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‘छोटी-छोटी गौवें, छोटे-छोटे ग्वाल, छोटे से हमरे मदन गोपाल’

राकेश तिवारी का उपन्यास आया है ‘फसक‘. कुमाऊँनी में फसक का मतलब गप्प होता है. हजारी प्रसाद द्विवेदी गल्प यानी उपन्यास को गप्प मानते थे. उपन्यास का एक रोचक अंश. प्रसंग गौ-कथा सुनने का है. यह उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है- मॉडरेटर

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नन्नू महराज के आश्रम में गौ-कथा चल रही है। भजन-कक्ष में गऊ सरीखी सरल स्त्रियां सिर पर पल्ला रखे बैठी हैं। गौशाला की जगह घर के खूंटे से बंधी। कई कुपोषण की शिकार। धुलाई में पीली पड़ गई सफ़ेद कमीज़ जैसी। कुछ अविवाहित युवतियां भी हैं जिन्होंने दुपट्टा ओढ़ रखा है। उनमें जो थोड़ा चंचल हैं, वे कभी-कभी कनखियों से पुरुषों को देख लेती हैं। सबके सामने एक-एक चौकी रखी हुई है। जिस पर गाय की तस्वीर सजाई गई है। कहीं-कहीं एक चौकी के सामने दो-दो, तीन-तीन स्त्रियां बैठी हैं। कुछ पुरुष भी आश्रम में मौजूद हैं, जो या तो उन स्त्रियों के परिवार के लोग हैं या महराज के भक्त। कुछेक वहां आई युवतियों के भक्त हैं (चंदू पांडे यह आरोप उनकी नज़रों का हवाला देकर लगाता है)। महाराज गौ माताओं की महिमा का बखान कर रहे हैं— गाय की कथा समुद्र मंथन से शुरू होती है। समुद्र मंथन में नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला नाम की पांच गौ माताएं प्रकट हुईं…।

   स्त्रियां बीच-बीच में गायों के चित्र पर फूल चढ़ाती जाती हैं। हाथ खाली होने पर गायों की तस्वीरों की तरफ़ हाथ जोड़ लेती हैं। असल गाय से अधिक सुंदर और आकर्षक क़ाग़ज की गायें लग रही हैं। गोबर भी नहीं कर रहीं। महाराज कह रहे हैं— गौ माताओं की सेवा करने से मनुष्य जन्म सफल हो जाता है। नक्षत्र अनुकूल हो जाते हैं। संतान की प्राप्ति होती है।

  एक निःसंतान स्त्री सबकी नज़रें बचा कर अपनी कोख पर हाथ रखती है। उसे विश्वास है कि जो बाबा कह रहे हैं वह एक दिन होगा। बाबा आगे कहते हैं— गौ माता की सेवा से ताप-संताप दूर होते हैं। सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। गौ माता में तैंतीस कोटि देवता वास करते हैं। उनकी पूजा कर ली तो सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं।

   सभी स्त्रियां एक साथ गौ-माता को प्रणाम करती हैं। सुख-समृद्धि सभी को चाहिए। सभी तख़मीना लगा रही हैं कि उस अकूत धन-संपत्ति को वे कैसे खर्च करेंगी और कैसे बचा कर रखेंगी, जो गौ माता के आशीर्वाद से मिलेगी। सामने बैठी एक युवा स्त्री का आंचल ढुलका हुआ है। बाबाजी का ध्यान बार-बार उसकी तरफ जा रहा है।

   उस स्त्री की नज़र बाबाजी पर पड़ी तो उसने अपना आंचल संभाला और बाबाजी ने अपना ध्यान। बोले— हर माता, चाहे वह बच्चे को स्तन-पान कराती हो, चाहे अन्न-जल देती हो, चाहे उसकी रक्षा-सुरक्षा करती हो, वह सम्माननीय है। जैसे हमारी धरती माता।…जैसे भारत माता। जैसे गंगा मय्या। जैसे मां लक्ष्मी, मां सरस्वती। जो निःस्वार्थ भाव से अपना प्रेम लुटाये, शिशुओं का लालन-पालन करे, वही माता है। माता का स्थान इसीलिए ईश्वर के समतुल्य है। ऐसी ही दयालु हैं गौ माता। इनकी आंखों में देखो। देखो गौ माताओं की आंखें। कितनी दया है उनमें। कितनी करुणा है। कितना स्नेह है। ये आंखें, उन्होंने एक बड़ी-बड़ी और अथाह गहरी आंखों वाली युवती की ओर देख कर कहा, प्रेम-रस के प्यालों की तरह हैं। ऐसी दयालु और करुणामयी माता की सेवा से सदैव पुण्य की प्राप्ति होती है।…बोलो, गौ माता की…।

   महिलाएं जैकारा लगाती हैं। पुष्प चढ़ाती हैं और तस्वीर में बनी सुंदर गायों की आंखों में झांकती हैं। सचमुच बड़ी ही निष्छल, निरीह और निष्पाप हैं ये आंखें। कइयों को उन आंखों में अपनी सासों, ननदों और बहुओं की आंखें दिखाई देने लगती हैं। वे गौ माता के सींग पर जाती अपनी नजऱों को बार-बार हटाती हैं। दूर बैठे पुरुष, जिनका ध्यान कथा में है, अपनी स्त्रियों के सदैव ‘गऊ’ आंखों वाली बने रहने की कामना करते हैं। जो मरखनी न हो। हृष्ट-पुष्ट बच्चों को जन्म दे, उन्हें दूध पिलाये, खाना पकाये, चूल्हा-चौका करे, पानी भरे, कपड़े धोये, बड़ियां बनाये, अचार डाले और स्वेटर बुने। जो भी करे, निःस्वार्थ भाव से करे। और अमूर्त, अदृश्य व मूक माताओं की पूजा से पुण्य कमाये। जिसके पुण्य-प्रताप से घर में सुख-समृद्धि और शांति आये।

  बाबाजी ने भजन शुरू कर दिया— ‘छोटी-छोटी गौवें, छोटे-छोटे ग्वाल, छोटे से हमरे मदन गोपाल।’

  बाबा जब बीच-बीच में, ऊंचे स्वर में, ‘छोटू से हमरे’ कहते तो गाय जैसी आंखों वाली औरतें झूमने लगतीं। भैरव के हाथ में लोटा था, जिस पर वह खुटका लगा रहा था। अभी वह खुद को गुणीजनों के बीच तबला बजाने लायक नहीं मानता और बंद कमरे में रियाज़ करता है।

  सभी स्त्रियों को बाबाजी ने गाय की एक-एक तस्वीर दी है, जिसे घर के मंदिर में रख कर वे पूजा करेंगी। उन्होंने अगली बार हल्द्वानी ने प्लास्टिक की गायें मंगाने का वादा किया है और कहा कि मंदिर में विराजमान गाय को रोज धूप-बत्ती दिखाने से सुख, समृद्धि और शांति आएगी। गौशालाओं में गोबर से खुर सड़ा रही और सड़कों पर आवारा घूम रही गायों की जगह काग़ज़ की गायों को मंदिर में बैठाने की इस उल्लेखनीय शुरुआत के लिए बाबाजी को भी पुण्य प्राप्त होगा। ऐसा भक्तों का मानना था।

 

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