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   हँसना मना है: हास्य दर्शन और इतिहास

इधर के कुछ दिनों में जिस युवा के लेखन ने प्रभावित किया है वह प्रत्युष पुष्कर हैं. कुछ समय पहले इनकी संगीत कविताएँ लगाईं थीं. आज एक अछूते विषय पर उनका लेख हास्य के दर्शन और उसके इतिहास पर. बहुत दिलचस्प- मॉडरेटर

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‘क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है?
जी, है.
क्या आपके हास्य में दर्शन है?
वो क्या?!’

‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान,
जिसकी हर मुस्कान चौवन्नी वो लम्पट
फूहड़ हो गया इंसान.’

ह्यूमर सुन्दर तब है जब सटल है, अगर आप एक संजीदा इंसान है और भारत में हैं, हालाँकि कहीं भी हैं तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, पर चूँकि भारत को रिसेंटली लम्पटई रोग लग गया है, तो अगर आप भारत में हैं और हँसना चाहते है तो आपको समझौते करने होंगे. सबसे पहले समझौता अपने टेस्ट से, फिर समझौता जेंडर से, फिर रेस से, और फिर वही घिसी पिटी नंगई से, जिसे हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा ह्यूमर मानता है.

लोग कहते हैं ट्रोल अब आये, मैं मानता हूँ ट्रोल तब आये थे जब कपिल शर्मा आया था या शायद उससे भी पहले. मुझे नवजोत सिंह सिद्धू सबसे बड़ा ट्रोल लगता है. एक ऐसा वीभत्स किरदार, जिसे देखकर मुझे क्रीप्स आते है. अधेड़ उम्र का एक मर्द जो अच्छा नेता नहीं बन सका, एक अच्छे कवि के आस पास तो कहीं नहीं, क्रिकेट के दिनों की लाइमलाईट फिर से चाहने लगा तो आइडेंटिटी क्राइसिस में फंसकर एक ऐसा किरदार बनकर निकला जिसने भारतीय ह्यूमर कों बेढंगा, लाउड, असहज, और लम्पट तुकबंदियों का पर्याय सा बना दिया. यहाँ अनु मलिक ने तगड़ा कम्पटीशन देने की कोशिश की, लेकिन उससे इंडियन आइडल ने हमें बचा लिया.

हास्य का आइडेंटिटी क्राइसिस से सीधा लेना देना है. ऐसा माना जाता है कि ह्यूमर सबसे पहले तब आया जब हमनें अपने ही पूर्वज चिम्पान्जियों की नक़ल करनी शुरू कर दी थी. हालाँकि जिस ह्यूमर या सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को किसी व्यक्ति के आकर्षण के सभी गुणों में से सबसे पहले कहीं रखने की कोशिश करते है हम, उसके बारे में हमें बीसवीं शताब्दी के शुरुआत तक कोई सुध नहीं थी.

बात पश्छिम की करें तो किसी भी दार्शनिक ने ह्यूमर को उतना महत्त्व नहीं दिया जितना मिलना चाहिए था. कान्त, होब्स, प्लेटो, सबने ह्यूमर को लिस्ट में कहीं नीचे रखा, और गाहे बगाहे गलती से कभी एकाध पारा लिख दिया तो लिख दिया.

‘व्हाई सो सीरियस, प्लेटो?’

सभी रसों में हास्य मानो सबसे डेलिकेट रस हो. जैसे आप किचन में कुछ बना रहें हो, बनाने में यह रस, वह रस, सब डाल रहें हो, और किचन की स्लैब पर बगल में हास्य बैठकर आपकी रेसिपी को किसी अबोध बच्चे सा घूर रहा हो. किसी भी रस की अति जैसे की आपने, हास्य खिलखिला उठेगा, आपका मजाक बना देगा. श्रृंगार ज्यादा हुआ हास्य बन जायेगा, करुणा की अति हुई, लोग हसेंगे आपपर, और जैसे आपने ज्यादा रौद्र या शौर्य डाला, हद्द से ज्यादा, हास्य आपको खा जायेगा मानो.

भाइयों और बहनों, जब कोई हद्द से ज्यादा रोता हैं ना तो हंसी आती है.

भारत एक आध्यात्मिक देश है. आध्यात्म का हास्य से सीधा लेना देना है. अगर आपने इस जीवन हद्द से ज्यादा मटेरिअलिस्टकली सीरियसली ले लिया तो आपके आध्यात्म की मृत्यु तय है. आध्यात्म स्व-करुणा से आपको बाहर निकालता है, स्व-करुणा से बाहर निकलते ही है, खिलखिलाती, चुलबुली हंसी आपकी राह तकती है.

‘वाट इज़ लाइफ, यो मुनिवर?
लाइफ इज़ अ लवली जोक.’

जोक को जोंक बनाने से बचाना हो तो हँसे! खुल कर हँसे! सबसे निर्मल हंसी. सबसे प्राकृतिक हंसी. सबसे प्रगतिवादी हंसी. वो हंसी जो किसी को आहत ना करें बल्कि सबको सम्मिलित कर ले. सबसे सुन्दर उत्सव है ह्यूमर.

अब सवाल यह उठता है कि हँसे किसपर?
प्रगतिवादी हंसी क्या है?

प्रगतिवाद की हंसी वो हंसी है जिसके पीठ पर प्लेटो बैठा है. प्लेटो ने हास्य की आलोचना ही की ज्यादातर. कहा हास्य तर्क से दूर ले जाता है, वायलेंस प्रोवोक करता है. सेल्फ कण्ट्रोल से समझौता करा देता है मानो.

जब मैंने पहली बार प्लेटो को हास्य पर पढ़ा, मैं झल्लाया, कहा इतना क्या कण्ट्रोल फ्रीक होना. फिर मुझे याद आया प्लेटो का समय.हारवर्ड यूनिवर्सिटी में साईंकोलोजी के प्रोफेसर, मशहूर कोग्नीटिव साइंटिस्ट  स्टीवन पिंकर का मानना है वायलेंस या हिंसा घटा है समाज में. हम मानवता के सबसे शांत समय में जी रहें है. हम जितने वायलेंट प्लेटो के समय में थे उतने वायलेंट आज नहीं है.

प्लेटो ने वायलेंस को हमसे कहीं ज्यादा करीब से देखा था. ऐसे में वायलेंट पार्टी कों कुछ भी ऐसा दे देना जो उनके वायलेंस/ उनकी हिंसा कों प्रोमोट करे, आग में घी डालने जैसा ही था मानो.

अब यह सोचिये, ब्रो! एंड सिस! एंड माई फेलो ट्रांसजेंडर मेन एंड वीमेन. कहीं हमारे हंसी में वो हिंसा तो नहीं दिख जाती जिसे हम इतिहास में कहीं पीछे, हज़ार साल पहले, अपने क्रमागत विकास की पूर्वगत सीढ़ियों पर कहीं छोड़ आये हो?

हास्य बीसवीं शताब्दी के शुरुआत तक ज्यादातर समाज में भोंडा ही था. इसका ध्येय ज्यादातर दूसरों की अवहेलना, दूसरों को ओवरपॉवर करना, दूसरों को नीचा साबित करना ही था.
और आज हमारे टेलीविज़न पर आते हास्य कार्यक्रम वही करने की कोशिश करते है ज्यादातर.
एक गली में चलते किसी औरत या किसी ट्रांसजेंडर पर हँसते लोग अगर आपका हास्य हैं तो आप रेड लाइन पर हैं.
अगर आप किसी हिजड़े पर जोक करना चाहते है और आपका जोक लिंग से जुड़ा हुआ है तो आप वाकई एक बहुत पकाऊ इंसान हैं.

आधुनिक हास्य विट ढूंढता है.

गूगल देवता विट की परिभाषा कुछ यों देते है.

“the capacity for inventive thought and quick understanding; keen intelligence.”

‘इन्वेंटिव’ ‘थॉट’ ‘अंडरस्टैंडिंग’ ‘इंटेलिजेंस’

इन चारों के बिना आपकी हंसी फूहड़ है. अगर आप किसी भारतीय स्टैंड अप कॉमेडियन कों जानते हों तो तो चुपचाप से यह गुरुमंत्र उनके कानों में भी फूंक दे. मैं फेसबुक पर पकाऊ स्टैंड अप कॉमेडी के विडोज़ देखकर पक चुका हूँ. लेकिन आप मुझे तोड़ नहीं सकते.

भारतीय समाज मे विट भरा हुआ है. पारिस्थितिजन्य विट की दो जगहें है दुनिया में, पहला भारत और दूसरा ईस्टर्न यूरोप मेरे हिसाब से. ओह! गज़ब! चौंका देते हैं भारतीय अपने विट से जब देखो तब. बनारस याद आता हैं ना आपको? मुझे तो गाजीपुर, कानपुर, पटना, पंजाब सब याद आता है.
भारतीय समाज में ज्यादातर पश्छिमी समाज से इतर, हास्य खुल कर विद्यमान रहा है.
पश्छिम में हास्य के पीछे के इस मोरल पोलिसिंग में बाइबल का भी बहुत बड़ा हाथ है.

बाइबल(ओल्ड टेस्टामेंट) में हसने पर मनाही है मानो. लेकिन इससे पहले कि हम बाइबल को दोष देना शुरू करें, जो हम करेंगे, हम उस समय के समाज और उसकी मनोवृत्ति को समझने की कोशिश करनी चाहिए. और वह समय ही क्यूँ, उसके बहुत बाद के समय तक, आखिर हम कैसे लोग थे और हमारा ह्यूमर कैसा ह्यूमर था कि जो कांस्तान्तिनोपोल के आर्चबिशोप, शुरूआती चर्च फ़ादर जॉन क्रिस्सोसटॉम कों ४०० के आस पास यह लिखना पढ़ा कि

‘हंसी ज्यादातर एक बेईमान कलुषित संवाद को जन्म देती है, गंदे संवाद से और भी गंदे कामों कों. ज्यादातर हास्य शब्दों और हंसी से हम दुर्वचन और बेइज्जती करने पर उतारू हो जाते हैं, और दुर्वचन और बेइज्जती से हाथापाई और चोट, हाथापाई और चोट से बर्बर हत्याओं तक चले आते है. इसीलिए अगर आपको अपने लिए कोई सलाह चाहिए ही तो, केवल गंदे शब्द या काम, हाथापाई, चोट और हत्याओं को ही मना ना करें, बल्कि इन सबके श्रोत असामयिक हास्य को न करें. (स्काफ, ४४२)’

हंसी का रिफरेन्स आप स्वयं बाइबल में ढूंढना शुरू कर दें तो आपके रौंगटे खड़े हो जायेंगे. हास्य की जगह हॉरर ही मिलेगा, मिलेंगे, दंभ से मुस्कुराते देवता.

बाइबल में किसी के मजाक उड़ाने तक को इतना सीरियस ओफ्फेंस माना गया है कि एक अध्याय में यहाँ तक लिखा है ओल्ड टेस्टामेंट के कि एक बार प्रोफेट इलाईज़ा बेथल को जा रहें थे, कि तभी कुछ बच्चे शहर से बाहर निकले और उन्हें चिढ़ाते हुए कहा, ‘चलते चल, गंजे, चलते चल,’ इसपर इलाईज़ा भड़क गए और पलटकर उन्हें ईश के नाम पर शाप देना शुरू कर दिया और तुरंत ही बगल के झाड़ फानुष से दो मादा भालू निकली और सभी ४२ बच्चों कों मौत के घाट उतार दिया (२ किंग्स, २:२३)

जीसस! नो वंडर दे हैड टू ब्रिंग अ न्यू टेस्टामेंट.
बताइए! इतने छोटे से मजाक पर ४२ बच्चे स्वाहा. और हम में से कुछ लोगों कों लगता है कि अभिव्यक्ति के आज़ादी  की लड़ाई एक छिछली लड़ाई है. हम कहाँ कहाँ से होते हुए यहाँ तक पहुंचे है, यह सोचना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन यह समय हमेशा आपको उस समय की याद दिलाता है. एक और बात, ये जिस इलाईज़ा प्रोफेट ने बच्चे मार गिराए अपने अपमान के बदले में, वो पूरी बाइबल में स्वयं बाल के ४५० प्रोफेट का मजाक उड़ाते, उन्हें नीचे दिखाते दिख जायेंगे आपको.

हास्य के बारे में ऐसी ही बात देकार्त के ‘पैशन्स ऑफ़ थे सोल’ में पढने को भी मिलती है. वो कहते हैं कि हास्य एक भाव नहीं बल्कि छ: भावनाओं का समागम सा है. आश्चर्य, प्रेम, हलकी घृणा, इच्छा, उमंग, और उदासी. हालाँकि इसी किताब के सीक्वल ‘ऑफ़ पर्टिकुलर पैशन्स’ के पार्ट थ्री में देकार्त यह कहते है कि हास्य का जड़, इसका प्रमुख कारण घृणा ही है. वो भी हास्य को भद्दा मजाक उड़ाने का, अवहेलना का ही एक्सप्रेशन मानते है.

“तत्कालीन शौर्य, हास्य का नेपथ्य है, इसकी उत्पत्ति का ध्येय स्वयं कों आह्लादित कर देना ही होता है, या दूसरे में उपस्थित किसी विकृति(जो केवल हमारे नज़र में विकृति हो सकती है) को स्वयं की तुलना मे नीचा दिखा, यथाशीघ्र स्वयं को बड़ा साबित करना होता है. और यह प्रवृत्ति उन लोगों में ज्यादा होती है जिन्हें खुद के बारे में बहुत कम पता हो, जो हमेशा अपने आप कों अपने ही पक्ष में रखकर केवल दूसरों की अक्षमताएं देखते रहते हो. और इसीलिए ज्यादातर हास्य, जो दूसरों की कमजोरियों पर स्वयं कों विकसित करता है, व्यक्ति के भीरुता की निशानी है. जो महान है, उनका पहला यथोचित दायित्व यह भी होता है कि वो दूसरों को अवहेलना से मुक्त करें, और अपनी तुलना केवल अपने सबसे सक्षम रूप से करें.”

(हॉब्स की किताब लेवियाथन (१६५१)का अनुवाद-अंश)

हॉब्स के इस कथन कों पढने के बाद एक बार अपने आस पास के हास्य पर नज़र दौड़ाइए, क्या आपको नहीं लगता कि जो हास्य हम कंज्यूम का रहें है वह डरपोको का हास्य है? क्या हम डरपोक दर्शक है?

अभी तक हम जिस हास्य की बात कर रहें है, जिसने बाइबिल और प्लेटो के समय से बीसवीं शताब्दी तक यूरोप और आज तक हमारा साथ नहीं छोड़ा, इसे हास्य का ‘सुपीरियरिटी थ्योरी’ कहते है.

हालाँकि इस थ्योरी की काट अठारवीं शताब्दी की शुरुआत से ही आनी शुरू हो गयी थी.

अब आप सोचिये, कोई भद्र मानुष अगर सड़क पर चलते हुए, बगल पड़े हुए गरीब, असहाय भिखारी हो देखे तो हँसे या रोये?
रोना ज्यादा लाजिमी लगता है ना? कोई भद्र पुरुष किसी स्त्री का मजाक उड़ता देखे तो हँसे या आगे बढ़कर रोके उसे?
कोई किसी हिजड़े को नीचा साबित करने में लगा हो तो अच्छा व्यक्ति क्या करें? मखौल उडाये या हिजड़े के संग खड़ा होकर डिफेंड करे?

क्या सुपीरियरिटी हास्य से लिये हमेशा पर्याप्त हो सकता है? हमेशा उचित भी हो सकता है? या हमें उस समाज का हिस्सा बने रहना है जो इस श्रेष्ठता के बजाय इक्वलिटी, समानता के लिए लड़ता हो?

ठीक यही बात फ्रांसिस हचसन ने १७५० में हॉब्स की आलोचना करते हुए लिखा..
और हास्य कों उस दिशा में मोड़ने की मदद की, जहाँ हास्य ईगो क्लैश नहीं रिलीफ बनकर सामने आता हो.

यही वह समय था जहाँ से हास्य के रिलीफ थ्योरी का उदय  हुआ.
इसका पहला प्रारूप लार्ड शाफ्सबरी ने १७०९ में लिखे अपने आलेख ‘द फ्रीडम ऑफ़ ह्यूमर एंड विट’ में दिया. फिर महान हर्बर्ट स्पेंसर ने भी इसका विस्तार किया, ‘बताया कि हमारी भावनाएं ऊर्जा का एक रूप सा धारण कर लेती है, और यह ऊर्जा अगर सदैव अतिरेक में रहे तो देह तक कों परेशान करना शुरू कर देती है. इस नर्वस एनर्जी को बजाय किसी घातक क्रिया के माध्यम से निकालने से बेहतर है कि हँस कर निकाल लिया जाये. रिलीफ.

इस रिलीफ कों सबसे बेहतर पहली दफे समझाया महानतम सिगमंड फ्रायड ने. ईगो बैटल वाले, अहम् से भरे हुए हास्य कों मना करते हुए फ्रायड ने हास्य की तीन परिस्थितियाँ सुझाई अपनी किताब ‘जोक्स एंड देयर रिलेशन टू द अनकांशसनेस (१९०५)’ में.

१.) देर विट्ज़ या द जोक
२.) द कॉमिक
३.) द ह्यूमर

देर विट्ज़ में उन्होंने काल्पनिक जोक बनाने पर बल दिया, हाजिर जवाबी और सहज मजाकिया टिप्पणियों कों अभ्यास में लाने को कहा. द कॉमिक में उन्होंने किसी जोकर की तरह निरंतर सोचते रहने और दूसरों से अनभिग्य हास्य को अभिनीत करने पर बल दिया.  ह्यूमर में उन्होंने सामान्य हास्य और उसे परिष्कृत करने की बात की. उसी नर्वस एनर्जी को निकालने की बात की.
किसी भी तरह के सप्रेशन या दमन के विरुद्ध हँसते हँसते खड़ा होने को कहा. रिलीफ लाने के ध्येय से.

रिलीफ थ्योरी ने सुपीरियरिटी थ्योरी को पलटी कर रख दिया.
अब जो दमन करता है वो कतई फन्नी नहीं लगता, जो रिलीफ लाता है, उस दमन के विरुद्ध ह्यूमरसली खड़ा होता है वह फन्नी है.

जो किसी क्लाउन की तरह अपने विचारों में मग्न रहकर भी आपको हँसने पर मजबूर कर दे वह फन्नी है, वह नहीं जो दूसरे कों जोकर बताता हो. वह जो नीचा दिखाता हो, भद्दा, और वो जो नीचे होकर भी, हौंसला रख हँसे, वह ट्रूली फन्नी.

अब दर्शक के तौर पर हमें निश्चित करना है कि हम किस तरफ खड़े होंगे? शोषण-मुखी हास्य या उन्मुक्त हास्य के साथ?
मैंने अपना साइड चुन लिया है? आपने?

क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है?
क्या आपके हास्य में दर्शन है?

हास्य ही नमक है, और नमक वाला टूथपेस्ट एक जोक. गेट ओवर विद इट, बाबू!

अगले आलेख में हम पूर्व के हास्य और पश्छिम के कुछ और दर्शन के बारे में पढेंगे.
साथ ही पोलिटिकल और डार्क ह्यूमर के बारे में.

(नीचे पढ़े महान तीरंदाज़ प्रत्यूष पुष्कर के द्वारा लिखे गए तीन पोलिटिकल डार्क चुटकुले.

*एक बार एक कश्मीरी लड़का दिल्ली में एक इंटरव्यू देने गया,
इंटरव्यूवर ने सभी सवाल पूछकर आखिर में पूछा, ‘ Where do you see yourself 5 years down the line?
लड़का तपाक से खड़ा हुआ और मेज पर मुक्का मारते हुए बोला, ’इंशा-अल्लाह! आजाद कश्मीर!’ 😀

*सवाल -२०१७ में कश्मीर में सबसे पोपुलर इंग्लिश गाना कौन सा है?
जवाब -We will, we will, ‘rock’ you. 😀

* सवाल- ज्यादातर उत्तर भारतीयों ने कश्मीरियों के लिए कौन सा गाना गया?
जवाब – पत्थर के सनम, तुझे हमनें, मोहब्बत का खुदा माना. :D)

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– प्रत्यूष पुष्कर
– लेखक/कवि. बहुआयामी कलाकार. संगीतज्ञ.
– शिक्षा- जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

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