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जेल जाना है तो इंटर की परीक्षा में टॉप कर जाइए

मार्केज़ होते और अगर बिहार में होते तो उन्होंने जादुई यथार्थ का एक क्लासिक उपन्यास जरूर लिखा होता. जो राज्य, जिस राज्य के विद्यार्थी पूरे देश में अपनी शिक्षा की धाक जमाते आये हों उस राज्य में दो साल से इंटर की परीक्षा में जो टॉप करता है वही गिरफ्तार हो जाता है. पिछले साल आर्ट्स टॉपर रूबी गिरफ्तार हुई थी. उसका टीवी इंटरव्यू वायरल हो गया था. उसे यह भी नहीं पता था कि जिन विषयों में उसको इतने अधिक नंबर आये थे उनमें पढाई क्या होती थी. इस बार का टॉपर और भी अधिक दिलचस्प है. गणेश कुमार नामक इस विद्यार्थी की असली उम्र 42 साल थी और वह 24 साल का विद्यार्थी बनकर अपने घर से बहुत दूर एक गुमनाम से कॉलेज से परीक्षा देकर पास हुआ था.

सब उसके बारे में एक से एक स्टोरी करने में लगे हैं- लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा है कि इतनी अधिक उम्र में वह इंटर पास करके करना क्या चाहता था? 42 साल की उम्र में 24 साल का बनकर वह पाना क्या चाहता था? और जो पाना चाहता था वह तो सिर्फ पास होकर ही मिल जाता उसके लिए टॉप करने की क्या जरुरत थी?

12 वीं की परीक्षा में पूरे देश में सबसे खराब रिजल्ट लाने वाले राज्य बिहार की शिक्षा व्यवस्था अभी सोर्स, पैरवी, घूस के सहारे चल रही है. वहाँ की एक बड़ी आबादी के लिए अपनी जिंदगी को बदलने का जरिया शिक्षा के अलावा और कुछ नहीं लगता. जब मैं 80 के दशक में बिहार में पढता था तब बहुत सारी घरेलू महिलाएं, बहुत सारे दुसरे कामकाजी पुरुष मध्यमा की परीक्षा देकर मैट्रिक की परीक्षा पास कर लेते थे. उस ज़माने में इंटर की परीक्षा में अच्छे नंबरों के लिए पैरवी करवानी होती थी. आज उसी दौर में पास हुए बहुत सारे लोग शिक्षक बन चुके हैं. वही परम्परा आज भी किसी न किसी रूप में चलती आ रही है.

यही शिक्षा व्यवस्था है जिसके कारण बिहार वह राज्य है जहाँ से शिक्षा के लिए विद्यार्थी सबसे अधिक पलायन करते हैं. ज्यादातर पलायन रोजगार के लिए होता है लेकिन बिहार में शिक्षा के लिए बड़ी आबादी पलायन कर जाती है.

एक बड़ी आबादी है जो आज भी अपनी किस्मत बदलने के लिए शिक्षा को एक बड़ा उपादान मानती है. एक बेहतर भविष्य के लिए. इसके लिए बहुत सारे रास्ते हैं जो बिहार की शिक्षा व्यवस्था समय समय पर दिखाती रहती है.

लेकिन जब इतना कुछ होता है, इतने सारे स्तर पर होता है तो जेल सिर्फ टॉपर को ही क्यों जाना पड़ता है?

पूरा कथानक एक जादुई यथार्थ के उपन्यास का है. बस कोई मार्केज़ नहीं है?

प्रभात रंजन

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