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‘मैला ‘आँचल’ बड़ी रचना है या ‘परती परिकथा’

फणीश्वरनाथ रेणु और मार्केज़ दोनों के जन्मदिन आसपास पड़ते हैं. दोनों के लेखन में एक समानता थी कि दोनों ने ही ग्लोबल के बरक्स लोकल को स्थापित किया. यह अलग बात है कि रेणु जी हिंदी के लेखक थे इसलिए उनकी व्याप्ति वैसी नहीं हो पाई. लेकिन पाठकों के बीच उनकी गहरी व्याप्ति है. उनके जन्मदिन, उनकी पुण्यतिथि के आसपास उनकी रचनाओं को लेकर हर साल बहसों का दौर चलता है. लेखक पुष्यमित्र का यह लेख रेणु जी के उपन्यासों पार्टी परिकथा और मैला आँचल के ऊपर एक टिप्पणी है- मॉडरेटर

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कल से कई लोगों ने लिखा है कि परती परिकथा रेणुजी की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इस उपन्यास में जिस तरह की भव्यता है, उसके हिसाब से लोगों की यह स्वाभाविक राय है। हालाँकि मैं व्यक्तिगत रूप से इस राय से असहमत हूँ। मैं मैला आँचल को ही उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानता हूँ। परती परिकथा में एक सम्मोहन जरूर है। ताजमनी, भिम्मल मामा और जमींदार पुत्र जित्तन के किरदार आपको आकर्षित करते हैं। उनके पिता का एक अंग्रेज महिला से प्रेम प्रसंग, सेमा चकेवा का प्रसंग और रग्घू रामायणी द्वारा गायी गई कोसी कथा का भी अपना आनंद है। सर्वे सेटलमेंट के माहौल को भी बखूबी उभारा गया है। मगर यह पूरी कथा आपको कहीं पहुंचाती नहीं। कुल मिलाकर यह किताब कोसी के खूबसूरत अनुभवों का एक कोलाज बन कर रह जाती है।

दरअसल, रेणुजी ने यह किताब भी नेहरू जी के आकर्षण में बंध कर लिखी है। उन्हें लगा था कि कोसी हाई डैम का एक सपना उनकी दुनिया को बदल देगा। हालाँकि यह सपना-सपना ही रह गया। कोसी की दुनिया कभी नहीं बदली। परती जमीन जलजमाव का शिकार हो गयी। इस किताब में मुझे जित्तन हमेशा नेहरू जी की प्रतिकृति लगते हैं। एक आदर्शवादी, पश्चिमी विचार से प्रभावित युवक जो अपनी दुनिया को पश्चिमी नजरिये से बदलना चाहता है। उसके तमाम प्रतीक यही इशारा करते हैं। उसके अपने प्रेम प्रसंग हैं, अपना अकेलापन है। और समाजवादी टाइप राजनेता लुत्तो उसे परेशान करता है। मगर गांव अंततः जित्तन को देखकर करुणा से भर उठता है। क्योंकि वह बड़े बाप का बेटा होकर भी कष्ट सहने लोगों की मदद करने गांव आ गया है। इस उपन्यास के सम्मोहन से बचकर जब आप इसे देखेंगे तो ये बातें समझ आएँगी।

वहीँ, मैला आँचल एक नायक विहीन कथानक है। आजादी के बाद का गांव है, गरीबी है जो सबसे बड़ी समस्या है। फिर हर तरह की राजनीति है। कांग्रेस से लेकर, समाजवाद और साम्यवाद तक। तहसीलदार हैं, हालाँकि कई मौके पर उसे भी लेखक की सहानुभूति हासिल होने लगती है, मगर अंत तक इस मामले में बैलेंस बना रहता है। गांव के तमाम शक्ति केंद्र ऐसे लगते हैं कि जैसे किसी राष्ट्र के शक्ति केंद्र हों। ऐसा लगता है कि मेरीगंज में पूरा देश मौजूद हो।

इस कथा की सबसे बड़ी खूबसूरती बाबन दास का वह किरदार है जो आजादी के बाद हर तरफ फ़ैल रही निराशा का प्रतीक बन जाता है। वह उन तमाम किरदारों के बीच आदर्श बनकर उभरता है, जो आज़ादी के बाद लगातार छुद्र स्वार्थों का शिकार होते जा रहे हैं। उनमें तहसीलदार, कांग्रेस के कार्यकर्त्ता, समाजवादी और साम्यवादी नेता तो हैं ही, बलदेव जैसा आदर्शवादी गांधीवादी और कालीचरण जैसा साम्यवादी युवक भी है। मगर बावनदास उन आदर्शों को नहीं छोड़ पाता जो उसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हासिल किया है। वह लोगों के पतन से आहत होता है और अंत में तस्करी को रोकने के लिये भारत और पाकिस्तान की सीमा (वर्तमान में बंगलादेश) पर जान दे देता है।

डॉ प्रशांत और कमली के प्रेम प्रसंग की कुछ कमजोरियों को छोड़ दिया जाये तो यह उपन्यास आजादी के बाद के भारत की आकांक्षाओं और हताशाओं असली दस्तावेज है। कहानी जरूरी कोसी के एक गांव की है, मगर उसमें पूरा भारत साँस लेता नजर आता है। पता नहीं कैसे इसे आंचलिक उपन्यास कह दिया गया? यह वस्तुतः सुमित्रानंदन पन्त की उन पंक्तियों का सटीक विस्तार है।

भारत माता ग्राम वासिनी

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा सा मैला आँचल।

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2 comments

  1. सर काफी अच्छा लिखा है आपने ,#रेणु की एक और रचना है बल्कि अंग्रेजी में उस साइज़ के उपन्यास को #novella कहते हैं #कितने चौराहे ;मुझे यह उपन्यास अतिविशिष्ट लगा इस उपन्यास के साथ भी वही हुआ जो #Gabriel Garcia Marquez के #Chronicle of a Death Foretold के साथ हुआ क्योंकि #Hundred Years of Solitude और #Love in the Time of Cholera ज़्यादा प्रसिद्द हुए।
    मैं व्यक्तिगत रूप से कहूँ तो मुझे #कितने चौराहे और रेणु की कहानी #लाल पान की बेगम से बहुत लगाव है।#मैला आँचल और #परती परिकथा में कुछ विशेष अंतर नहीं दिख पड़ता है मुझे हाँलाकि मुझे दोनों उपन्यास पसंद हैं।
    आपसे अनुरोध करूँगा कि आप #कितने चौराहे पर भी लिखें।

  2. पुष्यमित्र

    कितने चौराहे दुबारा पढ़ता हूं. वैसे मुझे सबसे अधिक पसंद रेणु के रिपोर्ताज हैं….

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