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राजीव गांधी ने देश के लिए जो भी किया उनको उसका जस नहीं मिला

राजीव गांधी को गए 27 साल हो गए. 80 के दशक में जब हम बड़े हो रहे थे तो हम देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री से बेपनाह मोहब्बत और नफरत दोनों करते थे. 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री की नृशंस हत्या के बाद टीवी पर हम ने अगले 12 दिनों तक दिन रात देखा. माँ के शव के सर की तरफ काला चश्मा लगाए, अमिताभ बच्चन के साथ खड़े राजीव गांधी के मासूम चेहरे को देख देख कर हम सबको उनसे वैसे ही प्यार हो गया था जैसे उन दिनों नए नए चले टीवी धारावाहिकों से हुआ था.

1989 में जब उनके कार्यकाल के बाद देश में आम चुनाव हुए तो राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की हार हुई. तब उनकी हार का एक बड़ा करण यह भी था कि दूरदर्शन को उन्होंने ‘राजीव दर्शन’ बना दिया था. टीवी पर देखकर उनसे प्यार हुआ और फिर टीवी पर उनको इतना देखा कि उनसे नफरत सी होने लगी थी.

संयोग से, दिल्ली में जिन दो विद्वानों के साथ कुछ अच्छा समय बिताने का सुयोग हुआ उनमें एक मनोहर श्याम जोशी थे और दूसरे वागीश शुक्ल. दोनों राजीव गांधी के घनघोर प्रशंसक थे. उनका यह मानना था कि आजादी के बाद देश में जो यथास्थितिवाद था उसको तोड़ने, एक बड़ा झटका देने का काम राजीव गांधी ने किया. यह जरूर है कि उन्होएँ समय से पहले देश में कम्युनिकेशन तथा कम्प्यूटरीकरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाये. उस समय इसका बहुत विरोध हुआ क्योंकि लोग इस बात को ठीक से समझ नहीं पाए. लेकिन बाद में इन दो क्षेत्रों ने ही देश में युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किये. जोशी जी कहते थे कि वह पहला प्रधानमंत्री था जिसमें विजन था, जो देश को आगे ले जाना चाहता था और उसके लिए उसके पास योजनायें थीं. यह जरूर था कि राजनीतिक समझ के मामले में वे कुछ अपरिपक्व थे लेकिन उनके काम युगांतकारी रहे.

वे मजाक में कहते थे कि पाकिस्तान भारत से इसीलिए बहुत पीछे रह गया, उसका समाज आगे नहीं जा पाया क्योंकि वहां कोई राजीव गांधी जैसा प्रधानमंत्री नहीं बना. अगर पाकिस्तान में भी समय पर कम्प्यूटरीकरण हो गया होता तो पाकिस्तान में सामाजिक-राजनीतिक हालात जस के तस नहीं बने रहे होते.

दुर्भाग्य की बात यह है कि इस देश में ऐसे किसी भी नेता को याद नहीं रखा जाता जिसने समाज के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण काम किया हो. हम अपने नेताओं को उनके राजनीतिक कामों से ही याद करते हैं. इसीलिए इतिहास में राजीव गांधी का वह दर्जा नहीं बन पाया है जिसके वे असल में हकदार हैं.

आज 21 मई है. मुझे आज भी 1991 का यह दिन याद है. मैं डीयू में पढता था और गर्मी की छुट्टियों में सीतामढ़ी गया हुआ था. 22 मई के दिन गाड़ी से मुजफ्फरपुर आ रहा था. रात में राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी. हम डरे हुए थे कि पता नहीं मुजफ्फरपुर पहुँच पायेंगे या नहीं. 1980 में जब उनके छोटे भाई संजय गांधी की मृत्यु दुर्घटना में हुई थी तो भी मेरी स्मृति में यह बात थी कि शहर की सारी दुकानें बंद हो गई थी. 1984 में तो पूरा शहर जैसे ग़मगीन माहौल में 9 दिनों तक टीवी देखता रह गया था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. जो शायद जवाहरलाल नेहरु के बाद इस देश की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री थी. मुझे याद है कि मेरे गाँव में भी कई घरों में चूल्हा नहीं जला था.

लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद अगली सुबह सीतामढ़ी से मुजफ्फरपुर आते हुए हमें रास्ते में सब कुछ सामान्य दिखा था. हम मुजफ्फरपुर इसलिए जा रहे थे क्योंकि मेरे चेचेरे बड़े भाई का तिलक समारोह था. हम डरे हुए थे कि पता नहीं मुजफ्फरपुर में उस दिन दुकानें खुली होंगी या नहीं. शहर में कहीं तोड़फोड़ तो नहीं हो जाएगी. 1984 में जब उनकी माँ इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी तब शहर के सिखों को शहर छोड़कर भाग जाना पड़ा था. उनको इतना परेशान किया गया कि वे चले गए. अनेक शहरों से सिख आबादी को शहर छोड़कर भागना पड़ा था.

लेकिन इसा कुछ नहीं हुआ. शहर मुजफ्फरपुर पहुंचे तो सब कुछ सामान्य था सिवाय इसके कि लोग खड़े होकर आपस में बातें कर रहे थे. लोगों के झुण्ड के झुण्ड सड़कों पर खड़े थे. लेकिन सारी दुकाने खुली हुई थी. मुझे तब भी यह बात अजीब लगी थी कि देश के इतने बड़े नेता की हत्या हुई और शोक जैसा कोई माहौल नहीं था.

जोशी जी कहते थे, राजीव गांधी अभिशप्त थे. उनका भाग्य इतना तेज था कि उसने उनको सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए पहले रास्ते बनाए. संजय गांधी की हत्या हुई, जो अगर जीवित होते तो राजीव गांधी को राजनीति में आने का झंझट मोल नहीं लेना पड़ता. वे जैसा सामान्य जीवन जीना चाहते थे वैसा जीते रह जाते. लेकिन अगले चार साल में उनकी माँ की हत्या हो गई और उनको प्रधानमंत्री बनना पडा. लेकिन अभिशप्त थे इसलिए उनकी अस्वाभाविक मौत हुई.

इतने दुर्भाग्यशाली थे कि जब उनकी मृत्यु हुई तब तक वे भारतीय राजनीति के लिए एक तरह से अप्रासंगिक हो चुके थे.

जबकि देश को जो सुधार आगे लेकर गए वे सब राजीव गांधी ने ही किये थे.

सच में देश में इतना दुर्भाग्यशाली कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ कि जिसने जो जो किया उसको उसका उसका जस नहीं मिला!

प्रभात रंजन 

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