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सत्ता ‘दुम’ लगाकर गढ़ती है – ‘हनुमान’

आज हनुमान जयंती है. हनुमान जी को भगवान भक्त के रूप में देखा जाता है. आज यह विशेष लेख युवा लेखक सुनील मानव ने लिखा है- मॉडरेटर

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 मेरी उम्र उस वक्त दस-बारह वर्ष रही होगी शायद। नाना जी  का पक्का घर बन रहा था। मिस्त्री भी पारिवारिक सदस्य जैसे ही थे, कहीं कोई पर्दा नहीं। नाम था- अलगू मिस्त्री। जाति के यादव और बिरहा के जबर्दस्त शौकीन। मैं जब तक ननिहाल रहा मेरी भी उनसे खूब पटी। रुख़सती की बेला में मैंने कहा मामा जी एक चीज माँगू तो देंगे। वो बोले-‘ बेहिचक मांगो भान्जे’। मैंने उनसे हनुमान विवाह की वो कैसेट माँग ली जो उन्हें बहुत प्रिय थी। बहरहाल वो कैसेट उन्होंने मुझे दे दिया सस्नेह।  कैसेट के A भाग में हनुमान-मृगअउली विवाह था, जिसे हैदर अली जुगनू ने गाया था जबकि B भाग में हनुमान-मंथरा विवाह  जिसे राम अधार यादव ने गाया था । कहने का लब्बो लुआब ये कि तभी से हनुमान जी के प्रति एक सोच मन में   खाना पानी लेकर  बैठ गई कि हनुमानजी तो अपने  राज्य  के राजा थे फिर राम ने उन्हें अपनी दासी मंथरा से विवाह के लिए वचनबद्ध कर विवश क्यों किया? हालाँकि सूर्यपुत्री सुवर्चला के साथ हनुमान के स्वैच्छिक विवाह का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में मिला। बनिस्बत इसके वो सवाल मन में बड़ा होता रहा।

आदिवासी कबीले से संबंध रखनेवाले हनुमान को राम की सत्ता स्वीकार करने के चलते आर्य संस्कृति ने स्वीकार तो कर लिया पर बहुत ही हिंसक तरीके से विरूपित करके। आदिवासी हनुमान का रंग- रूप आर्य-नस्ल से इतना अधिक भिन्न था कि आर्यों ने अपने हिंसक नस्लीय बोध के कारण आदिवासी समुदाय के हनुमान को बंदर कहा। सिर्फ यही नहीं दूसरे आदिवासी समुदायों के लिए भी आर्यों ने रीछ, भालू जैसे अपमानसूचक शब्दों का प्रयोग किया है जो कालान्तर में लिखित रूप से भी आर्य ब्राह्मणों द्वारा दर्ज कर दिया गया। सत्ता के प्रति सेवा व समर्पण का सबसे हिंसक रूपक हैं- हनुमान। जिन्हें सेवा व स्वामीभक्ति के बदले सत्ता की ओर से पूँछ (दुम) लगा दी जाती है। हनुमान में हनुमान का अपना कुछ नहीं है। हनुमान में जिस बल की बात की जाती है वो भी ‘राम-नाम’ (सत्ता) का बल है। ब्राह्मणों ने कथाओं के माध्यम से दर्शाया कि अपने पत्नी- बच्चों एवं कपि क्षेत्र (जहाँ के राजा हनुमान के पिता केसरी थे) के प्रति उत्तरदायित्व से विमुख हनुमान राम का दासत्व प्राप्त करके धन्य हो गये! बहुत ही ख़तरनाक साज़िश के तहत हनुमान के इस दासत्व-बोध को कालांतर में इतना अधिक ग्लोरीफाई किया गया कि दलित, आदिवासी समुदाय के लोग शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध के बजाय दासत्व को सहर्ष स्वीकार करके सत्ता की सेवा में न्योछावर हो जाने में ही अपने कुल की मुक्ति ढूँढने लगे !

अपने ग्रंथों में हनुमान को बलवान बुद्धिमान दर्शाने का एक बहुत ही मजबूत कारण ये भी था इससे दलित, आदिवासी समुदायों में ये मनोवैज्ञानिक संदेश जाता कि जब हनुमान जैसा अतुलित बलशाली और बुद्धिमान व्यक्ति सत्ता की सेवा में अपने पिछवाड़े दुम लगाने को समर्पित है तो तुम सामान्य लोगों की क्या औकात?

पर यहाँ हनुमान को राम के बराबर बल और बुद्धि वाला दर्शाने के अपने खतरे भी थे तो बुद्धिमान ब्राह्मणों ने हनुमान के जन्म को अवतार से जोड़कर हनुमान का आर्यीकरण किया । हनुमान जन्म की पौराणिक कथा के अनुसार  समुद्रमंथन के पश्चात शिव जी ने विष्णु का मोहिनी रूप देखने की इच्छा प्रकट की, जो उन्होनें देवताओँ और असुरों को दिखाया था। उनका वह आकर्षक रूप देखकर शिवजी आसक्त हो गए और इस तरह अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमान का जन्म हुआ ।

वर्तमान समय में हनुमान की सवर्ण समाज में सर्वस्वीकार्यता सत्ता के प्रति उनके इसी दासत्व- बोध का प्रतिनिधित्व करने के कारण ही है ।

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