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क्या होता अगर वह स्त्री न होकर पुरुष होती?

एक तरफ स्त्री आजादी की बात की जाती है दूसरी तरफ यह है कि आज भी कोई औरत अगर बोलती है तो पुरुष समाज उसको उसकी जगह बताने में लग जाता है. दिव्या विजय का एक लेख इस विषय पर- मॉडरेटर

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क्या होता अगर वह स्त्री न होकर पुरुष होती? या क्या होता अगर पुरुष-प्रधान न होकर यह समाज स्त्री-प्रधान होता? अगर ऐसा होता तो क्या वो अपने मन से ठीक विपरीत बात होने पर बलात्कार करती या बलात्कार की धमकी देती? ऐसे लोग जो देश की जड़ों को कुतर कर खोखला करने में व्यस्त रहते हैं उनकी देशभक्ति एक लड़की द्वारा पाकिस्तान का नाम लेने पर उबल पड़ती है और वो उसे सरेआम बलात्कार की धमकी देते हैं. जब स्त्री के दिमाग से होड़ लेने की कुव्वत मर्द में नहीं होती तब वो अपनी कुंठा उसकी देह पर निकालते हैं. कौन होते हैं वे जो स्त्री की जुबान बंद करने के लिए तुरंत अपने पुरुष अंगों को हथियार में बदल लेते हैं? क्या ये वही लोग नहीं जो अपनी पराजय से उपजी शर्म को हिंसा से ढक अपने अभिमान को पोषित करते हैं?

जिस समाज में बचपन से यह घुट्टी में पिलाया जाता रहा हो कि स्त्री सुनने की नहीं सिर्फ देखने की चीज़ है वहां हम किसी लड़की के अपने मत देने पर और कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद कर सकते हैं. बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए कि ऐसे फरमाबरदार लोगों पर हमारी संस्कृति का दारोमदार है जो चाहे किसी भी दर्जे के हों स्त्री को लेकर उनका दृष्टिकोण एक रहता है. देश की समस्याओं के लिए न सही, देश की समस्या बन चुकी लड़कियों के लिए तो कम से कम वे एकजुट हो जाते हैं.

राजनीति तो दूर की बात जहाँ एक लडकी किसी भी विषय पर खुलकर अपनी राय देते ही निशाना बनती है ऐसे में हमारे समाज के माननीय लोग कैसे पचा पायेंगे कि एक बीस वर्षीय स्त्री में इतनी बुद्धि होगी कि वो अपने दम पर कुछ ऐसा कह/कर सकती है जो उनके अस्तित्व पर सीधा हमला है, जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाता. उन्हें लगता है इसके पीछे ज़रूर कोई है जो लड़की को बहका रहा है. इसीलिए वो सवाल उठाते हैं कि कौन लड़की का दिमाग ख़राब कर रहा है? इसीलिए अपने मन में ‘च्च-च्च’ करते हुए बेचारी लड़की को मोहरा मान लेते हैं. शायद ये मान लेना कि स्त्रियाँ मात्र किसी का प्यादा हैं उनकी मर्दानगी के लिए कम खौफनाक होता होगा. आह! स्त्री सशक्तिकरण की क्या बढ़िया मिसाल है! पितृतंत्र से हताहत स्त्री की रक्षा के नाम पर उसकी शख्सियत की बखिया ही उधेड़ दो. और हमारे यहाँ के खिलाड़ी और पब्लिक आइकॉन जिनकी देशभक्ति का सुबूत उनका बल्ला है वे परोक्ष रूप से किसी लड़की का मखौल उड़ाते हैं पर ऐसा करते हुए वह पूर्ण पुरुष हैं क्योंकि स्त्रियों से मुद्दों पर सीधी बहस पुरुषत्व का हनन जो होता है. सबसे आसान है स्त्रियों की राय को उपहास या हँसी-ठठ्ठे में ख़ारिज कर देना और उन्होंने वही किया है. अहंकार की पराकाष्ठा और अपनी नस्ल के लिए अंधभक्ति के रूप में आखिर वह हमारी तहज़ीब के वाहक ही ठहरे क्योंकि जिस समाज में महिला से तर्क करना अपनी हेठी समझी जाती है वहां उनका यही व्यवहार अपेक्षित है.

सीएनएन-आईबीएन की डिप्टी-डायरेक्टर सागरिका घोष से लेकर दलित लेखक मीना कंडास्वामी तक कितनी ही महिलाओं को अपने विचार व्यक्त करने पर बलात्कार की धमकी दी गयी. अपनी और  अपने परिवार की सुरक्षा के लिए अंततः इन्होने सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त करने बंद कर दिए. अब गुरमेहर कौर भी मुहिम से किनारा कर रही हैं. सत्ताधारी लोग कब तक इस तरह औरतों को उनके ही शरीर का भय दिखा कर चुप करते रहेंगे. देह के कुछ हिस्से अलग भर होने से कौन उन्हें हमारा सरपरस्त होने का अधिकार देता है. जानेमाने लोगों के बारे में हमें मालूम हो जाता है मगर ऐसी असंख्य औरतें हमारे आस-पास हैं जो लगातार इस तरह की धमिकयों से हर रोज़ गुज़र रही हैं. वर्चुअल हिंसा ने गंभीर रूप इख़्तियार कर लिया है जिसे रोकने के लिए यथेष्ट उपाय हाल-फ़िलहाल तो दिखाई नहीं देते. गुरमेहर की फेसबुक प्रोफाइल खंगाल कर देखने पर वहां हर चलता-फिरता उसके साथ सेक्स करने, वन नाईट स्टैंड करने या बलात्कार करने में रूचि दिखा रहा है. एक संजीदा बात क्या स्त्री के मुंह से बाहर आते ही यौन-क्रिया में बदल जाती है. क्या पुरुष के कानों को स्त्री की जुबां से निकला हुआ हर शब्द एक ही शब्द में रूपांतरित होकर सुनाई देता है? क्या स्त्री का मस्तिष्क, उसकी देह, उसकी सत्ता, उसका व्यक्तित्व और उसका अस्तित्व मात्र उसकी योनि तक सिमट जाता है?

कुछ लोग जो सवार हैं कागज़ की नाव पर

तोहमत तराशते हैं हवा के दबाव पर

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