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हिंदी सिनेमा का शुरूआती ज़माना और बाइयों का फ़साना

आज यतीन्द्र मिश्र का जन्मदिन है. मुझे 15-16 साल पहले का वह दौर याद आ रहा है जब यतीन्द्र की किताब ‘गिरिजा’ आई थी. गायिका गिरिजा देवी पर लिखी वह किताब हिंदी में अपने ढंग की पली ही किताब थी. बड़ी धूम मची थी. तब मैं लेखक नहीं वेखक था. अपने दोस्त की उस सफलता पर आनंदित भी होता था और ईर्ष्या भी करता था. यह संयोग है कि आज जब उनके जन्मदिन पर उनको बधाई देने बैठा हूँ तो उनकी किताब ‘लता: सुर गाथा’ का डंका बज रहा है. मैं ईमानदारी से कहूं तो उनकी सोहबत में बहुत सारे संगीतकारों-गायकों से मिलने, उनको सुनने का सौभाग्य मिला और संगीत की परम्परा को थोड़ा-बहुत समझने का भी. हिंदी में संगीत के ऊपर आमफहम जुबान में लिखने का दौर उनके साथ ही शुरू हुआ. वे माहिर हैं मैं नक्काल. मैंने तवायफों की परम्परा पर ‘कोठागोई’ लिखी तो उसके पीछे सबसे अधिक प्रोत्साहन और प्रेरणा यतीन्द्र की ही रही. आज उनके जन्मदिन पर उनके इस लेख को याद कर रहा हूँ. लेख फिल्मों में बाइयों के ज़माने पर है. संयोग है कि बिहार की बाइयों पर एक फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ की इन दिनों बड़ी चर्चा है तो इस लेख को याद करने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता है. देखिये क्या रिसर्च है, क्या गहराई है. आज यतीन्द्र के जन्मदिन पर यही कामना है कि वे खूब लिखें और मेरे जैसे मित्रों को बार-बार ईर्ष्या करने का मौका दें- प्रभात रंजन

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हिन्दी फिल्म इतिहास में संगीत का आगमन या फिल्म संगीत का आरम्भ एक महत्त्वपूर्ण घटना रही है। पिछले लगभग सौ सालों में इस बात पर ढेरों बहस-मुबाहिसों और विमर्श के दौर चले कि मूलतः फिल्म संगीत किस ढंग से अपना स्वरूप यहाँ अख्तियार कर सका। बहुत सारी प्रचलित धारणाओं के साथ-साथ, जिस तथ्य की ओर हमारा ध्यान बरबस जाता है, उसमें सर्वाधिक प्रासंगिक वह दौर है, जब भारतीय समाज में बाईयों और तवायफों का दबदबा कायम था। एक प्रकार से यह हिन्दुस्तानी संगीत का वह आरम्भिक दौर है, जब तवायफों का संगीत राजदरबारों, बड़े नवाबी घरानों, महफिलों-मजलिसों एवं कोठों में रचा-बसा था और अपने शिखर पर था। हिन्दी फिल्म संगीत का आरम्भ भी आश्चर्यजनक ढंग से इसी दौर की देन है, जिसे हम सन् 1925 से 1945 के मध्य बीस वर्षीय लम्बे कालखण्ड में पसरा हुआ देख सकते हैं। इस बात को स्वीकारने में मुझे जरा भी सन्देह नहीं है कि भारतीय फिल्म संगीत, खासकर हिन्दी फिल्म संगीत का आरम्भ मुख्यतः बाईयों, तवायफों, नॉच गर्ल्स और नौटंकी के द्वारा हुआ है। ये स्वतंत्रता आन्दोलन के पूर्व (1925-45) का समय है, जिस समय भारतीय समाज में आमोद-प्रमोद के ढेरों प्रदर्शनकारी अभिव्यक्तियों में इन बाईयों का वर्चस्व रहा।

इस अवधारणा को समझने के जतन में उस समय की प्रमुख बाईयों का वर्गीकरण हम मुख्यतः तीन कोटियों में कर सकते हैं, जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समय सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर जिस तरह बन-बिगड़ रहा था, जिनसे गुज़रकर हिन्दी फिल्म संगीत का बिल्कुल आरम्भिक चेहरा विकसित हो सका। इस वर्गीकरण में जो सबसे दिलचस्प तथ्य है, वह यह है कि बाईयों का एक लगभग बड़ा समुदाय ही अस्तित्व में मौजूद न रहा, जिनमें से अधिकांश तवायफें न जाने किन वजहों से बाद के वर्षों में अन्धेरों में चली गयीं। कुछ के हिस्से में जो थोड़ी बहुत रोशनी हाथ आयी भी, वह भी धीरे-धीरे हमारे सांस्कृतिक समाज की विस्मृति का अंग बन गयी। बाईयों के व्यवहार और उनका विभिन्न प्रकार की कलाओं में संलग्न रहने की पड़ताल को परखने से पहले इतिहासकार सलीम किदवई के एक दुर्लभ और इतिइाससम्मत तर्क पर ध्यान देना लाजिमी है- “तवायफों, बाईयों व राजदरबारों एवं नवाबों के यहाँ आसरा पाने वाली गायिकाओं के बारे में कुछ भी ढूँढ़ने से पहले हमें इस बात का खासा ध्यान रखना चाहिए कि इनमें से अधिकांश औरतों को अपने इतिहास को दोबारा से गढ़ना पड़ा है। इन औरतों को अपनी जाती जि़न्दगी में इतने झूठ बोलने पड़े हैं कि आसानी से इनकी बातों से यह निकालना बेहद मुश्किल है कि इनकी जि़न्दगी में जो कुछ हुआ और घटा है, वह कितना सही और कितना गलत है।“

                किदवई इन अर्थों में इस पूरी परम्परा पर ऐसी पैनी नज़र डालते हैं कि आपको अपने व्यक्तिगत पसन्द की किसी भी बाई या गायिका को जानने समझने के लिए कम से कम एक मज़बूत सिरा पकड़ में आ जाता है। हाँ, यहाँ यह बताना उतना ही प्रासंगिक है कि जब वे इस तरह का सार्वजनिक बयान इन गानेवालियों के बारे में जारी करते हैं, तो उनका इशारा हमें उस परम्परा के प्रति भी मिलता हुआ नज़र आता है, जो बाद में जाकर सिनेमा में पूरी तरह दृश्यगत हो सका।

                सलीम किदवई के बयान को ध्यान में रखते हुए हमें उस समय की बाईयों की पड़ताल में कुछ दुर्लभ तथ्य हाथ आते हैं। मसलन एक कोटि उन बाईयों की है, जो कभी भी फिल्मों में नहीं गयीं; और जिनको कभी भी हिन्दी या किसी अन्य सिनेमा के खाते में डालकर आँका नहीं जा सकता। इसमें मुख्य रूप से जानकीबाई, छप्पनछुरी, मलका जान, अनवरबाई लखनवी, काशीबाई, रसूलनबाई और मलका पुखराज जैसी धुरन्धर तवायफें शामिल रही हैं। दूसरी श्रेणी उन बाईयों की थी, जिन्होंने फिल्मों में कम और महफिलों में बराबर से अपना दबदबा बनाये रखा। मुझे लगता है, इन गायिकाओं को फिल्मी दुनिया का सुनहला पर्दा रास नहीं आया होगा अथवा उन्हें अपना पेशेवर गायिकी का घराना उस समय ज्यादा महफूज़ लगा होगा, जिसके चलते उन लोगों ने अपना परम्परागत गायन समाप्त नहीं किया। उदाहरण के तौर पर जम्मू कश्मीर की कमला झरिया, बंगाल की अंगूरबाला और अनारबाला, गौहर जान, राजकुमारी, सितारा कानपुरी, अमीरजान और अख़्तरीबाई फैजाबादी।

तीसरी कोटि उन बाईयों की थी, जिन्होंने मुख्य रूप से फिल्मों को ही अभिनय व गायिकी के लिये अपना पसन्दीदा क्षेत्र चुना। सन् 1931 से 1940 के मध्य में प्रचलित इन बाईयों का दबदबा फिल्मी दुनिया में सर्वाधिक था। एक लम्बी फेहरिस्त है ऐसी बाईयों-गायिकाओं की, जो लगातार दस-पन्द्रह वर्षों तक फिल्म और उसके संगीत, दोनों ही परिदृश्यों पर सक्रिय थीं। पर आज लगभग अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद इस तथ्य को आँकना कम दिलचस्प नहीं कि धीरे-धीरे वे सब की सब गुमनामी के अन्धेरे में चली गयीं। इनमें प्रमुख तवायफें हैं- जहाँआरा कज्जन, जिल्लू, मुश्तरी, चन्दा, मिस गुलाब, मिस मोती, शान्ताकुमारी, शकीरा, मोहिनी, खुर्शीद, हीरा, फूलकुमारी, पन्नाबाई, मिस अनुसूर्या, बिब्बो, कमलाबाई, मिस शैला, मिस बदामी, तारा, पुष्पा, सुन्दरबाई, बिमला, मिस अनवरी, माधुरी, रामप्यारी, मिस इकबाल, शिरीन बानो, ललिता, रतनबाई, मिस लोबो, लीलादेवी, हमीदा, शाहजादी, कश्मीरा देवी, चम्पा, मिस पर्ल, शिवरानी, पीरजान, राजकुमारी बनारस वाली, राजकुमारी कलकत्तावाली उर्फ उल्लो बाई, चाँदकुमारी, अमीना, खातून, इन्दूबाला, निहारबाला, राधाबाई, सुलताना बानो, मिस शाहजहाँन, श्यामकुमारी, जरीना, मिस गुलजार, प्रेमकुमारी, अरुणा देवी, हुस्नबानो, इन्दूरानी, मणिबाई, जिल्लूबाई, बृजमाला, शकुन्तला, कान्ताबाई, पुतली, दुर्गाबाई, अजूरी एवं दुलारी आदि।

                यह फेहरिस्त देखते हुए सलीम किदवई का बयान याद आता है कि इनमें से अधिकांश औरतों को अपने इतिहास को दोबारा से गढ़ना पड़ा है। हो सकता है कि जाती जि़न्दगी में इन गायिकाओं के कुछ दूसरे प्रचलित नाम रहे हों,  जिनके अनुसार वे अपने समय की महफिलें लूटती रहीं, मगर हो सकता है जब उन्हें एक ज्यादा बड़ा प्रभावी क्षेत्र फिल्मी पर्दा नज़र आया, तो कुछ असमंजस में अपनी सही पहचान को छुपाने तथा फिल्म के ग्लैमर भरे जीवन को थोड़ी इज्जत से जीने की चाहत के चलते नाम बदल लिया हो। यह अकारण नहीं है कि ऐसी बाईयों तवायफों की लिस्ट में अधिकांश नाम कुछ गढ़े या नकली से लगते हैं मसलन- मिस लोबो, मिस बदामी, मिस पर्ल, मिस शैला, मिस गुलाब, मिस मोती। ठीक इसी तरह कुछ ठेठ पेशेवर नाम, जो अन्य सन्दर्भों से इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि बीत चुके इतिहास में फिल्मों के अलावा भी इनका कुछ अतीत रहा होगा, जिसकी निशानदेही कोठों तक अवश्य ही मौजूद रही होगी। मसलन चाँद कुमारी, हुस्नबानो, रतनबाई, हमीदा, जिल्लूबाई, पदमाबाई आदि।

                यह वो समय था, जब अंग्रेजों ने सोशल वैल्यूज़ प्रोग्राम बन्द करा दिये थे। किसी भी प्रकार की कुरीति या सामाजिक समस्या पर फिल्म बनाना उस दौर में जोखिम भरा काम था। हर एक फिल्म सघन सेंसरशिप के द्वारा आँकी जाती थी, जिसका असर यह रहा कि अधिकांश फिल्मवालों ने सेंसर से बचने के लिये पौराणिक, मिथकीय और ऐतिहासिक कथानकों में जाकर पनाह ली। मायामच्छिन्द्र, राजा हरिश्चन्द्र, रामशास्त्री, हनुमान पाताल विजय, बिल्वमंगल, सिंहलद्वीप की सुन्दरी, जादूगर डाकू और पृथ्वी वल्लभ जैसी फ़िल्में इस ख़ास परस्थिति को रेखांकित करती हैं। बाईयों के आगमन से एक अतिरिक्त उत्साह फिल्मवालों को यह भी मिला कि फ़िल्मी पर्दे पर उनकी अदायगी का इस्तेमाल वे लोग बखूबी करने लगे, जिसके पहले संगीत देने के लिये पर्दे के बाहर अलग से साजिन्दों सहित फनकारों को बिठाना पड़ता था।

                इस प्रक्रिया में कुछ तवायफों का जिक्र भी यहाँ फिल्म संगीत में विकास के मद्देनजर अवश्यंभावी लगता है। उस लिहाज से तवायफों की जो समृद्ध परम्परा रही, उसमें गौहरजान का विशेष नाम है। यह जानना दिलचस्प है कि हिन्दी फिल्म के आरम्भिक दौर में गौहर जान नाम से मुख्यतः तीन महत्त्वपूर्ण  गायिकाओं, बाईयों और अभिनेत्रियों की चर्चा आती है। इनमें से एक गौहर जान कर्नाटकी हैं, जो 1925-40 के बीच हिन्दी फिल्मों की महत्त्वपूर्ण अभिनेत्री रही हैं। आपके समय में अख़्तरीबाई फैजाबादी यानी बेगम अख़्तर फिल्मों में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। दूसरा नाम अदाकारा गौहर का है। इन्हें गौहर कय्यूम मामाजी वाला भी कहते हैं। लाहौर में जन्मीं मूक फिल्मों की भी ये समर्थ अभिनेत्री रहीं। इन्होंने चन्दूलाल शाह के साथ मिलकर रंजीत मूवीटोन की स्थापना की थी। एक तरह से 1929 में स्थापित हुई रंजीत फिल्म कम्पनी, जिसे रंजीत मूवीटोन भी कहते थे में गौहर ही उसकी मुख्य अभिनेत्री हुआ करती थीं। एक दिलचस्प तथ्य गौहर के सन्दर्भ में यह भी है कि उन्हें जामनगर की रियासत द्वारा भी पैसा मिलता था। वे जामनगर राजदरबार में फिल्मों में आने से पूर्व महफिलें करती थीं। यह तथ्य इस बात की ओर भी इशारा करता है कि जो बाईयाँ पेशेवर ढंग से फिल्मी जीवन में उतरने से पूर्व अपना कोठा सजाती रही थीं, उन्होंने एक्टिंग के क्षेत्र में पदार्पण के साथ अपने पुराने अतीत से किनारा कर लिया था। जो लोग अभिनय के क्षेत्र में सीधे नहीं आ सकी थीं, उन्होंने अपनी पेशेवर गायिकी और फिल्म संगीत के बीच एक बेहतरीन सन्तुलन बनाया हुआ था। इनमें हम मलका पुखराज, मिस मेनका, अख़्तरीबाई फैजाबादी, अनीस खातून, कज्जन, कानन देवी और मिस दुलारी जैसी गायिकाओं-बाईयों को याद कर सकते हैं।

                तीसरी गौहर जान शास्त्रीय संगीत की महत्त्वपूर्ण गायिका मानी गयीं, जिनका पूर्व नाम था एंजोलिना एवार्ड। ये कलकत्ता से सम्बन्धित थीं और ठुमरी गायिकी में बेहद नाम कमा चुकी थीं। एक ऐतिहासिक तथ्य इनके सन्दर्भ में यह काबिलेगौर है कि उस्ताद मौजुद्दीन ख़ाँ ने स्वयं बनारस से कलकत्ता जाकर गौहर को ठुमरी सिखायी थी। मूलतः तवायफों की परम्परा में आने वाली गौहर जान 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की सबसे महंगी गायिका थीं, जो महफिलें सजाती थीं। इनके बारे में मशहूर था कि सोने की एक सौ एक गिन्नी लेने के बाद ही वह किसी महफिल में गाने के लिये हामी भरती थीं।

                इसी समय यह याद करना भी फिल्मेतिहास के सन्दर्भ में दिलचस्प है कि फिल्मों में मशहूर कुछ ऐसी भी तवायफें थी, जिन्हें बाद में बहुत याद नहीं रखा गया। इनमें से अधिकांश अपने गाने स्वयं गाती थीं। बिब्बो, खुर्शीद, राधारानी, उमाशशि और अंगूरबाला व अनारबाला को इसी सन्दर्भ में याद कर सकते हैं। इसी तरह सितारा कानपुरी भी थीं, जो कानपुर छोड़कर फिल्मों में गीत आजमाइश के लिये आयीं। इनका 1948 में फिल्म ‘पगड़ी’ में मुकेश के साथ गाया गीत ‘एक तीर चलाने वाले ने’ बड़ा मशहूर गीत हुआ था। इसके संगीतकार गुलाम हैदर और गीतकार शकील बदाँयूनी थे। इसी सन्दर्भ में अभिनेत्री निम्मी को भी याद करना चाहिए। निम्मी को फिल्मों में आने से पहले निम्मी आगरेवाली कहा जाता था। उस समय संगीत हल्कों में उनके गाये गाने भी नये ढंग से शुमार हो रहे थे और वे ठुमरी, गजल, गीत और दादरा बहुत करीने से गा लेती थीं। मगर राजकपूर के कहने पर उन्होंने गाना छोड़ दिया और ‘बरसात’ फिल्म से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत निम्मी नाम से की। यह भी जानना प्रासंगिक होगा कि निम्मी की माँ वहीदनबाई अपने समय की महत्त्वपूर्ण तवायफ मानी गयी हैं।

                इनके अलावा चार प्रमुख गायिकाएँ, बाईयाँ ऐसी थीं, जो राजदरबारों में तो मुबारकबादियों के लिये आती-जाती थीं, मगर दूसरी ओर उनके भीतर उसी वक्त अपनी-अपनी बेटियों को हिन्दी फिल्मों में सफल अभिनेत्रियाँ बनाने की पुरजोर कोशिशें भी चल रही थीं। इनमें से अधिकांश संगीत में निपुण महिलाएँ थीं और एक हद तक उनकी गायिकी व हुनर का लोहा उस समय माना जाता था। इनमें नरगिस की माँ जद्दनबाई, शोभा गुर्टू की माँ मेनकाबाई, नसीमबानों की माँ शमशाद बेगम एवं अख़्तरीबाई फैजाबादी की माँ मुश्तरीबाई प्रमुख हैं।

                इनमें नरगिस की माँ जद्दनबाई सर्वाधिक प्रगतिशील औरत साबित हुईं, जिन्होंने बदलते हुए समय को पढ़कर न सिर्फ नरगिस को अपने गाने-बजाने की परम्परा से बहुत मेहनत के साथ अलग किया, बल्कि उन्हें अंग्रेजी तबीयत की शिक्षा दिलवाई। साथ ही नरगिस बेहतर ढंग से तैयार हो सकें इसलिये उन्हें सआदत हसन मंटो, पृथ्वीराज कपूर और महबूब खान जैसे नये सोच के लोगों के साथ उठना बैठना सिखाया। जद्दनबाई उत्तर प्रदेश के चिलबिला जैसे छोटे शहर की तवायफ थीं, मगर अपनी सोच व हुनर के चलते उन्होंने हिन्दी फिल्मों में भी काफी काम किये। नरगिस की पहली फिल्म जिसमें वे एक बाल कलाकार के रूप में बेबी रानी के नाम से पहली बार सिनेमा के पर्दे पर आती हैं, उसे लाहौर के निर्देशक चिमनलाल लाहौर, बी. एस-सी. ने निर्देशित किया था। 1935 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म का नाम ‘तलाशे-हक’ था। यह फिल्म एक और कारण से ऐतिहासिक है कि इस फिल्म में बतौर संगीत निर्देशक जद्दनबाई ने संगीत दिया था। कोठे की शैली का ठेठ बैठकी महफिल गाने वाला दादरा ‘घोर घोर घोर घोर बरसत मिहरवा एवं ‘दिल में जब से किसी का ठिकाना हुआ’ जैसे गीत उन्हीं पर फिल्माये गये थे। उनकी संगीतबद्ध अन्य फिल्मों में 1936 में ‘हृदय मन्थन’ के गीत ‘डमरू हर कर बाजे, सावन के बदरा घिर आये, सूने दिल का कहीं अश्कों से पता मिलता है’ और ‘हमारी सेजरिया सैंय्या एक बेरी आ जा’ मशहूर हुए। इसके अलावा जीवन स्वप्न 1937, मैडम फैशन 1936, मोती का हार 1937 और राजा गोपीचन्द 1935 जैसी फिल्मों में संगीत दिया। जद्दनबाई ने अपनी बनाई फिल्म कम्पनी का नाम भी संगीत फिल्म कम्पनी रखा था, जिसके तहत वे स्वयं फिल्म निर्देशन करती थीं।

                एक महत्त्वपूर्ण तथ्य जद्दनबाई और नरगिस के सन्दर्भ में यह भी मिलता है कि जद्दनबाई की माँ का नाम दिलिपा था और वे पूर्वी उत्तर प्रदेश की महत्त्वपूर्ण तवायफ के रूप में विख्यात थीं। इनके बारे में कहा जाता है कि इन्होंने ही तमाम सारी बाईयों से अपनी बेटी जद्दन को संगीत की तालीम दिलवायी थी। यह तथ्य राम औरंगाबादकर की मराठी में लिखी पुस्तक नरगिस के उर्दू तर्जुमे से प्राप्त होती हैं। यह 1960 में छपी है और पुस्तक का मूल्य 3 रुपये है। इसकी भूमिका में राम औरंगाबादकर ने यह लिखा है कि उन्हें जान से मार डालने की धमकियाँ दी गयीं कि वे नरगिस के पूर्वजों का इस तरह का कोई उल्लेख न करें। यह कुछ-कुछ उसी तरह का अपने इतिहास के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है, जिस तरह की बात सलीम किदवई तवायफों की एक पूरी परम्परा के बारे में यह कहकर उठाते हैं कि उन्होंने अपने अतीत को कई बार बदला और नये सिरे से लिखा है।

                जद्दनबाई से अलग, शमशाद बेगम भी अपने समय की महत्त्वपूर्ण गायिका थीं, जो राजदरबारों में महफिलें किया करती थीं। इनका ताल्लुक फिल्म अभिनेत्रियों की उस पीढ़ी से भी है, जिसमें उनकी बेटी नसीम बानो एक बहुत बड़ी अभिनेत्री बनीं और उनकी नातिन सायरा बानो ने भी फिल्म इण्डस्ट्री में अपनी कला का जादू बिखेरा। शमशाद बेगम के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली घराने की गायिकी को बखूबी सीख रखा था।

                इन सबसे अलग बिल्कुल नये सन्दर्भों में सिद्धेश्वरी देवी का नाम आता है, जो स्वयं बनारस की मशहूर गायिका थीं और बड़ी मोतीबाई व रसूलनबाई के बाद ठुमरी की एकमात्र दमदार उपस्थिति थीं। उन्हें सर्वाधिक बढ़ावा ओरछा और बड़ौदा जैसी रियासतों से हासिल था। ओरछा राजदरबार के वंशज महाराज मधुकर शाह जूदेव बताते हैं कि सन् 1935 से 40 के दौरान सिद्धेश्वरी देवी लगातार ओरछा गाने के लिये बुलायी जाती रहीं और उसके एवज में उन्हें बतौर पारिश्रमिक चाँदी के रुपयों की शक्ल में एक हजार सिक्का तथा ट्रेन का द्वितीय श्रेणी का किराया दिया जाता था। सबसे काबिलेगौर तथ्य यह भी है कि उसी दौरान फिल्मों में प्रयुक्त होने वाले अधिकांश बनारसी कजरी और दादरों को सीधे फिल्मवालों ने अपनी फिल्मों में जस का तस इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि हो सकता है उन दिनों इन बन्दिशों को उन लोगों ने रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, विद्याधरी और सिद्धेश्वरी देवी से हासिल किया हो। इनको प्राप्त करने के लिये वे लोग कभी-कभार छोटी-मोटी रकम की पेशकश करते रहे हों या ज्यादातर गायिकाओं को किसी फिल्म में गाने का लालच दिया जाता हो। इससे सन्दर्भित दिलचस्प तथ्य यह है कि यदि इनमें से किसी बाई को ऐसा कोई अवसर मिल जाता था, तो उस जमाने की म्यूजिक कम्पनियों के लिये उनका नाम एकाएक कई गुना ज्यादा कीमती हो जाया करता था। इस सन्दर्भ में वे लोग एक हद तक अपने शास्त्रीय गायन को कामर्शियल सेटअप में ले जाने के लालच के चलते अपने कुछ दादरों, कजरियों और बन्दिशों को फिल्मवालों को आसानी से उपलब्ध करा देते थे। इस काम में मेगाफान, कोलम्बिया, डावरकीन, एरोफोन एवं ट्वीन कम्पनी के रेकार्ड सबसे आगे थे। बेगम अख़्तर का भी उस जमाने में इसी कारण जबरदस्त बोलबाला था कि वे एक पेशेवर गायिका होने के साथ-साथ फिल्म स्टार भी थीं। उनके लिये मेगाफोन इस तरह विज्ञापन करता था- ‘मिस अख़्तरीबाई फैजाबाद फिल्म स्टार’।

                कहने का सार यह है कि बाईयों ने बदलते हुए समय के साथ अपने सम्बन्ध बनाते हुए म्यूजिक कम्पनियों के साथ इस बात के गाहे-बे-गाहे सौदे किये कि वे अपने प्राईवेट एल.पी. बनवाने के चक्कर में उन कम्पनियों को अपनी कुछ पुरानी घरानेदार बन्दिशें सौंप दिया करती थीं। रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, काशीबाई, अमीरजान से लेकर यह काम सिद्धेश्वरी देवी तक के जमाने में हुआ है, जिसकी पड़ताल उसी जमाने के फिल्मों की गीत लिस्ट को परखकर किया जा सकता है। मसलन, हम कुछ फिल्मों की बन्दिशें यहाँ इसी सन्दर्भ में याद कर सकते हैं- 1935 में रिलीज हुई नवजीवन फिल्म का ‘काहे करत मोसे रार सुन्दरवा, काहे करत मोसे रार’, निर्दोष अबला फिल्म का ‘होरी खेलूँ न मैं दईया री, उँगली पकड़ मोरी बईयाँ री’, नीला फिल्म  का, ‘नाही मानत नैना हठीले, कैसे बाँके कटील रसीले’, देवदास फिल्म का ‘नहीं आये घनश्याम घेरि आयी बदरी’, धर्म की देवी फिल्म का ‘मालिनिया लाओ माल आज जगे मोरे भाग’ और जवानी का नशा फिल्म का ‘अब सेजिया अकेली दुःख दे राम, सैंय्या गये परदेस (अख़्तरीबाई फैजाबादी)। इसी तरह 1933 एवं 1934 के भी कुछ गीत ध्यान देने लायक हैं- प्रेम की रागिनी फिल्म का ‘किरपा करो मो पे दीन दयाल, डोलत नैया मोरी मझधार’, मिस 1933 फिल्म का ‘मधुकर श्याम हमारे चोर’, कुरुक्षेत्र फिल्म का ‘धड़कन लागी करेजवा हो राम’,  दोरंगी दुनिया फिल्म का ‘बाँसुरी मधुर बजाओ रे कान्हा’, गुण सुन्दरी फिल्म का ‘गगरी छलक न जाये गोरी जमुना के तीर’, नाचवाली फिल्म का ‘झूलना डला दे प्यारी ऋतु बसन्त आयी’, तूफान मेल फिल्म का ‘आली री प्रियतम घर आये’।

                इसी के साथ यह जानना भी दिलचस्प है कि बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में कोठे और महफिलें वैसी पारम्परिक ढंग की नहीं रह गयीं थीं, जिस तरह वह नवाबी शासनकाल के दौरान या वाजिद अली शाह के समय में होती थीं। बम्बई, कलकत्ते और बनारस के बड़े व्यापारी भी संगीत की महफिलें कराने लगे थे और बाईयों का संगीत मुख्यतः तीन भागों में विभक्त हो गया था। एक तरफ वे बाईयाँ थीं, जिनका काम पारम्परिक दरबारी संगीत और महफिल सजाना रह गया था। साथ ही जिनके यहाँ नवाबों और राजाओं के अलावा पैसेवाले व्यापारी वर्ग के लोग भी शामिल होने लगे थे। कलकत्ता और मुम्बई इसका मुख्य केन्द्र था। दूसरी तरफ वह परिदृश्य था, जिसमें उर्स, दरगाह, मेलों और त्यौहारों में होने वाली संगीत सभाएँ और दंगल में होने वाली बाईयों की भागीदारी प्रमुख थी। इसमें आज भी मिर्जापुर में होने वाला कजरी का दंगल, बनारस में बुढ़वा मंगल और देव दीपावली की महफिलें तथा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया के दरगाहों पर होने वाली जियारतें शामिल की जा सकती हैं। तीसरी ओर उन म्यूजिक कम्पनियों का दखल इन औरतों की जिन्दगी में बढ़ने लगा था, जिनके लिये कभी-कभार उनके अनुरोध पर दादरा और कजरी की रिकार्डिंग कराना, एक नयी रवायत की शुरुआत जैसा बनने लगा था।

                बाईयों, कोठों तथा महफिलों से अलग एक धारा ऐसी पेशेवर गायिकाओं की भी थी, जिनका फिल्म संगीत पर गहरा प्रभाव रहा। दिलचस्प तथ्य यह है कि यह गायिकाएँ महफिली संगीत से सर्वथा दूर थीं और ज्यादातर बंगाल की पृष्ठभूमि से निकलकर आयी थीं। इस परम्परा में हम जूथिका राय, कानन देवी एवं पारुल घोष को याद कर सकते हैं।

                हिन्दी फिल्म संगीत के आरम्भिक दौर के बनने की प्रक्रिया के तहत एक खास तथ्य की ओर अलग से इशारा करना चाहता हूँ कि इनमें उन महफिलों की अपनी निजी परम्परा का भी परोक्ष रूप से योगदान रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि हर बाई के कोठे पर परम्परागत रूप से कुछ कायदे निभाये जाते थे। वे तवायफें और बाईयाँ राजदरबारों में या खुद के कोठों पर महफिलों को जिन तरीकों से सजाती थीं, उन्हें ‘बैठकी महफिल’ तथा ‘खड़ी महफिल’ कहते थे। ‘बैठकी महफिल’ का चलन ज्यादा था क्योंकि इसमें ठुमरी, दादरा, सादरा, होली और गज़ल आदि का भावपूर्ण प्रदर्शन गायिका बैठे हुए करती थी। बाईयों का भारी कपड़ा और श्रृंगार आम लोगों के आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था, जिसे पेशवाजा कहते हैं। ‘खड़ी महफिल’ कभी-कभार ही होती थी, जिसमें गानों की अदायगी थोड़े अंग-संचालन के साथ गायिका खड़े हुए करती थी। एक प्रकार से इसे हम मुजरे का प्रकार ही कह सकते हैं। संगतिये गायिका के पीछे-पीछे चलते थे, कभी-कभार तो दौड़ते भी थे। कब ‘सम’ आएगा, कब ‘ठेका’ लेना है- इसका ख़ास ख़्याल रखते थे। तबलानवाज़ों के तबले उनके कमर में कसे हुए आगे को लटके रहते थे। गायिका घूम-घूमकर महफिल में अपने फन का रंग बिखेरती थी।

                बेगम अख़्तर के यहाँ होने वाली बैठकी महफिल की एक सुन्दर छवि हमें बहुत बाद में जाकर सन् 1958 में बनी सत्यजित रे की फिल्म ‘जलसाघर’ में जस की तस बेगम पर ही फिल्मायी हुई दिखायी जाती है। वे बैठकी महफिल करती हुईं एक महत्त्वपूर्ण बन्दिश गाती हैं- ‘हे भर-भर आयीं मोरी अँखियाँ पिया बिन/घिर घिर आयी काली बदरिया/धड़कन लागी मोरी छतियाँ पिया बिन’।

                इस तरह म्यूजिक कम्पनियों से व्यापक लेन-देन और सौहाद्र्रपूर्ण मित्रता के चलते ढेरों ख्याल-ठुमरियाँ, गज़ल-गीत, भजन और नाट्य पद आदि फिल्मों की भी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गये। आज हम आसानी से ढेरों ऐसे प्रचलित मशहूर फिल्मी गीतों को जाँच सकते हैं, जो कभी बनारसी कजरी या महफिली मुजरा का अंग होते थे। उदाहरण के तौर पर बनारस में मशहूर राग मिश्र खमाज की ठुमरी ‘ठाढ़े रहियो ओ बाँके श्याम हो’, जिसे सिद्धेश्वरी देवी से लेकर शोभा गुर्टू तक गाती रही हैं;  पाकीजा फिल्म में बदलकर ‘ठाढ़े रहियो हो बाँके यार हो’ इस्तेमाल हुआ। इसी तरह राग मिश्र गारा की बनारसी ठुमरी ‘मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे’ जस का तस मुगले आज़म में प्रयुक्त हुई और बृज की पारम्परिक लोकधुन ‘निबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर सावन की आयी बहार रे’ पर बन्दिनी में ‘अबके बरस भेज भैय्या को बाबुल’ जैसा हृदयस्पर्शी गीत रचा गया। गंगा जुमना का बेहद मशहूर गीत ‘ढूँढ़ो-ढूँढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला’, पूरब अंग के एक दादरा ‘गंगा रेती पर बँगला छवा मोरे राजा’ पर आधारित था।

                फिल्म संगीत पर कोठों के जो अधिकांश शुरूआती प्रभाव लक्षित किये जाते हैं, उनमें महत्त्वपूर्ण भूमिका उनके साजिन्दों की भी होती थी। स्वयं संगीतकार नौशाद ने यह स्वीकारा है कि उनकी फिल्मों के संगीत पर जो असर है वह अवध की तवायफी गज़ल और बन्दिशों का है। उन्होंने लखनऊ और बनारस के अधिकांश कोठों के इर्द-गिर्द बसे हुए पुराने साजिन्दों को पकड़कर अपनी धुनों में वैसा प्रभाव डालने की कोशिश की है, जैसी उन दिनों खड़ी और बैठकी महफिलों में होती थी। लच्छू महराज भी फिल्मों से जुड़े हुए थे और उन्होंने भी अधिकांश जानकारियाँ इसी तरह की फिल्मवालों को उपलब्ध करायीं। अमृतलाल नागर ने अपने ऐतिहासिक कार्य ‘ये कोठेवालियाँ’ में साजिन्दों की इसी भूमिका पर ढेरों बाते कही हैं।

                अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अम्बालावाली, राजकुमारी, खुर्शीद, सुरैया और नसीम बानो आदि ऐसी महत्त्वपूर्ण गायिकाएँ, अभिनेत्रियाँ एवं तवायफों की परम्परा की प्रतिनिधित्व करने वाली स्त्रियाँ हुईं, जिन्होंने एक हद तक दरबार संगीत या महफिली संगीत को फिल्मों के रूपहले पर्दे पर जीवन्त किया। इन्हीं लोगों के दौर का प्रभाव बाद तक लक्षित किया जा सकता है। इसी समय तीन-चार महत्त्वपूर्ण बातें हुईं, जिन्होंने आरम्भिक फिल्म परिदृश्य को बदलने के साथ-साथ फिल्म संगीत की दुनिया को भी नये सिरे से गढ़ना शुरू किया। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात 1947 में भारत की आजादी से सम्बद्ध है, जब उस दौरान आजादी के कारण उपजा उथल-पुथल भरा समाज सांस्कृतिक रूप से काफी कुछ बदलने लगा।

                1947 में भारत-पाक विभाजन के साथ नूरजहाँ, रोशनआरा बेगम और मलका पुखराज जैसी बड़ी गायिकाएँ पाकिस्तान चली गयीं। सुरैया का कॅरियर इस समय शीर्ष पर था और लता मंगेशकर 1949 के साथ ‘बरसात’ और ‘महल’ जैसी फिल्मों से फिल्मी परिदृश्य पर मजबूती के साथ स्थापित हो रही थीं। 1946 में सहगल की मृत्यु के साथ सहगल युग का अन्त हो गया था और अब उसकी सिर्फ प्रतिध्वनियाँ बची थीं, जो लता और मुकेश आदि के आरम्भिक गानों में लक्षित की जा सकती हैं। धीरे-धीरे लता मंगेशकर ने जब अपना मुहावरा विकसित किया, तब तक स्त्री गायन का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका था और 1935 से 1945 तक की बहुतेरी बाईयों, अभिनेत्रियों का जमाना गुमनामी के अन्धेरे में जा चुका था।

                ऐसे में नौशाद, सी. रामचन्द्र, एस.डी. बर्मन, अनिल विश्वास, सलिल चौधरी और पण्डित रविशंकर की तमाम संगीतबद्ध फिल्मों का नया दौर आया, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकधुनें एवं बनारसी महफिल संगीत की धड़कनें अंतर्धारा की तरह बहुत सूक्ष्म ढंग से बहती हुई सुनी जा सकती है। खासकर पचास और साठ के दशक की कुछ बेहद उल्लेखनीय संगीतमय फिल्में, जिनमें हम आज भी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर सुन सकते हैं। उदाहरण के तौर पर- बसन्त बहार, शबाब, बैजू बावरा, अनारकली, आजाद, उड़न खटोला, अन्दाज, नौबहार, गंगा जमुना, लीडर, झनक झनक पायल बाजे, बहार, मुगले आजम, चित्रलेखा, मदर इण्डिया, फागुन, ममता, बर्मा रोड, मयूरपंख, रानी रूपमती और सेनापति जैसी फिल्में। मगर इस बात से कौन इनकार करेगा कि बसन्त बहार, बैजू बावरा और चित्रलेखा जैसी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत तक पहुँचने में हमें जो समय लगा, उसकी नींव में न जाने कितनी जानी-अनजानी पेशेवर बाईयों, तवायफों की गायिकी का योगदान रहा। साथ ही उनकी शुरुआती दौर की फिल्मों के संगीत का धरातल; जिनमे भूले-बिसरे कुछ फिल्मों के दिलचस्प नाम आज भी याद आ जाते हैं, जैसे, खूनी खंजर, दिल की प्यास, हूरे बगदाद और गुल सनोबर आदि।

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One comment

  1. Bahut saari ashuddhiyan tatha assawdhaniyan hain

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