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श्री श्री की कहानी ‘अदू-धूं-ना’

 

उनका नाम पूनम अरोड़ा है. श्री श्री के नाम से कहानियां-कविताएँ लिखती हैं. कहानियों में परिवेश किस तरह का प्रभाव पैदा कर सकता है इसके लिए इस कहानी को पढ़ा जा सकता है- मॉडरेटर

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काईयू ने जल्दी से किताब का पन्ना पलट दिया.

इस बार ख़्याल ज़्यादा लंबा नहीं था. उसने राहत की सांस ली. अरे यह क्या, शाम हो भी चुकी और देखो खिड़की के शीशे कैसे भाप उगल रहे हैं. इन पर परदा गिरा देना चाहिए था किसी को. पर क्यों आएगा कोई इस कमरे में? जबकि यह पढ़ने और सोने के बीच का समय है और जब तक ऐसा रहता है कोई उसके कमरे में नहीं आता.
बाहर मौसम अब थोड़ा-थोड़ा खुल चुका था.
नर्म, हल्का, ताज़ा खिले लिली के फूलों की तरह.
इस हवा में सांस भर कर देखती हूँ.
ताताई कहा करते थे कम से कम दिन में एक बार हमें अपने फेफड़े ज़रूर इस ख़रगोशी हवा से भर लेने चाहियें.
ओह ताताई ! उसने एक लंबी सांस ली, अपनी उम्मीद से ज़्यादा गहरी, ज़्यादा याद भरी, ज़्यादा नुकीली.

“साँसों का भी अपना कमरा होता है,नाभि तक. जब तक वहाँ सांस न पहुँचे तब तक आधी साँसे हमें आधा ज़िंदा रखती हैं”
ताताई प्यार से सर पर हाथ रख कर समझाते थे और तब अचानक काईयू की पलकें बोझिल होने लगती थीं. नींद से या किसी पुरानी सरसराहट से, कभी नहीं पता चल पाया उसे. लेकिन उस न समझ आने वाली बात में कुछ ऐसा था जो अभी तक महसूस होता है उसे. पलाश के अबीर रंग, एलोवेरा की जड़ की स्थिरता और कोई कत्थई सी शाम. इन सब को एक साथ मिला दें तो शायद वो न पता चलने वाली बात को कोई आकार मिल सकता है. लेकिन जानना किसे है? उसे इस बेमकसद खोज से कुछ लेना-देना नहीं.

पानी गर्म कर लेना चाहिए अब. नहीं तो देर हो जायेगी नहाने में .इस बार का ख़्याल भी ज़्यादा लंबा नहीं था शायद. अम्म्म, हाँ यह ऐसा ही था. लंबे से हल्का सा छोटा.
उसने किताब पर एक लाल पेन्सिल रख दी. इस याद के लिए कि अभी यह किताब पूरी पढ़ी जानी है. नीली पेन्सिल का मतलब था किताब लगभग पूरी पढ़ी जा चुकी. और काली का मतलब अब यह किताब पढ़ ली गई है और स्मृति के चिन्हों के लिए तैयार है. हर पन्ना कहीं न कहीं से छोटे टुकड़ों में स्मृतियों में बाँध लिया जाएगा जैसे ही कुछ पंक्तियों के नीचे काली रेखा बना दी जायेगी. ऐसा लगता था किताब एक समुद्र है और ये काले चिन्ह उसमें तैरती मछलियां. इस तरह से काईयू की सारी किताबें करीने से संभले हुए समुद्र हैं और मछलियां स्मृति के तैरते हुए छोटे-छोटे कोश.

कभी-कभी यह उसे एक क्रूर बात लगती है. किसी को इतनी लकीरों के पीछे धकेल देना, उस पर अपने जीवन को महसूस करते हुए प्रश्न-चिन्ह बना देना या कभी किनारों पर जो बिना अक्षरों की जगह होती है, उस पर किसी चेहरे को बना देना.
मतलबी इंसान ! उसे खुद पर चिड़चिड़ाहट हुई. इस चिड़चिड़ाहट में उसने खिड़की को पूरा खोल दिया. काईयू की नज़र खिड़की से नीचे गई. ओवर कोर्ट पहने हुए एक आदमी बाज़ार से लगती दीवार पर पेशाब कर रहा था. और पास ही दो कुत्ते एक दूसरे में उलझे हुए अजीब स्थिति में आने-जाने वालों को देख रहे थे. उसे इन दो दृश्यों से घृणा नहीं हुई. बल्कि मामूली सी छुपी हुई शरारती मुस्कान उसके कानों के आसपास गुदगुदाने लगी. ओवर कोर्ट वाले आदमी ने पैंट की ज़िप चढ़ाई और होंठ को तिरछा कर कोई गाना गाने लगा. दरअसल वो गाना गा नहीं रहा था, केवल गीत के बोल बुदबुदा रहा था. दूर से ऐसा लग रहा था जैसे वो पश्तो में कुछ कह रहा है और किस्तों में वो बोल काईयू के कानों में उड़-उड़ कर आ रहे हैं.

हवा तेज़ होने लगी. परदों में धीमी सी हलचल हुई और फिर कुछ देर सब सन्नाटे में घिर गया जैसे कुछ पलों के लिए सारी दुनिया ने उसे पलट कर किसी बहुत बड़ी हैरानी से देखा हो. और काईयू को इस बात से बोझ होने लगा. सारी दुनिया की नज़रे न झेल पाने का बोझ. यह अपराधबोध में बदल जाता उससे पहले ही काईयू ने यह ख़्याल भी तोड़ दिया.

अब उसे उकताहट होने लगी किताब से. उसने बेमन से कोई भी पन्ना खोल दिया किताब का. जहां उसकी नज़र पड़ी वहां लिखा था कि प्रिंस मिश्किन ने मैरी का हाथ चूम लिया. गाँव के शरारती बच्चे उन्हें छुप कर देख रहे थे और पत्थर मारने लगे. उसे घृणा होने लगी यह बात सोच कर भी कि एक अति आत्मीय दृश्य का अंत इस तरह हुआ. फिर उसने सोचा क्या होता अगर प्रिंस मिश्किन मैरी का हाथ न चूमकर उसके होठों को चूम रहा होता ? और बच्चे उन्हें पत्थर मारते इससे पहले गाँव में आग लग जाती. गाँव के सभी घर धीरे-धीरे आग की लपटों में आते रहते, लोग यहाँ-वहाँ भागते रहते लेकिन प्रिंस मिश्किन एक अंतहीन चुम्बन में यह कभी न देख पाता न मैरी ही कभी गाँव जलने का दृश्य देख पाती. लेकिन आग इतनी फ़ैल जाती कि उन दोनों के चुम्बन को भी छूने लगती.
ओह ! यह कितना भयावह है. उसने जल्दी से गर्म पानी में अपनी सर्द उंगलियां डाल दीं. खिड़की के पास खड़े होने की वजह से ये जमने लगीं थी. अभी मौसम में ताप आना नहीं शुरू हुआ न बर्फ के फूल ही झड़ते हैं आसमान से. उसे लगा ये सबसे ज़्यादा उदासी का मौसम है. सर्दी के जाने और गर्मी के मौसम के आने के ठीक बीच का समय.

उसे लगा प्रेम के उगने, फलने-फूलने और उत्तेजित होने का भी तो यही मौसम होता है. प्रेम का महीना ‘फरवरी’. फरवरी में हाल्टर नेक की पोशाकें नहीं पहनती प्रेमिकाएं जैसे वो अक्सर वसंत में पहना करती हैं. अपने प्रेमियों के साथ मॉल रोड के किनारे चलते-चलते वे सड़क के अंत तक पहुँच जाती हैं. ज़िन्दगी को भी ऐसे ही लोबान के धुंए की एक बारीक लकीर पर देखना चाहती होंगी वो और यह भी बहुत मुमकिन था प्रेमी खालिस प्रेम नहीं देख पाते थे उनमें. वे तुलनायें करते थे उनके स्तनों की संतरों और अमरूदों से. नितंबों की ऊंचाई की शिमला की छोटी बड़ी पहाड़ियों से और उनकी साँसों की जंगल के भीतरी हिस्सों में उगी जड़ी-बूटियों से आती खुशबू से. ऐसे सर्द कुहासे के दिनों में भी उन्हें पसीने से भीगा देखा जा सकता है. उनके चेहरे पर आभा की अलग-अलग किस्में दिखाई देती हैं और उनकी चाल सबसे ज़्यादा आकर्षित करती है.

किताब पर फिर नज़र पड़ी काईयू की. ताताई ने ही यह आदत लगवाई थी उसकी. वो कहते थे कि हर रोज़ कोई न कोई किताब हमारी प्रतीक्षा में रहती है, हमें उस तक पहुँचना होता है. अब जब वह देखती है कमरे की ओर तो ऐसा लगता है वह इन किताबों में गौण हो गई है. उसे याद आया कपूर की टिकिया डालनी है उसे किताबों के रेक के पीछे. फिर अचानक उसे याद आया कि उसे नहाना भी है अभी. वह इतनी सर्दी में नहाना तो नहीं चाहती थी लेकिन आजकल उसे अपनी देह से आती नमकीन गंध से चिढ़ हो गई है. यह गंध कुछ ऐसी ही है जैसे मॉल रोड पर अपने प्रेमियों संग घूमती प्रेमिकाओं से आती है. वह जानबूझ कर उनके करीब से गुज़रती थी ताकि ध्यान से उनकी गंध को पहचान सके. ताकि उसे देर तक यह याद रहे कि प्रेमिकाओं की संतुलित और बहकाव से भरी गंध को एक उम्र के बाद ही पाया जा सकता है. जब उस गंध में से स्पर्श और एकांत के झरने बहने लगते हैं.

उसने देखा उन लड़कियों के शरीर थोड़े भारी और बेफिक्र हैं. आँखें उतनी सच्ची नहीं जितनी उन लड़कियों की होती हैं जिनके प्रेमी नहीं होते. बिना प्रेमियों की लड़कियाँ किसी भी पहेली को उंगलियों पर एक से दस तक गिनती गिनने पर फ़ौरन सुलझा लेती हैं ,और स्पर्श की गंध में जगह-जगह बिखरी लड़कियाँ खुद हमेशा एक ऐसी पहेली बने रहना चाहती हैं जिसे कभी न सुलझाया जा सके. वो एक ऐसी हवा बनी रहना चाहती हैं जो डैंडलाइन के कोमल रेशों को अपने साथ समुद्र के रास्ते बहा कर दूर देशों तक ले जाये.

ताताई !
उसने आँखें बंद कीं, हथेलियाँ भींची और जीभ को मुँह में घुमाते हुए कहा ‘अदू-धूं-ना’…

बचपन में ताताई का यही शब्द सबसे ज्यादा अनोखा लगता था काईयू को. ताताई की हर बात जल्दी से कभी समझ नहीं आती थी. वो अलग थे, सभी लोगों से अलग. जिन दिनों काईयू ने अपने खुद के कमरे में अकेले सोना शुरू किया था वो कमरा लंबी गैलरी के पश्चिम में था और बाथरूम उस गैलरी को पार कर उत्तर की ओर था. ताताई ने ज़ीने के पास बाथरूम बनवाने की ज़िद की पापा से. वो बहुत रात तक काईयू के कमरे को देखते रहते थे. कहते थे रात को उनकी नींद में फव्वारें उठते हैं इसलिए वो सोते नहीं. वो नहीं चाहते ये फव्वारें काईयू की नींद तक भी पहुँच जाएँ. काईयू देर तक सोचती ताताई की ये बात. बालों में फीते बांधते हुए, आलूबुखारे धूप में सुखाते हुए और स्कूल में जीरो ब्लॉक के दौरान भी. अंत में कुछ नहीं समझ आता था उसे. और ताताई से कभी पूछा नहीं उसने इस बारे में.

उस रात भी बारिश हुई थी.
बादल गरज रहे थे. ताताई अपनी नींद के फव्वारों में बेचैन थे. वो चुपचाप उनके कमरे की चौखट पर खड़ी थी. एक चोटी का फीता खुला हुआ था लेकिन दूसरे का फूल सुबह से अभी तक वैसा का वैसा था. ताताई ने उसे कॉफ़ी घोटने को कहा. उसने उनके कप में गाढ़ा दूध डाला, ऊपर से फेंटी हुई कॉफ़ी. इसकी खुशबू से उसे फिर उन्हीं लड़कियों की गंध याद आई जो अपने प्रेमियों के साथ दिन भर मॉल रोड पर सपने में चलती, ख़्याल में बच्चे पैदा करतीं और आइसक्रीम खाती नज़र आती हैं.

काईयू भी जैसे फिर से अपने ख़्याल से जागी.
लाल पेन्सिल की तरफ देख कर उसे याद आया कि किताब पढ़ रही थी वो. लेकिन अब नहाना नहीं है, ये सोच कर उसने अपने पैर गर्म पानी से धो लिए. सुख उसकी पैरों की नसों पर गर्म पानी की पतली धार बनकर बह रहा था. छोटा सा सुख जो हमेशा एक हिरण की तरह उछलता- कूदता अचानक जंगल से बाहर निकल आता है. कुछ देर अचंभे से आपको देखता है, आपकी शिनाख्त करता हुआ आपके अतीत और वर्तमान को टटोलता है और छोटी सी मुस्कराहट से खुदको आपको थमा जाता है.
असीम सुख हमेशा आँखें बंद करने पर मिलता है. और आँखें बंद करने पर उसे ताताई याद आते हैं.

ताताई की याद के साथ ये शब्द भी चला आता है उसके कमरे में. कीमो थेरेपी के बाद वो बहुत कमज़ोर हो गए थे. सर से सफेद और काला दोनों रंग जा चुके थे. वो कॉफी नहीं पी सकते थे अब और सोते समय फव्वारों की बात भी नहीं करते. ताताई धीरे-धीरे ज़िन्दगी की ज़रूरी चुप्पी उसे सौंप रहे थे. बिना एक भी शब्द होंठों पर लाये गीतों को गाना सिखा रहे थे. वो उसे सिखा रहे थे कि पापों को छूते हुए कैसे उनसे बच कर ज़िन्दगी के आखिरी हिस्से तक शांति बना कर रखी जा सकती है. इस तरह से ज़िन्दगी की थकान को एक थरथरी कसावट में लपेटा जा सकता है.

काईयू को थकान होने लगी. अपने ठन्डे शरीर को गर्म करने के लिए वह रज़ाई में कबूतर की तरह सिमट गई. उसका हाथ अपनी छातियों पर गया, उसने महसूस किया कि उसकी छातियां अब भर गई हैं. एक गंध उसकी देह से लगातार बहती रहती है. लेकिन उसे इस गंध से चिढ होती है. फिर अचानक याद आया छत पर आलूबुखारे सूखने के लिए रखे थे, उन्हें उठाना वो भूल गई थी. उसने करवट ली और आँखों के सामने सब धुंधला होने लगा. मॉल रोड, सपने में बच्चे पैदा करती प्रेमिकाएँ, सर्द गीत और अपनी गंध.

उसे याद ही नहीं रहा प्रिंस मिश्किन ने मैरी के होंठ चूमने के बारे में कभी सोचा भी था या नहीं. और किताब पर लाल,नीली और काली तीनों पेंसिलें उसने क्यों रख दी थीं.

नींद की झीनी परत में उसे ताताई चुपचाप एक छोटी सी चट्टान पर बैठे दिखाई दिए. काईयू ने होंठ गोल किये, जीभ को तालु से अलग कर उसे मुँह में घुमाकर ज़िन्दगी का सबसे हसीन गीत गुनगुनाया…

‘अदू-धूं-ना’

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2 comments

  1. जिंदगी की थकान की थरथराहट को कसावट में कसती हुई कविता सी कहानी .अपनी गति ,लय और ताल में सटीक और अद्भुत .मन की हलचलों को जिंदगी के ग्राफ पर अंकित करती हुई प्रसंशनीय कहानी .

  2. जिंदगी की थकान की थरथराहट को कसावट में कसती हुई कविता सी कहानी .अपनी गति ,लय और ताल में सटीक और अद्भुत .मन की हलचलों को जिंदगी के ग्राफ पर अंकित करती हुई प्रसंशनीय कहानी .

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