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‘अनारकली’ के किरदार से मुझे रानी बेगम की याद आती है!

‘अनारकली ऑफ़ आरा’ में अनारकली को देखते हुए मुझे बार-बार अपने मुजफ्फरपुर की रानी बेगम की याद आती है. रानी चतुर्भुज स्थान के आखिरी दौर की सबसे बड़ी डांसर थी, जिसका सट्टा बंधवाना एक जमाने में मुज़फ्फापुर और आसपास के जिले के जमींदारों के लिए बड़ी बात समझी जाती है. कहते हैं कि प्रकाश झा अपनी फिल्म म्रत्युदंड में रानी का नाच रखना चाहते थे, लेकिन तब तक रानी से नाचना छोड़ दिया था इसलिए प्रकाश झा ने उसमें मुजफ्फरपुर का बस संवाद में इस्तेमाल किया है. जब डांसर के बारे में किसी के पूछने पर जमींदार साहब कहते हैं कि बनारस से नहीं मुजफ्फरपुर से ही बुलाये हैं.

80-90 के दशक में समय की बदलती हवा को रानी ने पहचाना था और गायन के लिए, अपनी गायिकाओं के लिए प्रसिद्ध चतुर्भुज स्थान को डांस के लिए पूरे इण्डिया में फेमस बना दिया था. कहते हैं कि मुम्बई के बियर बार में मुजफ्फरपुर की डांसर जाती थी, फिल्मों में एक्स्ट्रा डांसर के रूप में मुजफ्फरपुर की डांसर बुलाई जाती थी. उसने 100 साल से अधिक पुरानी एक संस्कृति को दुबारा जीवंत बनाकर चतुर्भुज स्थान के ग्लैमर को बनाए रखा.

बाद में इस पुरुषसत्तावादी समाज में रानी चतुर्भुज स्थान यानी वार्ड नंबर 16 की वार्ड काउंसिलर बनी, एक नहीं दो बार. आउटलुक समेत देश के बड़े-बड़े अंग्रेजी अखबारों में यह खबर प्रमुखता से आई थी कि एक नाचनेवाली मुजफ्फरपुर में वार्ड काउंसिलर बनी. वह मेयर बनते-बनते रह गई लेकिन दो बार वार्ड काउंसिलर के रूप में उसने अपने क्षेत्र में काम किया और अपने पेशे की महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिए उसने बहुत काम किया. उसके अधिकार के लिए, उनके सम्मान के लिए बहुत काम किया. आज भी कर रही हैं. शहर में उनका दबदबा है. उसी शहर में जहाँ उसके नाच देखने के लिए भीड़ जुटा करती थी आज उसका भी दबदबा है.

मैं उसके किरदार से प्रभावित होकर ही चतुर्भुज स्थान की परम्परा पर लिखने के लिए प्रेरित हुआ. हालाँकि अपनी पुस्तक ‘कोठागोई’ में मैंने सीधे सीधे उनके ऊपर नहीं लिखा लेकिन उस किताब की प्रेरणा रानी ही थी.

‘अनारकली’ के किरदार से मुझे बार बार रानी बेगम की याद आती है जो रनिया से रानी बेगम बनी. जिसने नाच में गोली से शामियाना छेदने की परम्परा शुरू हुई उसकी सुरक्षा में बंदूकवाले रहने लगे.

-प्रभात रंजन 

 

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