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सुषम बेदी के उपन्यास ‘पानी केरा बुदबुदा’ का अंश

हिंदी के डायस्पोरा लेखकों में सुषम बेदी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलंबिया में पढ़ाने वाली सुषम जी करीब आधा दर्जन उपन्यास लिख चुकी हैं. अमेरिका में रहने वाले दक्षिण एशियाई लोगों के जीवन को उन्होंने अपनी रचनाओं में बहुत बारीकी से उकेरा है. उनका नया उपन्यास आया है किताबघर प्रकाशन से ‘पानी केरा बुदबुदा’. उसी उपन्यास का एक अंश- मॉडरेटर

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यह तुम्हारी ज्यादती है पिया।

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मुझसे इस बारे में ज्यादा बात मत करो। तुम्हारे लिये यह इंटेलेक्चुअल डिस्कशन की बात होगी। नाट फार मी।

पसीने की बूंदे झलक आयीं थीं।

अचानक जैसे उसे अहसास सा हुआ। बोला- आय एम सारी। आई डिड नाट रियलाईज दिस इज अ वैरी सेनसेटिव इशू फार यू।

कहा न मैने। इस बारे में मैं कोई और बात नहीं करना या सुनना चाहती। जस्ट ड्राप इट।

लेकिन अगर तुम दक्षिण एशियाई कम्युनिटी के मसलों को पैनल में उठाना चाहती हो तो मुस्लिम कम्युनिटी को इग्नोर कैसे कर सकती हो। उनकी औरतों के तो हमारे घरों से भी बड़े मसले है। आखिर परदे जैसे नियमों को मानकर चलना कोई सहल बात तो नहीं।

पिया बिफर कर चिल्ला पड़ी-कर लो परदे की बातें। मुसलमानियों को तो जो पाबंदियां थी सी थी। इन दरिन्दों ने तो हम पर भी परदा लगवा दिया था। हम स्कूल की लड़कियां थीं तो

भी हमारे मां-बाप डर के मारे हमें बाहर नहीं खेलने देते थे। अकेले आने जाने नहीं देते थे। इतनी तो दहशत फैला रखी है कमबखतों ने।

अनुराग ने देखा कि उसका गुस्सा आंसुओ में तबदील हो गया। वह सुबक सुबक कर रोने लगी। पता नहीं क्या कुछ यादों की खिड़कियों से उसके भीतर चला आया था। पता नहीं किन किन घावों को उकेर रहा था। उन सुबकियों मे सिर्फ यही शब्द सुन पाया था अनुराग

देश निकाला न मिलता तो पिताजी आज जिंदा होते. बहुत बदली हुई होती हमारी जिंदगी! सच! बस अंदर ही अंदर. . . खा गया उनको घर से बिछड़ने का गम!. . . कहने को कैंसर हुआ. बस यही.

पिया को रोते हुए देखना कोई आसान नहीं था। यह लड़की कितनी भी मुश्किलों में हो, कभी रोई नहीं थी। हमेशा बहुत मजबूत और बुलंद दिखती थी। अविजेय सी, बेपरवाही की हद तक। तर्क की जमीन पर हमेशा अड़ी रहती। आज यह तर्क की दुनिया छोड़ एकदम भावात्मक स्तर

पर बात करने लगी है। इससे आगे बात ही नहीं करना चाहती! यह क्या कुछ था इसके भीतर! अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खुन के थक्के भी जमे हुए थे।

अनुराग:

पैनल की बात तो अधूरी ही रह गयी थी। पर उस कान्फेस में भी अनुराग आ ही नहीं पाया। जब पिया ने फोन किया तो अनुराग ने बताया कि उसकी बीवी की डिलिवरी की तारीख पास है। कहीं ऐसा न हो कि पीछे से कुछ हो जाये तो मुश्किल होगी। इसलिये उसने फैसला किया है कि वह शहर से कहीं बाहर नहीं जायेगा फिलहाल।

पिया को निराशा हुई, गुस्सा भी। उसे कहीं इन कांफ्रेंसों का इंतजार रहता था कि अनुराग के साथ ढेर सारा वक्त बिताने का मौका मिलेगा। पर अब यह भी बात समझ मे आ रही थी कि सचमुच कुछ हो गया तो पति का पास न होना किसी भी औरत के लिये बहुत तकलीफदेह बात हो सकती है। यानी कि अनुराग भी लाचार है। ऐसी हालत में किसी तरह का भी गुस्सा व्यक्त करना बड़ी गलत बात होगी। पिया ने फोन पर यही कहा था कि हां फिर तो तुम्हारा उसके पास होना जरूरी है।

दरअसल अगर वह आ जाता और पिया जान जाती कि पत्नी डिलिवरी के आसपास है तो एक डाक्टर होने के नाते वह खुद ही उसको आने से रोकती।

पर पिया को अगर गुस्सा और चोट लगी थी तो इस बात की कि उसकी पत्नी प्रेग्नेंट हुई ही क्यों? क्योंकि इसका सीधा सा अर्थ तो यही था कि दोनों के बीच बाकायदा पति-पत्नी का सम्बन्ध है।

लेकिन सम्बन्ध तो है ही। दुनिया भर के सामने ठीक पीट कर जिस सम्बन्ध को बनाया गया है उसे पिया नकार कैसे सकती है। लेकिन पिया नकार तो रही ही है। वह यह मान कर चल रही है कि शादी उसके मां-बाप के दिखावे के लिये की गयी है।

अगर वह नहीं मानकर चलती तो फिर विकल्प क्या है?

वह खुद को इस बात से तसल्ली भी देती रहती कि अनुराग न चाहे तो भी पत्नी की अपेक्षायें तो होंगी ही। जिस घर में वह रहता है जिस बिस्तर पर वह सोता है वहां जब दूसरी औरत मौजूद होगी तो जिस्मानी रिश्तों का कायम होना कोई बड़ी बात नहीं। ये रिश्ते क्षणिक भी तो होते है। सिर्फ जिस्मानी जरूरतों की पूर्ति के लिये।

उसने खुद भी दामोदर के साथ रिश्ता स्थापित किया ही था। पर उसमें चुनाव पिया का नहीं था।

यहां भी तो चुनाव अनुराग का नहीं।

बात ठीक वही नहीं है। तब पिया के जीवन में अनुराग नहीं था। जबकि पिया अनुराग के जीवन में आ चुकी है और फिर भी अनुराग का उस पत्नी से जीवित सम्बन्ध है!

पर अनुराग ने खुद यह भी कहा था-वह बला की खुबसूरत है. वह रोक भी कहां पाया होगा खुद को वह रिश्ता कायम करने से। इच्छा तो उसी में जगी होगी।

यानी बात सिर्फ पत्नी की अपेक्षाओं की नहीं है!

पुरुष की इच्छा विकट और दुदर्मनीय है! अनुराग सौंदर्य और यौवन को इच्छा से परे क्योंकर रखे! खासकर जब वे सामने उसकी थाली में ही पड़े हों!

पिया: यहां कोई किसी के लिये ठहरता नहीं। सब भाग रहे है। कहीं भी। बस भाग लगी है। चाहे उसी एक घर में। पिया भी किसी के लिये रुकी नहीं रहेगी। अनुराग के लिये भी नहीं।

मन में अविश्वास तो बना ही है न। अनुराग उसका है या नहीं-क्या सचमुच उसका है, उसका बना रहेगा? हमेशा तंग करते रहनेवाला यह सवाल! और सवाल से छुटकारा पाने की कोशिश।

अनुराग अकसर शिकायत भी करता कि उसकी पत्नी हमेशा कोई न कोई मांग करती रहती है। उसे शिकायतें ही रहती है कि घर पर कम वक्त बिताता हूं, बच्चोंकी देखभाल में मदद नहीं देता। पर अनुराग ने उसको यह भी समझा दिया था कि डाक्टर की कमाई ऐसे ही नहीं हो जाती। काम में लग कर कमाना पड़ता है। सो उसको समझ भी आ ही जाती है बात।

अनुराग को जब भी चैन और सुकून की तलाश होती है वह पिया को फोन कर देता है और कहता है – मेरे मन का सुख तो तुम्हीं हो पिया। सच मैने भी शादी करके क्या इांझट मोल ले लिया। तुम न हो तो भला मैं जाउंगा कहां। कितना जरूरी है तुम्हारा मेरी जिंदगी में होना। वर्ना मैं तो पागल ही हो जाउं!

पिया भी उसे बांहों में लेती तो सारी दुनिया भूल जाती। जैसे उसकी हस्ती का अंतिम छोर अनुराग ही था। अनुराग के आगे कुछ नहीं। अनुराग से पहले कोई नहीं, अनुराग के बाद कोई नहीं। सब कुछ अनुराग ही। उसके साथ बिताये एक एक पल में वह पूरी जिंदगी के हर सुख को पा जाती।

लेकिन जब अनुराग पास न होता तो मन के संदेह अकसर हावी हो जाते। अनुराग का अपना भरा-पूरा जीवन है। उसकी पत्नी, उसके बच्चे।

शायद वह पूरा सुख से जी रहा है। पिया एक अतिरिक्त सुख है उसके जीवन में। क्या सच?

नहीं पिया यह नहीं मानती। अनुराग और उसका रिश्ता वैसा ही है जैसे दो अनछुए कुंवारे दिलों और जिस्मों का होता है। जब पिया ने अनुराग को जाना था तब उसके जीवन में कोई नहीं था। एक अनुराग ही है जिसके लिये उसकी रगों में खून किसी पहाड़ी दरिया सा बहता है।

वह सराबोर रहती है, सिर से पांव तक नहायी हुई उस बहाव में। उस रिश्ते में बस एक बहाव ही है, कोई सोच की चट्टान उस बहाव को बांधती नहीं। अगर पिया सोच पाती तो यह रिश्ता जुड़ने ही न पाता। आखिर वह शादी शुदा तो थी ही जब उससे मिली।

कोई व्यक्ति ऐसा मिलता है न जीवन में जब पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक जाती है। इंसान उड़ने लगता है। हवाओं से बातें करता है,बादलों से खेलता है- बस कुछ कुछ वैसा ही हुआ न अनुराग से मिलना।

 निशांत:

बार में हुई मुलाकात के बाद यूं तो निशांत की याद भी धुंधली पड़ गयी थी और पिया का अनुराग से ही मिलना जुलना बना रहता। उसकी बात सच थी। शादी से कोई फर्क नहीं पड़ा था। वह कोई न कोई तरीका खोज ही लेता पिया के साथ वक्त गुजारने का। पिया को भी यही लगता कि अनुराग उसकी जिंदगी का अटूट, अभिन्न हिस्सा है। उसके बगैर सचमुच जिंदगी में उथलपुथल मच जायेगी। उसके सपने, उसकी सोच, उसके रोमानी ख्याल, उसकी जीने की चाह — सब अनुराग को ही केन्द्र में रक्खे थे। उनका मिलना नियमित तौर पर चलता ही रहा था। काम के सिलसिले में मिलना हो ही जाता और काम की दुनिया में निजी मुलाकातों के लिये भी क्षण निकल ही आता।

एक दिन सचमुच निशांत उसके सामने खड़ा था। पता लगा कि उसकी नियुक्ति हुई है उसी शहर के पागलों के अस्पताल में। ठीक जो काम वह करना चाहता था। गंभीर रूप से मानसिक बीमारी के मरीजों का इलाज।

दुबारा निशांत को मिलकर खिल उठी थी पिया।

कितना अलग था वह अनुराग से। कितना अलग! यूं तो उसके व्यवहार में भी एक रुखापन है पर वह उसकी सीधी, सच्ची सपाटबयानी से उपजा है, मन के मैल से नहीं। बहुत कम बोलता। बोलता तभी जब कुछ कहना होता। बात ज्यादातर पिया ही करती। पर दोनों को एक दूसरे की उपस्थिति भाती थी।

काम के बाद अकसर वे किसी बार में मिल जाते। मनोविश्लेषण का ही कोई विषय लेकर बात छिड़ जाती तो घंटों विवाद होता रहता।

फिर धीरे धीरे दोस्ती घनी होती गयी।

अब पिया उसे घर पर बुला लेती और वे दोनों घंटों साथ बैठे रहते। निशांत कोई न कोई ड्रिक धीरे धीरे सिप करता रहता। पिया कुछ कबाब वगैरह तैयार कर देती। अकसर शाम का खाना वे साथ ही खाने लगे।

उन दिनों जब पिया की अनुराग से मुलाकात हुई तो वह उससे बोली थी

यह सही नहीं है। तुम तो मुझसे आराम से मिलकर अपनी बीवी के पास लौट जाते हो और मै अकेली रह जाती हूं। मैं बहुत ज्यादा अकेलापन महसूस करती हूं। क्या तुम कभी मेरे नहीं होगे?

अनुराग ने पुचकारते हुए उसे कहा था- नहीं ऐसा नहीं है। पर अभी तो यह संभव नहीं हो पायेगा न। वह दूसरा बच्चा एक्सपेक्ट कर रही है। बीच मझधार तो नहीं छोड़ सकता उसे। पर यूं उससे मेरा कोई कमयूनिकेशन भी नहीं। शी इज सो इमेच्योर। हमारी बच्चों के बारे में ही बात होती है कि उसको यह चाहिये, वह चाहिये या डाक्टर को दिखाना है। इसके इलावा तो और कुछ नहीं। लेकिन अभी तुम धैर्य रखो। इतनी जल्दी उसका त्याग नहीं कर सकता।

आई नो।आई फुली अंडरस्टैंड। आखिर वह तो पूरी तरह से तुम पर डिपेंडेंट है। छोड़ने की बात सोच ही कैसे सकते हो। मेरा वह मतलब नहीं था। आई डोंट वांट तु काज़ ऐनी पेन टु हर। मैं तो बस इतना कह रही थी कि मुझे भी अकसर बहुत अकेलापन लगने लगता है। सोचती हूं कैसा रिश्ता है हमारा। मिलते है तो पूरे जोश से लेकिन साथ नहीं रह सकते। क्या नियति है हमारी |

सही कह रही हो पिया। देखो, कुछ सोचेंगे।

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