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आज उसी जॉर्ज पंचम का जन्मदिन है जिनको ‘भाग्यविधाता’ कहा गया था!

आज जॉर्ज पंचम की जयंती है. 1911 में वे भारत के सम्राट बने थे और उनके स्वागत में देश भर ने जैसे पलक पांवड़े बिछा दिए थे. कहा जाता है कि ‘जन गण मन’ की रचना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनके ही स्वागत में की थी. यह जरूर विवाद का विषय है कि टैगोर ने उनके स्वागत में यह गीत लिखा था या नहीं. लेकिन जॉर्ज पंचम के स्वागत में हिंदी के उस समय के अनेक बड़े माने जाने वाले कवियों ने कविताएँ जरूर लिखी थीं. भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखकों में एक बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने जार्ज पंचम के स्वागत में “सौभाग्य समागम” लिखी. खड़ी बोली में पहला महाकाव्य लिखने वाले अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने “शुभ स्वागत” लिखा. खड़ी बोली के आरंभिक कवियों में एक श्रीधर पाठक ने “श्री जार्ज वन्दना” तथा नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ ने “महेन्द्र मंगलाष्टक” लिखकर जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी का स्वागत किया. जॉर्ज पंचम के सम्मान में दिल्ली दरबार हुआ था, जिसमें उनको सम्राट घोषित करके राजमुकुट भी पहनाया गया था.

जॉर्ज पंचम ने बड़े पैमाने पर चांदी के सिक्के जारी किये थे जिनके ऊपर उनकी तस्वीर थी. ज़माना चाहे जितना बदल गया हो लेकिन आज भी दीवाली के मौके पर चांदी के उसी सिक्के को खरीदकर घर में रखना शुभ माना जाता है जिसके ऊपर जॉर्ज पंचम की तस्वीर है. सिक्का कब का बंद हो गया लेकिन धनतेरस के दिन वह सिक्का एक हजार से ऊपर की कीमत में बिकता है.

भारत में जहाँ जहाँ वे गए उनका भव्य स्वागत हुआ. मुम्बई में गेटवे ऑफ़ इण्डिया उनके स्वागत में ही बनाया गया था. दिल्ली में दरबार लगाकर उन्होंने ही दिल्ली को कोलकाता के स्थान पर देश की राजधानी होने की पुष्टि की.

दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में जॉर्ज पंचम की एक मूर्ति है. आजादी के बाद के एक बड़े लेखक कमलेश्वर ने एक कहानी लिखी थी ‘जॉर्ज पंचम की नाक’, जिसमें मूर्ति की नाक टूट जाती है. अभी पिछले साल एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें कुछ देशभक्त जॉर्ज पंचम की मूर्ति तोड़ते दिखाई दे रहे थे.

आज वे गुलामी के एक बड़े प्रतीक हैं लेकिन इतिहास से इस सच को नहीं मिटाया जा सकता है कि मुगल साम्राज्य के अंत के बाद वे अकेले राजा थे जिनको दिल्ली में तख़्त पर बिठाकर भारत का सम्राट घोषित किया गया था. उनके बाद किसी को इस तरह से भारत का सम्राट नहीं घोषित किया गया.

प्रभात रंजन

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2 comments

  1. हाँ! यह विवाद का विषय माना जाता है. पर अगर कोई ध्यान दें या कहूँ कि देना चाहे तो यह स्पष्ट है कि “जन गण मन” में “अधिनायक” “जॉर्ज पंचम” नहीं हैं ।

    जन गण मन गीत दिसम्बर, 1911 में लिखा गया. उस वक़्त जब कि जॉर्ज पंचम भारत आया था। यह गाना सर्वप्रथम 1911 में कोलकत्ता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। फिर यह गीत जॉर्ज पंचम के आगमन/स्वागत समारोह में उनकी उपस्थिति में दूसरे दिन भी गाया गया, जिसके बाद जॉर्ज पंचम के स्वागत का प्रस्ताव पारित हुआ और उसके स्वागत में गीत गाया गया। विदेशी पत्रकारों ने भूल वश जो छपा वो हमेशा के लिए भ्रान्ति फैलाने का सामान बन गया।

    उदाहरण ” The Bengali poet Rabindranath tagore sang a song composed by him specially to welcome the Emperor” (Statesman, Dec28, 1911) ” The proceedings began with the singing by Rabindranath tagore of a song specially composed by him in honour of the Emperor.” (Englishman, Dec 28, 1911) “When the proceedings of the Indian National Congress began on Wednesday 27 december 1911, a Bengali song in welcome of the Emperor was sung. A resolution welcoming the Emperor and Empress was also adopted unanimously.” (Indian, Dec29, 1911).

    असल में अधिवेशन की शुरुआत रबिन्द्रनाथ के द्वारा जन गण मन गा कर हुई थी और इसके बाद “रामभुज चौधरी “के द्वारा रचित एक हिंदी गीत ” बादशाह हमारा” जॉर्ज पंचम की विरुदावली के रूप में कांग्रेस के मोडरेट नेताओं की इच्छा पर गाया गया। तत्कालीन कलकत्ता, (आज के कोलकत्ता) से प्रकाशित होने वाले पत्र ” अमृत बाज़ार पत्रिका के दिसम्बर ,1911 के अंक और अन्य समाचार पत्रों से ये बात स्पष्ट होती है.
    ” The proceedings of Congress party session started with a prayer in Bengali to praise God (song of benediction). This followed by a resolution expressing loyalty to KIing George V. Then another song was sung welcoming King George V” (Amrita Bazar Patrika 28, 1911). ” The Proceedings commenced with a patriotic song composed Babu Rabindranath Tagore the laeding poet of Benagl (Jangan mam ) of which we give the english translation (फिर यहाँ पर जन गण मन का अंग्रेजी अनुवाद दिया गया है।) Then after passing the loyalty resolution, a Hindi song paying heartfelt homage to their Imperial Majesties was sung by the Bengali boys and girls in chorus.” (The Bengalee, Dec. 28, 1911). कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन की रिपोर्ट भी ये अंतर बड़े अच्छे ढंग से स्पष्ट किए देती है.” On the first day of 28th annual session of the Congress, proceedings started after singing Vande Mataram. On the second day the work began after singing a patriotic song by Babu Ravindranath Tagore. Messages from well wishers were then read and a resolution was passed expressing loyalty to King George V. afterwards the song composed for welcoming King George V and Queen Mary was sung.”

    ये विवाद टैगोर के जीवन काल में ही उठ चला था। उन्होंने उनके पास आए कई पत्रों में भी इससे आहत होकर यह बात दुःख के साथ लिखी है।10 नवम्बर 1937 को उनके द्वारा श्री पुलिन बिहारी सेन को लिखा हुआ यह पत्र “जब मुझसे कांग्रेस के कुछ आला अधिकारीयों द्वारा जॉर्ज पंचम की स्तुति में गीत लिखने को कहा गया, इस बात ने मुझे हैरान कर दिया…. तो इस बात ने मेरे मन को बहुत बुरे ढंग से उद्वेलित कर दिया और उस दिमागी उलझन के प्रतिउत्तर में मैंने “जन गण मन” में “उस भाग्य विधाता” का जय नाद किया है जिसने युगों युगों से भारत के रथ के लगाम अच्छे और बुरे समय , सीधे और टेढ़े रास्तों में बड़ी मजबूती के साथ थामे राखी है। भाग्य विधाता, जन गण के मन को पढने वाला, युगों युगों का मार्ग निर्देशक, कभी भी जॉर्ज v, जॉर्ज VI या कोई और जॉर्ज नहीं हो सकता। मेरे औपचारिक कांग्रेसी मित्र भी इस गीत के बारे में यह समझ सकते हैं.।चाहे उसकी ताज या राज्य के प्रति आदर बहुत अधिक ही क्यूँ न हो”(टैगोर की जीवनी. ” रविन्द्र जीवनी, खंड 2, पेज 339, लेखक प्रभात कुमार मुख़र्जी ) । 23मार्च, 1939 को सुधा रानी को लिखे पत्र में भी ” मैंने किसी चतुर्थ या पंचम जॉर्ज को ‘मानव इतिहास के युग युग धावित रथ का चिर सारथि’ कहा है इस प्रकार के अपरिमित मूढ़ता का संदेह जो लोग मेरे बारे में कर सकते हैं उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है “। इतना ही नहीं, रविन्द्रनाथ के साहित्य को जरा सा भी पढ़े वाला यह बता सकता है बड़ी आसानी से कि राजा, राजेश्वर कहकर वो हमेशा किसे संबोधित करते हैं? गीतांजलि की 50, 51, बहुत प्रसिद्ध कविता 35″ मेरा चित्त भय शून्य हो…”, और जन गण मन इसी गीत को पूरा पढ़ने से (केवल वही दो अंश जो आज राष्ट्र गान हैं उतना ही नहीं), सम्पूर्ण कविता पढ़ने से जैसे “मंगल दायको”, सभी लोगों को बचाने वाला। किस से बचने वाला स्पष्ट है ब्रिटिश हुकूमत। यह इस कविता (राष्ट्रगान) का एक पद है हिंदी में :

    “विकट पंथ उत्थान पतन मय युग युग धावित यात्री

    हे चिर सारथि तव रथ चक्रे मुखरित पथ दिन रात्रि

    दारुण विपल्व मांझे , तव शंख ध्वनी बाजे

    संकट दुःख परित्राता ”

    “जुगो धबितो जात्री …युगों से तीर्थ यात्री ….. तीर्थ यात्री तो ईश्वर को दर्शन के लिए जाते हैं!!!!…., अन्य शब्द “बिप्लाबो” हिंदी में विपल्व …..आज़ादी के लिए लड़ा जाने वाला संग्राम , ” शंखोधोव्नी” … शंख ध्वनि.जो लड़ाई शुरू होने पर होती है…” संकट दुःख परित्रता” कैसा संकट दुःख …. जॉर्ज की स्तुति होती तो यही कहा होता न की कोई दुःख संकट नहीं है तो ” निद्रितो भारतो जागे” सोया हुआ भारत जागे ! यह शब्द तो हमेशा कवियों के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जन मानस को खड़ा करने के लिए आएं हैं। पूरी कविता पढ़ने से ऐसे कई पंक्तियाँ, अंश आते हैं जिनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है।

    हिंदी के मूर्धन्य विद्वान् आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी बार बार ये विवाद उठने पर इस पर लेख लिखकर खंडन किया था। 30 नवम्बर 1948 को जब इसे राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाने की बातचीत शुरू हुई थी. उस विवाद में यह भी था कि यह 1911 में नहीं 1912 में दिल्ली दरबार में सबसे पहले गाया गया था। उन्होंने इसका भी खंडन किया था।

    क्या आप अब भी ये भ्रम पालेंगे की जन गण मन जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रहा, दूसरे ऐसे ही महान मोहक और गौरव शाली गीत वन्दे मातरम के साथ साथ., वह जॉर्ज पंचम की स्तुति है??

  2. Rohit K Mishra

    Ver well written!

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