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…लेकिन ऑपरेशन ब्लूस्टार भिंडराँवाले की हत्या की सीमा से बहुत दूर आगे तक चला गया था

 

आज से 33 वर्ष पहले 5 जून, 1984 भारतीय राजनैतिक इतिहास के काले दिनों में से एक में शुमार हुआ. इसी दिन  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ को अंजाम दिया गया था. कॉंग्रेस के ख़ासमख़ास सरदार खुशवंत सिंह भी श्रीमती गाँधी के इस फ़ैसले से बहुद दुःख और रोष में थे. स्वयम् घोषित नास्तिक होते हुए भी सरदार खुशवंत सिंह इस कार्यवाही के विरुद्ध थे. भिंडराँवाले से उन्हें लेशमात्र भी हमदर्दी नहीं थी पर बेक़सूर तीर्थयात्रियों के क़त्ल को सही मानना उन्हें नागवार था. इस सप्ताह में हुई गतिविधियों जैसे स्वर्णमंदिर पर सैन्य धावा, श्रीमती गाँधी के मन में ख़ूनख़राबे से उपजा भय, तात्कालिक राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और स्वयं खुशवंत सिंह के बीच हुई बातचीत आदि पर खुशवंत ने अपनी आत्मकथा ‘सच, प्यार और थोड़ी-सी शरारत’ में बेबाक रूप से लिखा, प्रस्तुत है उसी से एक अंश– दिव्या विजय


 

इस बात की जानकारी किसी को नहीं है कि श्रीमती गाँधी इस विचार से कब सहमत हो गयीं उनके पास स्वर्ण मन्दिर में सेना भेजने का आदेश देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है और उस समय उनके सलाहकार कौन थे. इस प्रसंग में राजीव गाँधी, अरुण नेहरू, अरुण सिंह और दिग्विजय सिंह के नाम लिए गये. यह भी कि फ़ौजी कार्रवाई शुरू करने की तारीख़ का चुनाव किसने किया. इसमें सन्देह नहीं है कि राष्ट्रपति जैल सिंह को इस फ़ैसले की ख़बर बिल्कुल नहीं दी गयी. जब श्रीमती गाँधी ने उन्हें पंजाब पर सैनिक शासन लागू करने के लिए राज़ी किया तब उन्हें यह नहीं बताया गया कि सेना को मन्दिर में भिंडराँवाला और उसके हथियार बंद अनुयायियों का सफ़ाया करने का आदेश दे दिया गया है. जब पंजाब या सिखों का मामला होता था तो वे ज्ञानी जी पर भरोसा नहीं करती थी. उनके सलाहकारों में से किसी को सिख परम्पराओं की दूर-दूर तक जानकारी नहीं थी. उन्होंने सैनिक कार्रवाई की शुरुआत के लिए 5 जून, 1984 का चुनाव किया. यह गुरू अर्जुन सिंह की बरसी का दिन था. वे हरिमंदिर के संस्थापक थे. इस दिन दूर-दूर के इलाकों से हज़ारों-हज़ार सिख तीर्थयात्रा के लिए आनेवाले थे. भिंडराँवाला को पकड़ने के दूसरे रास्तों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया था. सादे कपड़ों में कमांडो दस्ता उस पर काबू पा सकता था. मंदिर परिसर की घेराबंदी की जा सकती थी. जो लोग भीतर थे उन्हें राशन और पानी से वंचित किया जा सकता था ताकि वे बाहर आकर समर्पण करने के लिए मजबूर हो जाते या फिर वे छिपकर गोली चलानेवालों का निशाना बनाए जा सकते थे. इसमें कुछ दिन और लग सकते थे पर इसमें ख़ूनख़राबा कम होता.

 

बहरहाल, सेना ने स्वर्ण मंदिर पर धावा बोल दिया. उसके साथ टैंक थे, सशस्त्र गाड़ियाँ और गोताखोर थे. ऊपर निर्देश देते हुए हेलीकॉप्टर मँडरा रहे थे. लड़ाई शुरू होने के बाद दो दिन और दो रात चलती रही. दोनों तरफ़ की गोलाबारी में लगभग 5000 आदमी, औरतें और बच्चे मारे गये. टैंकों से छोड़े गये भारी गोलों से अकाल तख़्त मलबे का ढेर हो गया. बीच के मंदिर को दोनों युद्ध-बाहर घोषित किया था. उस पल भी 70 से अधिक गोलियों का आघात लगा. ड्योढ़ी का बहुत बड़ा हिस्सा उड़ गया. लेखागार जिसमें गुरूओं के दस्तख़तों से जारी किए गये हुकुमनामे थे, राख का ढेर हो गया था. श्रीमती गाँधी को यह आश्वासन दिया गया था कि यह कार्रवाई दो घंटे से ज़्यादा नहीं चलेगी. जिस हद तक पवित्र संपत्ति का नुकसान हुआ और जानें गयीं उससे वे भी भयभीत हो गयीं. यह स्वीकार करने की बजाय कि उन्होंने भयंकर भूल की है, उन्होंने पूरे प्रसंग को झूठ की आड़ में दबाने का फ़ैसला किया.

 

धर्म के प्रति अपनी उदासीनता बल्कि विद्वेष के बावजूद मेरे मन में इस बारे में कोई संदेह नहीं था कि मुझे अपनी क़ौम के लोगों के साथ अपनी अस्मिता की फिर से पुष्टि करनी चाहिए. मैं भिंडराँवाला को दुष्ट इन्सान समझता था जिसे अपनी करनी का फल मिल गया. लेकिन ऑपरेशन ब्लूस्टार भिंडराँवाले की हत्या की सीमा से बहुत दूर आगे तक चला गया था. वह पूरे समुदाय के मुँह पर भलीभाँति तय करके जानबूझकर मारा गया तमाचा था. मैंने बड़ी दृढ़ता से महसूस किया कि मुझे अपना विरोध दर्ज़ कराना चाहिए. मैंने किसी से मशविरा नहीं किया. मेरी पत्नी कसौली में थी, बेटी दफ़्तर में और बेटा बम्बई में. मैंने राष्ट्रपति से मिलने का समय माँगा. उन्होंने मुझसे फ़ौरन चले आने के लिए कहा. मैं फ़्रेम में जड़ा हुआ वह प्रशस्ति पत्र साथ ले गया था जो मुझे पद्मभूषण प्रदान करते समय राष्ट्रपति वी. वी. गिरि के दस्तख़तों से दिया गया था. ज्ञानी जैल सिंह बेहद उदास थे. “तुम्हें कैसा लग रहा है, मैं जानता हूँ”, उन्होंने मुझसे कहा “लेकिन जल्दबाज़ी मत करो, इस बारे में कुछ दिन सोच-समझ कर फ़ैसला करो कि तुम्हें क्या करना है.” मैं अपनी बात पर अड़ा रहा “नहीं ज्ञानीजी, मैं ख़ुदको अपना फ़ैसला बदलने का वक़्त नहीं देना चाहता. मैंने क़सम खाई थी कि अगर सेना ने मंदिर में पैर रखा तो मैं सरकार द्वारा प्रदान किए गये सम्मान त्याग दूँगा. वे बोले, “मेरी क़ौम मुझे इस बात के लिए कभी माफ़ नहीं करेगी, तुम्हें क्या लगता है कि अगर मैं अभी त्यागपत्र दे दूँ तो उससे कुछ बात बनेगी?” मैंने उनसे कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है. वे त्यागपत्र दें या न दें सिख अपने पवित्रतम तीर्थस्थल के अपवित्र किए जाने के लिए उन्हीं को ज़िम्मेदार ठहरायेंगे.

 

मुझे मालूम था कि मेरी पद्मभूषण लौटाने की बात वे अपने तक ही रखेंगे. मैंने उन्हें इसका मौक़ा नहीं दिया. राष्ट्रपति भवन से मैं संसद मार्ग पर सीधे पी. टी. आई. के दफ़्तर पहुँचा और अपने विरोधपत्र के सार के साथ सम्मान लौटाने का समाचार वहाँ दे दिया. उसमें लिखा था “एक चूहे को को मारने के लिए पूरे घर को नहीं गिराया जाता.” सुबह के अख़बारों ने उसे मुखपृष्ठ पर छापा.

 

इसके बाद जो कुछ हुआ वह मेरे लिए बड़ा दुखदायी अनुभव था. रात ही रात में मैं सिखों के लिए किसी लोककथा के नायक के जैसा हो गया. सरकार की खुल्लम खुल्ला भर्त्सना करनेवाला मैं पहला सिख था. साथ ही हिंदुओं की नज़र में मैं खलनायक बन गया था. मेरे पास पत्रों और तारों की बाढ़ आ गई–सिख इस बात के लिए मेरी प्रशंसा कर रहे थे कि मैंने दिखा दिया कि एक सिख को क्या करना चाहिए और हिन्दू देश के महाशत्रु के रूप में मेरी निन्दा कर रहे थे. हर पत्रकार ने जो मेरा साक्षात्कार लेने आया मुझसे सवाल किया कि मैंने साथ के साथ राज्यसभा से इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया. मैंने उनसे कहा कि मैं ख़ुद को उस एक मंच से वंचित नहीं करूँगा जहाँ से सरकार और जनता को यह बता सकता हूँ कि उसने सिखों और देश के साथ कितनी बड़ी नाइंसाफ़ी की है.

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