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थूका है मैनें ख़ून हमेशा मज़ाक़ में

हिंदी सिनेमा के दर्शक मुख्य रूप से दो तरह के लोग हैं। एक वो, जो पॉपुलर सिनेमा को पसंद करते हैं और दूसरे वो, जो सिनेमा में आर्ट की तलाश करते हैं। इन्हें शाहरुख़/सलमान के फ़ैन और इरफ़ान/नवाज़ुद्दीन के फ़ैन्स में बाँटा जा सकता है। ठीक इसी तर्ज़ पर उर्दू शायरी के चाहने वाले भी दो तरह के लोग हैं। एक पॉपुलर मुशायरा पसंद करने वाले और दूसरा संजीदा शायरी पसंद करने वाले। जौन एलिया के साथ (वफ़ात के बाद ही सही) सबसे अच्छी बात ये हुई कि उनके दीवाने दोनों तरह के लोग हैं। एक वो, जिन्होंने यूट्युब पर उन्हें अलग अंदाज़ में शेर पढ़ते हुए सुना और अपने दिल में जगह दे दी। इनमें से कम लोग ऐसे हैं, जिन्हें जौन की शायरी से लेना-देना है। दूसरे वो लोग हैं, जिन्हें वाकई शायरी की समझ है और शायरी के रंग को ख़ूब पहचानते हैं। महज़ एक बात कहना चाहूँगा कि जौन को हमने जितना जाना है, जितना समझा है, जौन उसके आगे की शय का नाम है। हमें चाहिए कि हम जौन को और ज़ियादा पढ़ें, और ज़ियादा समझने की कोशिश करें, और ज़ियादा जीने की कोशिश करें – त्रिपुरारि

1.

जो ज़िंदगी बची है उसे मत गँवाइए
बेहतर है ये कि आप मुझे भूल जाइए

हर आन इक जुदाई है ख़ुद अपने आप से
हर आन का है ज़ख़्म जो हर आन खाइए

थी मशवरत की हमको बसाना है घर नया
दिल ने कहा कि मेरे दर-ओ-बाम ढाइए

थूका है मैनें ख़ून हमेशा मज़ाक़ में
मेरा मज़ाक़ आप हमेशा उड़ाइए

हरगिज़ मेरे हुज़ूर कभी आइए न आप
और आइए अगर तो ख़ुदा बन के आइए

अब कोई भी नहीं है कोई दिल मुहल्ले में
किस किस गली में जाइए और ग़ुल मचाइए

इक तौर-ए-देह सदी था जो बेतौर हो गया
अब जंतरी बजाइए तारीख़ गाइए

इक लाल क़िला था जो मियाँ ज़र्द पड़ गया
अब रंगरेज़ कौन से किस जा से लाइए

जो हालतों का दौर था वो तो गुज़र गया
दिल को जला चुके हैं सो अब घर जलाइए

शायर हैं आप यानी कि सस्ते लतीफ़ागो
ज़ख़्मों को दिल से रोइए सबको हंसाइए

अब क्या फ़रेब दीजिए और किसको दीजिए
अब क्या फ़रेब खाइए और किससे खाइए

है याद पर मदार मेरे कारोबार का
है अर्ज़ आप मुझको बहुत याद आइए

बस फाइलों का बोझ उठाया करें जनाब
मिसरा ये “जौन” का है इसे मत उठाइए

2.

जो हुआ ‘जौन’ वो हुआ भी नहीं
या’नी जो कुछ भी था वो था भी नहीं

बस गया जब वो शहर-ए-दिल में मिरे
फिर मैं इस शहर में रहा भी नहीं

इक अजब तौर हाल है कि जो है
या’नी मैं भी नहीं ख़ुदा भी नहीं

लम्हों से अब मुआ’मला क्या हो
दिल पे अब कुछ गुज़र रहा भी नहीं

जानिए मैं चला गया हूँ कहाँ
मैं तो ख़ुद से कहीं गया भी नहीं

तू मिरे दिल में आन के बस जा
और तू मेरे पास आ भी नहीं

3.

एक साया मिरा मसीहा था
कौन जाने वो कौन था क्या था

वो फ़क़त सहन तक ही आती थी
मैं भी हुजरे से कम निकलता था

तुझ को भूला नहीं वो शख़्स कि जो
तेरी बाँहों में भी अकेला था

जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना
वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था

बात तो दिल-शिकन है पर यारो
अक़्ल सच्ची थी इश्क़ झूटा था

अपने मेआ’र तक न पहुँचा मैं
मुझ को ख़ुद पर बड़ा भरोसा था

जिस्म की साफ़-गोई के बा-वस्फ़
रूह ने कितना झूट बोला था

4.

ऐ वस्ल कुछ यहाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ
उस जिस्म की मैं जाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

तू आज मेरे घर में जो मेहमाँ है ईद है
तू घर का मेज़बाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

खोली तो है ज़बान मगर इस की क्या बिसात
मैं ज़हर की दुकाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

क्या एक कारोबार था वो रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ
कोई भी राएगाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

कितना जला हुआ हूँ बस अब क्या बताऊँ मैं
आलम धुआँ धुआँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

देखा था जब कि पहले-पहल उस ने आईना
उस वक़्त मैं वहाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

वो इक जमाल जलवा-फ़िशाँ है ज़मीं ज़मीं
मैं ता-ब-आसमाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

मैं ने बस इक निगाह में तय कर लिया तुझे
तू रंग-ए-बेकराँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

गुम हो के जान तू मिरी आग़ोश-ए-ज़ात में
बे-नाम-ओ-बे-निशाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

हर कोई दरमियान है ऐ माजरा-फ़रोश
मैं अपने दरमियाँ न हुआ कुछ नहीं हुआ

5.

लाज़िम है अपने आप की इमदाद कुछ करूँ
सीने में वो ख़ला है कि ईजाद कुछ करूँ

हर लम्हा अपने आप में पाता हूँ कुछ कमी
हर लम्हा अपने आप में ईज़ाद कुछ करूँ

रूकार से तो अपनी मैं लगता हूँ पाएदार
बुनियाद रह गई प-ए-बुनियाद कुछ करूँ

तारी हुआ है लम्हा-ए-मौजूद इस तरह
कुछ भी न याद आए अगर याद कुछ करूँ

मौसम का मुझ से कोई तक़ाज़ा है दम-ब-दम
बे-सिलसिला नहीं नफ़स-ए-बाद कुछ करूँ

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