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उन्होंने ‘लुगदी’ परम्परा को ग्लैमर की ‘वर्दी’ पहनाई

मुझे याद है जब आमिर खान ने अपनी फिल्म ‘तलाश’ का प्रोमोशन शुरू किया था तो वे मेरठ में सबसे पहले वेद प्रकाश शर्मा के घर गए थे. यह हिंदी की लोकप्रिय धारा के लेखन को मिलने वाला विरल सम्मान था. 80 और 90 के दशक में उनके उपन्यासों ने गाँव-देहातों तक ने केवल हिंदी उपन्यासों का विस्तार किया था बल्कि जासूसी उपन्यासों में भारतीय जासूसों की जीत के साथ करोड़ों लोगों के दिल में राष्ट्रवाद का अलख जगाया था. वे सच में आम जन के लेखक थे. उस आम जन के, जिसका जीवन सपनों में बीत जाता है. इस उम्मीद में कि एक दिन उनके भी दिन आयेंगे. सच में गूगल युग में इस जासूसी मुग़ल को नहीं समझा का सकता है. हम जितना समझते हैं उससे बहुत बड़ा कद था उनका- संपादक

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लोकप्रिय साहित्य जनता की भाषा में जनता से संवाद करती रही है. लगातार संवाद करती रही. जब मैं सीतामढ़ी जिले के अपने गाँव मधुवन में रहता था तब मैंने लेखक बनने का सपना देखा था तो उसके पीछे वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का बहुत बड़ा हाथ था. मैं तब तक न किसी बड़े साहित्यकार के संपर्क में आया था न ही यह जानता था कि बड़ा लेखक कौन होता है. हम लोग वेद प्रकाश शर्मा के हर उपन्यास का बेसब्री से इन्तजार करते थे और उसके पीछे एक लम्बी सी गाड़ी पर हाथ टिकाकर खड़े वेद प्रकाश शर्मा की तस्वीर को देखते थे और उनके जैसा लोकप्रिय बनने का ख्वाब देखते थे.

अब सोचता हूँ क्यों? क्या कारण था कि उदिस्ठ मास्टर साहब ट्यूशन पढ़ाने के बाद रात में लालटेन जलाकर तेल जला जला कर कॉपियां भरा करते थे. कहते थे कि देखना, किसी दिन किसी किसी प्रकाशक की नजर पड़ गई तो ये उपन्यास वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों से ज्यादा पढ़े जायेंगे. एक दिन उन्होंने बताया था कि ऐसे ऐसे करीब 21 उपन्यास उन्होंने लिख रखे थे. खुद वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों पर भी एक प्रकाशक की ऐसे ही तो नजर पड़ी थी. बहरहाल, उनके उपन्यास छपे या नहीं पता नहीं. बाद में उदिस्ठ मास्टर साहब से मिलना भी नहीं हुआ.

लेकिन मैं अक्सर इस बात को सोचता हूँ कि क्या था वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों में, उनके जासूसी किरदारों में कि गाँव-देहातों में लोग उनके उपन्यासों को पढने के लिए राशन की ढिबरी का तेल जलाते थे? इंटरनेट विहीन उस युग में भी उनके उपन्यासों के प्रकाशन की तिथि का पता रखते थे? आज भले हार्पर कॉलिन्स द्वारा छपने के बाद, अंग्रेजी अनुवादों के बाद सुरेन्द्र मोहन पाठक का लेखकीय कद बड़ा लगने लगा हो लेकिन अखिल भारतीय लोकप्रियता में वे वेदप्रकाश जी के सामने बौने ही रहे.

असल में इसके कारण थे.

मुझे अब यह बात शिद्दत से लगने लगी है कि हिंदी के आम पाठकों के अधिक करीब वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास थे. वह बहुत तैयारी के साथ उस हिंदी भाषी समाज के लिए लेखन करते थे जो मध्यवर्गीय संभ्रांत तबके का नहीं माना जाता था, जो छोटे-छोटे काम करता था, जो जो गुमटी लगाता था, जो वस्त्र भण्डार, किराना स्टोर चलाता था, सीताराम भोजनालय चलाता था. मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ी बात है. हम ‘जनवादी’ कहलाने वाले लेखक अपने साहित्य में मजदूरों-किसानों की बात तो करते हैं, शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं लेकिन कभी भी हम उन तक पहुँचने की कोशिश नहीं करते हैं.

जबकि वेद प्रकाश शर्मा जैसे लेखकों ने न सिर्फ उनकी जैसी भाषा में साहित्य लिखा बल्कि उनके उपन्यासों में कई किरदार ऐसे हैं जो उस वर्ग के हैं जो समाज के संभ्रांत तबके में अपनी जगह नहीं बना पाए, जो सामाजिक मानकों से असफल रह गए. ऐसे लोगों में जीवन के प्रति विश्वास पैदा करने का बड़ा काम उनके उपन्यासों ने किया. मुझे उनका एक किरदार केशव पंडित इस सन्दर्भ में याद आता है जिसने वकालत की पढ़ाई नहीं की मगर बड़े बड़े वकीलों को नाकों चने चबवा देता था, जिन अपराधियों को बड़े बड़े वकील सजा नहीं दिलवा पाते थे वे उसके अकाट्य तर्कों के सामने पानी भरते थे. 1980 के दशक में मुझे नहीं लगता कि हिंदी के औपन्यासिक संसार में ऐसा लोकप्रिय कोई दूसरा किरदार भी हुआ. वह एक ऐसा किरदार था जो समाज में हाशिये पर रह गए लोगों में आत्मविश्वास पैदा करता था. उनके अंदर यह भाव पैदा करता था कि दुनियावी मानकों पर असफल रहने के बावजूद वे अपने जाती हुनर से कामयाबी हासिल कर सकते थे. मुझे लगता है कि उस दौर में जब देश में निजीकरण शुरू नहीं हुआ था, उदारीकरण ने युवाओं के सामने नए नए अवसरों के दरवाजे नहीं खोले थे तब उनके उपन्यासों के होने के कुछ मानी थे. जब सरकारी नौकरियों के अलावा बेहतर भविष्य के लिए कोई विकल्प नहीं होता था केशव पंडित जैसे किरदार नाकामयाब समझे गए लोगों को उम्मीद की किरण दिखाते थे.

पिछले कुछ सालों से उनके लेखन का जलवा उतार पर था. वे लंग कैंसर से पीड़ित थे. आवाज गायब हो गई थी लेकिन 80 और 90 के दशक में उन्होंने हिंदी को ग्लैमर दिया था. गाँव-गाँव में लोगों को एक सपना दिया था लेखक बनकर नाम कमाने का. वह उनके बाद कोई नहीं कर पाया.

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