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शम्भुनाथ सिंह का गीत ‘मुझको क्या क्या नहीं मिला’

नई कविता की तर्ज़ पर नवगीत आन्दोलन चला था. जिसके सूत्रधार थे शम्भुनाथ सिंह. इन्होने तीन खण्डों में नवगीत दशक का संपादन किया था. आज की पीढ़ी नहीं जानती लेकिन शम्भुनाथ सिंह ने हिंदी में गीतों को रुमान से मुक्त करके एक नया रंग दिया था. उनका ही एक गीत- मॉडरेटर

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राजा से हाथी घोड़े

रानी से सोने के बाल,

मुझको क्या-क्या नहीं मिला

मन ने सब-कुछ रखा संभाल।

 

चँदा से हिरनों का रथ

सूरज से रेशमी लगाम,

पूरब से उड़नखटोले

पश्चिम से परियाँ गुमनाम।

 

रातों से चाँदी की नाव

दिन से मछुए वाला जाल!

बादल से झरती रुन-झुन

बिजली से उड़ते कंगन,

पुरवा से सन्दली महक

पछुवा से देह की छुवन।

सुबहों से जुड़े हुए हाथ

शामों से हिलती रूमाल!

 

नभ से अनदेखी ज़ंजीर

धरती से कसते बन्धन,

यौवन से गर्म सलाखें

जीवन से अनमाँगा रण।

पुरखों से टूटी तलवार

बरसों से ज़ंग लगी ढाल!

 

गलियों से मुर्दों की गंध

सड़कों से प्रेत का कुआँ,

घर से दानव का पिंजड़ा

द्वार से मसान का धुआँ!

खिड़की से गूँगे उत्तर

देहरी से चीख़ते सवाल!

 

मुझको क्या-क्या नहीं मिला

मन मे सब-कुछ रखा संभाल!

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