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‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’ के शायर की आज पुण्यतिथि है

शाइरों में तख़ल्लुस रखने का चलन जाने कब से शुरू हुआ क्या पता, पर क़ायम आज भी है। एक और फ़ैशन अपने नाम के साथ अपने शहर या क़स्बे के रखने का भी रहा है। फ़िल्मी गीतकारों में साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, मजरूह सुल्तानपुरी आदि नामों में एक और चमकता सितारा रहा जो बहुत कम उम्र में ही हमसे जुदा हो गया — शकील बदायूँनी। उनके ऊपर मेरा लेख- दिव्या विजय

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शकील के परिवार में शाइरी का कोई माहौल नहीं था सिवाय इसके कि इनका कोई दूर का रिश्तेदार शाइर था। उसे ही देख इन्हें भी शाइरी के शौक़ ने अपने घेरे में ले लिया। कॉलेज के मुशाइरों में ख़ुद को मिलती तारीफ़ ने इन्हें गीतकार बनने की ओर प्रेरित किया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पास हो दिल्ली पहुँच कर शकील आपूर्त्ति अधिकारी बने पर एक दिन मुशाइरों में इनके हुनर को पहचान प्रोड्यूसर करदार साहब इन्हें संगीतकार नौशाद के पास ले गये और फिर नौशाद तथा शकील की जोड़ी अमर गीत-संगीत की गारंटी बन गयी। इन दोनों की दोस्ती ता ज़िंदगी बनी रही। जब शकील मियाँ बीमारी से लड़ रहे थे और उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तब नौशाद ने उन्हें तीन फ़िल्मों के लिए दस गुना मेहनताना दिलवाया।

इस जोड़ी में एक और फ़नकार आ जुड़ा, मो. रफ़ी। इन तीन मुसलमान व्यक्तियों ने मिल कर अब तक के सबसे मशहूर व अमर भजन श्रोताओं को दिए। ‘बैजू बावरा’ के ‘ओ दुनिया के रखवाले’ एवम् ‘मन तरपत हरि दरसन को आज’, ‘कोहिनूर’ का ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’। ‘मुग़ल ए आज़म’ का ‘मोहे पनघट पे नंदलाल’ भी शकील का ही लिखा है पर यह एक फ़ीमेल गीत है तो रफ़ी इसमें शामिल न थे। भजनों के अलावा इन तीनों के सुपरहिट गीतों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। नायक-नायिका के टकराने, किताबें गिरने और नज़रें मिलने की सिचुएशन पर शकील का लिखा ‘मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की क़सम’ कौन भूल सकता है। परवर्ती हिन्दी फ़िल्मों में यह सिचुएशन कितनी ही बार कॉपी हुई पर इन बोलों की बराबरी कोई न कर पाया।

प्रेमियों के लिए एंथम का दर्ज़ा पा चुके गीत ‘प्यार किया तो डरना क्या’ के लिए नौशाद डायरेक्टर के. आसिफ़ को मना कर चुके थे क्योंकि लगभग इसी सिचुएशन का गीत एक अन्य फ़िल्म ‘अनारकली’ में था। इस पर के. आसिफ़ ने उन्हें उक्त गीत की शूटिंग के लिए बने शीशमहल के बारे में बताया कि मैं तो निर्देशक के तौर पर यह चुनौती जीत जाऊँगा, अब चुनौती तुम्हारी और शकील की है। नौशाद और शकील ने पूरी एक रात बैठ कर इस गीत के न जाने कितने ही ड्राफ़्ट रिजेक्ट कर फाड़ दिए और फिर जो फ़ाइनल हुआ वो क्या कहने की ज़रूरत है?

हालाँकि शकील ने फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्ड लगातार तीन साल जीत कर अब तक का अपराजेय रिकॉर्ड बनाया पर हैरत की बात कि एक भी बार यह अवॉर्ड उन्हें नौशाद के साथ काम करने के लिए नहीं मिला। ‘चौदहवीं का चाँद’ और ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं’ संगीतकार रवि तथा ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ संगीतकार हेमन्त दा के साथ काम करने पर उन्हें मिला था।

यह वो वक़्त था जब फ़िल्मों में काम करने के लिए शाइरों को अदीबों की दुनिया में इज़्ज़त नहीं बख़्शी जाती थी बल्कि कमतर ही आँका जाता था। एक बार एक महफ़िल में एक बुज़ुर्गवार शाइर ने शकील को उनके अवॉर्डिड सॉंग ‘चौदहवीं का चाँद’ के लिए जम कर लताड़ा था कि “क्यों मतले में एक मिसरा कम वज़नदार है?” शकील उन्हें धुनों के साथ अल्फ़ाज़ों का मेल बिठाने की बारीक़ी वगैरह समझाते रहे पर वे न माने।

शकील बहुत ही कम उम्र में दुनिया से इंतकाल फ़रमा गये और ज़्यादा फ़िल्मों के लिए गीत न लिख पाए पर उनके नाम पर ‘मुग़ल ए आज़म’ तथा ‘मेरे महबूब’ जैसी अमर अल्बम्स हैं। इससे अलग शकील की ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें भी क़द्रदानों में उतनी ही मक़बूल हुईं जितने उनके फ़िल्मी गीत। मलिका ए ग़ज़ल बेगम अख़्तर की सोज़ भरी ग़ज़लें ‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’ और ‘ऐ मुहब्बत! तेरे अंजाम पे रोना आया’ शकील की क़लम की ख़ुसूसियत ही दिखाती हैं। पंकज उधास और निर्मला देवी (अभिनेता गोविंदा की माँ) ने भी इनकी लिखी बेमिसाल ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों/गीतों को अपनी आवाज़ दी।

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