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पंकज दुबे की कहानी ‘किमची’ दिव्या विजय के हिंदी अनुवाद में

पंकज दुबे अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में समान रूप से दक्ष लेखक हैं लेकिन कोरिया की पृष्ठभूमि की यह कहानी उन्होंने अंग्रेजी में लिखी थी, जिसका अनुवाद लेखिका दिव्या विजय ने किया है. कहानी और अनुवाद दोनों का आनंद लीजिये- मॉडरेटर

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किम्ची

उसने अपने नाम से कभी जुड़ाव महसूस नहीं किया. उसके कुछ दोस्त उसे चिढ़ाते और कुछ उसे किम कहते. वो एक बिन माँ के परिवार में बड़ी हुई थी. उसके पिता ही उसके बालों की चोटी गूंथते. वो बेहद खूबसूरत थी और उसके बाल प्राकृतिक रूप से सीधे थे. नई दिल्ली के ईस्ट ऑफ़ कैलाश में बसे उसके परिवार में मात्र दो व्यक्ति थे जो रक्त सम्बन्धी थे, पिता और उनकी प्रिय पुत्री, किम्ची. तीसरा प्राणी रक्त संबंधी तो नहीं था परन्तु अत्यधिक निष्ठावान मित्र था. उनका पालतू कुत्ता जिसका नाम दोस्त था. दोस्त, उस नस्ल का कुत्ता था जिसे भारत में सबसे नीचा माना जाता है. यह परित्यक्त नस्ल अनुमानतः चौदह हज़ार सालों अथवा उस से भी अधिक समय से देखी जाती रही है. यह दिल्ली में सबसे अधिक दिखाई देने वाले आवारा कुत्तों में से एक नस्ल थी.

“अब मैं सत्रह साल और नौ महीने की हूँ. आपको अपना वादा पूरा करना होगा.” किम्ची ने शोर मचाते हुए घर में प्रवेश किया.

“सब्र रखो. हमारे पास अब भी तीन महीने शेष हैं.” उसके प्यारे पिता के पास तैयार जवाब था.

एक पंक्ति के इस उत्तर को वह हमेशा नापसंद करती थी पर उसके पास कोई विकल्प नहीं था. वह उनके हाथ की सुन्दर लिखाई को बहुत पसंद करती थी. मिस्टर अबीर आनंद को हरे रंग की स्याही वाले फाउंटेन पेन से लिखने की आदत थी. यह थोडा विचित्र था पर उन्हें यह काफी रुचिकर लगता था. उसके पिता अपनी सुन्दर कर्सिव लिखाई को हरी स्याही वाले फाउंटेन पेन से लिखते थे, किम्ची को अपने बचपन से यह बहुत अनोखा लगता था. यह एक अनूठी बात थी जबकि अधिकतर लोग लैपटॉप के कीबोर्ड्स को तरजीह देते थे.

दरअसल उनके बीच यह करार था कि अट्ठारह साल की होने से पहले किम्ची कभी अपनी माँ के बारे में बात नहीं करेगी और इसके बदले किम्ची को एक ही छत के नीचे आवारा कुत्ता रखने की अनुमति थी. किम्ची के पिता मिस्टर अबीर आनंद अनुभवी व्यापारी थे. उनकी एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी थी. वो पालतू जानवरों के खिलाफ नहीं थे पर उन्हें हमेशा से ऊंची नस्ल के कुत्ते पसंद थे. वो सदा से उन्हें चाहते थे, सड़क पर फिरने वाले कुत्ते के पक्ष में वह कभी नहीं थे.

किम्ची ने इस सारे अरसे में अट्ठारह बरस की होने का और अपनी माँ की बाबत जानने का इंतज़ार किया था. इसमें कुछ ही महीने बाकी थे. यह अटपटा था पर सच था कि एक सफ़ल इवेंट मैनेजमेंट कंपनी संचालित करने के बावजूद उनकी पारिवारिक घटनाओं का कोई दस्तावेज़ी इतिहास नहीं था. किम्ची के पास अपनी माँ की मात्र एक तस्वीर थी. वह किसी फोटो स्टूडियो में खिंचवाई गयी तस्वीर-सी थी जिसे लोग अक्सर वैवाहिक वेबसाइट पर पोस्ट करते हैं. तस्वीर में किम्ची की माँ किसी उत्तर-पूर्वी राज्य की स्त्री लगतीं थीं. घर भर में किम्ची के माता-पिता के विवाह की तस्वीरों का कोई चिह्न नहीं था.

चूँकि होनी को कुछ और ही मंज़ूर था, किम्ची के पिता अबीर आनंद का भयानक कार एक्सीडेंट हो गया. अस्पताल में उन्हें डॉक्टर्स द्वारा मृत घोषित कर दिया गया. किम्ची को अपने पिता की मृत्यु से इतना सदमा पहुंचा कि वो कोई प्रतिक्रिया तक व्यक्त न कर पायी. दोस्त उस व्यक्ति की मृत्यु पर सबसे अधिक विलाप करने वाला इकलौता प्राणी था जिसे कभी आवारा कुत्ते पसंद नहीं आये.

कुछ दिन यूँ ही बीत गए. किम्ची अब भी शोकार्त्त थी जब उसके पास उनके पारिवारिक वकील अशनी पाराशर का फोन आया. वो किम्ची से उसके पिता के वसीयतनामे के सिलसिले में मिलना चाहते थे.

अपने पिता के वसीयतनामे से गुजरने के बाद उसकी ज़िन्दगी क्या रफ़्तार लेने वाली थी किम्ची को इसका अंदाजा नहीं था. वक़्त गुज़रा और अगला दिन आ पहुँचा. दिन शुरू होते ही दरवाज़े की घंटी बजी. जैसा कि अपेक्षित था,सारे कानूनी दस्तावेजों के पुलिंदे के साथ वकील अशनी पाराशर थे. स्वाभाविक रूप से पिता की सारी संपत्ति किम्ची की थी. वसीयत में भी यही लिखा था पर उसमें किम्ची को ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी. वसीयत के समाप्ति पर मौजूद उपलेख का आखिरी पॉइंट किम्ची के लिए अत्याधिक कुतूहल उत्पन्न करने वाला अंश साबित हुआ. वह पुत्री को पिता द्वारा लिखा गया आखिरी ख़त था जो उनके हरी स्याही वाले फाउंटेन पेन से उन्हीं की खूबसूरत कर्सिव लिखाई में लिखा गया था. ख़त देखते ही किम्ची की आँखें भर आयीं. किम्ची ने ख़त पढना शुरू किया,

प्रिय किम्ची,

मैं जानता हूँ घर में बिना स्त्री के बड़ा होना तुम्हारे लिए अत्यंत मुश्किल रहा होगा. मैंने कभी तुम्हारे मन को उस दिशा में नहीं भटकने दिया और तय किया कि 18 वर्ष के होने पर तुम्हें तुम्हारी माँ के बारे में सब बता दूंगा. तुम सोचती हो कि ऐसा क्यों? किसी के साथ इस से विचित्र क्या होगा! पर जैसा कि तुम जानती हो यह जीवन एक अप्रत्याशित यात्रा है और इसमें कोई भी अनपेक्षित स्थिति आ सकती है. यह ख़त और वसीयत इसी उद्देश्य से है कि अगर तुम्हारे 18 वर्ष के होने से पूर्व मुझे कुछ हो जाता है तो तुम मेरे लॉकर को खोलने के लिए स्वतंत्र हो. उसमें मौजूद स्क्रैपबुक जिसमें तुम्हारे सभी जवाब हैं, को पाने की तुम अधिकारी होगी. स्क्रैपबुक मेरी अलमारी के छोटे लाकर में है.

तुम्हें बहुत सारा प्यार मेरी मिश्री की डली

ईश्वर तुम पर सदा कृपा बनाये रखे

पापा

(मिस्टर अबीर आनंद)

किम्ची यह सब पढ़कर विस्मित थी. वह तुरंत अपने पिता के कमरे की ओर भागी जहाँ उनकी अलमारी रखी थी. वह सब जगह चाबी ढूँढने लगी और चाबी मिलने पर चैन की साँस ली. जब उसे स्क्रैपबुक मिली तो उसके आनंद की सीमा नहीं थी. स्क्रैपबुक में तीन स्केच  थे. पहले स्केच में नैसर्गिक सौंदर्य स्थल था…एक गाँव, खेत में काम करते कुछ किसान,एक सुन्दर नदी और उसके किनारे कुछ गौएँ. नदी के दूसरी ओर एक बुलंद और मज़बूत इमारत थी और कुछ सशस्त्र सैनिक भी दिखाई दे रहे थे.

दूसरा स्केच पहले वाले से असाधारण रूप से अलग था. उसमें सलाद का एक बड़ा कटोरा था. किम्ची स्क्रैप बुक पलट रही थी. अगला पन्ना पलटते ही  उसकी आँखें भीग आयीं जब उसने  अपनी माँ की युवावस्था का स्केच देखा जो उस तस्वीर से काफी साम्य रखता था जो उसके पास थी. किम्ची ये बेतरतीब स्केच देख व्याकुल हो रही थी. उसकी मनःस्थिति ऐसी नहीं थी कि वो इन स्केच का अर्थ बूझ सके. उसने अपने मन को शांत किया और एक-एक कर फिर से तीनों स्केच देखे. लेकिन इनमें छिपे संकेतों को वो नहीं पकड़ पायी. वकील को रुखसत कर किम्ची स्क्रैप-बुक लेकर अपने कमरे में आ गयी.

उसके लिए यह सब संभालना मुश्किल था. किम्ची के कमरे का लैंप अब भी जल रहा था. अब उसका एकमात्र सरंक्षक दोस्त था. किम्ची के कमरे की बत्ती बुझने तक वह नहीं सोता था. किम्ची की यह रात जागते हुए गुजरने वाली थी.

अचानक, किम्ची के मन में कुछ कौंधा. वो उठी और अपनी टेबल से स्क्रैप-बुक ले आई. उसने पन्ने पलटने शुरू किये और स्क्रैप-बुक के हर पन्ने के ऊपरी दायें कोने पर बने गहरे लाल-नीले रंग के चिन्ह पर उसकी नज़रें टिक गयीं. उसने अपना लैपटॉप खोला और गूगल करना शुरू किया. सारी रात ढूँढने के बाद उसे मालूम हुआ कि वह चिह्न साउथ कोरिया के राष्ट्रीय झंडे से मिलता-जुलता है. उसे अनुभूति हुई कि उसकी माँ का साउथ कोरिया से कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य है. किम्ची दक्षिण कोरिया, उसकी राजधानी सीओल, बंदरगाह वाले शहर बुसान, वहां के लोगों, त्योहार, संगीत, व्यंजन और विभिन्न सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में शोध करती रही. उसे अचानक अहसास हुआ कि स्क्रैप-बुक में मौजूद सलाद का स्केच असल में किम्ची है. किम्ची कोरिया की खमीर उठा कर बनायी गयी पारंपरिक सलाद है. यह सब्जियों और अनेक प्रकार के मसालों के मेल से बनायी जाती है. परंपरागत रूप से गर्मी के महीनों में किम्ची को ठंडा रखने के लिए और सर्दी में जमने से बचाए रखने के लिए  इसे ज़मीन के नीचे मर्तबान में भर कर संग्रहित किया जाता था. किम्ची की सैकड़ों किस्में पत्ता गोभी, मूली और खीरे को मुख्य घटक के रूप में इस्तेमाल कर बनायीं जाती हैं. अब तक किम्ची को पुख्ता यकीन हो चला था कि उसकी माँ का निश्चित ही साउथ कोरिया से कुछ सम्बन्ध है.

किम्ची ने तय किया कि ‘लैंड ऑफ़ मॉर्निंग काल्म’ कहे जाने वाले दक्षिण कोरिया के भ्रमण के लिए जायेगी और उसने अपनी माँ की तस्वीर और स्क्रैप-बुक के साथ अपना बैग पैक करना शुरू कर दिया. उसने अपने ट्रेवल एजेंट को फोन किया और यह तय किया गया कि जैसे ही उसका वीसा और टिकट जारी हो जायेंगे वह व्यक्तिगत परियोजना के तहत साउथ कोरिया की राजधानी सीओल के भ्रमण के लिए निकल पड़ेगी.

अंततः वह दिन आ गया और किम्ची सीओल के छोर पर बने इंचन हवाई अड्डे के लिए उड़ चली. अपने मित्रों के साथ घूमने के अनुभव किम्ची को थे पर यह यात्रा विशेष थी. इस यात्रा का सम्बन्ध उसकी माँ से था जिनके साथ की कोई स्मृति किम्ची के पास नहीं थी. उसको यह तक ज्ञात नहीं था कि वो जीवित हैं अथवा नहीं. अपनी माँ से मिलने की आशा और उनका प्रेम पाने की लालसा लिए किम्ची अपने लक्ष्य की ओर उड़ चली.

हवाई उड़ान में उसकी नींद अस्त-व्यस्त रही. नींद में वह अकेली नहीं थी. आकाश और बादलों की यात्रा के बीच उसकी माँ, स्क्रैप-बुक, पापा का एक्सीडेंट, पालतू कुत्ता दोस्त, सब उसके ख्वाबों में विचरते रहे. इंचन ने बहुत ही गर्मजोशी से उसका स्वागत किया. हवाई-अड्डे पर जिस तरह उसका सत्कार किया गया उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था. अपने अगले क़दम को सोचने के लिए वह एक कैफ़े में जा बैठी जो उसी के हमउम्र नौजवान लड़के-लड़कियों की चहल-पहल से भरा हुआ था.

“सुनो! तुम्हारा ब्लड ग्रुप कौन-सा है?” एक लड़की ने खीसें निपोरते हुए समूह में बैठे एक लड़के से पूछा. संयोग से किम्ची ने इसे सुन लिया और वो पूरी बातचीत सुनने के लिए उत्सुक हो उठी.

“मैं बी-पोज़िटिव हूँ.” प्रश्न सुन उस बाँके, नये फ़ैशन से सजे-धजे और ख़ूब सारा मेक-अप किये हुए कोरियन युवक ने जवाब दिया. किम्ची ने इस तरह मेक-अप से पुते-पुताये लड़के भारत में कभी नहीं देखे थे. उसने आस-पास नज़र दौड़ाई तो पाया कि कोरियन लड़के ख़ूबसूरत कोरियन लड़कियों के मुक़ाबले ज़्यादा प्रसाधन उपभोगी थे. मेक-अप के अवलोकन से किम्ची छूट भी न पाई थी कि उसने नौजवान छात्र-समूह की ज़ोरदार हँसी सुनी, “बी ग्रुप हमारा टाइप नहीं है. तुम तो भुलक्कड़, ग़ैर-ज़िम्मेदार और आत्म-केंद्रित व्यक्ति हो.”

समझदार किम्ची ने फ़ौरन अंदाज़ा लगा लिया कि कोरिया में ब्लड ग्रुप से किसी के व्यक्तित्व की विशेषताएं निर्धारित की जाती हैं. इस चलन के प्रति उसकी बहुत ही मिश्रित प्रतिक्रिया थी. वह अपने विचारों में डूबी हुई थी कि तभी स्थानीय ट्रैवल-एजेंट का फ़ोन आया जिसने सिओल में उसके घूमने-फिरने का इंतज़ाम कर दिया था.

किम्ची के ठहरने की व्यवस्था इंसाडॉंग नामक क्षेत्र में की गयी थी. इंसाडॉंग और सैमचॉंग-डॉंग में जोसियन राजवंश के दौरान संभ्रांत और अभिजात्य परिवार रहा करते थे. अतः ये दोनों क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से तो समृद्ध थे ही साथ ही कोरियन पारंपरिक घरों, कोरियन कला दीर्घाओं, रेस्त्राँओं, चायघरों, फ़ैशन शॉप्स, सुंदरतम स्थानों और शिल्प प्रदर्शन-स्थलों का सुरुचिपूर्ण मेल थे.

किम्ची उन्हीं में से एक बुटीक में ठहर गयी जो कि मिस्टर मिन-जुन की देख-रेख में था. हालाँकि मिन-जुन एक अस्सी वर्ष के व्यक्ति थे परंतु फिर भी काफ़ी चुस्त-दुरुस्त, फुर्तीले और असंभव रूप से एक सौम्य नौजवान-से लगते थे. किम्ची को उनका सुबह-सवेरे और सई साँझ मिलने वाला अभिवादन प्रिय लगा. उसने शहर और साउथ कोरिया की संस्कृति में जज़्ब होना शुरू कर दिया. शुरूआत में उसे सिओल की हर युवा स्त्री अपने माँ की तस्वीर जैसी लगती थी परंतु जब उसने बेखयाली से बाहर निकल सोचा तो उसे अपनी मूर्खता पर हँसी आई. वह व्यापक क्षेत्र में फैली विभिन्न गलियों, सांस्कृतिक केंद्रों और बाह्यांचल में बसे छोटे शहरों में घूमी परंतु उसने पाया कि उसके सभी प्रयास निष्फल थे. अपनी माँ के सिओल में होने के किसी भी संकेत को पाने में वह विफल रही.

धीरे-धीरे निराशा की एक अप्रिय लकीर उसके दिमाग़ में पसरने लगी जो कि उसके सुंदर चेहरे पर भी नुमायाँ थी. तदनंतर उसे दिल्ली में छोड़ आए अपने सबसे नज़दीकी मित्र ‘दोस्त’ की याद आने लगी. उसने अपने स्थानीय एजेंट को फ़ोन किया और वापसी की टिकट बुक करवाने की बाबत बात की.

उसके पश्चात् वह कुछ दिनों तक अपने आवास से बाहर नहीं निकली. वृद्ध और सौम्य रखवाले ने यह देख किम्ची से उसकी कुशल-क्षेम पूछी. शायद वह भी काफ़ी दिनों से अपनी इस दिमाग़ी तथा दिली हालत के पूछे जाने की चाह में थी. अंततः विह्वल हो उसने सब-कुछ मिन-जुन  को बता दिया.

“कभी भी निराश नहीं होते बेटी. प्रभु की लीला में विश्वास रखो” मिन-जुन ने अपनापे से किम्ची को सांत्वना दी. वह प्राकृतिक शक्तियों का एक उत्साही अनुयायी और पुजारी था.

किम्ची इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए उदासीन थी।

अब जैसे कि तुम पहले से ही सिओल के सभी स्थानों की खोज-बीन कर चुकी हो तथा वापस जाना चाहती हो तो मैं तुम्हें यहाँ रुकने के लिए नहीं कहूँगा. भारत लौट कर अपनी पढ़ाई और काम पर ध्यान दो” उसने मानो मिन-जुन  के स्वर में अपने पिता को ही सुना.

“और इससे पहले कि तुम यहाँ से लौट जाओ, मैं तुम्हें दक्षिण कोरिया के माउंट डोरा पर यहाँ की सबसे विशेष चीज़ दिखाने ले जाऊँगा” मिन-जुन  इस ख़ास चीज़ के बारे में बात करते हुए बहुत ही उत्साहित था. संभवतः वह अपने सभी मेहमानों को डोरासन के ऊपर स्थित इस प्रिय-स्थल पर ले जाता होगा.

किम्ची को पर्वत घूमने का विचार भला जान पड़ा. यह सिओल के बाहर स्थित था. वे एक किराए की कार से कुछ ही घंटों में पर्वत पर पहुँच गये.

वह वहाँ एक वेधशाला देख मुस्कुराई. डोरा वेधशाला, डोरा पर्वत के ऊपर स्थित है जहाँ से विसैन्यीकृत क्षेत्र दिखाई पड़ता है. यह दक्षिण कोरिया का उत्तर के सबसे नज़दीक लगा हिस्सा है. सैलानी दूरबीन द्वारा उत्तर कोरिया राज्य के इस एकांतिक स्थान की विरल झलक देख सकते थे. वे एक गाँव-भर को देख पाते थे.

किम्ची दूरबीन द्वारा इस गाँव को देख विस्मित थी. उसके चेहरे के हाव-भाव बदल गये, दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. उसके साउथ कोरिया में आगमन के बाद यह पहला मौक़ा था जब उसका दिल इस तरह धड़क रहा था. उसने पाया कि असैनिक क्षेत्र में स्थित यह गाँव, उसके पिता की स्क्रैप-बुक में बने चित्र से हू-ब-हू मेल खाता है. वही चित्र जो उसके सपनों में घूमा करता था. बिल्कुल वही गाँव, खेत में काम करते हुए किसान और सुंदर नदी किनारे चरती कुछ गौएँ. वे नदी के दूसरी ओर कॉंक्रीट से बने एक भवन की ऊँची मचान पर खड़े थे जहाँ कुछ सशस्त्र सैनिक भी दिख रहे थे.

“इस गाँव के बारे में कुछ बताइये.” किम्ची ने सीधे ही अपने गाइड मिन-जुन से पूछा.

“यह एक शांति गाँव है. एक प्रतीकात्मक गाँव, यह दिखाने के लिए कि उत्तर में शांति और राज-व्यवस्था क़ायम है.” निश्चित ही मिन-जुन पहले भी यह जवाब हज़ारों सैलानियों को दे चुका होगा.

यह वर्णन सुन किम्ची आश्वस्त-सी नहीं लगी और वृद्ध मिन-जुन ने यह महसूस किया.

“दरअसल असैनिक क्षेत्र में स्थापित यह गाँव एक उत्तर कोरियन प्रपंच है, पुराने ख़ुशहाल उत्तर कोरिया का अवशेष-भर.” उसने किम्ची को आगे बताया.

तुम इस गाँव में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही हो?” मिन-जुन की जिज्ञासा स्वाभाविक ही थी.

“इसके अलावा हम और क्या देख सकते हैं?” किम्ची को जवाब देने की बजाय सवाल पूछना अधिक प्रिय था.

“यहाँ एक प्रार्थना-कक्ष है” मिन-जुन ने सूचना दी.

“प्रार्थना-कक्ष?” किम्ची यह सुन अचंभित हुई कि दो देशों को बाँटती सीमा-रेखा पर भला एक प्रार्थना-कक्ष का क्या काम.

हाँ, दक्षिण कोरिया तथा उत्तर कोरिया के पुनरेकीकरण के लिए यहाँ प्रार्थनायें होती हैं”, यह बताते हुए मिन-जुन  के चेहरे पर एक संत सदृश कांति थी.

अगले ही पल वे उस प्रार्थना-कक्ष के भीतर थे. यह एक बड़ा हॉल था जिसमें हर सिम्त खंभे दीखते थे. किम्ची ने पाया कि सभी स्तम्भ और दीवारें विश्व के सैंकड़ों लोगों द्वारा दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के पुनरेकीकरण के लिए लिखी प्रार्थनाओं की चिट्ठियों व चिप्पियों से पटी हुईं थीं. वह भौंचक्की थी. वह लटके, टँके और चिपके पत्रों को एक-एक कर पढ़ ही रही थी कि अचानक ही उसकी नज़र एक पत्र विशेष पर ठहर गयी.

अपने पिता की लिखाई देख वह एक अकथनीय अविश्वास से भर गयी. यह अविश्वसनीय एवम् अकल्पनीय था परंतु सच यही था. यह तो उसके पिता अबीर आनंद की ही लिखाई थी. उसी हरी स्याही से लिखी जो उन्हें लिखने के लिए प्रिय थी. उसने पत्र लेकर सूँघा, उनकी पसंदीदा हरी स्याही की वही महक उसमें थी. पत्र में लिखा था-

हे परमपिता परमात्मा,

मैं कोरियन पेनिन्सुला लड़ाई के बाद हुए दुर्भाग्यपूर्ण बँटवारे में में अपनी प्यारी पत्नी सोरा को खो चुका हूँ. मुझे लगा था कि वह असैनिक क्षेत्र के शांति गाँव में नन्ता प्रदर्शन में भाग लेकर लौट आयेगी. बाद में हमें ज्ञात हुआ कि वह गाँव तो प्रपंच-भर था और नदी पार कर सीमा लाँघने की इजाज़त किसी को न थी. हाल ही में कुछ लोग इसी प्रयास में अपनी जान गँवा बैठे हैं. मेरी प्रिय सोरा के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता. अब आपके चमत्कार से ही कुछ हो सकता है. अतः यहाँ मैं संपूर्ण कोरियन पेनिन्सुला के पुनरेकीकरण के लिए प्रार्थना करता हूँ.

हे प्रभु, कृपया उसे वापस भेज दें. मैं अपनी बच्ची की देखभाल अकेले करने योग्य नहीं हूँ.

आशा है आप तो समझेंगे.

किम और उसका पिता अबीर आनंद

दिव्या विजय

किम्ची के पिता द्वारा लिखा सद्भाव से भरा यह पत्र उसके मर्म को छू गया. असंभव और अनपेक्षित रूप से एक ही पल में उसे अपने सभी जवाब मिल गये. वह कुछ भी न बोल पाई, एक शब्द भी नहीं. वह आँसुओं से भर उठी, ज़ार-ज़ार हो चली.

वह शीघ्रता से वेधशाला से बाहर आ गयी.

किम्ची चलने लगी.

मिन-जुन उसके पीछे-पीछे चला.

किम्ची तेज़ क़दमों से चलने लगी. वह भागने लगी…वह रुक गयी…वह हाँफ रही थी.

मिन-जुन बहुत दूर नहीं था. किम्ची ने एक छोटा कोरियन रेस्त्राँ देखा जिसमें खुले में ही बैठने की व्यवस्था थी.  वह वहीं बैठ गहरे साँसें भरने लगी. इससे पहले कि वह कुछ ऑर्डर कर पाती, एक छोटे ख़ूबसूरत लड़के ने आकर उसके सामने ‘किम्ची’ नामक व्यंजन का पात्र रख दिया. वह फिर से रोने लगी. अब उसके आँसू उसी पात्र में गिरने लगे और वह बिना अपने खारे आँसुओं की परवाह किए किम्ची सलाद खाने लगी.

अपने ‘अस्तित्व’ का स्वाद उसने पहली बार चखा. यह उसके लिए निर्धारक क्षण था. वह दरअसल इंडो-कोरियन प्रेम की निशानी थी. किम्ची अपने वजूद और अब तक के अपने सफ़र पर मुस्कुरा उठी तथा उसने अपने ‘दोस्त’ के पास इंडिया लौटने का निर्णय ले लिया.

Posted 7th December 2016 by prabhat Ranjan

Labels: divya vijay pankaj dubey दिव्या विजय पंकज दुबे

 
      

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3 comments

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