईं। घर में एक के बाद एक कई मौतें हुईं। सियासी बेसब्री बढ़ती गई। नई कौम ने जश्ने अजीम के बस किस्से ही सुने थे। उन्होंने कभी बडम्मा को भारी भीड़ से घिरे नहीं देखा था। उन्होंने नहीं देखा था कि सरकारी ओहदेदार अम्मा के मुरीद हो गए हों और अदब से उसके सामने सिर झुकाते हों।

भूली बिसरी यादों की तरह बूढ़े लोगों के मन में जवानी के दिनों की स्मृतियाँ छूटी हुई थीं। उन्हें मारिया डेल रुजारिओ कैस्टिनेडा ए मोंटेरो के वालिद की वफात का वो दिन याद था जब भरी दोपहर में दो सौ गज का गलीचा उनके जायदाद में मिले घर से कुर्बानगाह तक बिछा दिया गया था। जब रुजारिआ अपने पिता की अंत्येष्टि से लौटीं तो उनका समूचा वजूद नई गरिमा से दिपदिपा रहा था – इस तरह बाईस साल की वह लड़की बडम्मा में बदल गई।

उन दिनों मध्ययुगीन खयाल केवल परिवार के अतीत का हिस्सा नहीं होता था बल्कि पूरे मुल्क के विगत से उसकी साझेदारी रहती थी।

समय के साथ बडम्मा भी अपनी ही पुराकथा में पिघलती चली गईं। गर्मी की दोपहर में भी जो रतनजोत के फूलों के भार से लदी, अपनी बालकनी में अक्सर दिखा करती थी, अब मुश्किल से ही दीखती। वह जैसे दृश्य से ओझल हो चली थी, जैसे बहुत दूर चली गई थी।

उसने अपने सारे अधिकार निकानू को सौंप दिए थे।

कुछ वायदे अनकहे होते हैं, परंपराएँ उन्हें निभाती हैं। मामा ने भी किया। उन्होंने अपना वसीयतनामा वारिसों के नाम लिखकर मोहरबंद किया और उसी दिन वारिसों ने तीन रातों के सार्वजानिक उत्सव का ऐलान किया। लेकिन साथ ही सब ये सच भी जानते थे कि बड़ी अम्मा अपनी आखिरी ख्वाहिश अंतिम घड़ी आ जाने से पहले किसी को न बताएँगी और कोई यह बात गंभीरता से ले नहीं पाता था कि वे भी कभी मरेंगी।

लेकिन आज सुबह वायकम की घंटियों ने जब मोकेंडो को जगाया तो वहाँ की जनता को इस बात का भरोसा हुआ कि बडम्मा भी मनुष्य हैं और अलविदा की तैयारी में हैं।

धूल से सनी, पूरब के महीन क्रेप से तैयार छतरी के नीचे बड़ी अम्मा सन के बिछौने पर लेटी थीं। कानों तक उनके मलहम पुता था। जीवन की साँसें क्षीण हो चुकी थीं। कौन कह सकता था कि ये वही अम्मा थीं जिनकी छातियों तक में मातृसत्ता की घुट्टी जज्ब थी।

जो मामा अपने पचास पूरे होने तक दुनिया के सबसे जोशीले विवाहार्थी को खारिज कर दिया करती थी; या जिसे कुदरत ने इतनी ताकत दी थी कि वह अकेली ही अपनी रियाया का पेट पाल सके; आज कुँवारी, निपूती, निर्वंश दुनिया से चले जाने को तैयार बैठी थी।

हथेलियों पर तेल मलते समय पादरी ईसाबेल को अन्य लोगों को मदद के लिए बुलाना पड़ा। मामा की उँगलियों में हीरे की अँगूठियाँ दमक रही थीं और मौत की तीव्र वेदना वाली घड़ियों में भी मामा ने अपनी मुट्ठियाँ छाती पर भींच रखीं थीं। उनकी भतीजियों की हाजिरी भी वहाँ बेकार सिद्ध हुई। किसी भी तरह उन्होंने मुट्ठी न खोली। उनकी निस्तेज आँखें जैसे सबसे कह रही थीं – ‘तुम सब लुटेरे हो।’

पादरी अपने सेवकों के साथ अनुष्ठानों में लगे थे। मामा सब देख रही थीं। सहज पर शांत और दृढ़। मामा बुद्बुदाईं – ‘मैं मर रही हूँ।’ फिर उन्होंने अपनी हीरे जड़ी अँगूठी निकाली और मैगडेलेना को सौंप दी। मैगडेलेना की ही अँगूठी थी…। उनकी सबसे छोटी वारिस और नवदीक्षित नन। जिसने परंपरा को तोड़ते हुए चर्च को स्वीकार किया और विरासत को ठेंगा दिखाया।

अगले दिन तड़के ही बड़ी मामा ने निकानू को अपने पास बुलाया और उसे कई बातें पूरी सजगता के साथ समझाईं। आधा घंटे तक अपने कामकाज के बारे में समझाती रही। फिर उसने अपने अंतिम संस्कार को लेकर कुछ खास निर्देश दिए। आखिर में चौकस होकर बोली – “अपनी आखें खुली रखना। सारी कीमती चीजें ताले में रखो। कई लोग तो केवल इन्हें झपटने की ताक में होंगे।”

इसके बाद एकांत में कुछ बातें उसने पादरी के साथ कीं। बहुत देर तक, पर बड़ी ईमानदारी से गुनाहों की खर्चीली माफी माँगी और फिर रिश्तेदारों के साथ अमल इश्तिराक की चंद घड़ियाँ बिताईं। अंत में उसने बेंत की आराम कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया ताकि वह अपनी अंतिम इच्छा सबको सुना सके।

चौबीस पेजों का ये लेखा-जोखा था, जिसमें मख्दूम मामा की जायदाद का खुलासा था। बहुत सुंदर लिखावट में निकानू ने इसे तैयार किया था।

डॉक्टर और पादरी को हाजिर-नाजिर मानते हुए मामा ने नोटरी को अपनी चल-अचल संपत्ति लिखवा दी थी। जिन दिनों उपनिवेश बना, सरकारी हुक्म के साथ ठीक-ठाक मिकदार में ये रियासत तीन जिलों से मिलकर बनाई गई। लेकिन समय के साथ सारी ताकत मामा के हाथ में चली गई। शादी ब्याह भी उसकी मर्जी से होते।

पाँच कस्बों की परती जमीन थी ये। दो सौ बावन परिवारों की जमीन थी ये। लेकिन किसी के पास भी अपनी जमीन न थी। जो भी किसान थे सब के सब बँटाईदार थे। अपने जन्मदिन पर बडम्मा अपने घर के ओसारे पर बैठ जाती और लोगों से लगान वसूल करती। उसके पूर्वज भी यही करते आए थे। यह काम तीन दिन तक चलता। उगाही वसूलने के बाद मामा का आँगन सूअरों, फीलमुर्ग और मुर्गों से खचाखच भर जाता। बागानों के फलों का दशमांश उस तक पहुँच जाता। फसल के नाम पर ले देकर केवल यही एक फसल साल भर में होती थी, उसके बाद जमीन में कुछ न उगता।

पारंपरिक परिस्थितियों ने यह तय कर दिया था कि इन पाँचों कस्बों को अपनी सरहदों के भीतर ही पनपना था। यही हाल काउंटी के गढ़ का भी था। किसी को संपत्ति का अधिकार नहीं था। सारी जमीन मामा की थी। मकानों के किराए उसे ही दिए जाते। शहर की सड़कों तक पर मामा का अधिकार था।

बस्ती के बाहर आवारा मवेशी बड़ी तादाद में भटका करते। भूख-प्यास से ये मर जाते थे। उन्हें तालानुमा आकृति से दागा जाता। ये एक पारंपरिक लुआठा था जिसकी कहनियाँ लोग दूर-दराज तक तक सुनते-सुनाते। इस लुआठे से मरते मवेशियों के आँकड़ों का नहीं, बल्कि बिगड़े हालातों का पता मिलता था। कारण कोई बताता नहीं था। पिछले गृह युद्ध में घरों के सारे अस्तबल खाली हो गए। उनकी जगह गन्ने का रस निकालने वाले कोल्हू आ गए; दूध की डेरियाँ आईं और चावल की मिलें खड़ी हो गईं।

अपनी वसीयत में गिनाईं तमाम चीजों के अलावा मामा ने तीन सोने के घड़ों का जिक्र किया जो आजादी की लड़ाई के दौरान घर में ही जमींदोज हुए थे। कई सालों की खुदाई के बाद भी इनका पता नहीं चला। किराए की सारी जमीन भी खोद डाली गई; जमीनों की उपज का दसवाँ भाग भी मिलता रहा; बाग-बगीचों से फल भी मिलते रहे; बड़े -बड़े दान भी मिले; आने वाली हर पीढ़ी ने सारा कच्चा चिटठा सहेज कर भी रखा, लेकिन दबे खजाने का कहीं पता नहीं चला।

अपनी चल-अचल संपत्ति को बताने में बड़ी अम्मा को तीन घंटे लगे। जैसे-जैसे वह ब्यौरा देती जाती, उसकी गरिमा का पता लोगों को मिलता जाता।

जब दस्तखत करने के लिए उसने काँपते हाथ कागज पर रखे और उसके दस्तखत के नीचे गवाह अपनी सही देने को उद्यत हुए, राजभरा जलजला भीड़ के दिलों को थर्रा गया। भीड़ जो नगर चौक में सुबह से उमड़ आई थी। भीड़ जो धूल से सने बादाम के पेड़ों के नीचे जमा थी।

अब यदि कुछ बताने से छूट गया था तो वह था न दिखने वाली मामूली दौलत। बड़ी मामा ने वही किया जो उनके पूर्वज करते आए थे।

मामा अपने भारी कूल्हों पर थोड़ा उचकीं और गंभीर, दबंग आवाज में कुछ कहते हुए पुरानी यादों में गुम हो गईं। फिर उन्होंने अपनी अलक्ष्य दौलत के बारे में इतना भर बताया – जमीन के नीचे दबे सारे खनिज उसके हैं। यहाँ-वहाँ बहता हुआ पानी, झंडे का रंग, देश की संप्रभुता, सारे पारंपरिक दल, आदमियों के अधिकार, नागरिकों के अधिकार,देश का नेतृत्व, अपील करने का अधिकार… सब उसके हैं। कांग्रेस की सुनवाइयाँ, सिफारिशी खत, ऐतिहासिक अभिलेख, दस्तावेज, मुक्त चुनाव, रानी सुंदरियाँ, यादगार भाषण, बड़े-बड़े प्रदर्शन… सब उसके हैं। अलग दिखने वाली औरतें, सज्जन पुरुष, अति शिष्टाचारी फौजी, राष्ट्रपति की गरिमा, उच्चतम न्यायालय, सारा सामान जिसके आयात पर रोक लगा दी गई है, उदार स्त्रियाँ, मीट की समस्या, भाषा की शुद्धता, अच्छे उदाहरण की जरूरत, आजाद और जिम्मेदार मीडिया… सब उसके हैं। दक्षिण अमेरिका का एथेंस (बोगोटा), जनता की राय, जम्हूरियत के सवाल,ईसाईयों की नैतिकता, विदेशी मुद्रा का अभाव, पागलखाने के अधिकार, साम्यवाद का आतंक, राज्य रूपी जहाज, जीवन यापन की उच्च लागत, गणतंत्र के तौर-तरीके, राजनैतिक समर्थनों के लिए दिए गए बयान…

वह अपनी बात पूरी न कर सकी। इतनी मेहनत से दिए गए आँकड़ों ने उसकी आखिरी साँस हर ली। अपने परिवार की अर्जित ताकत का प्रमाण देते-देते वह न जाने किस अदृश्य कोलाहल में डूब गई। बडम्मा ने बड़ी हिचकी ली और उनके प्राण पखेरू उड़ गए।

उसी दोपहर को दूरस्थ राजधानी के निवासियों ने एक बाईस साल की नव-यौवना की तस्वीर समाचार पत्र के एक्स्ट्रा एडिशन में देखी। लोगों ने सोचा कि ये कोई रानी-सुंदरी है। इस तरह बड़ी मामा एक बार फिर जिंदा होकर अपने क्षण भंगुर यौवन के साथ चार-चार स्तंभों में दिखाई दे रही थीं और वह भी नए परिष्कृत रूप में।

उनके घने बाल हाथी दाँत की कंघी से करीने से बँधे हुए थे। गले के कॉलर पर मुकुट जैसी कोर थी। गली के किसी फोटोग्राफर ने मोकेंडो से गुजरते हुए यह तस्वीर कभी खींची थी और समाचारपत्र के एक सेक्शन के लिए बतौर अनाम लोगों की सूची में रख छोड़ी थी, जिसे अब इस तरह भावी पीढ़ियों की स्मृतियों में जुड़ जाना था।

तस्वीर कई जगह लगाईं गई थी। खस्ता-हाल बसों में, मंत्रियों के एलिवेटर्स में, उदास उजाड़ पड़े चायघरों में…। लोग इज्जत से तस्वीर की बात कर रहे थे… उसके चिपचिपे मलेरिया ग्रस्त प्रदेश की बात कर रहे थे। मोकेंडो के सिवा जिसे और कोई नहीं जानता था, आज प्रिंट मीडिया ने उसे चंद घंटों में पूज्य बना दिया।

बूँदा-बाँदी होने लगी थी। सुबह और धुंध ने राहियों को ढँक दिया। मृतक के लिए चर्च की घंटियाँ घनघना उठीं।

जब यह समाचार गणतंत्र के राष्ट्रपति के पास पहुँचा तो वह हैरत में पड़ गया। उस समय वह युद्ध मंत्री द्वारा फौज में भर्ती नए केडेट्स को अभ्यास-संबंधी सुझाव दे रहा था। उसने टेलीग्राम के पीछे अपने हाथ से एक नोट लिखा और अपना भाषण खत्म करने के बाद बड़ी अम्मा के सम्मान में एक मिनिट का मौन रखवा दिया।

मामा की मौत ने जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। राष्ट्रपति भी इस प्रभाव से बच न सके हालाँकि उनके पास खबरें छन-छन कर ही पहुँच रही थीं। लेकिन शहर में व्याप्त भयाकुलता को वह भाँप गए थे। सब बंद था सिवा इक्का-दुक्का मामूली कॉफीघरों के। महानगर के प्रधान गिरजाघर में नौ दिन तक फ्यूनरल की रस्में होनी थीं।

राष्ट्रीय संसद भवन के डोरिक स्टाइल से बने खंबों के नीचे, जहाँ भिखारी समाचारपत्र ओढ़ कर सोए रहते थे और जहाँ मृतक राष्ट्रपतियों की प्रतिमाएँ शोभायमान थीं – वह भी आज रोशनी से नहाया हुआ था।

राष्ट्रपति जब अपने ऑफिस पहुँचे तो शोक का दृश्य देख द्रवित हो उठे। मंत्रियों ने फ्यूनरल गार्ब (पोशाक) पहन रखा था। उनके चेहरे संगीन थे और वे सब खड़े हुए थे। वे सब राष्ट्रपति का इंतजार कर रहे थे। उस रात को होने वाली वारदातें ऐतिहासिक पाठ थीं।

केवल इसलिए नहीं कि इन घटनाओं ने ईसाइयत मिजाज और जन शक्ति के महान ऊँचे लोगों को आंदोलित किया था, बल्कि इसलिए भी कि बडम्मा जैसे काबिल-ए-शोहरत इंसान को दफनाने की बात पर अलग-अलग दिलचस्पियाँ और नफे खुलकर सामने आ गए थे। बडम्मा ने लंबे समय तक अपनी सल्तनत को सामाजिक और सियासती हलचलों से महफूज रखा। इसका गुप्त राज जाली इलेक्टोरल सर्टिफिक्टेस थे जो तीन ट्रंक भरकर उनकी रियासत से मिले। उनके नौकरों, आश्रितों, किरायेदारों, छोटों-बड़ों सभी को अपने वोट के साथ सदियों से मरे लोगों के वोट डालने का भी अधिकार था।

उसने अपने परंपरागत पूर्वाधिकारों का इस्तेमाल नाशवान ताकतों पर किया, वर्ग-शक्ति का प्रयोग जन-सामान्य पर किया, ज्ञानातीत दैवी ताकतों को मानव-सुधार पर लगा दिया। चैनों-अमन के दिनों में उसने पादरियों की केनोरीज (जो उनके वित्त को देखती है) के प्रस्तावों को मंजूर-नामंजूर किया, उनकी पद-वृद्धि को अपने हाथ में रखा, आराम की नौकरियों पर नियंत्रण रखा और अपने दोस्तों के हितों पर आँख रखी। जरूरत पड़ने पर उसने चोरी-छुपे चालबाजियों को भी पनाह दी, जीत हासिल करने के लिए चुनाव की धोखेबाजियों को निभाया। मुसीबतों के दिनों में बड़ी मामा साथी-गुटों के लिए गुप्त रूप से हथियार जुटातीं पर जनता के सामने पीड़ित के साथ खड़ी दीखतीं।

वतन परस्ती की पुरजोशियों के सारे सम्मान उसी से जामिन होते। गणतंत्र के राष्ट्रपति को अपने सलाहकारों से राय न लेनी पड़ती।

महल के पिछले हिस्से में एक पोर्त्त कौशेर (घरों के पिछवाड़े में बना पोर्टिको के साथ का द्वार) था, जहाँ से वॉयसराय भीतर आते थे; वहीं उससे लगा सनौवर के पेड़ों का एक घना बगीचा था। यहाँ एक पुर्तगाली साधु ने प्यार में पड़कर आत्महत्या कर ली थी। ऐसा उपनिवेश के अंतिम दिनों में हुआ। तमाम पदकों से विभूषित बहुत से अफसरों के होते हुए भी राष्ट्रपति को उस दिन छोटे-से हुल्लड़ का अंदेशा तक नहीं हुआ था और न ही वह उसे रोक पाया था।

पर उस रात उसे पूर्वाभास होने लगे थे। उसे अपने भाग्योदय का आगा-पीछा सब याद हो आया। उसने बड़ी मामा की मौत पर नौ दिन के शोक की घोषणा की। उसने बड़ी मामा को वीरता का मरणोपरांत पुरस्कार दिया जो इस वीरांगना के लिए उपयुक्त था।

उस दिन सवेरे-सवेरे रेडियो और टेलीविजन पर हमवतनों के नाम राष्ट्रपति का नाटकीय प्रबोधन और संदेश प्रसारित हुआ। देश के नेताओं ने भरोसा दिलाया कि बडम्मा का फ्यूनरल और उसके संस्कार दुनिया के सामने नई मिसाल कायम करेंगे।

इतने महान काम में कुछ गंभीर अड़चनें तो आनी थीं। न्याय व्यवस्था बड़ी मामा के पूर्वजों की उपज थी। उसमें इस तरह की आकस्मिक घटनाओं का निदान न था। न्याय के बुद्धिमान पंडित, न्याय की मूर्तियों के प्रमाणित कीमियागर तरह-तरह की व्याख्याओं और न्याय की राह निकलने में डूब गए। वे ऐसी तरकीब निकाल लेना चाहते थे कि जिससे देश का राष्ट्रपति भी फ्यूनरल में शामिल हो सके।

बड़ी संकट की घड़ियाँ थीं ये। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों, पुरोहितों, वित्तदाताओं की जान साँसत में थी।

एक भव्य अर्धचन्द्राकार महासभा में; जो किसी अमूर्त कानून के तहत खास वर्ग के लिए आरक्षित थी, जहाँ देश के नायकों-महा नायकों की ऑइल पेंटिंग्स लगी थीं; जहाँ ग्रीक अमर विचारकों की आवक्ष मूर्तियाँ थीं… बड़ी मामा का जनाजा पहुँचा। मोकेंडो के कड़ियल सितंबर ने मामा की देह को बुलबुला बना दिया था।

लोग पहली बार मामा को बिना रैटन कुर्सी के देख रहे थे। ये पहली दोपहर थी जब लोगों ने मामा की आँखों को भावशून्य पाया। उसके शरीर पर सरसों का पुलटिस नहीं था। लोगों ने देखा कि मामा चिरनूतन हो गई थी। लोगों ने देखा कि मामा खूब उजली हो गई थी – जैसे किसी कहानी से चुलाकर किसी ने उसे निकाला हो।

कभी न खत्म होने वाला वक्त आवाजों से भरता गया, शब्दों से भरता गया, आवाजें गणतंत्र में गूँजती रहीं… छापे की दुनिया ने प्रवक्तओं को मशहूर बना दिया।

कीटाणु रहित, कानून बनाने वालों की सभा को अचानक ये ख्याल आया कि बड़ी मामा की पार्थिव देह उनके निर्णय का इंतजार करते हुए ४५ डिग्री की छाया में पड़ी है। और तब जाकर यह ऐतिहासिक बवाल बंद हुआ।

पूरा वातावरण लिखित कानूनमय था। कोई इस पर असहमति दर्ज नहीं कर सकता था। फिर आदेश तैयार हुआ कि मामा के शव का लेप किया जाये।

जबकि नए नियमों को जोड़ा जाना था, विवादों पर सहमतियाँ होनी थीं और नया संशोधन किया जाना था कि राष्ट्रपति फ्यूनरल में शामिल होकर मामा को कैसे मिट्टी दे सके।

बहुत कुछ कहा जा चुका था। बहस हद पार कर चुकी थी। समुद्र लाँघ चुकी थी और किसी पूर्व सूचना की तरह तेजी से बहती हुई कैस्टल गॉन्दोल्फो में पोप के निवास स्थान तक पहुँच गई थी।

मुख्य पुजारी खिड़की से बाहर झील की तरफ देख रहा था। वह अगस्त की सुस्ती से बाहर निकलकर आया था। झील में गोताखोर एक लड़की का सिर ढूँढ़ रहे थे। कुछ सप्ताहों से शाम के अखबारों में कुछ खास पढ़ने को नहीं होता था। पर उस शाम मुख्य पुजारी ने अखबार में एक तस्वीर देखी। यह बाईस साल की युवती की तस्वीर थी। “बड़ी मामा…” पुजारी चौंक कर तस्वीर देखता रहा। वह धुँधली डैगेरोटाइप तस्वीर को देखते ही पहचान गया। कई साल पहले उसे ये तस्वीर तब भेंट में मिली थी जब संत पीटर के बाद वह गद्दी पर बैठा था।

मुख्य पुजारी के साथ बाकी पुजारियों का दल भी चिल्ला उठा… “बड़ी मामा।” और इस तरह तीसरी बार, बीसवीं शताब्दी में ईसाइयत की सल्तनत घंटों तक व्याकुलता, खीज और हैरानी में डूबी रही। ये हड़बड़ी तब दूर हुई जब मुख्य पुजारी अपनी काली लिमोजीन में बैठकर बडम्मा के शानदार फ्यूनरल को निकल पड़ा।

आडुओं के उजले बागान पीछे छूटते गए, एपियन के रास्तों पर फिल्मी सितारे धूप सेंक रहे थे जो हर तरह के शोरगुल से बेखबर थे और संत एन्जिल का कैसल टाइबर नदी के मुहाने पर फीका-उदास था। झुटपुटा होने पर संत पीटर के चर्च और मोकेंडो की घंटियों की आवाजें घुलमिल गईं। उसके दमघोंटू तंबू के उस पार आपस में उलझे सरकंडों की झाड़ियाँ थीं, सन्नाटे में खोई दलदल थी जो रोम के साम्राज्य और बड़ी मामा के खेतों के बीच सरहद बना रही थी।

रात का सफर था। रात भर बड़ा पुजारी बंदरों की आवाज सुनता रहा जो आने-जाने वालों से नाराज होकर चिल्ला रहे थे।

वह डोंगी में बैठ गया। डोंगी सामान और लोगों से ठसाठस थी। डोंगी में याकु की बोरियाँ लदी थीं, केलों के गुच्छे थे, मुर्गों के क्रेट्स थे और आदमी-औरत।। जो मामा की अंत्येष्टि पर अपना भाग्य आजमाने निकले थे।

रतजगे और मच्छरों के आतंक से चर्च के इतिहास में पहली बार किसी बड़े पुजारी की पवित्रता नष्ट हुई थी। लेकिन उस महान औरत के देश की शानदार सुबह ने, उसके आदिम दृश्यों ने, सेब के बगीचों, इगुआना की आवजों ने सफर के दर्द और तकलीफों को दूर कर दिया था।

दरवाजे पर दस्तक की आवाज ने निकानू को उठा दिया। ये पवित्र दस्तक की आवाज थी जो पवित्र पुजारी के पहुँचने का पवित्र संदेश थी।

मृत्यु ने घर पर कब्जा कर लिया था।

बड़ी मामा का सुरक्षित शव मुख्य-भवन में रखा था। काँपते टेलीग्राम्स के ढेरों को ताकता शव। निर्णय की उम्मीद में इंतजार करता शव। राष्ट्रपति के एक के बाद एक दिए संबोधनों से प्रेरित, विवादों से कुंठित, लोग और सभाओं के बीच घिरा… और जिनके आने से अँधेरे गलियारे भी भर गए। रास्तों पर जाम लग गया। अटारियों पर साँस लेने की जगह नहीं बची; और जो थोड़ा देरी से आए वे चर्च के पास की दीवारों पर चढ़े, कटहरे पर चढ़े, शातिरों पर जा बैठ गए, मुँडेरों पर चढ़े… जहाँ जगह मिली वहाँ चढ़ गए।

शव की रखवाली उनके नौ भतीजे बारी-बारी से करते रहे। रो-रो कर वे आधे रह गए थे।

और अभी भी इंतजार की घड़ियाँ खत्म नहीं हुई थीं। शहर के परिषद सदन में चार चमड़े के स्टूल रखे गए। एक साफ पानी का कलश रखा गया। एक खटोला रखा गया। बड़ा पुजारी अनिद्रा से परेशान था। रात-रात भर वह सरकारी हुक्मनामे पढता। दिन में बच्चों को इटली की कैंडी खिलाता। दोपहर कभी ईसाबेल के साथ तो कभी निकानू के साथ खाना खाता। इस तरह उसे कई दिनों तक वहाँ रहना पड़ा – गर्मी और इंतजार ने इन्हें और लंबा कर दिया।

प्रतीक्षा का समय खत्म हुआ। पादरी पास्त्राना अपने ढोलची को लेकर नगर-चौक पहुँच गए थे। उन्होंने फरमान पढ़ने का ऐलान किया। डुगडुगी बजी… रैटटैट रैट टैट… कि फरमान की प्रतियाँ लोगों के बीच बाँटी जाएँगी… रैटटैट रैट और गणतंत्र के राष्टपति… रैटटैट रैट… जिनके पास विशेषाधिकार हैं… रैटटैट, वही बताएँगे कि बडम्मा के फ्यूनरल में कौन शामिल होगा, रैटटैट टैटएट टैटएट टैटएट…

वह शानदार, अजीम दिन आ गया। गलियाँ छकड़ों, खोमचेवालों, लॉटरी स्टॉल्स से खचाखच भर गईं। वहाँ सपेरे गले में साँप लटकाए घूमते नजर आए। उनके पास एक खास मलहम था जिससे विसर्प (ऐरीसिफलस) दोष जीवनभर के लिए दूर हो जाता था।

इस तरह छोटे से चौक में लोगों ने अपने तंबू गाड़ लिए और चटाइयाँ बिछा लीं। फुर्तीले तीरंदाज अफसरों के लिए रास्ता खाली करवा रहे थे।

सब मिलकर उस घड़ी का इंतजार कर रहे थे… सान जॉर्ज से धोबिन चली आई थी, मोतियों का मछुआरा एनगा से आया था, झींगा लेकर कोई तसाजेरा से आया; एक ओझा मोजजाना का था। नमक बनाने वाले मनाउरे से थे। वालेदुपार से अकॉर्डियन बजाने वाले आए। अयापेर के घुड़सवार, सैन पैलायो के नुक्कड़ गीतकार, ला क्यूवा से मुर्गे पालने वाले, सबाना डी बोलिवर से अच्छे प्रबंधक, रेबोलो के बांके, मैग्डलीन के माझी, मोनपॉक्स के बदमाश… और भी कई लोग वहाँ इकट्ठे हुए।

यहाँ तक कि कर्नल ऑर्लिनो के सेवा-निवृत सिपाही, मर्लबर्ग का ड्यूक जो सिर पर शेर की खाल, नाखूनों और दाँतों का ताज पहनता था, बड़ी मामा से सौ साल पुरानी नफरत भूलकर वहाँ आया था। ये लोग राष्ट्रपति को अपनी पैंशन याद दिलाना चाहते थे जिसे देश साठ साल से भूले बैठा था।

ग्यारह बजने को थे। पसीने से नहाई उन्मादी भीड़ को कुलीन लोगों के सिपाहियों ने रोक दिया। वे सुंदर जैकेट्स पहने हुए थे। सिर पर मजबूत लोहे का टोप था। वे तेज आवाजों में जयजयकार कर रहे थे। तभी टेलीग्राफ ऑफिस के पास कोट और टोपी पहने सम्मानित और गौरवशाली लोगों का हुजूम इकठ्ठा होने लगा। राष्ट्रपति के साथ उनके मंत्री थे, संसद के डेलीगेट्स, पूरा उच्चतम न्यायालय, राज सभा, सारे दल, पादरी लोग, बैंक के नुमाइंदे और भी बड़े लोग वहाँ थे।

गंजे, थुलथुले और बीमार राष्ट्रपति को हैरतअंगेज भीड़ परेड करते देख रही थी। इससे पहले उन्होंने उसे समारोहों का उद्घाटन करते ही देखा था। वे लोग तो ये भी नहीं जानते थे कि वह है कौन, लेकिन आज वे उसकी असलियत देख रहे थे।

पादरियों, मंत्रियों, चमकते सितारे और तमगों वाले फौजियों के बीच वह दुबला-पतला – कमजोर, देश का सबसे बड़ा नेता, ताकत का पुतला लग रहा था।

दूसरी कतार में क्रेप का शांत, शोक वस्त्र मुँह पर डाले देश की सुंदरियाँ परेड कर रही थीं। पहली बार वे दुनियावी चीजों का त्याग करके परेड को निकली थीं। सबसे आगे विश्व सुंदरी थी। उसके बाद सोयाबीन रानी थी। फिर ककड़ी रानी, केला रानी, याकू रानी, अमरूद रानी, नारियल रानी, सेम-फली रानी, इगुआना के अंडों की रानी… जो इस दिन को यादगार बनाने लायक नहीं थीं, बस वे ही छूटी थीं।

बडम्मा को बैंगनी कपड़ों में लपेटा गया था। दुनिया की सच्चाई से बचाने के लिए उन्हें आठ तांबे के टर्नबकल्स से बाँधा गया था। बड़ी मामा फॉर्मीलीडाइड-अमरता में डूबी अपनी शान-शौकत के कद को नाप-तौल रही थीं।

जिस वैभव के सपने वह अपनी बालकनी से दिन-रात जागते हुए देखती थी, वह इन ४८ घंटों के आनंदमयी पलों में पूरा हो गया। हर उम्र ने उसकी याद में श्रद्धांजलि दी थी।

एक समय था जब बेसुधी में वह अक्सर मुख्य पुजारी की कल्पनाओं में खोई रहती, वेटिकन के बगीचों पर तैरती और सोचा करती कि वह जो अपनी शानदार बग्घी में बैठकर सारे वेटिकन के बगीचों में घूमता है, जिसने गर्मी को ताड़ के पत्तों से बने पंखे से जीत लिया है, जो दुनिया की परम पदवी पर सुशोभित है… आज उसके फ्यूनरल में था।

ताकत के जलवों से चकाचौंध लोग बहुत कुछ नहीं देख पा रहे थे। उन्होंने घर की छत के नीचे की हलचल और लोलुपता को नहीं देखा। वे नहीं देख पाए कि शहर के महा-महिम खुली शव-गाड़ी को गली में ले जाने से पहले किस तरह के मोल-तोल कर रहे थे। किसी ने मोकेंडो की तपती गलियों में शव गाड़ी पर गिद्धों की उड़ती परछाईं को नहीं देखा। कोई यह नहीं देख पा रहा था कि आने वाले बड़े-बड़े लोग कैसे गलियों में रोग फैलाने वाला कचरा छोड़ गए थे। किसी का ध्यान भतीजों, भगवत-संतानों, नौकरों, बडम्मा के आश्रितों पर नहीं गया कि कैसे अंतिम संस्कार के बाद घर के दरवाजे, फट्टों की कीलें उखाड़ दी गईं और नींव का बँटवारा हो गया।

और जो सबने देखा – महसूस किया वह था – अंत्येष्टि का शोरगुल जिसमें राहत भरी साँसें नुमायाँ थीं। चौदह दिन की दुआओं, जोशीले भाषणों के बाद उन्हें चैन मिला था। उन्हें उस दिन तसल्ली मिली जिस दिन सीसे की नींव पर टिकी कब्र का मुँह बंद कर दिया गया।

और वहाँ खड़े लोगों में से कुछ ही इस बात को ठीक से जान रहे थे कि वे नए युग को जन्मते देख रहे हैं।

अब सबसे बड़े पुजारी की आत्मा और देह स्वर्ग की तरफ ऊपर उठ रहे थे, जमीन पर उसकी मुहिम पूरी हुई।

अब गणतंत्र का राष्ट्रपति आराम से बैठकर शासन कर सकता था। अपने फैसले खुद कर सकता था।

अब रानियाँ खुद अपनी मर्जी से शादियाँ कर सकती थीं। बहुत से बच्चे पैदा कर सकती थीं।

अब प्रजा बेखौफ कहीं भी अपने तंबू गाड़ सकती थी। उनके पास अपार जमीन थी। क्योंकि उन्हें कुचलने वाली बडम्मा अब सीसे की कब्र में दफन थी।

अब एक ही चीज छूट गई थी कि कोई वहाँ आए। अपना स्टूल वहाँ डाले और चौखट से टिककर बड़ी मामा की कहानी अपनी संततियों को सुनाए।

कि दुनिया के तमाम लामजहब लोग इस कहानी को जान लें।

कि जान लें, ‘आने वाला कल बुधवार है।’

कि जान लें जमीन से कचरा बुहारने वाला कोई आएगा और अंत्येष्टि के बाद यहाँ कचरा न होगा। कचरा न होगा।

जे.एस. बर्नस्टीन ने १९६८ में इस कहानी का अनुवाद अंग्रेजी में किया था। यह अनुवाद उसी पर आधारित है।

समालोचन (http://samalochan।blogspot।in/) से साभार

Posted 6th December 2016 by prabhat Ranjan

Labels: aparna manoj gabriel garcia marquez अपर्णा मनोज गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़

 
      

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