Home / Featured / जब सौ जासूस मरते होंगे तब एक कवि पैदा होता है : चन्द्रकान्त देवताले 

जब सौ जासूस मरते होंगे तब एक कवि पैदा होता है : चन्द्रकान्त देवताले 

चंद्रकांत देवताले की कविताओं पर विमलेन्दु का लिखा एक आत्मीय लेख- मॉडरेटर

========================================

साल 1993 का यह जून का महीना था जब चन्द्रकान्त देवताले से पहली बार मुलाकात हुई थी. भोपाल में कवि भगवत रावत ने, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सहयोग से एक कविता कार्यशाला का आयोजन किया था. इसमें प्रदेश भर के नवोदित कवियों में लगभग पचास कवियों का चयन करके बुलाया गया. इन कवियों को देश के ख्यातिलब्ध कवियों और आलोचकों के साथ पाँच दिनों के लिए छोड़ दिया गया. उन्हीं के साथ रहना खाना, बतियाना, कविताएँ सुनाना और सुनना. उन पाँच दिनों की यही दिनचर्या थी. ज्यादातर कवि-आलोचक शिक्षक की भंगिमा में थे. लेकिन उन्हीं में एक कवि ऐसे थे जो कम बोलते थे. जब बोलते भी तो साफ समझ न आता, क्योंकि आवाज़ लड़खड़ाती थी. लगभग तुतलाने जैसी. लेकिन जुबान से ज्यादा उनकी आँखें बात कर लेती थीं. किशोरवय को लाँघकर युवावस्था में दस्तक दे रहे हम कवियों की कविताएँ सुनते या हमसे बात करते हुए अक्सर उनकी आँख भर आती. हम लोगों की कविताओं पर उनकी अधिकांश टिप्पणियाँ, उनकी सजल आँखों और आर्द्र हृदय से ही होती थीं. यही थे हिन्दी कविता के बड़े कवि चन्द्रकान्त देवताले.

पहले ही दिन से, उनके मर्म को न जाने कहाँ छुआ मैने कि मुझे अन्य नवोदित कवियों से कुछ अतिरिक्त स्नेह मिलने लगा. लगभग पिता जैसा. और पिता से भिन्न भी. कार्यशाला के दौरान अधिकांश समय वे मुझे अपने साथ बैठाए रखते. साथ में खाना खाते. कहीं एकान्त में बैठ कर मेरी बांसुरी सुनते. इस कार्यशाला के अश्रुपूरित समापन के बाद, कई वर्षों तक उनसे मिलना होता रहा. रीवा और भोपाल के साहित्यिक आयोजनों में. जब वे इन्दौर में रहते थे, तो उसी दौरान मैं पहली बार इन्दौर गया था किसी काम से. कुमार अंबुज भी तब इन्दौर में थे. मैं खोजते खाजते कुमार अंबुज के घर पहुँचा. शाम को कुमार अंबुज अपनी स्कूटर पर बैठा कर मुझे घुमाने निकले. घर से निकलते हुए उन्होंने किसी को फोन कर बताया कि आपके लिए सरप्राइज लेकर आ रहा हूँ. रास्ते में अंबुज जी ने ढोकले खिलाते हुए मुझे 19, संवाद नगर, इन्दौर पहुँचा दिया. हरी भरी लताओं से आच्छादित इस घर के सामने हम दोनों खडे थे. कालबेल बजाई तो दरवाजा तुरन्त खुला. मेरे सामने देवताले जी और देवताले जी के सामने मैं. दोनों जन भाव विह्वल !  कुमार अंबुज मुस्कुराते हुए खड़े थे. भीतर जाते हुए देवताले जी अंबुज से कह रहे थे कि मैने सोचा था कि तुम कोई बढ़िया सी दारू ला रहे हो, पर तुम उससे भी अच्छी चीज ले आए. अंबुज जी ने बताया कि दारू भी लाया हूँ. और लपक कर स्कूटर की डिग्गी से एक आधी खाली बोतल निकाल लाए. उस शाम हम लोगों ने खाना साथ ही खाया. खाना देवताले जी ने ही बनाया था, क्योंकि उन दिनों अकेले थे घर में.

भोपाल की पहली मुलाकात में देवताले जी अथाह स्नेह वाले व्यक्ति लगे थे. उनको कवि के रूप में जाना जब उनकी कविताएं पढ़नी शुरू कीं. ऐसी वेधक कविताएँ जो आपके संवेदी तन्तुओं को लहूलुहान कर दें. सहज भाषा, लेकिन भाषा का ऐसा मारक घुमाव कि आप चकित रह जाएँ कि ऐसे भी बात को कहा जा सकता है! तब आपको लगेगा कि बात को ऐसे ही कहा जाना चाहिए, जैसे चन्द्रकान्त देवताले कहते हैं. विनोद कुमार शुक्ल, कुँवर नारायण, विष्णु खरे के साथ, जिस कवि से, मेरे सर्वाधिक प्रिय कवियों की चतुष्टयी पूरी होती है, वो चन्द्रकान्त देवताले ही हैं. समकालीन हिन्दी कविता के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में एक. उनकी कविताओं की रेंज हम देखते हैं तो चकित रह जाते हैं. विषयों की इतनी विविधता किसी और हिन्दी कवि में दुर्लभ है. मानवीय संवेदना का शायद ही कोई ऐसा छोर हो, जो उनसे छूट गया हो. साथ ही एक ऐसी राजनीतिक सजगता उनमें है, जो किसी भी लेखक के लिए अभीष्ट होती है.

बेचैनी, चन्द्रकान्त देवताले का कवि-व्यक्तित्व है, तो ‘आग’ उनकी कविता का बीज-तत्व. जीवन के उत्तरार्ध में वे स्वीकार  भी करते हैं—“मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा/ और मैने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं.” देवताले जी के लिए कविता कर्म कोई विलास नहीं है. वो एक बेचैनी लिए धरती से आसमान के बीच घूमते थे. वो एक खोजी की तरह दुनिया को देखते थे. अपने किसी साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि “जब सौ जासूस मरते होंगे तब एक कवि पैदा होता है.” एक कवि अगर निरापद हो जाए तो फिर कैसा कवि. कवि वही है जो हर वक्त सत्ता, राजनीति और मनुष्य के विरुद्ध साजिशों के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो जाए. वे लिखते हैं—“ऐसे जिन्दा रहने से नफरत है मुझे/ जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्छा कहे/ मैं हर किसी की तारीफ करते भटकता रहूँ/ मेरे दुश्मन न हों/ और इसे मैं अपने हक में बड़ी बात मानूं.”

देवताले जी की कविताओं पर, मुझ जैसे प्राथमिक दरजे के विद्यार्थी का कुछ भी लिखना यकीनन गुस्ताखी मानी जायेगी और मानी भी जानी चाहिए. लेकिन यह गुस्ताखी सचेत भाव से घटित हो रही है. ‘ छोटन के इस उत्पात ‘ को ‘बड़न’ द्वारा क्षमा कर दिया जाय—ऐसा आग्रह भी मेरा कतई नहीं है. जो कवि कवियों की कई पीढियों के बीच लगातार लिख रहा हो, और न सिर्फ लिख रहा हो, बल्कि उस समय का प्रतिनिधि कवि हो, उस कवि को नई पीढ़ी कैसा समझ पा रही—यह लिख देना गुस्ताखी भले हो, नाजायज़ तो नहीं.

इतने लम्बे कवि-जीवन के बाद जीवन के उत्तरार्ध में जो चन्द्रकान्त देवताले, एकदम युवतम कवियों के बीच चुनौती बनकर खड़े रहे, उनके बारे में विष्णु खरे ने ठीक ही कहा था, “ चन्द्रकान्त व्यापक और प्रतिबद्ध अर्थों में, इस देश के कठिन समय में, अपनी निजी, पारिवारिक और सामाजिक ज़िन्दगी, भारतीय समाज के अपने विडम्बनात्मक जीवन तथा उसमें अपनी और किसी प्रकार संघर्ष कर रहे अन्य असंख्य लोगों की तनावपूर्ण जिजीविषा के कवि हैं. मानव जीवन के साथ चन्द्रकान्त की कविता का रिश्ता, सुख-दुख के संगाती का, जागरुकता तथा ऐन्दियता का है.”

चन्द्रकान्त देवताले निरन्तर भयभीत और तनावग्रस्त कवि थे. उनका भय और तनाव वैयक्तिक नहीं है. वे उस मनुष्य के लिए भयभीत दिखते हैं, जो निरंतर संघर्षों और अभावों के बीच अपनी जिजीविषा को बचाए हुए है. जो इन तमाम अभावों और कष्टों के बावजूद अभी तक अपनी आदमीयत को बचा ले गया है. लेकिन कब तक बचा पायेगा, ‘इस शाही हाड़ तोड़ती दिनचर्या में’ कवि इसी भय और तनाव के बीच सवाल करता है—
“ वे कौन सी चीज़ें हैं/ जो आदमी को आदमी नहीं रहने देतीं/ क्यों आदमी आदमी नहीं रह पाता/ वे कौन सी चीज़ें हैं और किनके पास/ और क्यों सिर्फ उन्हीं के पास/ जो आदमी को उसकी जड़ों से काटकर/ कुछ और बना देती हैं. “

आदमी को आदमी नहीं रहने देने वाली इन्हीं चीजों की पड़ताल करना ही चन्द्रकान्त देवताले की कविता की मुख्य प्रतिज्ञा है. उन्हें मालूम भी है कि, “ जो गाड़ कर रखता है खजाना/ वही रचता है कहानी साँप की..” । वे लकड़बग्घे की हँसी को पहचान गए हैं. और आगाह कर रहे हैं——–“ ये तीमारदार नहीं/ हत्यारे हैं/ और वह आवाज़/ खाने की मेज पर/ बच्चों की नहीं/ लकड़बग्घे की हँसी है…..” ।

सिसकियों का अनुनाद

यथास्थितिवाद चन्द्रकान्त देवताले को विचलित करता है. वे उन लोगों को फटकारते हैं, जो इतने जुल्मों को सहने के बाद भी उस छली और क्रूर जनगणमन अधिनायक की लगातार आरती उतारते रहते हैं. ‘ पंत पेशवा शहर में आ रहा है ‘ कविता में अत्यधिक नाराजगी में वह अपनी ही बिरादरी के धकियाये और लतिआये हुए लोगों पर खीझते हुए व्यंग्य करते हैं——–“ पेट पर लात मारने वाला/ बस्ती में आ रहा है/ उसके लिए स्वागत द्वार बनाने में जुट जाओ/ लतिआये हुए लोगो/ तुम्हारी उदारता दर्ज की जायेगी इतिहास में/………धकियाये हुए लोगो/तुम्हारा आतिथ्य अमर हो जायेगा इतिहास में/……..सताये हुए लोगो/ तुम्हारी सहिष्णुता सदियों चर्चित रहेगी इतिहास में.”

वे खीझते इसलिए हैं क्योंकि जानते हैं कि ये सताये हुए लोग लगातार इसी स्थिति में रहने के आदी होते जा रहे हैं. जबकि, “ अपनी छिपी हुई ताकत के साथ/ उठ खड़े होंगे जिस दिन ये सब/ इन आँधियों की तरह/ टूट कर गिरेंगी पराये समय की घड़ियां/ शिखरों से.”…..  कवि सिर्फ पर उपदेश-कुशल ही नहीं हैं. वे खुद इस लड़ाई में शामिल होते हैं, सबकी तरफ से. वे चाहते है—“ मैं बनूं/ अफवाहों के स्याह बीहड़ में/ आँधी की हथेली पर का चिराग/ मेरे भीतर के माइक्रोवेव टावर की आत्मा से/ टकराने दो असंख्य पहाड़ों को कँपाती ध्वनियाँ……”

कविता देवताले जी का अस्त्र है. दुनिया की तमाम क्रूरताओं और दुखों के खिलाफ लड़ाई में– कविता, बच्चे और स्त्री— कवि की ताकत हैं. सब कुछ निराश कर देने वाले के बावजूद, जब कवि कहता है, “ और आपके हाथों में/ यह एक छोटी सी शीशी/ कविता के अर्क वाली…..”, तो वह इस छोटे से दिखने वाले अस्त्र की खिल्ली नहीं उड़ा रहा होता, बल्कि बड़ी चतुरता से कविता की ताकत से चेतावनी दे रहा होता है. कवि का दूसरा अस्त्र है—नन्हें नन्हें बच्चे. ‘ थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे ‘  बहुत मार्मिक कविता है. दुनिया ङर के तमाम वंचित और कुपोषण के शिकार बच्चों की चिन्ता कवि करता है. वह देखता है कि “ असंख्य बच्चों के लिए/ कीचड़-धूल और गंदगी से पटी/ गलियां हैं जिनमें वे/ अपना भविष्य बीन रहे हैं/…….और…….ढेर सारी बच्चियां/ गोबर-लीद ढूढ़ते रहने के बाद/ अँधेरे में दुबक रही हैं/ लड़कियाँ नदी तालाब कुआँ/ घासलेट-माचिस-फंदा/ ढूढ़ रही हैं……..”

इस कविता में कवि अपनी छटपटाहट और संवेदना के उस चरम पर जा पहुँचता है, जहाँ पर पहुँचना हर किसी के वश की बात नहीं है. और इस चरम पर पहुँचने के बाद चीखें बन्द हो जाती हैं और शुरू होती है ललकार ! लेकिन कवि सोचता है—“ पर वे शायद अभी जानते नहीं/ वे पृथ्वी के बाशिन्दे हैं करोड़ों/ और उनके पास आवाज़ों का महासागर है/ जो छोटे से गुब्बारे की तरह/ फोड़ सकता है किसी भी वक्त/ अँधेरे के सबसे बड़े बोगदे को…….” । चन्द्रकान्त देवताले का अंतिम और सबसे बड़ा अस्त्र—ब्रह्मास्त्र—है, स्त्री. वे बार-बार स्त्री की शरण में जाते हैं.

चन्द्रकांत देवताले शायद स्त्री पर सबसे ज्यादा कविताएं लिखने वाले कवि हैं, और शायद स्त्री पर सबसे ज्यादा बेबाकी, जिम्मेदारी और अंतरंगता से लिखने वाले कवि भी. जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली शै पर, सबसे ज्यादा कविताएँ हों, यह स्वाभाविक ही है. लेकिन देवताले जी के लिए सत्री निजी और एकान्तिक आनन्द की चीज़ नहीं है. वे स्त्री के सामाजिक सरोकारों और इस दुनिया के लिए उसकी अनिवार्य ज़रूरत को प्रतिष्ठित करते हैं. वे न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत लड़ाइयों में स्त्री का साथ लेते हैं, बल्कि समस्त मानव जाति को बचाने के लिए किए जा रहे अपने संघर्ष में, ऊष्मा और ऊर्जा स्त्री से ही लेते हैं. इनकी कविता में स्त्री अनेक रूपों में आती है. वह पत्नी है, प्रेमिका है, माँ है, और अपने स्व की तलाश करती स्त्री है. देवताले जी की कविताओं में स्त्री, कवि को परिवार, समाज, देश और वृहत्तर संसार से एक आत्मीय, जिम्मेदार और संवेदनशील रिश्ता कायम करने में एक कड़ी की तरह मदद करती है. कवि स्त्री के साथ अपने संबन्धों को संकोचहीन होकर, बल्कि गर्व के साथ बताता है.

दाम्पत्य जीवन की बेबाक अभिव्यक्तियाँ तथा पत्नी को साथी की तरह निरूपित करती कविताएँ ‘तुम’, ‘ उसके सपने ‘, ‘शब्दों की पवित्रता के बारे में’, ‘ महाबलीपुरम्-1,2 ‘  हिन्दी कविता में विरली हैं. पत्नी से साथी की तरह संवाद करती ऐसी ही सुन्दर कविताएँ केदारनाथ अग्रवाल के यहाँ मिलती हैं. समुद्र के पास पत्नी की स्मृति कवि को अकेला नहीं होने देती. और उसकी स्मृति का साथ पाकर कवि इतना समृद्ध होता हुआ कि समुद्र उसे अकेला लगने लगता है….’ तुम हमेशा अकेली छूट जाती हो’, ‘उसने चौंका दिया एकाएक कह कर’, ‘कुछ नहीं सिर्फ प्रेम’……वे कविताएँ हैं जहाँ वह स्त्री मौजूद है, जो साथ नहीं है. लेकिन जिसके होने ने कवि को उदात्त और मानवीय बनाया. इस स्त्री से प्रेम, कवि को बाँधता नहीं, मुक्त करता है…..उन असंख्य लोगों के लिए, जिनको कवि की ज़रूरत है. कवि जानता है कि,… “ तुम मेरी आधी रात का सूर्योदय/ तुमसे मैं आग/ फफोले उमचाता शब्द/ मुझसे तुम आँख/ जिससे हम देखते सपने……” । यह सपना कवि पूरी दुनिया के लिए देखता है.

चन्द्रकांत देवताले की कविताओं में एक स्त्री वह आती है जो समूची स्त्री जाति की प्रतिनिधि है. यह स्त्री अपनी तमाम सामाजिक विडंबनाओं, अपनी तमाम जकड़नों, तथा दुखों के साथ आती है. लेकिन यह स्त्री, पुरुष के लिए बेहद ज़रूरी और उसे बेहतर मनुष्य बनाती हुई आती है. कवि “ आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा/ कि स्त्री दिखाई ही न दे/ “ …….कवि की डोर हमेशा किसी स्त्री के हाथ में रही……और…. “ प्रेम करती हुई औरत के बाद भी अगर कोई दुनिया है” …तो उस वक्त वह कवि की नहीं है….उस इलाके में कवि “सांस तक नही ले सकता, जिसमें औरत की गंध वर्जित है…” ।  और जब कवि कहता है कि,….. “ नहीं सोचता कभी, कोई भी बात जुल्म और ज्यादती के बारे मे/ अगर नहीं होतीं प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर….” …….तब स्त्री की अनिवार्यता और श्रेष्ठता को सर्वोच्च मानसिक और जागतिक स्तर पर प्रतिष्ठित करता है. स्त्री को इस आध्यात्मिक ज़िद के साथ स्वीकार करने वाला कवि ही देख पायेगा उस औरत को जो———-
“ आकाश और पृथ्वी के बीच/ कपड़े पछीट रही है/ वह औरत आकाश और धूप और हवा से/ वंचित घुप्प गुफा में/ कितना आटा गूँध रही है/ एक औरत अनन्त पृथ्वी को/  अपने स्तनों मे समेटे/ दूध के झरने बहा रही है/ एक औरत का धड़ भीड़ में भटक रहा है/ उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ़ रहे हैं/ पाँव जाने कबसे/ सबसे/ अबना पता पूछ रहे हैं…….”…

आकाश और पृथ्वी के बीच                                                                                कब से वह औरत कपड़े पछींट रही है                                                                          वह औरत आकाश और धूप और हवा से वंचित                                                                  घुप्प गुफा में                                                                                              कितना आटा गूँध रही है                                                                                    एक औरत अनन्त पृथ्वी को                                                                                 को अपने स्तनों मे समेटे                                                                                    दूध के झरने बहा रही है                                                                                     एक औरत काधड़ भीड़ में भटक रहा है                                                                         उसके हाथ अपना चेहरा ढूढ़ रहे हैं                                                                             उसके पांव जाने कब से                                                                                     सबसे                                                                                                    अपना पता पूछ रहे हैं ।  (औरत)

औरत को इस तरह देख पाने वाला कवि ही ‘ घर में अकेली औरत ‘ और ‘नहाते हुए रोती औरत’ के दुख को जान सकता है. चंद्रकांत देवताले ने अकेली औरत की कई अनछुई अनुभूतियों को शब्द दिया है…….. “ तुम्हारा पति अभी बाहर है/ तुम नहाओ जी भर कर/ आइने के सामने कपड़े उतारो/ आइने को देखो इतना/ कि वह तड़कने को हो जाये/ पर उसके तड़कने से पहले/ अपनी परछांईं को हटा लो/ घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है……”

इस कविता में एक शादीशुदा किन्तु पति के प्यार और अधिकार से वंचित स्त्री का मार्मिक चित्रण है. इस कविता में स्त्रियों का त्रासद सूनापन और एकदम निजी अकेलापन सामने आता है. इसी तरह ‘नहाते हुए रोती औरत’ में भारतीय स्त्री की सामाजिक और पारिवारिक उदास ज़िन्दगी सामने आती है. यह एक जबर्दस्त कविता है………. “ किस चीज़ के लिए रो रही है यह औरत/ और क्यों चुना उसने नहाने का वक्त/ …..दुख हथेली पर रख कर दिखाने वाली नहीं यह औरत/ रो रही है बे आवाज़ पत्थर और पत्तियों की तरह/ वह जानती है पानी बहा ले जायेगा/ आँसुओं और सिसकियों को चुपचाप/ उसके रोने का रहस्य/ हालांकि जानते हैं सब/मामूली वज़हों से अकेले में/ कभी नहीं रोती कोई औरत…….”

एक दिन क्षमा मागनी होती है

             चंद्रकांत देवताले की कविताओं में स्त्री का आत्मीय स्पर्श तो है ही, एक ऐसा स्नेहिल स्पर्श भी है जो तमाम दुखों के बीच कवि को जूझने की शक्ति देता है. इनकी कविता में एक ऐसी विरल पारिवारिकता है जहाँ स्त्री माँ के रूप में अपने सरलतम किन्तु कविता के विषय के रूप में जटिलतम रूप में मौजूद है. कवि स्वीकार करता है——-“ माँ पर नहीं लिख सकता कविता/ माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए/ देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे/ और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया/ …..मैने धरती पर कविता लिखी है….सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा/ माँ पर नहीं लिख सकता कविता.”

           लेकिन माँ पर कविता न लिख पाने की अपनी आत्मस्वीकृति के बावजूद कवि माँ की स्मृतियों में जाता है——“ वे दिन बहुत दूर हो गए हैं/ जब माँ के बिना परसे/ पेट भरता ही नहीं था/ ………वह मेरी भूख और प्यास को/ रत्ती रत्ती पहचानती थी/ और मेरे अक्सर अधपेट खाये उठने पर/ बाद में जूठे बर्तन अबेरते/ चौके में अकेले बड़बड़ाती रहती थी/ …..और आखिर में उसका भगवान के लिए बड़बड़ाना/ सबसे खतरनाक सिद्ध होता था.

माँ पर कविता न लिख पाने की अपनी लाचारी मान लेने के बाद भी देवताले जी माँ की स्मृतियों में जाते है. इसकी वज़ह यही हो सकती है कि उनके भीतर खुद वात्सल्य का एक सोता है, जो बार-बार फूट पड़ता है. वे खुद एक स्नेहिल, जिम्मेदार और वयस्क पिता की तरह कविताओं में आते हैं. इसीलिए जब वे थोड़े से बच्चों की खुशहाल जिन्दगी के लिए, दुनिया के बाकी बच्चों की अजीयत भरी ज़िन्दगी देखते हैं तो एक मर्माहत चीख निकलती है——-“  ईश्वर होता तो इतनी देर में उसकी देह कोढ़ से गलने लगती/ सत्य होता तो वह अपनी नयायाधीश की कुर्सी से उतर/ जलती सलाखें आँखों में खुपस लेता/ सुन्दर होता तो वह अपने चेहरे पर तेजाब पोत/ अन्धे कुएँ में कूद गया होता…”

‘ दो लड़कियों का पिता होने से’ इतना संवेदनशील पिता हो जाता है कवि कि ‘ बालम ककड़ी बेचती हुई लड़कियों’ की चिन्ता भी उसकी चिन्ता हो जाती है. और “ सोते वक्त भी कांटों की तरह/ चुभती रहती हैं/ इत्ती सुबह की ये लड़कियाँ……..”

कवि एक स्नेहिल पिता है और वह यह भी जानता है कि “ प्रेम पिता का दिखायी नहीं देता/ ईश्वर की तरह होता है……दुनिया भर के पिताओं की कतार में/ पता नहीं कौन सा कितना करोड़वां नम्बर है मेरा/ पर बच्चों के फूलों वाले बगीचे की दुनिया में/ तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए….”…….यह एक अद्भुत कविता है. कवि-पिता ने बदलते वक्त को पहचान लिया है. आगे की पंक्तियों में वह लड़कियों की पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्र अस्तिव-विकास की हिमायत करता है—–“ मुझे माफ करना मैने अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था/ मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी/ अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गयी हो/ मैं खुश हूँ सोचकर/ कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछांई…….”
पिता द्वारा बेटी की परछांईं को अपनी भाषा के अहाते से मुक्त करना सचमुच एक क्रान्तिकारी कदम है. आज भी कितने पिता ऐसा कर पाते हैं !

       चंद्रकांत देवलाले की कविता का एक विशिष्ट लक्षण यह उजागर होता है कि वे सिर्फ कवि होने के नाते कोई रियायत नहीं लेना चाहते. वे खुद को भी इस दुनिया की विडंबनाओं और खराबियों के लिए दोषी मानते हैं. इसीलिए विष्णु खरे उन्हें अपराध-बोध से ग्रस्त कवि कहते हैं. देवताले अपने अपराधों की निर्भीक आत्म-स्वीकृतियाँ भी देते हैं. बस में एक आदिवासी बच्ची को कवि अपनी गोद में बिठा लेता है और महसूस करता है——“ धड़कने लगा बाप का दिल/ फिर यही सोच कर दुख हुआ मुझे/ कि बच्ची को शायद ही मिली होगी/ मुझसे बाप की गंध/ मैं क्या करता मेरी पोशाक ही ऐसी थी/ मेरा जीवन ही दूसरा था…….”

              कवि को अपने दुसरे तरह के जीवन का पछतावा है. वह जानता है कि अपने इस विशिष्ट कुल-गोत्र के कारण ही वह नितान्त आदिम लोगों के सुख तो क्या, दुखों तक का भागीदार नहीं बन सकता. यह पछतावे का भाव कवि के पूरे जीवन पर हावी है. इसका एक खास असर कवि के मूल स्वर में दिखता है. वह गुनहगारों में खुद को शामिल मानता है. वह अपनी कविताओं में गुनाहों और गुनहगारों की सूचना देता है और दुख में डूब जाता है. प्रतिरोध का जो स्वर, चन्द्रकांत देवताले की कविताओं का अगला चरण होना चाहिए, उस तक देवताले जी की कविताएं नहीं जातीं. प्रतिरोध की बजाय कवि क्षमा माग लेना ज़्यादा उचित समझता है——–
“ एक दिन क्षमा मागनी होती है/ तुम्हारा जीवन कैसे गुज़रा यह दीगर बात होगी/……..क्षमा मागनी होगी सबसे पहले अपनी माँ से/……..फिर उससे जिसके भीतर/ तुम अपनी आग को बर्फ में तब्दील करते रहे/ फिर मागते रहना दुनिया भर से/.”

                क्षमा माग लेने की यह सुविधाजनक मुद्रा कवि में शायद भारतीय जीवन में प्रचलित मिथकों से आई है. भारतीय मिथकों में शिव से लेकर राम, कृष्ण, पैगम्बरों, महावीर, और बुद्ध तक क्षमाशीलता की इतनी गाथाएँ प्रचलित हैं कि शायद यही वज़ह है कि भारत में सामाजिक गैर-बराबरी और अन्याय के ख़िलाफ कभी भी किसी बड़े आन्दोलन का मानस तैयार नहीं हुआ.

      देवताले जी का पहला कविता संग्रह 1975 में आया और तब से आज तक वो अनथक लिख रहे हैं. बड़े आश्चर्य की बात है कि इस सुदीर्घ काव्य-यात्रा में भाषा-शैली और विषयवस्तु के स्तर पर कवि में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया, जबकि इसी अवधि में दुनिया में कितने बदलाव हो गये. दुनिया को कुरूप बनाने वालों ने अपने अस्त्र-शस्त्र बदल डाले. कुछ समय के लिए चंद्रकांत देवताले मुख्य मार्ग को छोड़कर पगडंडी में घुसे ज़रूर हैं, लेकिन जल्दी ही अपने पुराने ढर्रे में आ गए. जैसे 1982 में प्रकाशित संग्रह ‘रोशनी के मैदान की तरफ’  की कुछ कविताओं में भाषा और तकनीक के स्तर पर कुछ बदलाव देखने को मिलता है——
“ स्मृतियों की देहहीन नदी/ हवा में उड़ रही है/ और कुएँ के भीतर नहाती हुई शाम/ तुम्हारे आईने में मेरा नाम पुकार रही है/ ……..इसी तरह…… “ एक दिन रस बनना बन्द हो जाता है/ और फिर देह के भीतर सारी पृथ्वी सूखने लगती है/ आवाज़ का हरापन भूरे में बदलने लगता है/ ……आँखों के आकाश में/ चहकने वाले सारे रंग पत्थर बनकर/ गिर पड़ते हैं आँखों के बाहर/.”

1975 से अब तक की कविताओं में भाषा और शिल्प की एकरसता हैरत में डालने वाली है. भाषा में देशज शब्द भी आये हैं. खास तौर से ‘ गाँव तो थूक नहीं सकता मेरी हथेली पर’  कविता में देशज शब्द मौजूद हैं. लेकिन इनकी कविताओं में देशज शब्दों का प्रयोग बड़े सजग ढंग से हुआ है. उतना ही जितना ज़रूरी था. कवि गाँव की स्मृतियों में भी जाता है, लेकिन उस तरह रूमानी होकर नहीं जैसे अधिकांश कवि गाँव जाते हैं. चंद्रकांत देवताले उस गाँव की स्मृति में जाते हैं जहाँ की स्नेहिल ज़िन्दगी, सादगी और अपनापन, शहर के हो चुके कवि में संवेदना को बचाए रखने में मदद करता है तथा कवि को ज्यादा उदात्त बनाता है.

      चंद्रकांत देवताले अपने गहरे सामाजिक सरोकारों, संवेदनाओं और अपनी चिन्ताओं में अद्वितीय कवि हैं. वे मानवीय पीड़ा, सुख-दुख के उन आयामों तक जाते हैं जहाँ बहुत कम कवि पहुँच पाये हैं. उनकी चेतना में सारी दुनिया अपने सुन्दर और असुन्दर रूप में अंकित है. उनकी कविताओं में ‘ समुद्र ‘ और ‘ बसन्त ‘ पदों का प्रयोग बार-बार मिलता है, जो कवि की चेतना को समुद्र जैसी विशालता और गहराई देता है, तथा जीवन के क्रूरतम दिनों में भी उल्लास के छोटे-छोटे बसन्तों को पकड़ कर जिजीविषा को बचाये रखने की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी है.

       चंद्रकांत देवताले रिश्तों के प्रति बेहद सजग कवि हैं. वे चीज़ों से अपने रिश्तों का ताप बराबर बनाए रखना चाहते हैं. उनकी ‘ पत्थर की बेन्च ‘ कविता इसी भावभूमि की कविता है. जहाँ प्रेम, संवेदना और राहत के छोटे-छोटे और निरापद प्रतीकों को सहेजने और बचाये रखने की चिन्ता, व्यापक अर्थों में समस्त मानवीयता को बचाने की चिन्ता बन जाती है. इन निरापद प्रतीकों को बचाने के लिए कवि कई-कई बार जन्म लेना चाहता है…….. “ वह रास्ते भूलता है, इसलिए नये रास्ते मिलते हैं/ नक्शे पर जगहों को दिखाने जैसा ही होगा/ कवि की ज़िन्दगी के बारे में कुछ भी कहना/……. “ बहुत मुश्किल है बताना/ कि प्रेम कहाँ था किन किन रंगों में/ और जहाँ नहीं था प्रेम उस वक्त वहाँ क्या था ? “

              और फिर कवि यह भी कह देता है——-
“ एक ज़िन्दगी में एक ही बार पैदा होना
और एक ही बार मरना
जिन लोगों को शोभा नहीं देता
मैं उन्हीं मे से हूँ ।

7 नवंबर 1936 में बैतूल जिले के जौलखेड़ा गाँव में जन्में चन्द्रकान्त देवताले, इस 14 अगस्त को इस दुनिया से चले गये. जाने से पहले 13 कविता संग्रहों में अपनी आग, अपनी बेचैनी दुनिया को सौंप गए. एक कवि तभी अमर होता है जब वो हमारी तड़प का हिस्सा बन जाए. कवि समाधान नहीं देता. वह समाधान खोजने में हमारा सारथी बनता है. यही कवि और कविता की सार्थकता है.

 
      

About Prabhat Ranjan

Check Also

‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ पर अवधेश प्रीत की टिप्पणी

‘देह ही देश’ जैसी चर्चित किताब की लेखिका गरिमा श्रीवास्तव का पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ …

17 comments

  1. алушта крымские зори бетта краснодарский край отдых
    в абхазию с собакой благодать горнолыжный комплекс гостевой дом дача алушта
    анапский археологический музей горгиппия таганрог отель с бассейном геленджик отели с крытым бассейном

  2. красная талка геленджик цены на 2021 год калуга хостелы эконом класса
    гостиница санкт петербург рядом отель гранд пари отель пик в рязани
    санаторий черноморская зорька анапа хостел макси хаус ростов на дону сходница украина

  3. кск медведица верхняя троица эдем алушта
    долина нарзанов кисловодск официальный сайт цены кострома отель екатерина официальный адлер бургас официальный сайт
    курортный комплекс морская звезда отель элита магнолия сочи отзывы

  4. санаторий дорохово отзывы суздаль бассейн
    сауна белые ночи санатории азовского моря ливны гостиница
    гостиница с бассейном в спб хостел в текстильщиках отель атлант

  5. камелия кафа отдых в сукко 2021
    санаторий подмосковье мытищи аристократ белоозерский официальный курорты свердловской области
    kestane военный санаторий крым цены черноморская зорька

  6. сочи санаторий фрунзе официальный сайт анапа паланга
    машук санаторий официальный сайт санаторий полтава крым на карте крыма санаторий им калинина мичуринский район официальный сайт
    ярославль гостиница парус недорогие санатории в подмосковье санаторий бакирово цены на 2021

  7. санаторий матери и ребенка в подмосковье санатории кисловодска долина нарзанов
    санаторий ерино цены на 2021 мво сухум корпус турфирма моя россия
    сана санаторий гагра санаторий сосновый бор тольятти лазаревское краснодарский

  8. отдых в oka spa resort эльбрус гостиницы базы отдыха цены
    санаторий в янгантау официальный сайт санаторий солнечный евпатория официальный сайт санаторий мо чемитоквадже официальный сайт
    айвазовского санаторий bridge отель сочи гостиница райгонд кисловодск

  9. санаторий в сочи магадан курорты кмв
    электронная очередь на санаторно курортное отель гамма сочи санаторий валуево московская область
    пансионат шингари пионерский проспект 14 анапа санаторий светлый тюмень

  10. отели сочи все включено цены 2021 хит парк
    лучшие отели ейска по системе все включено санаторий красный холм цены на 2021 оздоровительные комплексы в подмосковье
    евпатория акватория отель мечта евпатория гостиницы липецка цены за сутки

  11. санаторий для пенсионеров старый город мини гостиница
    дома отдыха тверская область сочи отели 4 звезды у моря сухум гостиница
    лечебные санатории в казахстане замок у моря головинка официальный сайт турбаза мир алушта отзывы

  12. отель с горячим бассейном красная поляна санаторий утес крым
    ижевск отели и гостиницы цены адлер отель кипарис цены фото пансионат коралл головинка официальный сайт
    сочи екатерининский квартал крымская весна санаторий отели пятигорска цены на 2021 год

  13. тихвин отели гостиницы цены ижминводы санаторий цены на 2021 с лечением
    санаторий марат крым гаспра грин резорт отель и спа кисловодск отдых в архызе с бассейном зимой
    сибирь анапа монплезир отель казань колпино гостиницы

  14. кириллов гостиница пляж бархатные сезоны адлер
    1001 отель отзывы 50 лет октября 13 санатории управделами президента в кисловодске
    отель гранд агатия анапа пансионат фея 1 анапа глория кореиз

  15. молния ямал санаторий бургас в сочи
    парк отель солнечный букинг в крым с собакой россошь гостиницы
    им кирова кисловодск электричка скачки кисловодск дом отдыха газпром

  16. Hello. And Bye Bye Bye.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *