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आशुतोष भारद्वाज के उपन्यास का अंश ‘प्रूफरीडर के नाम खत’

इन्डियन एक्सप्रेस के पत्रकार आशुतोष भारद्वाज को बस्तर पर अपनी रपटों के लिए याद किया जाता है. उनको चार बार प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिल चुका है.रायटर्स के अंतरराष्ट्रीय कुर्त शोर्क अवार्ड के लिए दुनिया भर से शॉर्टलिस्ट किये गए आठ पत्रकारों में उनका नाम भी शामिल है. लेकिन वे एक संवेदनशील लेखक हैं. नक्सलवाद की पृष्ठभूमि में वे एक उपन्यास बहुत दिनों से लिख रहे हैं. उसका एक रोचक अंश आज आपके लिए- मॉडरेटर

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अब अनन्या की बारी थी। तब अनन्या ने अपनी कहानी सुनायी: “परिवार के बारे में मेरे पास कुछ भी नहीं है, बचपन में भी मेरे साथ कुछ खास नहीं हुआ। मैं सीधा वहीं से शुरु करूँगी जब मैंने बीए के बाद एक प्रूफरीडर की नौकरी शुरू की। एक छोटा सा ऑफिस था जहाँ तरह तरह की ढेर सारी किताबें छपने से पहले प्रूफरीडिंग के लिये आतीं थीं। प्रूफरीडिंग करने वाली बड़ी बड़ी कंपनियाँ हमें ये चीजें भेजा करतीं थीं। स्कूल के कोर्स की किताबें, साइंस, मैथ, इतिहास, बच्चों की कहानियाँ, सैक्स वाली कहानियाँ, प्यार-मोहब्बत की कथायें, बड़े लोगों की जीवनियाँ। खूब सारे पन्ने भी आते थे, पांडुलिपियाँ। न जाने किस ने लिखा होता था, हमारे पास भेजता था। कुछ टाइप किये होते थे, हाथ की लिखावट में भी होते थे। पाँच लोग थे मेरे ऑफिस में, दो छोटे कमरे। एक में मालिक बैठता था, बाहर हम चार प्रूफरीडर। सबकी एक-एक कुर्सी मेज, तीन रंग के पैन — लाल, काला, नीला। एक पैंसिल, रबड़, कटर। मैंने कटर के बजाय ब्लेड लिया हुआ था, मुझे पैंसिल ब्लेड से छीलने में आसानी रहती थी। हर प्रूफरीडर के पास एक लकड़ी की रैक थी, दो खाने वाली। एक में वो कागज जिनका प्रूफरीड हो चुका है, दूसरा जिनका होना बाकी है। मालिक के कमरे में दो बहुत बड़ी अलमारी थीं, एक में ढेर सारे कागज रखे रहते थे जिन्हें वो हमें देता था। दूसरी अलमारी में चार खाने थे, हर प्रूफरीडर का एक। पन्ने प्रूफरीड हो जाने पर हम अपने अपने खाने में रख देते थे। एक पन्ने की प्रूफरीडिंग के पिचहत्तर पैसे मिलते थे। दिन में दो सौ पन्ने मतलब डेढ़ सौ रुपये। हमारे हर पन्ने को मालिक दूसरे प्रूफरीडर से पढ़वाता था। इस पढ़ने के पैसे नहीं मिलते थे, लेकिन अगर दस पन्ने में एक से ज्यादा गलती मिलती तो पाँच पन्नों के पैसे कट जाते थे। हम एकदूसरे की गलती कम से कम निकालना चाहते थे, लेकिन हमारे बाद मालिक भी पढ़ता था, अगर वहाँ पाँच पन्ने में एक से ज्यादा गलती मिलती तो वह दोनो के, प्रूफरीडर और जिसने उसका दुबारा पढ़ा, अठारह पन्नों के पैसे काट लेता था। हमें नहीं मालूम होता था इन कहानियों, किताबों, निबंधों को कौन भेजता है, कौन लिखता है, कहाँ छपती हैं। हम सिर्फ इन्हें प्रूफरीड करते थे।

“हम चार प्रूफरीडरों के बीच में एक बाथरूम था, जिसमें दो नल लगे थे, एक इंडियन स्टाइल की लैटरिन। एक बाल्टी दो मग्गे थे बाथरूम में, एक मग्गा लैटरिन वाले नल के नीचे, दूसरा बाल्टी पर टंगा रहता था। लैटरिन के ऊपर एक लोहे का फ्लैश था जिससे एक जंजीर लटकती रहती थी लेकिन जंजीर खींचने पर पानी नहीं लोहे की जंग झर कर लैटरिन पर गिरती थी, इसलिये लैटरिन में पानी बाल्टी से डालते थे। अगर एक बार भी पानी डालने में देर हो जाये तो आधे घंटे में बदबू बाहर आने लगती थी। बाथरूम में अंदर कुंडी नहीं थी, अंदर जाओ तो दरवाजा पकड़ कर बैठना पड़ता था। बाथरूम में खिड़की नहीं थी, कमरे में भी कोई खिड़की नहीं थी। बाथरूम में एक जीरो वाट का लाल रंग का बल्ब था, कमरे में दो साठ वाट के बल्ब। मेरा मन टेबिल लैंप का होता था, लेकिन मेरी मेज बहुत छोटी थी, कागज इतने होते थे सारी जगह घेर लेते थे। एक दरवाजा था, सीधा बाहर सड़क पर खुलता था, हमारे दांये एक पान का खोखा था जो एक नाले पर टिका हुआ था। दरवाजा बंद रखते थे नहीं तो सड़क अंदर आ जाती थी।

“इस जगह मैं लोगों के लिखे को सुधारा करती थी। सुबह नौ से शाम छः तक। मैं बहुत तेजी से प्रूफरीड किया करती थी, बाकी प्रूफरीडर एक दिन में दो सौ पन्ने पढ़ पाते थे, मैं तीन सौ पढ़ जाती थी। इस ऑफिस के बाहर मेरे दोस्त लोग थे उन्हें लगता था मैं बहुत बड़ा काम कर रही हूँ, तरह तरह की चीजें पढ़ती हूँ, दूसरों के शब्दों को सुधारती हूँ। मुझे भी लगता था कि मैं केवल इन पन्नों पर लिखे शब्दों की मात्रायें, पूर्ण विराम, अर्द्धविराम नहीं ठीक कर रही, मैं दरअसल इनके लेखक के जीवन को ही दुरुस्त कर रही हूँ। मुझे नहीं मालूम था इनके लेखक कौन होते थे, न उन्हें मालूम था कौन उनके कागजों पर प्रश्नवाचक चिन्ह हटाकर विस्मयाबोधक चिन्ह लगाता है, कौन उनकी छोटी इ की मात्रा काट बड़ी ई की करता है, कौन उनके अर्द्धविराम को सेमीकॉलन बनाता है। कुछ गलतियाँ लगभग सभी पन्नों में दिखती थीं, कुछ केवल किसी किसी लेखक में ही दिखतीं थीं। इन गलतियों से मैं उनके लेखक का अनुमान लगाया करती थी। मुझे लगता कि कुछ खास किस्म की मात्राओं की अशुद्धियाँ किसी खास किस्म के लोग ही किया करते होंगे। मसलन बड़ी ई को छोटी इ बतौर बरतने वाले इंसान शायद अपने जीवन में अधिकांश चीजों को कमतर कर आंकते होंगे, कहीं वे शायद निराशावादी भी होंगे। इसके विपरीत छोटे उ को बड़े ऊ में बदल देने वाले लोग हवा में उड़ते होंगे। दो वाक्यों के बीच फुलस्टॉप न लगाने वाले लोग अपने जीवन के धागों को किसी तारतम्य में बुन पाने में असमर्थ होंगे। या शायद लंबे वाक्य वह लिखता होगा जो दूर तक बहता-बिखरता जाता होगा, उसका प्रेम खत्म हो जाने के बाद भी बहुत देर तक खिंचता चला जायेगा। छोटे वाक्य बरतने वाला इंसान चीजों को, शायद संबंधों को भी झटके से खत्म कर सकता होगा।

उस वक्त मुझे नहीं मालूम था कि मेरी जिंदगी सिर्फ अर्द्धविराम, फुलस्टॉप, छोटी-बड़ी ई की मात्राओं के व्यूह में फंसी हुई थी। मैं दो वाक्यों के बीच के पूर्ण विराम को अर्द्धविराम में बदल देती थी, कबुतर को कबूतर कर देती थी, a को the में, the को a में परिवर्तित कर देती थी, मुझे लगता था कि मैं इस तरह किसी अनाम लेखक की इबारत में ही नहीं, उस लेखक के जीवन में, उसके जरिये इस सृष्टि में एक निर्णायक हस्तक्षेप करती हूँ। मुझे इससे पहले प्रूफरीडिंग का कोई अनुभव नहीं था। मैंने इससे पहले एक प्राइमरी स्कूल में कुछ महीने पढ़ाया था, बच्चों की कॉपियॉं चैक करती थी लेकिन कभी भी उन कॉपियों को दुरुस्त करते वक्त यह ख्याल नहीं आया था जो मुझे अनाम लेखकों की उन इबारतों से गुजरते वक्त हुआ था। मुझे नहीं मालूम उस छोटे से ऑफिस के कमरे में क्या हुआ कि मेरे भीतर नियंता का भाव पनपने लगा। उस पर भी यह एहसास कि मैं इस पूरी प्रक्रिया में एकदम अनाम रही आती हूँ, मेरी उँगलियों के निशान इन कागजों पर, इस कायनात पर उतरते तो हैं लेकिन कोई भी इन निशानों को चीन्ह नहीं पाता। क्या मैं अज्ञात सृष्टा हो रही थी? एक ऐसे फलक पर पहुँच रही थी जिसके स्वप्न ने भी मुझे कभी नहीं छुआ था? किसी अज्ञात, खोह, कोटर में बैठा हुआ मौन नियामक।

“अजीब बात है तब तक मुझे जरा भी इल्म नहीं हुआ था कि जिस काम को मैं कायनात के सीने पर अपना दस्तखत मान रही थी, वह सिर्फ कुछ मात्राओं को सुधारना भर था। मुझे नहीं मालूम था कि जिसे मैं अपना अमिट हस्ताक्षर समझ रही थी, वह कभी भी मिटा दिया जा सकता था, मिटा दिया जाता था। जिन लेखकों की पांडुलिपियाँ मैं पढ़ती थी, सुधारती थी, वे उसके बाद मेरे सुधारों को, मेरे निशान को जब चाहे मिटा देते थे।

तव तक मुझे यह भी बोध नहीं था कि मैं खुद को उन पांडुलिपियों का पहला संपादक और आलोचक मान रही थी लेकिन संपादक और आलोचक तो दूर मैं एक पाठक भी नहीं थी। दिन भर में तीन सौ पन्ने पढ़ने वाली लड़की पाठक हो सकती थी? मुझे एहसास तक नहीं था कि इन तीन सौ पन्नों में बिखरे लगभग डेढ़ लाख शब्दों में से शायद एक भी मेरे जेहन में दर्ज नहीं होता था, किसी भी अक्षर की ध्वनि मेरे भीतर नहीं गूँजती थी, किसी भी शब्द का अर्थ मेरे बोध को नहीं छूता था, कोई भी वाक्य अपने विन्यास में मेरे सामने उद्घाटित नहीं होता था। मैं सिर्फ एक प्रूफरीडर थी जो हर ग्यारह पंक्तियों के बाद पैराग्राफ बदल देती थी, तीन पंक्तियों से ज्यादा लंबे खिंचते वाक्य को तोड़, फुलस्टॉप लगा दो वाक्य बना देती थी।

तेज गति से उन पन्नों से गुजरती जाती मैं उस इबारत के चेहरे को सिर्फ थोड़ा पौंछती थी, उसके भीतर दहकती आंच में मेरी उंगलियाँ कभी नहीं सुलगी थीं, शब्दों के बीच बहते दरिया में मैं कभी नहीं डूबी थी।

मैं इसी तरह नौ से छः तक जीती रही, एक दिन मुझे मालिक ने बुलाया। किसी लेखक ने अपनी कहानी की पांडुलिपि वापस भेजी थी यह कहकर कि बहुत ही खराब प्रूफरीड हुयी है। उस पर मेरी प्रूफरीडिंग के निशान बने हुये थे। पांडुलिपि नहीं, उसकी फोटोकॉपी। मालिक ने वह फोटोकॉपी और उसके पहले पन्ने पर स्टैपलर से जुड़ी एक चिठ्ठी मेरे सामने रख दी। नौ पन्नों की कहानी थी, आठ पन्नों का खत।

श्रीमान प्रूफरीडर,

रात के तीन बजकर बारह मिनट हुये हैं। मैं अपनी टेबिल लैंप के तले आपको यह खत लिख रहा हूँ। मैं पिछले चार महीनों से अपनी कहानी पलट रहा हूँ जो उस पत्रिका के संपादक ने आपको प्रूफरीड करने के लिये भेजी थी। मैं चार दिनों से इसी उधेड़बुन में हूँ कि आपको यह खत लिखूँ या नहीं, लेकिन इस रात लगा कि अगर मैं नहीं लिखता हूँ तो उन सभी लेखकों के साथ धोखा करूँगा जो आपको अपना लिखा प्रूफरीड करने भेजते हैं। आपका काम सिर्फ मेरी मात्राओं को सुधारना था, मेरे शब्दों के साथ छेड़छाड़ करने का, उनका अपमान करने का आपको कोई हक नहीं था। अगर आपको मेरे शब्द समझ नहीं आ रहे थे तो उनके साथ दुराचार करने के बजाय आप मुझसे संपर्क करते तो मैं आपके संशय दूर कर देता।

मैं आपको यह खत लिखना नहीं चाहता था, मुझे यह भी नहीं मालूम कि आप कौन हैं, कितना और क्या पढ़े लिखे हैं, कहाँ बैठकर प्रूफरीड करते हैं, शायद मैंने आपको कहीं देखा हो, या शायद न देखा हो, शायद मैं आपसे परिचित हूँ, शायद न हूँ, शायद आपने मेरा लिखा पहले पढ़ा हो,  शायद न पढ़ा हो, लेकिन लेकिन फिर लगा कि जिस तरह कोई इंसान अगर रास्ते पर पत्थर से टकरा कर गिरता है तो उसका कर्तव्य बनता है कि वह उस पत्थर को रास्ते से हटा दे, उसी तरह मुझे आपको इस प्रूफरीडिंग के काम से हटाना चाहिये ताकि जो काम आपने मेरे साथ किया है किसी और के साथ न कर पायें।

जाहिरी तौर पर आपको शब्दों की समझ नहीं है, आपको नहीं मालूम कि कोई वाक्य तीन पन्नों तक भी बिना पूर्णविराम के एक लंबी, गहरी सांस की तरह, एक उफनते दरिया की तरह बहता जा सकता है, एक ऐसी सांस जिसकी हरेक धड़कन किसी अंतिम पुकार की तरह आपको झकझोरती है कि जिंदगी दरिया के इसी उफान में डूब जायेगी, एक ऐसा वाक्य जिसका हरेक शब्द आपकी जड़ों पर प्रहार करता है, आपके नीचे की जमीन को झिंझोड़ आपको उखाड़ फेंकता है, आपको नहीं मालूम कि शब्द इस विराट सृष्टि को उद्घाटित नहीं करना चाहता, यह दरअसल उसे छुपा ले जाने की चाहना में डूबा रहता है, एक महान इबारत इस जादुई कायनात की व्याख्या नहीं करती बल्कि उसके जादू की ओर उँगली भर दिखाती है, इस इबारत में वह जादू जुगनू की तरह कौंधता है, सिर्फ निगाह भर के लिये चमकता है, तुरंत बुझ जाता है, पगलाये हुये आपको अपने पीछे खिंचे आने को मजबूर करता है; आपको नहीं मालूम कि जो व्याकरण हम स्कूल की किताबों में सीखते हैं, वह फांसी का फंदा भी हो सकता है, कि शब्द के साथ क्रीड़ा हमें मुक्त करती है, बेहिसाब आसमान में बिखरने का, फूटने का न्यौता देती है; आपने कभी किसी इबारत को किसी गीत की तरह नहीं गुनगुनाया है, आपको यह इल्म नहीं है कि हरेक अक्षर की एक विशिष्ट ध्वनि होती है, हरेक अक्षर में एक ऐसा स्वर सोया रहता है जिसकी धमक समूची भाषा में किसी अन्य स्थल पर सुनायी नहीं दे सकती, इसलिये हरेक वाक्य को किसी राग की तरह गाया जा सकता है; आपको यह इल्म भी नहीं है कि शब्द दरअसल नवरस का मूल स्रोत है, यह चिंघाड़ता हुआ अट्टाहस हो सकता है, मासूम लोरी भी, खुमार में डूबी प्रेम कथा भी। अगर मैं किन्हीं मात्राओं का फेरबदल करता हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे उनका ज्ञान नहीं, बल्कि यह कि किन्हीं अवसरों पर मैं उनकी उन ध्वनियों को चुनता हूँ जैसा मैं उन्हें सुनता आया हूँ, जो आपकी श्रव्य इंद्रियों के एकदम विपरीत भी हो सकती है।

मैं इस वक्त अपनी बालकनी में कुर्सी पर बैठा हूँ, सामने यूकेलिप्टस के लंबे पेड़ खड़े हैं। मेरे अपार्टमैंट के दाहिनी तरफ हाईवे है, जो मेरी बालकनी से दिखाई नहीं देता। इस वक्त अंधेरे में वैसे भी कुछ दिखाई नहीं देता। घंटे भर बाद मोर, कौए, तोते इन वृक्षों पर चहचहाना शुरु कर देंगे। मुझे अक्सर लगता है कि भाषा का महत्व जितना मनुष्य के लिये है, उससे कहीं अधिक शायद इन परिंदों के लिये है। मनुष्य ने तो अपने को अभिव्यक्त करने के लिये अन्य माध्यम खोज लिये हैं लेकिन पक्षी शायद अपनी आवाज से ही जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाता है। मसलन मुर्गा अगर सुबह बाँग न दे पाये, बरसात में भीगता मोर अपना गीत न गा पाये, या तोता उड़ते वक्त अपनी ध्वनियों से न खेल पाये। गूँगा परिंदा। अपनी आवाज को चारों तरफ खोजता फिरता बौखलाया परिंदा।

क्या आपको कभी किसी चीज से डर लगता है? मुझे लगता है। मुझे कई सारी चीजों से डर लगता है। इतनी सारी चीजों से मुझे डर लगता है कि मुझे अचंभा होता है कि आखिर मैंने अपने जीवन में भय के कितने नाम और चेहरे अपने शब्दकोश में दर्ज कर लिये हैं, कि शायद मेरी वर्णमाला के हरेक अक्षर से मेरे जीवन के किसी भय की कथा कही जा सकेगी, लेकिन इसके बाद भी न जाने कितने अनाम भय होंगे जो मेरी वर्णमाला से परे होंगे, जिनका कभी नामकरण नहीं कर पाउँगा, जिन्हें किसी को कभी बता नहीं पाउँगा लेकिन जिनका अस्तित्व मेरे जीवन पर किसी प्रेतछाया की तरह मंडराता रहेगा, मेरे जीवन की हरेक धड़कन को निर्धारित करता रहेगा।

पता है मेरे लिये सबसे बड़ा डर क्या है? आप शायद सोच रहे होंगे कि किसी गल्पकार के लिये न लिख पाना, अपनी आवाज खो देना सबसे बड़ा डर होता होगा। नहीं, मैं गूँगा हो जाना सह सकता हूँ, जीवन में कई बार यह लगता है कि मेरे शब्द मुझे छोड़कर चले गये, ऐसे अंतराल बार-बार आते हैं जब मैं खुद को डूबता महसूस करता हूँ, हफ्तों-महीनों तक डूबता जाता हूँ, लेकिन फिर निकल भी आता हूँ, शब्द वापस आ जाते हैं भले ही बहुत लंबे अंतराल के बाद। लेकिन सबसे बड़ा डर है कि मैं वह नहीं लिख रहा जो लिखना चाह रहा हूँ, मेरी अनुभूति और अभिव्यक्ति के बीच गहरी खाई है।

इसलिये इस दहशत ने मुझे जकड़ लिया जब मैंने अपनी कहानी को उस पत्रिका में पढ़ा। यह वह नहीं थी जो मैंने प्रकाशित होने के लिये भेजी थी। मेरी पांडुलिपि को किसी ने उलट कर रख दिया था, मुझे लगा कि किसी ने मेरे वीर्यवान शब्दों का सत्व किसी इंजैक्शन की सिरिंज से निकाल, उन्हें निचोड़कर, धोकर धूप में सुखाने किसी जंग लगे लोहे के तार पर डाल दिया था। हफ्तों तक धूप में पड़े रहने के बाद मेरे शब्द सूख कर अकड़-सिकुड़ गये थे, उन पर जंग के भूरे खुरदुरे निशान उभर आये थे। अपने लिखे को इस कदर सरे-राह जलील होता देख मैं कंपकंपा उठा। मुझे यकीन नहीं हुआ कि यह मैंने लिखा है। मैंने शब्द-दर-शब्द इस छपी हुई चीज को अपनी भेजी कहानी से मिलाया। यह वह एकदम नहीं थी जो मैंने भेजी थी। मैं कई रात इस दहशत की गिरफ्त में फंसा छटपटाता रहा कि दुनिया इसे मेरा लिखा समझ कर पढ़ रही है, मेरी चारों तरफ बदनामी हो रही है कि मैं इतनी मुर्दार और मरियल चीज आखिर कैसे कहीं प्रकाशित होने के लिये भेज सकता हूँ। क्या मेरे भीतर इतना भी लेखकीय विवेक और धैर्य नहीं है? आखिर इसे छपवाने की हवस मेरे ऊपर कैसे हावी हो गयी? मेरे गुरु लेखक, जो गिनती में दो-तीन ही हैं, खुद को कोस रहे हैं कि आखिर किस पैशाचिक क्षण उन्होंने इतने लालची इंसान को शागिर्द बनाना स्वीकार किया। मैंने उन्हें इस कदर रुसवा किया कि वे अपनी दी हुयी समूची विद्या मुझसे वापस माँग रहे हैं, गुरु-दीक्षा बतौर मेरे दाहिने हाथ का अँगूठा माँग रहे हैं कि मैं कलम उठाने योग्य न रहूँ कि मेरा यह टुच्चापन लेखकीय जगत में मेरी अंतिम उपस्थिति बन जाये कि मुझे अपने इस अक्षम्य अपराध के प्रायश्चित का कोई अवसर न मिले कि यह छपी हुई चीज मेरे निरे निर्वीर्य लेखकीय जीवन का आखिरी कौतुक बन दर्ज हो कि मेरा समूचा लेखकीय अतीत मिट जाये, मुझे भविष्य में सिर्फ और सिर्फ इस गुनाह के निर्माता बतौर ही जाना जाये।

मैं उन सभी खतों का इंतजार करने लगा जो क्रोधित पाठक मुझे भेजने वाले थे, जिनके तजुर्मों में मेरे लिये हिकारत भरी पड़ी थी। मैं उन सभी खतों को अपने जेहन में लिखता, मिटाता, फिर लिखता। जब कई दिनों तक ऐसा कोई खत नहीं आया तो मैंने उनके मजमून अपनी डायरियों में लिखना शुरु कर दिया। मैं कल्पना करता कि इसे छपवाने पर मुझे किस तरह के खत आने चाहिये, फिर मैं उन्हें खुद को संबोधित कर लिखता। जब इस तरह के कई खत, उस चीज के लेखक को कोसते हुये, मैंने खुद को लिख लिये लेकिन किसी भी पाठक का कोई भी खत मुझे नहीं मिला तो मुझे लगा कि उन्होंने उस प्रकाशित चीज और उसके तथाकथित लेखक को इतनी भी तवज्जो नहीं दी कि उसे दो पंक्तियाँ लिख कर अपनी असहमति या आक्रोश दर्ज करायें। मुझे यह भी लगा कि शायद वे सब मुझे लिखने के बजाय संपादक के नाम पत्र लिखेंगे, तथाकथित लेखक के साथ संपादक को भी कोसेंगे कि लेखक तो कच्चा और टुच्चा था ही, आखिर वह, बतौर संपादक, कैसे उसे छाप बैठा।

मैं इस तरह अगले महीने के अंक का इंतजार करने लगा कि ‘संपादक के नाम पत्र’ स्तंभ में उन सभी खतों का मुलायजा करूँगा, अपना गुनाह सर झुकाये स्वीकारूँगा, उन पाठकों को खत लिख कर माफी माँगने का तो नैतिक साहस नहीं है लेकिन उन सभी अनजान पाठकों से, जिन्होंने मुझे पढ़ने की ज़ेहमत उठाई और खत लिखे, मौन माफी माँगूगा। अगला अंक आते ही मैंने कंपकंपाते हुये, डरते हुये पन्ने पलटे, अनुक्रमाणिका में पृष्ठ संख्या देख सीधा ‘संपादक के नाम पत्र’ पर आया। खुद को कठोरतम धिक्कार सुनने के लिये तैयार किया। कुल तीन पन्नों में पच्चीस खत थे — पन्ना नौ, दस, ग्यारह। पहला खत संपादकीय पर था, दूसरा पिछले अंक में छपी किसी कविता को इस सदी की महानतम कविता बता रहा था, तीसरा जीवन में अनुशासनहीनता की आवश्यकता पर, चौथा वर्तमान राजनीति की तुलना हस्तमैथुन से कर रहा था, पाँचवां शब्दों के उचित उच्चारण से मनुष्य के जीवन पर होने वाले परिणाम की व्याख्या कर रहा था, सातवें की फिक्र थी इन दिनों यह पत्रिका अपने राजनैतिक विरोधियों से भी विज्ञापन ले रही है जो उसके समझौतावादी हो जाने का बड़ा सबूत है, दसवें का मानना था कि पिछले एक-डेढ़ साल में एक भी ऐसी कहानी इस पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुयी है जो दुनिया की महानतम कहानियों में शुमार हो सके, यह सामयिक साहित्य और इस पत्रिका के पतन का अकाट्य सूचक है, ग्यारहवें ने दो अंक पहले छपी किसी उपन्यास की समीक्षा से सहमति जतायी थी कि वाकयी वह उपन्यास इस भाषा में रचे गये साहित्य की श्रेष्ठतम कृति है…इत्यादि।

मेरी कहानी पर कोई टिप्पणी नहीं थी। मैंने अनुमान लगाया कि किसी अंक में छपी किसी रचना पर प्रतिक्रिया दो-तीन अंक बाद ही आती है क्योंकि जब तक पाठक उसे पढ़कर, संपादक को खत लिखते हैं, अगले अंक की कंपोजिंग हो चुकी होती है। मेरा अनुमान इस तथ्य से पुख्ता होता था कि इन पच्चीस में से सत्रह खत पिछले अंक में छपी सामग्री पर नहीं, उससे पिछले अंकों में छपी रचनाओं पर थे।

मैंने एक महीना इंतजार और किया, इकत्तीस दिन का महीना था, हरेक दिन मेरा छटपटाते हुये बीता। अगले महीने की पहली तारीख को मैं बुक-स्टॉल गया, मालूम हुआ अंक सात तारीख तक आता है। छः दिन और थे अभी। इस अंक में भी तीन पन्नों में सिमटे कुल चौबीस पत्र थे ‘संपादक के नाम पत्र’, लेकिन मेरी कहानी पर कोई टिप्पणी नहीं थी। मैंने एक महीना और इंतजार किया, जैसाकि इन अंकों में भी था अक्सर दूर-दराज के पाठकों के खत तीन-चार महीने तक आते थे। अगले दोनो अंकों में भी लेकिन उस कहानी पर कुछ नहीं था। अब मुझे विश्वास हो गया कि चूँकि इस पत्रिका के संपादक से मेरे दोस्ताना संबंध थे, शायद उसने मेरा लिहाज और सम्मान करते हुये खुद ही मेरे खिलाफ आये पत्रों को अपनी पत्रिका में जगह नहीं दी। लेकिन मेरा दायित्व था कि मेरी कड़ी भर्त्सना में लिखे गये उन पत्रों को मैं बाहर लाऊं, उन्हें उचित जगह दूं। मैंने तय किया कि किसी तरह से यह पत्र पत्रिका के दफ्तर से ले आऊँगा, उन्हें खुद ही प्रकाशित करवाउँगा। इस उद्देश्य से मैंने एक दिन पत्रिका के दफ्तर फोन किया, खुद को किसी पूर्वी राज्य का निवासी बताया और कहा कि मैं यह पत्रिका कई सालों से नियमित पढ़ रहा हूँ, कई पत्र लिखे हैं, सभी प्रकाशित हुये हैं लेकिन इस बार मैं बहुत निराश हुआ हूँ क्योंकि मैंने एक लेखक की कहानी पर (मैंने अपना नाम और उस चीज का नाम भी बताया) तीन महीने पहले दो पत्र संपादक के नाम लिखे थे लेकिन एक भी प्रकाशित नहीं हुआ। दफ्तर के क्लर्क ने मेरा फोन सहायक संपादक को दिया, मैंने उसे भी यही बात दोहरायी। उसने कहा कि वह पाठकों की प्रतिक्रिया बतौर आये पत्र खुद ही देखता है लेकिन उसकी निगाह में ऐसा कोई पत्र उस कहानी पर नहीं आया है। उसने फोन होल्ड कर अपने सहयोगियों से पूछा लेकिन उन्होंने भी यही जवाब दिया। उसने मेरा नाम पूछा कि शायद इस नाम से आया कोई पत्र किसी को याद हो, तो मैंने कहा कि आप मेरे नाम को मत देखिये आप यह याद करिये कि क्या उस कहानी पर कोई प्रतिक्रिया आयी थी। उसने कहा कि उसे याद नहीं आ रहा कि कोई प्रतिक्रिया आयी थी। उसने पूछा कि क्या मैं उस कहानी के लेखक का कोई दोस्त या रिश्तेदार हूँ, तो मैंने जवाब दिया कि मैं सिर्फ एक आम पाठक हूँ। खैर, अंत में यह कहते हुये कि कुछ पत्र डाक में खो जाते हैं, कुछ यहाँ दफ्तर में भी गुम हो जाते हैं, उसने कहा कि मैं चाहूँ तो इस बार सीधे उसे पत्र भेज सकता हूँ, उसने अपना पता भी दिया, कि वह उसे तुरंत प्रकाशित करवायेगा। उसने मुझे फोन करने के लिये धन्यवाद भी दिया कि मुझ जैसे गंभीर पाठकों की वजह से ही यह पत्रिका जीवित है।

इस फोन के बाद मैं समझ गया कि किसी ने उस चीज को दो पैराग्राफ से आगे नहीं पढ़ा, जाहिरी तौर पर इस योग्य भी नहीं माना कि इस पर कोई प्रतिक्रिया दी जाये, मुझे यह भी याद आया कि खुद सहायक संपादक को शायद वह चीज याद नहीं थी, पूरे तेरह मिनट फोन चला था लेकिन उसने एक भी बार उस पर कुछ नहीं कहा था, वह सौजन्यवश ही सही, दो पंक्तियाँ कह सकता था लेकिन उसने रत्ती भर उल्लेख नहीं किया था कि जिस चीज पर हम इतनी देर बात करते रहे वह आखिर थी क्या।

मैं वापस उसी जगह था जहाँ से तीन महीने बारह दिन पहले मेरी यात्रा शुरु हुयी थी, जब मेरे पास वह अंक आया था, मैंने अपने शब्द की सार्वजनिक दुर्दशा होते देखी थी। मैं दिन भर नौ पन्ने में सिमटी उस चीज को पलटता रहता — पच्चीस से तेतीस तक। कुल दो विज्ञापन थे इस बीच, एक पूरे पन्ने का, दूसरा चौथाई पेज का — नीचे, दाहिने तरफ। पहला एक सरकारी विज्ञापन था, किसी सिंचाई योजना से किसानों को होता अभूतपूर्व लाभ, दूसरा युवा लेखकों के लिये किसी मरहूम की याद में एक कहानी प्रतियोगता की घोषणा।

लगभग चार महीने हो गये थे, मैं एकदम पंगु होने लगा था। मैंने इस दौरान सिवाय उन काल्पनिक खतों के जो मेरे लिये भेजे गये थे लेकिन मुझ तक पहुँच नहीं पाये थे और कुछ नहीं लिखा था। मैं उस अंक के आने से पहले किसी नाटक की एक स्क्रिप्ट लिख रहा था अपने निर्देशक मित्र के लिये जो मेरी कहानी पर एक नाटक करना चाह रहा था लेकिन इन चार महीनों में मैं कायदे का एक वाक्य तक नहीं लिख पाया था, मैंने लोगों से मिलना भी छोड़ दिया था। पूरे दौरान मुझे डर लगा रहता कि शायद अब कोई पत्र मेरे नाम आयेगा, या शायद अब मेरे दोस्त मेरा लिहाज छोड़ मुझे लताड़ेंगे कि आखिर कैसे मैंने इसे छपवा लिया।

यह स्थिति चलती रही जब एक रात अपनी बालकनी में कुर्सी पर बैठे हुये मुझे यूकेलिप्टस के एक पेड़ पर किसी परिंदे के चीखने की आवाज सुनायी दी, वह परिंदा देर तक चिचियाता रहा। शायद किसी बिल्ली या सांप ने इस सोते हुये पक्षी को दबोच लिया था। न मालूम क्या था उस आर्तनाद में कि मुझे अपनी कहानी याद आयी और सहसा एहसास हुआ कि इसमें मेरा कहाँ दोष है, मैं क्यों खुद को कोस रहा हूँ, दरअसल गलती तो पत्रिका के संपादक, उसके प्रूफरीडर की है कि आखिर क्यों उन्होंने मेरी कहानी की ऐसी दुर्गति की। वह परिंदा अभी भी किसी की शिकंजे में फंसा चीख रहा था, उस अंधेरे में मुझे वह दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन इतना गहरा सन्नाटा था कि मैं उसके छटपटाते पंखों की बौखलाई फड़फड़ाहट भी सुन पा रहा था। मैं कुर्सी से खड़ा हो गया, मैं उसकी चीख से नहीं पहचान पा रहा था कि यह कौन सा पक्षी है —- कोयल, मैना या किंगफिशर। मेरा मन हुआ कि टॉर्च जला कर देखूँ, शायद पता चले किसने किस पर हमला किया है। अंधेरे में वह बेबस चीख गूँज रही थी। कुछ पल बाद फड़फड़ाहट शांत हो गयी, ठोस, सख्त सन्नाटा फिर से अंधेरे पर काबिज हो गया।

यह मेरे लिये इल्हाम का लम्हा था, अपने हक के लिये लड़ने का लम्हा। मैं अगले ही दिन पत्रिका के दफ्तर गया, संपादक को बतलाया कि आखिर कैसे उन्होंने मेरी रचना को बेइज्जत किया है। मैंने अपनी मूल पांडुलिपि और प्रकाशित रचना उसकी मेज पर रख दीं। उसने दोनो को पलटा और तुरंत स्वीकारा कि इस अवांछित संपादन की वजह से मेरी कहानी का जबरन स्खलन हो गया था। उसे आश्चर्य हुआ कि इतनी बड़ी भूल आखिर कैसे हो गयी। उसने माफी मांगी लेकिन उसने यह भी कहा कि पिछले एक साल से उसने प्रूफरीडिंग का काम किसी बाहरी एजेंसी को दे दिया है क्योंकि प्रूफरीडिंग काफी महँगी पड़ रही थी, यह एजेंसी सस्ते में कर देती है। अंक की सारी सामग्री उसे दे दी जाती है, दस दिन बाद मिल जाती है। उसने बताया कि आजकल बहुत सारी पत्रिकायें  प्रूफरीडिंग का काम किसी एजेंसी को दे देती हैं। उसने यह भी पूछा कि क्या मैं अपनी पिछली कहानियों की प्रूफरीडिंग से संतुष्ट था जो उसकी पत्रिका में प्रकाशित हुयीं थीं, मैंने हाँ कहा तो वह बोला कि इसका अर्थ कि यह एजेंसी ही अनपढ़ है, इसलिये अब वह सारी प्रूफरीडिंग पहले की तरह अपने ही दफ्तर में करवायेगा या किसी दूसरी एजेंसी को देगा।

मैं लेकिन इतने से संतुष्ट नहीं होना चाह रहा था। मैं उस इंसान के पास पहुंचना चाह रहा था जिसने मेरी कृति का अपमान किया। लेकिन मेरे संपादक मित्र को सिर्फ उस एजेंसी का पता मालूम था, उसे नहीं मालूम था कि किसने इसे प्रूफरीड किया था। अगले दिन मैं उस एजेंसी के दफ्तर पहुँचा, तो उसने बताया कि वह सारी पांडुलिपियाँ दूसरे शहरों में प्रूफरीडर्स के पास भेज देते हैं। जब मैंने कहा कि मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी कहानी को कहाँ भेजा गया था, किसने प्रूफरीड किया था, तो उसने पहले तो कहा कि यह पता लगाना बहुत मुश्किल है लेकिन मेरी जिद पर उसने अपनी फाइल टटोलीं और बताया कि उस पत्रिका का वह अंक यहाँ से पचास किलोमीटर दूर एक शहर भेजा गया था, वहीं किसी ने इसे प्रूफरीड किया होगा। मैं उससे उस जगह का पता लेकर आ गया। कुछ दिन सोचता रहा कि वहाँ यानि आपके पास आकर बताऊँ कि आपने मेरे साथ क्या किया है, लेकिन फिर लगा कि मैं क्यों आपको अपना चेहरा दिखाऊँ, क्यों अपनी पहचान बताऊँ, बेहतर होगा कि आपको एक खत लिखा जाये।

मैं अपनी पाँडुलिपि की फोटोकॉपी आपको भेज रहा हूँ, जिसमें आपके निशान लगे हैं, जिन्हें देख कर आप समझ सकते हैं कि आपने मेरे साथ क्या किया है।

उम्मीद है इसे पढ़कर आप तय कर लेंगे कि आपकी सजा क्या होनी चाहिये।

एक अनाम लेखक

मैं उस खत को देर तक पढ़ती रही। कई-कई बार पढ़ा। मुझे जरा भी याद नहीं आया कि कौन सी कहानी थी, याद आता भी नहीं क्योंकि मैं सिर्फ प्रूफरीड कर रही थी, उन रचनाओं को पढ़ थोड़े रही थी। जब देर तक मुझे नहीं सूझा तो मैंने उस पांडुलिपि को पलटा। पांडुलिपि और प्रकाशित कहानी को अक्षरशः पढ़ा। पूरे ग्यारह पन्नों में मैंने सिर्फ यह परिवर्तन किये थे —- नौ पन्ने की कहानी में तीन जगह मैंने पैराग्राफ तोड़ दिया गया था, दो जगह दो लंबे वाक्यों को जोड़ एक कर दिया था, एक जगह घिरियाना लिखा था, मैंने उसे बदल कर घिघियाना कर दिया था।

क्या सिर्फ यही था या कुछ और भी था जिसे मैं निगाह नहीं कर पा रही हूँ?

इसके बाद कई दिन तक मैं ऑफिस नहीं गयी, पूरा दिन उस पांडुलिपि को पढ़ती रही शायद कुछ और सूझ जाये। लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि मैंने किया क्या था, आखिर कौन है यह लेखक, और क्यों इसने मुझे यह खत भेजा है। इसके बाद मेरे भीतर एक अनजान सा द्रव्य फूटने लगा, मेरी धमनियों में बहने लगा, मुझे लगा मेरे भीतर खून नहीं यह द्रव्य बह रहा है, जिसका स्रोत न मालूम कहाँ है। मेरा मन हुआ कि इस लेखक से जाकर मिलूँ, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि यह कहानी कहाँ या किस पत्रिका में प्रकाशित हुयी है, मैंने मालिक से पूछा कि यह कहानी किसने प्रूफरीड करने के लिये भेजी है तो उसने बताने से मना कर दिया कि पहले ही मैं उनकी एजेंसी की बदनामी करा चुकी हूँ, अब और क्या बचा है। यानि मेरे पास कोई तरीका नहीं था इस लेखक के पास पहुँचने का। जल्दी ही मैंने ऑफिस छोड़ दिया, और दो महीने बाद सब कुछ छोड़ यहाँ, इस ड्रामा स्कूल आ गयी।”

****

उस रात अनन्या अपने बिस्तर पर देर तक रजाई ओढ़े औंधी पड़ी रही। उसकी देह पर दो अनाम, अदृश्य कीड़े कुलबुलाते रहे। डॉरमैट्री में चार लड़कियाँ अपने नाटक की रिहर्सल के बाद बेसुध सो रहीं थीं, पाँचवीं अपने पलंग के पास टेबिल लैंप जलाकर अपनी स्क्रिप्ट पढ़ रही थी। झारखंड के एक कस्बे से आयी यह लड़की नाटक में उस लड़की का रोल कर रही थी जो नया जीवन शुरु करने दूसरे शहर आती है, अपना नाम-पहचान बदल कहीं और मुड़ जाती है लेकिन सहसा एक दिन अपनी तस्वीर एक गुमशुदा के पोस्टर में पाती है। अनन्या इसी लड़की का रोल करना चाह रही थी लेकिन पाँच ऑडिशन के बाद भी जब वह एक डायलॉग तक ठीक से नहीं बोल पायी तो उसे पूरे नाटक से ही बाहर कर दिया गया था।

वह लड़की अपने डायलॉग बुदबुदा रही थी, अनन्या टेबिल लैंप के आलोक में कुलबुलाते उसके होंठ देखती रही। उसके होंठ की आहट से अनन्या उसके शब्दों का अनुमान लगाती रही। वह लड़की अपने किरदार में खोयी हुयी थी, उसे जरा भी अंदाज नहीं लगा कि अनन्या उठकर बैठ गयी है, उसे देख रही है। कुछ देर बाद अनन्या ने अपनी डायरी अपने बस्ते में से निकाली, बाहर आ गयी। मार्च की ठंडी, चमकदार रात में महादेव के मंदिर पर पीली झंडी किसी बेबस देवता की पुकार की तरह मचल रही थी। अनन्या मंदिर की दीवार से पीठ टिका कर बैठ गयी। झूमर की पहाड़ी पर अंधेरे के रूहानी परिंदे डुबडुबा रहे थे। उत्तर से दक्षिण की ओर जाते इन स्याह परिंदों के पंखों की छाया पहाड़ी पर किसी अनाम लिपि में कथा लिख रही थी। रात में इन पक्षियों को रास्ता कैसे सूझता होगा? इस वक्त ये कहाँ जा रहे होंगे?

अनन्या ने डायरी खोली, लिखना शुरु किया:

बाईस फरवरी, रात दो पैंतीस। ड्रामा स्कूल की एक रात।

सात महीने पहले मैं यहाँ क्यों आयी थी, मुझे अभी भी ठीक से नहीं मालूम। क्या मुझे यहाँ आना चाहिये था? क्या मैं यहाँ से कभी निकल पाउँगी? मैं एक ऐसी लड़की का किरदार निभाना चाहती थी जो सब कुछ छोड़ एक अजनबी शहर चली जाती है, लेकिन अब मैं जिन अनेक स्त्रियों के किरदार इस नाटक में जी रही हूँ, क्या उनमें से किसी में भी मेरा प्रतिबिंब है या वे सभी मेरी ही प्रतिरूप हैं? या मैं एक ऐसे नाटक में दाखिल हो चुकी हूँ जिसमें मनुष्य फरेब का अनिवार्य प्रतिरूप है, फरेब ही अंतिम सत्य है? ै

 सहसा उड़ता हुआ एक परिंदा अपने समूह से अलग हो गया। सभी परिंदे समान गति में, एक अदृश्य धागे, लय में बंधे उड़ रहे थे। वह परिंदा पंक्ति के बीच में था, पहले उसने अपनी गति धीमी की, वह धीमे धीमे पीछे होता गया, कुछ देर बाद सबसे आखिरी परिंदा वही था। फिर वह चुपचाप सबसे अलग गया। तकरीबन बीस परिंदे थे लेकिन किसी को एहसास नहीं हुआ कि उनका साथी अब उनके साथ नहीं है। अनन्या को लगा कि शायद वह थक गया था, कुछ पल उसने अपनी चाल धीमी की थी सुस्ताने के लिये कि बाकी सब उसे छोड़ कर चले गये। लेकिन ऐसा नहीं था। कुछ देर तक धीमे धीमे पंक्ति के पीछे उड़ते रहने के बाद सहसा उसकी चाल तेज हुयी और वह पूरब की तरफ उड़ चला। इस बार वह काफी तेज गति से उड़ रहा था, स्कूल की ओर आ रहा था। देर तक उड़ते रहने के बाद वह स्कूल के सामने घाटी के बीच आकर हवा में थम गया। शायद सुस्ता रहा था। नीचे गहरी घाटी थी, देवदार के पेड़ भी। वह चाहता तो किसी पेड़ पर बैठ सकता था लेकिन हवा में ही अटका रहा।

अंधेरे में वह पक्षी आखिर क्यों अपने कुनबे से अलग हुआ था? अलग होकर यहाँ क्यों आ गया था?

अनन्या को अपने प्रूफरीडिंग के दिनों में पढ़ी वह कहानी याद आयी। अमूमन प्रूफरीडिंग की चीजें कम ही उसे याद थीं लेकिन यह वही कहानी थी जिसके लेखक ने उसे लंबा सा खत लिखा था। यह कहानी एक ऐसे लेखक के बारे में थी जो अपनी मातृभाषा को छोड़ किसी अन्य भाषा में लिखना चाहता है। वह पूरी जिंदगी अपनी मातृभाषा में लिखता रहा है, इस लिखे का ठीक-ठाक सम्मान भी हुआ है, लेकिन सहसा उसे यह भाषा अपर्याप्त लगने लगती है या शायद वह इसका बेइंतहा अभ्यस्त हो चुका होता है, उसे इसमें अब कोई चुनौती नजर नहीं आती, वह इसके सुकून और सुविधा को त्यागना चाहता है। या शायद वह अपने पूर्वजों से त्रस्त है, पितृदोष से ग्रस्त है, वे लेखकीय पूर्वज जो उसकी मातृभाषा में लिखते आये हैं। वह भाषा जिसका हरेक अक्षर उसे अपने पुरखों के लहू में डूबा नजर आता है, जिसके हरेक शब्द पर उनकी उँगलियों के अमिट निशां दर्ज हैं, जिसकी समूची वर्णमाला पर वे हल चला बंजर कर चुके हैं। उसे अपनी लिखी कहानियों का हरेक लम्हा अपने पूर्वजों के अदम्य और असंभव शिकंजे की गिरफ्त में नजर आता है, दमघोंटू शिकंजा जिसके भीतर कैद उसके किरदार छटपटाते रहते हैं। उसे अपने लिखे से धीरे धीरे नफरत होने लगती है, वह अपनी कहानियों को जला कर राख कर देना चाहता है।

ऐसी ही एक रात उसे लगता है कि अपनी मातृभाषा से दूर जाये बगैर वह अपने पुरखों के प्रेत से मुक्त नहीं जा पायेगा। उसे लगता है कि कोई नयी भाषा सीखनी चाहिये, एकदम अजनबी भाषा, जिसे न तो वह जानता हो, न ही उसमें लिखी किसी अनूदित किताब या रचना को उसने पढ़ा हो, जिसकी कोई स्मृति उसके भीतर न हो, जिस भाषा को वह एक शिशु की तरह सुने, सीखे, उसके संकेत, ध्वनियाँ अपने अंतर में दर्ज होता महसूस करे। इस भाषा के संपर्क में आने का अनुभव कुछ ऐसा हो कि उसके भीतर से उसका अतीत, पिछली भाषा और उसका दर्ज संस्कार पूरी तरह से मिट जाये, इस भाषा की सृष्टि में वह किसी नवजात शिशु की तरह आँख खोले, उसकी काया को अपने बोध की कंपकंपाती उंगलियों से स्पर्श करे, उसके शब्दों की थाप उसकी रूह पर गूँजती रहे, और फिर वह इस नयी भाषा में, उसके नये व्याकरण में मानव जाति का अंतिम उपन्यास लिखे, एक ऐसी कथा जिसके दरबार में कायनात के समूचे अफसाने पनाह मांगने घिसटते आयें।

यह भाषा कौन सी हो, इसके चुनाव के लिये वह बहुत मशक्कत नहीं करता। वह दुनिया के नक्शे पर आँख बंद कर उंगली रखता है, पहली और दूसरी बार उंगली किसी ऐसे देश पर जाती है जिसकी भाषा वह जानता है। तीसरी बार अपने ही देश पर उसकी उंगली जा टिकती है। चौथी बार एक ऐसे देश पर जाती है जिसकी भाषा तो वह नहीं जानता, लेकिन जहाँ ऐसे लोग रहते हैं जो उसकी भाषा जानते हैं। पाँचवीं मर्तबा वह ऐसे देश पर आता है जहाँ कोई उसकी भाषा नहीं जानता, वह उनकी भाषा नहीं जानता, लेकिन उसने उस भाषा से अनूदित कुछ किताबें पढ़ रखीं हैं। दसवीं मर्तबा उसकी उँगली ऐसे देश पर जाती है जिसका उसने कभी नाम भी नहीं सुना था, जिसकी भाषा से भी वह एकदम अपरिचित है।

वह उस देश में रहने चला जाता है, महीनों तक ऐसे लोगों के बीच रहता है। चूँकि उसके व अन्य लोगों के बीच कोई संपर्क भाषा नहीं है इसलिये वह उनकी बात समझ पाता है न उनसे संवाद कर पाता है, उनकी किताबें पढ़ पाता है न ही कोई उसे अपनी भाषा सिखा पाता है। वे सिर्फ संकेतों में ही बात कर पाते हैं। धीरे धीरे वह उनके हाव-भाव पढ़ कुछ शब्द सीखता है, साल भर बाद उनकी लिपि पढ़ना शुरु करता है।

अनन्या अंधेरे में पहाड़ को देख रही होगी, कहानी के शब्द उसके जेहन से उतर हवा में अपनी इबारत लिखते जा रहे होंगे कि उस वक्त वहाँ से गुजरता कोई भी आकाश में दर्ज हो रही उस कथा को पढ़ सकता होगा। परिंदा अभी भी घाटी के बीच में हवा में टंगा हुआ होगा। सहसा वह अटक जायेगी, उसे कहानी का अगला दृश्य याद नहीं आयेगा —- नयी वर्णमाला पर अपनी पकड़ बना लेने के बाद जब उस लेखक ने उपन्यास लिखना शुरु किया तो क्या हुआ। या शायद वह इसके आगे की कथा को याद ही नहीं करना चाहती होगी।

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