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अभिषेक कुमार पाण्डेय की कहानी अनुबंधित जीवन

अभिषेक कुमार पाण्डेय युवा कथाकार हैं। अभी जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं, उसे ग्रामीण परिवेश और वहाँ के जनजीवन को आधार बना कर लिखी गई है। स्वाभावत: ग्रामीण शब्दावली भी प्रयोग हुआ है, जिससे कहानी का लुत्फ़ दोबाला हो जाता है। – संपादक
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सुलक्षिणी ने दुआर बुहारने के बाद अपनी बकरी के आस-पास के मल-मूत्र से भींगे पुआल को बटोरकर बाहर दुआर पर डाल दिया और बकरी को बरामदे से खोलकर दुआर पर लगे पपीते के पेड़ में बांधने  के बाद उसके आस-पास पुआल बिछाने लगी. बकरी के दोनों बच्चे उसके आगे पीछे घूम-घूमकर दूध पीने के प्रयास में एक दुसरे को धक्का देते और दूध भरे थान को बार-बार हुलेड़कर मातृरस का पान करने लगे. घुटनों के बल बैठकर दूध पी रहे ये बकरी के बच्चे सुलक्षिणी के खेल के मैदान के साथी हैं, सुलक्षिनी उनके सभी नाज उठती है. उनके चारे पानी के इंतजाम से लेकर उनके रहने की जगह की सफाई का सारा जिम्मा इसी के सिर है. बदले में ये सुलक्षिनी को अकेले बैठे देखकर उसकी पीठ पर कूदकर चढ़ जाने की होड़ लगाते हैं, कभी उसके बाल चबाते हैं तो कभी उसकी गोद में बैठकर जुगाली करते हैं, जुएँ निकलवाते हैं और सुलक्षिनी उनकी इस करतब के लिए हमेशा लालायित रहती है. उसे इस निरीह-निर्जीव प्राणियों की ये हरकते हमेशा आनंदित करती हैं.

इस लड़की की सुबह सबसे पहले हो जाती है. अभी सूरज का नामोंनिशान नहीं भोर की बेला है, हल्की-हल्की ठंढ पड़ने लगी है, खेतों में धान कट गए हैं और खेतवाहों तथा मजदूरों के घरों में उनकी हैसियत के मुताबिक अनाज भर गया है, गाँव के चवंर में पिछली बारिश का पानी भी कम पड़ने लगा है, हर साल इसी सीजन में गांव के नुनिया, धुनिया, हरिजन, पासी के बच्चे विद्यालय न जाकर सुबह से शाम तक चवँर में डटे रहते हैं. दिन भर पानी उबिछ्ते हैं, पाक गिंजते हैं, तब जाकर दस बारह गरई, चरंगा, सिधरी, डेंरा मछलियाँ हाथ लगती हैं. इस शिकार, इस लड़कपन, इस अठखेली का जो आनंद है, वह समय के साथ लुप्त हो जायेगा. परन्तु इस शिकार का जो स्वाद शाम को घूरे में पकाकर खानें में हैं, वह संसार के किसी पकवान में कहाँ.? परन्तु लड़कपन बहुधा शैतानी का संगी होता है. अतः उसका मुल्य भी चुकाने के लिए कलेजा मजबूत करना पड़ता है, शाम को जब पुरे बदन, घुटनों के ऊपर तक और हाथ में कीचड़ लगाये दूब घास में मछली गूंथकर घर पहुँचने पर बाबा लाल-लाल आँखों से घूरते हैं तो सभी मछलियों की लाल आँखें देखकर उनमें बाबा की लाल आँखों की छवि दिखाई पड़ती है. कमबख्त मछली को मार डालो पर आँखें बंद नहीं करेगी, लाल-लाल आँखों से घूरेगी, बाबा की लाल-लाल आँखों की याद दिलाएगी. फिर चापाकल के पास पीट-पीटकर सारे बागी बच्चों को नहलाने कार्यक्रम चलता है और आस-पड़ोस से बच्चों के रोने-डाकराने की आवाजे आती हैं.

कल शाम सुलक्षिनी का छोटा भाई निट्टू भी अपनी किताबें अपने पड़ोस के एक बच्चे को पकड़ा कर विद्यालय से कल्टी हो अपनी मत्स्य शौकीन मित्र-मंडली के साथ दिन भर चवंर में डोलता रहा और शाम को कीचड़-पांक में लिपटा घर पहुंचा. दरवाजे के पहले हीं उसकी बूढी दादी ने उसे धर लिया और क्रोधावेश में मारने लगी. बूढी हाथों में इतनी ताकत तो नहीं थी कि इस मार का कोई प्रभाव पड़े परंतु निट्टू जमीन में लोटकर ऐसा डकराया जैसे बकरा जिबह किया जा रहा हो. उसकी मां, चिंता, आँगन में भूंजा भूंज रही थी, एकमात्र पुत्र की दर्दनाक आवाज कलेजे को चीर गयी. भूंजा चूल्हे पर छोड़कर बाहर दौड़ी तो देखा निट्टू जमीन में लोट रहा है और उसकी सास बांह पकड़ कर उसे उठा रही है. क्षणभर में माजरा समझ गयी चिल्लाते हुए बोली-“जान हीं क्यों नहीं ले लेती हैं, दिन भर खाट तोडना हैं, हुक्का सुडकना है, उससे फारिग हुई तो मेरी कोंख उजाड़ने को तैयार हैं.” निट्टू ने माता को पक्ष लेते देखा तो झट से खड़ा हो गया और बुढ़िया को ऐसा धक्का मारा कि बेचारी गिर गयी. सुलक्षिनी पास हीं खड़ी थी दौड़ कर उठाने लगी. “नमकहराम, भाई जमीन पर गिरा था तो दया नहीं आयी, इस डायन के लिए इतनी चिंता? इसी दिन रात के लिए रोटियाँ तोडती हैं, किसी दिन कोख खाली करके मानेगी”-चिंता फिर गरजी. सुलक्षिनी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप बुढ़िया को उठाया उसके कमर में चोट लगी थी. दोनों एक तरफ चली जैसे पीछे से आती चिंता की जहर भरी आवाज से दूर भागना चाहती हो.

दुआरे से थोड़ी दूर आकर सुलक्षिनी ने बुढ़िया को पलानी में बैठाया और कमर सहलाने लगी-“ज्यादा चोट तो नहीं लगी दादी?”. “अब इस चोट की किसे परवाह है, बचपन से चोट हीं तो खाती चली आती हूँ. आँखें कुछ देखकर समझने लायक हुई तभी से माता-पिता की टहल सेवा में लग गयी, खेल-तमाशे, सैर-सहेलियों से तो परिचय हीं न हुआ. मोहल्ले को जानने समझने लायक हुई तो ब्याह कर दिया. यहाँ घर-गृहस्ती के ऐसे जाल में पड़ी जैसे भाग्य गुलाम हो गया हो. मायके में माता-पिता की टहल का वह सिलसिला सास-स्वसुर के जीवन पर्यंत चलता रहा. उसमें भी छः-छः संतानों के पालन पोषण का जिम्मा और तेरे दादा की बेमुरव्वती, उनसे प्रेम की आशा हीं बेमानी थी. दिनभर भोजन के बाद यारों-संगियो के साथ इस गाँव से उस गाँव, इस खेत से उस बगीचे वे सैर-शिकार के फेर में पड़े रहते और मैं घर दुआरे के जंजाल के फेर में. रात बीतते घर आते तो दो टूंग बात को भी तरस जाती.” बुढ़िया ने सांस खींचकर फिर कहा-“जैसे तैसे पांच बेटियों की शादी की और सोचा बेटा भाग्य के अंतिम पन्ने पर सुनहरे रंग भरेगा पर इसने भी अपनी दवात में मेरी खातिर काली स्याही ही रख छोड़ी थी” यह कहकर बुढ़िया रोने लगी.

सुलक्षिनी को चिंता हो आई, बुढ़िया की नहीं, अपनी चिंता. वह भी तो इसी राह की मुसाफिर सी लगती है, दिन भर काम करती है, रात रहे उठती है, बकरी, दुआर, घर, आँगन, बर्तन, भोजन, चूल्हे के लिए लकड़ी, बिस्तर, कपडे इन्हीं सब चीजों से तो घिरी हुई है. बकरी का दूध निकालती है, पर वह भी उसके हिस्से नहीं, निट्टू लड़ पड़ता है. सबसे अंत में सबके खाने के बाद भोजन करती है. कभी-कभी तो भोजन भी कम पड़ता है तो कच्ची मुली खाकर रात गुजारती है. सुलक्षिनी को चुपचाप बैठे देखकर बुढ़िया ने रोना बंद कर दिया. उसे अपनी तरफ खींचकर पूछा-“क्या सोच रही बाबू?” सुलक्षिनी ने दादी को कहा-“मैं भी तो तुम्हारी तरह हीं हूँ न? बड़ी होकर मुझे भी तुम्हारा हीं जीवन जीना है?” बुढ़िया का कलेजा बाहर होने को हो आया लड़की को खुद से चिपका कर बोली-“न मेरी रानी, तू तो भाग्यशाली है बिटिया, कभी-कभी हीं सही, स्कुल तो जाती है, सहेलियों में खेलती है. तेरा भाग्य बड़ा बली होगा. यह सुनकर सुलक्षिनी को तसल्ली हो आई. वृद्ध व्यक्ति में ईश्वर की छाया होती है. दादी ठीक हीं तो कहती है. वह स्कुल जाती है, सहेलियों में खेलती है, कभी-कभी पेड़ पर चढ़कर दोल्हा-पाती खेलती है. वह सचमुच भाग्यशाली है, भगवान् निर्मम नहीं होते वह उनकी रोज पूजा भी करती है. फिर उसके भाग्य में कमी कहाँ से रह जाएगी. रात हुई, निट्टू रो-रो कर जिद करता रहा मछली चाहिए. उसे मछली भी न मिली और दादी ने भी मारा. जिद कर बैठा था जब तक कल मछली नहीं लाने को कहेगी, खाना नहीं खायेगा. सुलक्षिनी उसकी हठ पर क्रोधित हो रही थी-“कैसा दुष्ट हो चला है, स्कुल छोड़ा, दिन भर चौकड़ी भरता रहा, दादी को धक्का दिया और अभी भी राजा बना जिद किये बैठा है”. उसकी माता ने सुलक्षिनी से कल मछली लाने जाने को कहा. कल सुलक्षिनी के स्कुल में खेल है, उसे वहां जाना है पर माता का आदेश सुनकर स्कुल और खेल नेपथ्य में चला गया. कल सुलक्षिनी सारा काम ख़तम कर चवंर में जाएगी.

दुवार का सारा काम करने के बाद सुलक्षिनी घर के कामों में व्यस्त हो गयी बाहर दुआरे से स्कुल जाते बच्चों की आवाजे सुनकर बाहर आई. देखा गुलबी, चन्दन, सन्नू और मोहल्ले के कई बच्चे नए कपड़ो में स्कुल जा रहे है. मन बेचैन हो गया सब-कुछ भूल गयी, मछली लाना भी और चूल्हे पर चढ़ा भात भी. आँगन में उसकी माता दाल साफ कर रही थी चावल के जलने की गंध नाक में पड़ी तो चिल्लाते हुए उठी-“एक काम ठीक से नहीं होता इस कुलक्षिनी से”-एक झटके से बाहर आई और सुलक्षिनी को बालों से पकड़कर अन्दर ले गयी. दो धौल जमाया और जलते चावलों की ओर लक्ष्य कर कहा-“आज तू और बुढ़िया यही खाना.” सुलक्षिनी तुरत हीं आसमान से जमीन पर आ गयी. आँखों से झर-झर आंसू गिरने लगे. बाहर से उसकी सहेली पुकार रही थी-“सुलक्षिनी, सुलक्षिनी स्कुल नहीं जाना क्या?” वह चुप रही सहेली के सामने रोते हुए कैसे जाएगी. थोड़ी देर बाद आवाज आनी बंद हो गयी उसकी सहेली चली गयी. रोते-रोते बाहर आई और बकरी के बच्चों को गोद में लेकर बैठ गयी, खूब रोई. रोते हुए बच्चे को जो तसल्ली माता की सानिध्य में आती है, सुलक्षिनी वही तसल्ली इन दो निरीह जीवों के सानिध्य में पाकर तृप्त हो रही थी. थोड़ी देर तक रोती रही फिर उन दो संगियो को पुचकारकर दादी के पास चली.

बुढ़िया ने सब बातें सुन ली थी, पर अनजान बनी रही. पूछती तो बच्ची एक बार फिर रोने लगती. सुलक्षिनी उसके पास जा बैठी बुढ़िया ने बात को विस्मृत करने के उदेश्श्य से कहा-“तो आज मछली लाने जाएगी??” “ठेंगा से जाती हूँ, मेरी लायी मछली खाकर तो ऊँगली काटेंगे राजकुमार”-सुलक्षिनी ने तंज से कहा. “हम्म…अभी तक गुस्से में है मेरी रानी, मुझे बहुत प्यार करती है”-बुढ़िया ने फिर पुचकारा. सुलक्षिनी ने उसकी तरफ गुस्से और शिकायत की नजर से देखकर कहा-“कल तुम्हे कुछ हो जाता तो?” बुढ़िया ने सुलक्षिनी को अपनी तरफ खींच कर गोद में बिठा लिया बोली-“मेरी परी रानी, तुझे हीं तो देखकर जी रही हूँ नहीं भगवान् से कब का बुलावा मांग लेती” सुलक्षिनी सोच रही है, मछली कैसे पकड़ेगी, गोद से उतर गयी. दादी से कहा-“आज मछली न लायी तो अम्मा क्या करेंगी?” बुढ़िया ने कहा-“वही जो रोज करती है, तुझे और मुझे ताने देगी और क्या? ”फिर कुछ रूककर-“ज्यादा बिगड़ी तो खाना भी रोक रखेगी और क्या?” “नहीं, खाना रोक दे कोई बात नहीं, उलाहना की याद भी करके रोयाँ कांपने लगता है”, सुलक्षिनी ने सोचा,”वह मछली पकड़ने जरूर जाएगी, फिर आखिर वह और दादी भी तो खायेंगी आह कैसा बढ़िया स्वाद होता है, साग-भात, दाल-भात खा-खा कर मन उकता जाता है. कभी-कभी बाबु घर में मछली खरीदकर लाते भी हैं तो केवल झोल हीं मिलता है मछली तो कभी नसीब भी नहीं होती.”

दिन के एक या दो बजा होगा. सुलक्षिनी पानी में मछली टकटोर रही है पानी में पूरी तरह लथपथ फ्रॉक पानी में सनकर शरीर से चिपक गया है. शरीर पूरी तरह कीचड़ में लिपटा हुआ है, बालों में लगी कीचड़ की मिट्टी सूखकर सफ़ेद पपड़ी के समान जम सी गयी है. दूर से देखने पर सुलक्षिनी एक पके बालों वाली बुढ़िया दिखती है, नजदीक से भी एकाएक पहचान में नहीं आती. मछलियाँ उसके पैरों में टकरा-टकरा कर भागी जाती हैं और वह इस छुपन-छुपाई के खेल में मछलियों को पछाड़ने में लगी है. झुककर मछली पकड़ने के प्रक्रम में उसकी कमर टूटी सी जाती है, बार-बार उठकर कमर सीधी करती है और फिर तन्मयता से इस खेल में मग्न हो जाती है. हाँ, ये कुछ हाथ आया शायद ओह! जरूर बड़ी मछली है, हाथ बाहर निकल कर देखा बड़ी सी गरई है, शायद यही सौरा मछली है, जो अपने पीछे मछलियों के झुण्ड घुमाती रहती है. सुलक्षिनी बेहद खुश हो गयी दौड़ कर अपने मछली वाले डब्बे के पास पहुंची. उसमे मछली को डाला और झांककर मछली गिनने लगी. तीन गरई, दो सिधरी और पांच कतली मछली हाथ लगी है. बस कुछ मछलियाँ और पकड़ ले तो झोल वाली मछली अच्छी बन पड़ेगी. नहीं, इतनी सी मछली से तो किसी भी विधि झोलदार मछली न बन पाए. कम से कम दस मछली और मिल जाती.

फिर पानी में उतरी, किनारे पर नजर गयी देखा एक छोटे से बिल के अन्दर बाहर मछलियाँ आ जा रही है. दादी ने एक बार बताया था-“ऐसी-ऐसी बिलों में दो-दो किलो तक मछलियाँ निकलती हैं, पकड़ने वाला चाहिए. एक बार तेरे दादा ने भी ऐसी हीं बिल से एक झोला सिंघी मछली पकड़ी थी खूब दावत हुई थी. पड़ोस में भी बांटी गयी फिर भी ख़त्म न होती थी. कई दिनों तक पानी में जिन्दा रखा था कई दिन भोज किया था.” सुलक्षिनी ने सावधानी से बिल को चारो और से गीली मिट्टी इकठ्ठा कर उसे घेर दिया और हाथ लगा-लगा कर मछली टटोलने लगी. हाँ, खूब सारी मछलियाँ हैं. खुश हो होकर पकड़ रही है, डब्बे में डालती जाती है. कई मछलियाँ नन्हे हाथों को छकाकर भाग गयी. फिर भी बीस और मछलियाँ पकड़ में आईं हैं अब घर जा सकती है. पूरी देह भींग गयी है पछुआ हवा तीर की तरह शरीर को छेद रही है. सुलक्षिनी डब्बे को छाती से चिपकाये घर की ओर भागी जाती है.

सूरज ढल चुका है, सुलक्षिनी सिलबट्टे पर सरसों लहसन का मसाला पीस रही है. सारा शरीर टूट रहा है, दिन भर धान रोपने वाला मजदूर और सारा दिन मछली मारने वाले मछुआहे को तब तक शरीर की पीड़ा का एहसास नहीं होता जब तक वह पानी में खड़ा रहता है जैसे हीं पानी से बहार निकला, नहाया, शरीर पोंछा, फिर पता नहीं कहाँ से दुनिया भर की दर्द-पीड़ा पुरे शरीर को सजा देना शुरू कर देती है, यही सजा सुलक्षिनी की परीक्षा ले रही है, आंसू जब्त किये है, होंठ दांतों से भींचे हुए है. मसाला पिसती जाती है. जब से घर आई है, सिर्फ एक क्षण को दादी को मछली दिखाने बैठी है. फिर जो अम्मा ने रगेदना शुरू किया है अभी तक फुर्सत में नहीं हैं. घर आई, नहाई, मछली साफ की, आटा गुंथा, रोटी पकाई, बाबु को मछली से भात अच्छी लगती है उनके लिए भात बनाई और अब मसाला पीस रही है. भूख लग आई है, पेट व्याकुल हो रहा है. पर थोडा धीरज और धर ले कम से कम आज मछली तो खाने को मिलेगी, अपनी पकड़ी गयी मछली, स्वादिष्ट झोलदार मछली, विभिन्न प्रकार की मछली. इसी स्वप्न ने सुलक्षिनी के दर्द को जैसे कम सा कर दिया. सारा काम ख़त्म कर दादी के पास चली. सबके भोजन कर चुकने के बाद हीं ये दोनों दादी पोती निवाला उठाने का सौभाग्य पातीं हैं. दादी दुआरे पर आग में कुछ पका रही है सुलक्षिनी के आते हीं उसे राख में ढँक दिया सुलक्षिनी देख नहीं पायी. देर तक दोनों बाहर बैठी बातें करती रहीं. घर के अन्दर से निट्टू की आवाज आ रही है अम्मा उसे जिद कर-कर के परोस रही है. शायद बाबु भी खा रहे हैं. बस कुछ देर में वे खा चुके होंगे, फिर हम दोनों भी इस जिह्वा और उदर की तृप्ति का हक़ पाएंगे. दोनों घर के बाहर बैठीं हैं, बातें कर रहीं हैं पर कान और मन ये दोनों घर के अन्दर की गतिविधियों पर ध्यान लगाये हैं.

रात यौवन की ओर बढ़ रही है, झींगुरों ने बोलना शुरू कर दिया है, जैसे कह रहे हो कब खाने जाएगी. परन्तु घर के अन्दर से आवाजे नहीं आ रहीं हैं “क्या वे हमें भूल गए? नहीं ऐसा नहीं हो सकता.” सुलक्षिनी ने सोचा और दरवाजे की और चली. अन्दर देखा आँगन में कोई नहीं. दरवाजा टेलकर घुसी. “आह! सभी सो चुके हैं. कैसे सो गए? क्या सचमुच हमें भूल गए?”-क्षण भर को सुलक्षिनी को लगा जैसे स्वप्न देख रही हो. परन्तु यथार्थ तो सूरज की भांति अटल अविचलित रहता है. सुलक्षिनी ने चूल्हे के पास पड़े रोटी के डालिए को खोला सिर्फ दो रोटियाँ, दो प्राणियों के लिए. कडाही का बर्तन हटाया, मछली देखने भर को नहीं केवल थोडा झोल भर बच गया था. मन में तूफान सा उठ खड़ा हुआ. आँखों में सैलाब सा उमड़ने लगा, सुलक्षिनी ने ऊपर देखा तारे भी तरस खा रहे थे. झींगुरो की आवाजे क्रंदन कर रही थी. बारी-बारी एक-एक रोटी से कडाही में लगे मसाले को पोछा और गोल-गोल लपेटकर दादी के पास चली. जी होता था, वही बैठकर रोए, पैर और आंसू सँभालने मुश्किल हुए जा रहे थे. दादी के पास पहुँचने तक बाँध टूट गया. दादी सारा माजरा समझ गयी. उसने सुलक्षिनी को गोद में बिठाकर पुचकारने की कोशिश की परन्तु खुद हीं अपने आंसुओं को काबू नहीं रख पाई. फिर सुलक्षिनी को गोद से उतारा और रख में से कुछ निकालने लगी. सुलक्षिनी ने देखा एक गरई मछली है, जो दादी पका रही थी. इसे दादी ने चुपके से शाम को उस समय निकल लिया था जब सुलक्षिनी उसे मछली दिखा रही थी.

दादी-पोती एक दुसरे को रोटी और मछली तोड़-तोड़ कर खिलाती जाती थी और आंसुओं से धरती भिगातीं जाती थी…

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