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स्मिता पारिख की कुछ नज्में, कुछ कविताएँ

आकाशवाणी में उद्घोषिका , अभिनेत्री, और ई-बिज़ एंटरटेनमेंट की मुख्य प्रबंधक स्मिता पारिख ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मध्य-प्रदेश के इंदौर शहर में की, कॉमर्स में स्नातकोत्तर की डिग्री राजस्थान के उदयपुर शहर में हासिल की. बचपन से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखने की शौक़ीन स्मिता को कक्षा ११ वी में मात्र १५ वर्ष की उम्र में राजस्थान साहित्य अकैडमी से कहानी लेखन के लिए युवा सहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हुया, उसी साल महाराणा मेवाड़ फ़ाउंडेशन से कविता लेखन केलिए , पुरस्कार प्रदान किया गया. आकाशवाणी उदयपुर और फिर आकाशवाणी मुंबई से जुड़ाव रहा और स्मिता ने एफ एम चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों का संचालन किया,,,,, ‘अपने मेरे अपने ‘ और “जाएँ कहाँ ”  जैसे प्रसिद्ध टेलिविज़न कार्यक्रमों में मुख्य भूमिकाएँ निभायीं. दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों जैसे- ” बायोस्कोप, सिने सतरंगी, डीडी टॉप १० का संचालन किया. संगीत जगत के सभी  दिग्गजों के साथ विश्व भर में भ्रमण किया और संचालन किया. मुंबई मे इनकी ई-बिज़ एंटरटेनमेंट     नाम से एककम्पनी है जो देश विदेश में इवेंट्स करतीं हैं।

मैं पंथ निहारूँ… स्मिता का पहला कविता संग्रह है जो २०१४ में प्रकाशित हुया. आज उनकी कुछ कविताएँ- दिव्या विजय

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1.दूसरी औरत

मैं वो हूँ जिसे घरों मे जगह मिलती नहीं

बंद कमरों में मिलतीं हैं रहमतें मुझको

मैं खुलेआम किसी की  कुछ नहीं लगती

फिर भी सुनती हूँ कि मैं जान हूँ उनकी

न मुझे रुतबा मिले, न सकूँ न है कोई नाम मेरा

कुछ लोग मुझे ‘दूसरी’ कहा करते हैं

 

मैं उनके सपनों में बसा करती हूँ

वो अपने जीने की वजह भी कहते हैं मुझे

उनकी महफ़िल में न नाम, न निशान है मेरा

उनकी रातों को मैं फिर भी रंगा करती हूँ

वो अपनी सीमाओं में रहकर मुझसे मिलते हैं

मैं हर वक़्त उनकी राह तका करती हूँ

उनकी शुहरत पे मैं एक दाग़ की मानिंद हूँ

जिसको दुनिया की नज़रों से छुपाते हैं वो

अपनी हसरत तो मैं उनसे छुपा लेती हूँ

ये मुहब्बत ही कमबख़्त उभर आती है

 

‘भूल जाओ’ कहकर वो मुँह फेरते हैं अक्सर

मैं तनहा अपने अंधेरों में भटक जाती हूँ

 

उनको साँसों की तरह रोज़ जिया है मैंने

वो बिना साँस लिएजीने को कहते हैं अब

अपनी हालत पे रोती हूँ, तो हँसती हूँ कभी

ऐ मौत आ तू ही जुदा कर दे हमें

आ तू ही अब बेख़ौफ़ बना दे मुझको

आ तू ही बतला दे उनको क़ीमत मेरी

 

और मुझको मोहब्बत का सिला भी दे दे

 

 

  1. ख़्वाब जागें हैं

 

फिर नींद गुम… ख़्वाब जागे हैं अभी

बसने दो पलकों में सुलगती यादों को

उन गुज़रे हुये पलों के

भीगे एहसासों से…..

एक रात में भी कुछ लम्स जी लूँ…..

फिर सवारूँ सूनी पलकों को….

कि जिनसे रौशन होता है

मेरी रूह का कोना कोना

 

तन्हाई महक उठती है

तेरी साँसों की मादक ख़ुशबू से

जुगनुओं से जल उठते हैं…

मेरी आँखों के चराग…..

मुट्ठी में भींचकर रखना चाहती हूँ….

वो बीता एक एक लम्हा…

पर वक़्त ही तो है…….

फिसल जाता है ….।

गुज़रना फ़ितरत है उसकी…..

फिर नींद गुम…. ख़्वाब जागे हैं अभी …

बसने तो दो पलकों में… सुलगती यादों को।

 

  1. तेरी ख़ुशियाँ… तेरे अहसास

 

तेरा हँसना… तेरा खिलना…

मुझसे बिछड़कर भी तेरा…

अपने आप में गुम रहना….

तेरी महफ़िलें… तेरी शौहारतें…

तेरी चाहतें…. तेरे जज़्बात….

और इन सब के बीच….

तनहा … अधूरा सा तू…..

सोचता तो होगा ना कभी….

कि कितनी बेरंग होती तेरी ये

शोरगुल वाली ख़ोखली ज़िंदगी

अगर इसमें मेरी पाक मोहब्बत का

रंग यूँ घुला ना होता…..

 

कुछ रंग मेरी शोख़ी का

कुछ अंश मेरी हस्ती का

तुम्हारे अधूरेपन को पूर्ण बनाती मैं

तुम्हारे अंदर की आवाज़ को

तुम्हारे होंठों तक पहुँचाती … मैं…

 

समाज और झूठी शान की बेड़ियों में फँसा तू…।

इश्क़ की दीवानगी के परवाज़ लिए मैं

ख़ौफ़ और मजबूरी का पुलिंदा तू….

अल्हड़ नदी सी बेख़ौफ़ बहती मैं….

 

तू चाहता तो बहुत है मुझसा बनना…

तू खुद को कोसता भी है….

और तू ये जानता भी है…

कि तेरी ज़िंदगी के मायने हैं मुझसे

और मैं बनी हूँ तेरे लिए…..

 

तू मुझसे प्यार भी करता है और नफ़रत भी….

क्यूँकि ना तू मेरा हो सकता है … ना किसी और का….

मैं… तुझको तेरे अधूरेपन, तेरे ख़ालीपन

का अहसास कराती हूँ हरपल….

और तू मेरे बग़ैर जी भी नहीं पाता,,,,

क्यूँकि तेरी रूह का आइना हूँ मैं…

और ये हक़ीक़त जानता है तू…..

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