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जब आप प्रेम में होते हैं तो अनावश्यक रूप से सकारात्मक हो जाया करते हैं

जानकी पुल हो सकता है किसी स्थापित लेखक की रचना से परिचय करवाने से चूक जाए लेकिन उसकी पूरी कोशिश होती है कि किसी नए लेखक की उल्लेखनीय कृति उसकी नजर से छूट न जाए. हाल में एक उपन्यास नजर में आया ‘रूममेट्स‘. सीत मिश्रा का यह उपन्यास कई मायनों में दिलचस्प है. मैं हा नहीं कहूँगा कि यह बहुत कमाल उपन्यास है या अलग हटकर. ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन अपने अपने घरों से कैरियर बनाने आई लड़कियों के जीवन के छोटे छोटे टुकड़े दास्तान इस उपन्यास में कुछ मार्मिक, कुछ दिलचस्प, कुछ आज की जिंदगी की जटिलताओं को समझने के लिहाज से प्रासंगिक अंश इस उपन्यास में जरूर हैं, जिससे बेहतर की सम्भावना दिखाई देती है. उपन्यास का प्रकाशन ‘शब्दरम्भ’ प्रकाशन द्वारा किया गया है. इस प्रकाशन का पहला उपन्यास ‘डार्क हौर्स’ था, जिसको साहित्य अकादेमी का युवा पुरस्कार मिला था. ‘शब्दारम्भ’ का यह दूसरा उपन्यास है. इसका एक अंश पढ़िए फिलहाल- मॉडरेटर

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जब आप प्रेम में होते हैं तो अनावश्यक रूप से सकारात्मक हो जाया करते हैं। यही हाल मेरा होता गया, जब भी पूरब कुछ कहते मैं उसे हमेशा खुद से जोड़कर ही देखती। मैं कभी उन्हें सीधे जाकर कुछ नहीं कहती लेकिन अपनी हरकतों से बहुत कुछ बयान करने की कोशिश करती।

दफ्तर में बातों से निकलती हुई बात एक बार नाखूनों पर जाकर अटक गयी। सबने नाखून के बारे में अपनी राय रखी। रब ने कहा कि उन्हें बढ़े हुए नाखून बिलकुल पसंद नहीं। उनके दोस्त ने पलटकर कहा कि महिलाओं को तो लम्बे नाखून रखने का शौक होता है अगर आपकी पत्नी रखेंगी या प्रेमिका लम्बे नाखून रखेंगी तब क्या करोगे? उन्होंने कहा कि कह देंगे या तो नाखून रख लो या फिर मुझे।

उस दिन के बाद मेरे नाखून कभी नहीं बढ़े। इसके बाद नाखून बढ़ाने का शौक कभी पाला भी नहीं। जो बातें पूरब को पसंद नहीं वह मैं कभी नहीं करती, अंजाने में कुछ हो जाए तो अलग बात है।

प्रेम में स्थिरता नहीं रहती न बातों में, न एहसासों में, और न ही स्थिति में। बदलाव की चाहत बरकरार रहती है। शायद यही वजह थी कि कुछ वक्त तक तो यह सब अच्छा लगता रहा लेकिन बाद में यह जानने कि इच्छा प्रबल हो गयी कि आखिर पूरब क्या चाहते हैं? मैं इतनी हरकतें करती हूँ कि किसी का भी ध्यान उस ओर चला जाता है लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता।

पूरब नहीं समझ सकते कि उन्होंने मुझे कितना मजबूर किया है? कोई भी इस बात को सिरे से खारिज कर सकता है कि जो शख्स तुमसे बात नहीं करता वह भला तुम्हें मजबूर कैसे कर सकता है? लेकिन जब कोई दिल में उतरता है और इस तरह से उतरता है कि उसके हिसाब से आपके दिन-रात तय होने लगते हैं, खुशी गम की वजहें उसके इर्द गिर्द ठहरने लगती हैं। तब यह कतई जरूरी नहीं रह जाता कि वह हाथ पकड़ कर रोकेगा, तभी मैं रुकूंगी, उसके आप-पास मौजूद होने का एहसास इतना गहरा होता है कि मैं उसमें डूबी रहने के लिए घंटों बैठ सकती हूँ। पूरे दफ्तर की फालतू की बकवास सुन सकती हूँ। बेवजह की तंज सुन सकती हूँ। मैं कहना चाहती थी कि यकीन मानो रब आपने मुझे मजबूर कर दिया। जिसतरह आप मुझे में शामिल हो चुके हो कि आपके कुछ कहने की जरूरत नहीं रह गयी, अब सबकुछ मेरा दिल मुझसे करवा लेगा जो उसे उचित लगेगा।

आप चाहे-अनचाहे जब किसी के जीवन में शामिल हो रहे होते हो तब आप उसे किस-किस चीज के लिए मजबूर करते हो इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। आप इन बातों का हिसाब नहीं रख सकते और न ही कभी इन बातों का हिसाब दे सकते हैं। मजबूर करने के लिए कुछ कहने की जरूरत नहीं होती। तुम्हारे बिना जाने, तुम्हारे बिना चाहे तुम मुझमें शामिल हो गये अब मैं मजबूर हूं वह सब करने के लिए जो तुम मुझमें मौजूद रहकर करवाना चाहते हो।

इस बात से पल्ला झाड़कर जाया जा सकता है, यह प्रेम में जी रहे शख्स की यह खुद की परेशानी है, और खुद के द्वारा ही यह परेशानी खड़ी भी की गयी है। लेकिन जवाब पाने का हक तो हर किसी का होता ही है।

प्रेम पहला था और अनुभव कच्चा इसलिए निभा से सलाह ली। प्रेम में दोस्तों से बड़ा कोई हितैषी नहीं था, आखिर आपके राजदार तो वही होते हैं। वह इस मामले में निभा मुझसे और ईश से ज्यादा अनुभवी थी। उसने कहा, सीधे-सीधे बोल दे। मुझे यह तरीका रास नहीं आया पूरब के सामने कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं थी। बात की शुरुआत कैसे करती? हम दोनों कभी बात भी तो नहीं करते। उनके सामने तो जाने कितनी लहरे पूरे पेट से निकलकर पूरे शरीर में दौड़ती हैं, उस वक्त कुछ बोलने सुनने का मन नहीं करता। बस उसे महसूसने को जी चाहता है। उनसे सीधे न पूछने का एक कारण यह भी था कि शायद वह ‘ना’ कह दें और मैं बर्दाश्त नहीं कर सकूँ। मैं बिलकुल अंजान बनकर उनतक अपनी बात पहुंचाना चाहती थी।

निभा ने दूसरी सलाह दी। कहा फोन, कर दे यह तरीका भी ठीक नहीं लगा। फोन कर दूँ जरूरी है वही उठाएँ।

अंत में निभा ने कहा कि किताब के पीछे लिखकर किताब उन्हें पढ़ने को दे दे। अगर उनकी नजर पड़ी तो जवाब देंगे न दिये तो समझ जाना कि उसे तुझमें कोई रुचि नहीं है। यह सलाह बाकी दोनों सलाहों से बेहतर लगी।

मैंने एक किताब के पीछे लिखा-

                        क्या यही वो जिंदगी है जिसकी मुझे तमन्ना थी

                         क्या तुम वही हो जिसकी मैंने आरजु की थी

                         मैं एक झूठा ख्वाब देख रही हूं

                         या कि तुम एक परछाईं हो

                         जिसकी ना तो कोई शुरुआत है और न ही अंत

                         क्या तुम्हारी नजर में,

                         मैं अपनी हदों को तोड़ रही हूं

                        लांघ रही हूँ अपनी सीमा-रेखा

                         क्या तुम मुझे मेरी परिधी में बांधना चाहते हो

                         और बताना चाहते हो मेरी सीमाएं………….

                         नहीं… नहीं, ऐसा नहीं करना

                         मैं बंधना चाहती हूं तुममें,

                         तुम्हारी इजाजत से।

उन्हें किताब देने से पहले मन में कई बातें थी, अगर उन्होंने किताब लेने से इंकार कर दिया तब क्या करूँगी। या किताब अपने किसी दोस्त को दे दी और उसने यह सब पढ़ लिया फिर क्या होगा? फिर खुद ही ध्यान आया इसमें कहीं नाम तो लिखा नहीं है कि किसने लिखा किसके लिए लिखा। यह सब सोचकर मैंने किताब देने का निश्चय किया।

पूरब के दफ्तर आने के बाद मैंने उन्हें किताब दिखाते हुए कहा कि गुनाहों की देवता बहुत अच्छी किताब है। इस किताब के बारे में कहा जाता है कि अगर आप किताब पढ़ने के शौकीन है और आपने इसे नहीं पढ़ा तो कुछ भी नहीं पढ़ा।

‘मैंने नहीं पढ़ी है यह किताब’।

‘यह बहुत अच्छी किताब है आप चाहें तो पढ़ सकते हैं।‘

पूरब ने कहा, ‘मैं किताबें नहीं पढ़ता’।

मैंने उनकी बात अनसुनी करते हुए उनके डेस्क पर किताब छोड़कर तेज कदमों से आगे बढ़ गयी। मैं नहीं चाहती थी वह पीछे से आवाज देकर मुझे किताब लौटा दें।

दूसरे दिन पूरब दफ्तर जल्दी आ गये। उन्होंने मुझे किताब लौटाते हुए कहा कि आपकी किताब यहाँ छूट गयी थी। क्या आपने किताब के पीछे कुछ लिखा था, मैंने इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी। मैं बिलकुल सकपका गयी टूटे शब्दों में जाने क्या कहा जिसका मतलब था, ‘हाँ, कुछ-कुछ लिखने की आदत है इसलिए जहाँ जब भी जो सुझता है वहीं लिख देती हूँ। शायद किताब में भी कुछ लिख दिया हो।’

पूरब ने ‘हूँ’ कहा और अपने काम में व्यस्त हो गये।

मैं किताब लेकर सीधे वॉशरूम में घुस गयी इस उम्मीद में कि शायद कोई जवाब आया हो। काफी देर तक उस किताब को अपनी बाहों में लपेटे खड़ी रही समझ में नहीं आ रहा था खोलूँ कि न खोलूँ। कुछ लिखे जाने का भी डर था और न लिखे जाने का भी। कोरी कल्पनाओं में जीना असल जिंदगी से बिलकुल अलग होता है।

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