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धर्मवीर हमारे दौर में कबीर की तरह जिए

धर्मवीर नहीं रहे. सन 2000 के आसपास उनकी पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ ने हिंदी आलोचना को सर के बल खड़ा कर दिया था. भक्तिकाल की जो ब्राह्मणवादी व्याख्याएँ की गई हैं उनके ऊपर वे बहुत तार्किक तरीके से प्रश्न खड़े करते हैं. अगर वे और पुस्तकें न भी लिखते तो भी एक क्लासिक के लेखक के रूप में याद किये जाते. लेकिन वे हिंदी साहित्य के ब्राह्मणवादी दायरे को तोड़ने के बड़े प्रोजेक्ट के लिए लेखन कर रहे थे. वे समकालीन हिंदी में कबीर की तरह थे जिन्होंने लगातार हिंदी के मठों-गढ़ों के ऊपर सवाल खड़े किये, उनको असहज बनाया. उनका जाना सच में एक बहुत बड़ा शून्य है जो इतनी आसानी से नहीं भरा जाने वाला है. आज उनकी उसी ऐतिहासिक पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ के अंश. पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी- मॉडरेटर

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यह पुस्तक कबीर पर मेरी बड़ी योजना का एक हिस्सा है इस में मैंने कबीर के ब्राह्मणवादी समीक्षकों को समझना चाहा है। इसमें पता चलता है कि ब्राह्मणवादी समीक्षकों ने कबीर के दर्शन और सामाजिक सन्देश के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं बरता। उन्होंने कबीर की नहीं बल्कि कबीर के भीतर रामानन्द ब्राह्मण को बैठाकर उसकी प्रशंसा की है। मूल कबीर से ये भी बचते रहे हैं। इनकी यह भी कोशिश रही है कि कहीं यह सिद्ध न हो जाए कि कबीर दलितों के किसी पुराने धर्म के प्रचारक एवं अपने किसी नए धर्म के प्रवर्तक थे। उन सबका उद्देश्य इस सम्भावना पर रोक लगाना है कि हिन्दू धर्म को छोड़ कर भारत के दलितों का कोई नया या अलग धर्म भी हो सकता है- डॉ. धर्मवीर

अध्याय-1

कबीर का समय : जन्म और उनकी मृत्यु

कबीर के जन्म और उनकी मृत्यु के समय और स्थान के बारे में विद्वानों की एक राय नहीं है। इसका एक कारण यह है कि इतिहास और भूगोल की दृष्टि से अभी कुछ निश्चयात्मक रूप से तय नहीं हो पाया। जो कुछ सूचनाएँ प्राप्त होती हैं वे ढीले अन्तःसाक्ष्य, कमजोर बाह्य प्रमाण और पक्षधरता की साम्प्रदायिक जनश्रुतियों के माध्मय की हैं। तथ्यों की इन कठिनाइयों के साथ विद्वानों के दृष्टिकोण भी ठीक नहीं हैं। तथ्यों को लेकर विद्वान लोग जिस अनुमान का सहारा लेते हैं वह नाम मात्र का अनुमान होता है। वास्तव में वह उनकी कल्पना शक्ति भी होती है। विद्वानों की कल्पना शक्ति उनकी साम्प्रदायिक भावनाओं की पिछलग्गू बन कर रह जाती है। अपनी विशेष पक्षधरता के कारण वे सच्चाई के साथ खींचतान और तोड़-मरोड़ तक करते हैं। इस तोड़-मरोड़ में उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि वे किस प्रकार के असामान्य निष्कर्ष निकाल रहे हैं।

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने कबीर के जन्म और मरण का एक विवरण पत्र तैयार किया है। यह विवरण विभिन्न पुस्तकों के आधार पर बनाया गया है। इसे नीचे दिया जा रहा है।1

क्रम पुस्तक का नाम विक्रम संवत् ईस्वी सन् आयु वर्षों में

सं.

जन्म मरण जन्म मरण

1.कबीर कसौटी 1455 1575 1398 1518 120

2.भक्ति सुधा बिंदु संवाद 1451 1552 1394 1495 101

3.कबीर एण्ड दी कबीर पंथ 1497 1575 1440 1518 78

4.सम्प्रदाय 1205 1505 1149 1448 300

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  1. कबीर वचनावली, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, नागरी प्राचिरणी सभा, काशी, 11 संस्करण, संवत् 2015

इस चार्ट में हरिऔध जी ने यह भी सूचना दी है कि डॉक्टर हंटर ने कबीर का जन्म सन् 1380 ई. विक्रम 1434 में लिखा है तथा विल्सन ने उन की मृत्यु सन् 1448 ई. अर्थात् संवत् 1505 में बतलाई है।

कबीर के जन्म के बारे में समय जो लिखित काव्य सामग्री उपलब्ध है, वह इस प्रकार है :

  1. संवत् बारह सौ पाँच में ज्ञानी कियों विचार।

काशी में परगट भयो शब्द कहो टकसार।

  1. चौदह सौ पचपन साल गए चन्द्रावर एक ठाठ ठए;

जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी प्रगट भए।2

कबीर की मृत्यु के संबंध में जो प्रचलित काव्य पंक्तियाँ मिलती हैं, वे इस प्रकार हैं :

  1. पन्द्रह सौ औ पाँच में मगहर कीन्हो गौन।

अगहन सुद एकादसी, मिल्यो पौन में पौन।

  1. पन्द्रह सै उनचास में मगहर कीन्हो गौन।

अगहन सुदी एकादशी मिलो पौन में पौन।।

  1. समन्त पन्द्रा सौ उनहत्तरा रहाई।

सतगुर चले उठि हंसा ज्याई।।

  1. संवत् पन्द्रह सौ पछहत्तरा किया मगहर को गवन।

माघ सुदी एकादशी रलो पवन में पवन।।3

जो अन्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं वे जनश्रुतियों में रले मिले इस प्रकार हैं :

  1. बिजली खां ने संवत् 1507 (सन् 1450 ई.) में अमी नदी के कनारे तथा बस्ती जिले के खिरनी नामक स्थान पर कबीर के रोजे का निर्माण करवाया था। इसका नवाब फिदाई खां द्वारा संवत् 1624 (सन् 1567) में जीर्णोद्धार करवाया गया था।4
  2. यह भी माना जाता है कि असम के प्रसिद्ध भक्त शंकर देव (संवत् 1506 : 1625) ने अपनी उत्तर भारत की बारह वर्षीय तीर्थ यात्रा (संवत् 1540 : 1532) के अवसर पर कबीर की समाधि के दर्शन किए थे।5

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2.कबीर साहित्य की परख। परशु राम चतुर्वेदी, भारती भंडार, लीडर प्रेस, इलाहाबाद प्रथम संस्करण संवत् 2011, पृ-268

  1. वही, पृ.-268
  2. वही, पृ.-273

इनके अतिरिक्त कबीर के बारे में कुछ और जन श्रुतियाँ प्रचलित हैं जो इस प्रकार हैं :

  1. कबीर रामानन्द (संवत् 1356 : 1467) के समकालीन थे।6
  2. कबीर का संवत् 1551 में सिकन्दर लोदी से काशी में आमना-सामना हुआ था। सिकन्दर लोदी ने उन्हें उनके धार्मिक सिद्धान्तों के लिए दण्डित किया था। तब कबीर को काशी छोड़कर मगहर जाना पड़ा था।7
  3. नानक की (संवत् 1526 : 1596) कबीर के साथ संवत् 1553 में नानक की 27वें वर्ष में भेंट हुई थी।6
  4. कबीर को झूंसी वाले तकी (मृत्यु संवत् 1466) का समसामयिक माना जाता है।9
  5. कबीर की आयु 120 वर्ष की थी।10

कबीर के जन्म और मरण काल के बारे में मूल सामग्री और जानकारी इतनी ही है जो ऊपर दी गई है। विद्वान अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार इस सामग्री में से यह या वह संवत् चुनते रहते हैं। लेकिन ज्यादातर हिन्दू लेखकों का संवत् चुनने का आधार वैज्ञानिक और तथ्यपरक नहीं है। केवल कुछ ही भारतीय विद्वान और विदेशी विद्वान वैज्ञानिक आधार को अपनाते हैं। एक हिन्दू लेखक डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत का तर्क देखा जा सकता है कि वह कितना कमजोर तर्क है—‘‘अनन्त दास की परिचई के अनुसार कबीर ने 120 वर्ष की आयु पाई थी। कबीर ऐसे महात्मा की इतनी आयु का होना आश्चर्यजनक भी नहीं है। हम ऊपर कबीर की जन्म तिथि संवत् 1455 निश्चित कर चुके हैं। 1455 में 120 जोड़ देने पर उनकी मृत्यु तिथि 1575 हो जाती है। अतः इन सभी तिथियों में मेरी समझ में संवत् 1575 वाली तिथि ही प्रमाणिक माननी चाहिए। इससे कबीर को सिकन्दर लोदी, स्वामी रामानन्द तथा नानक चैरू, समकालीन मानने में बाधा नहीं पड़ती है।’’11 कबीर ही नहीं,

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5-वही, पृ.-292

  1. वही, पृ.-284
  2. वही, पृ.-270
  3. वही, पृ.-271
  4. वही, पृ.-274
  5. कबीर की विचार धारा, डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत, साहित्य निकेतन, श्रद्धानंद पार्क, कानपुर, द्वितीय संस्करण, संवत 2014, पृ.-9
  6. वही, पृ.-47

डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत रामानन्द के बारे में भी इसी तर्क का इस्तेमाल करते हैं। वे लिखते हैं—‘‘हम रामानन्द का समय संवत् 1385 से लेकर 1505 तक निश्चित कर सकते हैं। इस निश्चय के अनुसार उनकी आयु 120 वर्ष की आती है। जनश्रुति भी है कि उन्होंने 120 वर्ष की आयु प्राप्त की थी। रामानन्द ऐसे योगी और महात्मा की आयु 120 वर्ष होना स्वाभाविक ही है।’’12 सोचा जा सकता है कि ऐसे विद्वान की बात कैसे मानी जा सकती है। इन विद्वान को मनुष्य की 120 वर्ष की आयु अस्वाभाविक नहीं लग रही है और उन्होंने मनुष्य को महात्मा कह कर रामानन्द और कबीर की आयु बड़ी जल्दी 120 और 120 वर्ष की मान ली है।

कबीर की मृत्यु संवत् 1505 में न मानने का डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत का एक और तर्क देखा जा सकता है। वे लिखते हैं—‘‘ब्रिग्स साहब सिकन्दर लोदी का आगमन सन् 1494 में मानते हैं पर आरकेलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया में लिखित तथ्यों के आधार पर सिकन्दर लोदी और कबीर का इस तिथि पर मिलना असम्भव सिद्ध हो जाता है क्योंकि उसमें लिखा है कि सन् 1450 में बिजली खाँ ने आमी नदी के दाहिने तट पर कबीर शाह का रोजा बनवाया था तथा 1567 में फिदई खाँ ने उसकी मरम्मत करवाई थी।’’ इसका तात्पर्य यह है कि कबीर 1450 तक सतलोकगामी हो चुके थे। इस मत के आधार पर कुछ ही लोग यह मानने लगे हैं कि कबीर की निधन तिथि सन् 1450 के पूर्व किसी समय है। डॉ. राम कुमार वर्मा का मत इससे भिन्न है। उनका अनुमान है कि ‘‘बिजली खाँ कबीर का भक्त था। उसने मगहर में उनकी जन्मतिथि के उपलक्ष में रोजा बनवाया था। पर वहाँ की बनी हुई समाधि इस बात की विरोधिनी प्रतीत होती है। मेरा अनुमान है कि सर्वे का तिथि निर्देश केवल अनुमान मूलक है और किसी पुष्ट प्रमाणों पर आधारित नहीं है। अतः हमें उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए।’’13

यहाँ डॉ. राम कुमार वर्मा की मानसिक भागदौड़ देखी जा सकती है कि बिजली खाँ ने कबीर का रोजा उनकी जन्म तिथि के उपलक्ष में बनवाया था। यह बाद में देखा जाएगा कि कबीर की जन्म तिथि किसी हालत में भी तय नहीं हो सकती थी लेकिन पहले डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत का तर्क देखा जाए कि सर्वे की तिथि निर्देश केवल अनुमान मूलक है और किन्हीं पुष्ट प्रमाणों पर आधारित नहीं है, इसलिए उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए। अजीब बात है कि डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत सर्वे के अनुमान अपने अनुमान से काट कर रहे हैं। उन्होंने सर्वे के अनुमान को मान लिया है और अपने अनुमान को प्रमाण। उन्हें मालूम होना चाहिए कि सर्वे अनुमान वैज्ञानिक हुआ करते हैं। सर्वे के अनुमान को काटने के


वही, पृ.-28

  1. वही, पृ.-25-6

लिए डॉ. त्रिगुणायत की मात्र कल्पना की उड़ान पर्याप्त नहीं है। अनुमान के सामने दूसरा अनुमान लाया जा सकता है पर इस प्रकार के मानने के आधार पर नहीं कि मनुष्य की महात्मा के रूप में 120 वर्ष की आयु स्वाभाविक है। सच बात यह है कि यदि सर्वे के अनुमान पर ध्यान नहीं दिया जाना है तो फिर उसके मुकाबले में जनश्रुति पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए।

अब एक डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत की बात छोड़ी जाए और देखा जाए कि इन सारे विद्वानों के कबीर के जन्म और निधन के बारे में परस्पर विचार मिलते हैं। ऐसे समय में कबीर का विद्यार्थी क्या कर सकता है ? उसके सामने ऐतिहासिक तथ्य, जनश्रुतियाँ और साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह हैं—और उसे निश्चयात्मक रूप से कुछ सही-सही सिद्ध करना है। सत्य की खोज का रास्ता नीर-क्षीर विवेक का है। वह भी कुछ नष्ट न करे बल्कि उपलब्ध तथ्यों को अलग-अलग करके सशर्त बना दे। साहित्य की उपलब्ध सामग्री में सभी कुछ ठीक है पर वह यह बताए कि कौन सी बात ऐतिहासिक है, कौन सी मनोवृत्ति जनश्रुतियों को खड़ी करने में सामाजिक रूप से निर्णायक बनी है। और किस लड़ाई की वजह से इस पंथ के खिलाफ षड़्यंत्र रचे गए हैं। जो सामग्री के रूप में इकट्ठा मिलता है। उसे अलग-अलग करके देखें और जो अलग-अलग मिलता है उसे इकट्ठा करके देखें। अपनी पूर्व मान्यताओं को झिंझोड़ देने का अवसर दे और सही बात को सही कहने का साहस करें। उसे जो अपनी सामाजिक लड़ाई लड़नी है वह लड़ाई को बिना तथ्यों तो तोड़े-मरोड़े भी जारी रख सकता है। लड़ाई में ऐतिहासिक सत्य को नकारने के रूप में इस्तेमाल न करें।

कबीर के जन्म और निधन की तिथियों को जानने से पहले मोटे रूप में यह तय कर लेना चाहिए कि उनके समय का ज्यादा से ज्यादा फैलाव आगे और पीछे कहाँ तक जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि प्रत्यक्ष प्रमाणों के अभाव में यह जान लिया जाए कि कबीर किस सन्त के बाद हुए थे। इसके लिए यह जानना पर्याप्त होगा कि उन्होंने अपनी रचनाओं में किन सन्तों या महापुरुषों का नाम लिया है—इसके उत्तर में कबीर ग्रन्थावली में एक सूचना मिलती है। उसमें कबीर कहते हैं-‘‘गुरु परसादी जैदेव नामा : भगति के प्रेम इन्हहिं है जाना।’’14 यदि यह पंक्ति कबीर की है तो यह सिद्ध हो जाता है कि जयदेव और नामदेव कबीर से पहले हो चुके हैं। यह बात फिर अलग है कि नामदेव के जन्म और मरण के बारे

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  1. हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, लेखक डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, अनुवाद परशुराम चतुर्वेदी, अवध पब्लिशिंग हाउस, पान दरीबा, लखनऊ, प्रथम संस्करण, संवत् 2007, पृ.-32-3

में भी इन विद्वानों ने भ्रम फैला रखा है और उसमें कुछ निश्चय से तय नहीं होने दिया है। डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत बताते हैं कि डॉ. भण्डारकर ने नाम देव का समय तेरहवीं शताब्दी का अन्तिम चरण माना है। इससे यह अनुमान लगाना अनुचित नहीं होगा कि कबीर का समय तेरहवीं शताब्दी के बाद तक पड़ सकता है। उधर, कबीर का उल्लेख ऐतिहासिक पुस्तक ‘आइने अकबरी’ में आया हुआ बताया गया है। आइने अकबरी का रचनाकाल सन् 1596 माना गया है। दूसरे, कबीर के साहित्य में कहीं ‘मुगल’ शब्द का प्रयोग भी नहीं हुआ है। जहाँ कहीं उनके साहित्य में ‘मुगल’ शब्द का प्रयोग मिलेगा उस अंश को प्रक्षिप्त ही मनना पड़ेगा। हिन्दुस्तान में बाबर की शुरुआत मुगल काल सन् 1526 से माना गया है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कबीर का समय 1526 से पहले का होना चाहिए। फिर नानक और बाबर का समय एक माना गया है। नानक ने सन् 1521 में बाबर द्वारा किए गए भारत पर आक्रमण का वर्णन अपनी अष्टपदियों में किया है। फिर, कबीर का समय नानक के समय से बहुत दूर पड़ गया है। जनश्रुति यह भी है कि नानक की कबीर से भेंट हुई थी लेकिन नानक की वाणी इसका खण्डन करती प्रतीत होती है। नानक वाणी में कबीर नानक के सामने जिस रूप में पेश आए हैं यहाँ वे पंक्तियाँ उद्घृत की जा सकती हैं :

यक अरज गुफ्तम पेसि तो दर गास कुन करतार।

हका कबीर करीम तू बे ऐब परवदगार।।15

(हे कर्तार, मैंने तेरे पास एक विनती की है, कान लगा के सुन, तू सच्चा है, बड़ा है, दयालू है, दोष रहित और पालनकर्ता है।)

इस प्रकार कबीर का समय 14वीं और 15वीं शताब्दियों के बीच में कहीं होना चाहिए।

अब यह कैसे तय किया जाए कि 14वीं और 15वीं शताब्दियों में से कबीर का वास्तविक समय कहाँ से कहाँ तक बैठ सकता है। यहाँ मूल विषय पर आने से पहले ही यह तय कर लेना चाहिए कि आयु 120 वर्ष की थी। इसमें जब तक कबीर की आयु का सही-सही पता नहीं चलता तब तक उनकी आयु की दूसरे लोगों की आयु से तुलना कर लेनी ठीक रहेगी। नीचे हिन्दी के कुछ प्रमुख पुराने कवियों की और नानक की आयु और उनका समय दिया जा रहा है। ये इस प्रकार हैं :

  1. नानक वाणी, डॉ. जयराम मिश्र, लोक भारती प्रकाशन, 15ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-1, द्वितीय संस्करण, 1988, पृ.-427

क्रम सं. कवि का नाम जन्म संवत् मृत्यु संवत् आयु

  1. विद्यापति 1417 1505 88 वर्ष
  2. कबीर 1455 1575 120 वर्ष
  3. नानक 1526 1596 70 वर्ष
  4. सूरदास 1535 1620 85 वर्ष
  5. मीराबाई 1555 1603 48 वर्ष
  6. मलिक मुहम्मद जायसी 1557 1600 43 वर्ष
  7. तुलसीदास 1589 1680 91 वर्ष
  8. केशवदास 1612 1676 64 वर्ष
  9. बिहारी 1652 1721 69 वर्ष

10 भूषण 1692 1772 80 वर्ष

  1. देवदत्त 1730 1824 94 वर्ष16

इस तालिका में कबीर की आयु को देखते ही माथा ठनकता है। लगता है कि उनकी आयु के बारे में कुछ असमान्य जरूर है। जब उनकी समानता के अन्य लोगों में से किसी सी भी आयु 100 तक भी नहीं गई तो कबीर की आयु को एकदम 120 वर्ष तक पहुँचा देना कपोल-कल्पित-सा लगता है। इस तालिका से डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत के उन कथनों की कलई खुल जाती है कि ‘‘कबीर ऐसे महात्मा को इतनी आयु होना भी आश्चर्यजनक भी नहीं है’’ या ‘‘रामानन्द ऐसे योगी और महात्मा की आयु 120 वर्ष होना स्वाभाविक ही है।’’ यहाँ औसत निकलाने की आवश्यकता नहीं है लेकिन सबसे अधिक 94 वर्ष की आयु का केवल एक व्यक्ति है। यदि अनुमान का प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह सहारा लेना पड़े तो कबीर की आयु ज्यादा से ज्यादा 90 वर्ष तक मानी जा सकती है लेकिन हिन्दू लेखक प्रत्यक्ष के अभाव में और अनुमान से परे अपनी सम्भावनाओं का सहारा लेते हैं। डॉ. श्याम सुन्दर दास लिखते हैं—‘‘इन सब बातों पर एक साथ विचार करने से यही सम्भव जान पड़ता है कि कबीरदास जी का जन्म संवत् 1456 में और मत्यु संवत् 1575 में हुई होगी। इस हिसाब से उनकी आयु 119 की होती है और जिस पर बहुत लोगों को विश्वास करने की प्रवृत्ति न होगी परन्तु जो इस युग में भी असम्भव नहीं है।’’2 यह हिन्दू विद्वानों की मनमानी की पराकाष्ठा है। पूछा जा सकता है कि इन कवियों में अनेक महात्मा हुए हैं पर उनकी उम्र, उनके महात्मा होने के कारण 120 वर्ष तक क्यों नहीं जा सकी ?

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  1. प्राचीन कवियों की काव्य साधना, राजेन्द्र सिंह गौड़, साधना सदन, इलाहाबाद-1, तृतीय आवृत्ति, 1952

कबीर की 120 वर्ष की आयु के बारे में दो बातें हो सकती हैं—या तो कबीर खुद असामान्य आयु तक जीवित रहे थे या उनके बारे में जो अन्य लोगों ने असामान्य बातें गढ़ी हैं। ऐसा नहीं लगता कि कबीर 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे होंगे। उनके साहित्य और उनके जीवन संघर्ष को देखकर यह नहीं माना जा सकता कि वे एक दिन भी निष्क्रिय रहे होंगे। यदि कबीर 120 वर्ष तक जीवित रहे हों तो यह भी सम्भव है कि उनके बुढ़ापे का काफी समय निष्क्रियता में बीता हो। प्रश्न यही है—क्या वे अपने जीवन में कुछ वर्षों तक निष्क्रिय रहे थे ?

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