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सिक्स वर्ड स्टोरी के दौर में आठ सौ पन्नों का उपन्यास ‘सात फेरे’

चंद्रकिशोर जायसवाल जी के उपन्यास ‘सात फेरे’ के ऊपर जाने माने लेखक, पत्रकार पुष्यमित्र की टिप्पणी- मॉडरेटर
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आज सुबह चंद्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘सात फेरे’ पढ़ कर खत्म किया है. आज के जमाने में 829 पन्नों का उपन्यास पढ़ना किसी के लिये भी धैर्य और एकाग्रता का काम है. खास कर उस दौर में जब 100 पन्नों के उपन्यास ही बिक रहे हों और पढ़े जा रहे हों. एक सिटिंग में किताब खत्म हो गयी, यह बताना किताब की सबसे बड़ी खासियत हो गयी हो. ट्विटर पर दो वाक्यों में पूरी बात कही जा रही हो. छह शब्दों की कथा रची जा रही हो. सब आपलोग जानते ही हैं.
इस किताब के बारे में इतना जरूर कह सकता हूँ कि उठाने में यह वजनदार जरूर मालूम होती है, पढ़ने में काफी हल्की लगती है. चंद्रकिशोर जायसवाल को पढ़ते हुए मुझे हमेशा नोबेल विनर कवियत्री विस्साव शिम्बोर्शका की वह पंक्ति याद आती है.
ओ वाणी, मुझसे खफा न होना
कि मैंने तुझसे उधार लिए
चट्टानों से भरी शब्द
फ़िर ताजिंदगी उन्हें तराशती रही
इस कोशिश में
की वे परों से हलके लगें…
परों से हल्की कहानियां ही चंद्रकिशोर जायसवाल के कथा संसार की खूबसूरती है. ऐसा दूसरा उदाहरण विनोद कुमार शुक्ल के गद्य में मिलता है, हालांकि कई बार विनोद कुमार शुक्ल अमूर्तता की तरफ बढ़ जाते हैं. जायसवाल हकीकत की ठोस बुनियाद पर खड़े रहते हैं. वैसे, मेरे लिये यह सब लिखना बहुत त्रासद है. मैं उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़े, हाल ही में अपने जीवनसाथी को खो देने वाले इस विलक्षण साहित्यकार की खूबियां हिंदी के पाठकों को बताने की कोशिश कर रहा हूँ. जबकि होना यह चाहिये था कि वे इस उम्र में स्वनाम धन्य होते. मगर दिल्ली की साहित्य मंडली से दूर, साहित्यिक संगठनों से अलग थलग, रेणु के पूर्णिया में रहने वाले इस कथाकार को शुरुआत में प्रकाशक भी नहीं मिले. अपनी रचनाएं खुद छापते रहे. ज्ञानपीठ ने इस उपन्यास सात फेरे को छापा भी तो कीमत इतनी रख दी कि यह पाठकों के लिये दुर्लभ हो गया.
मुझे यह प्रति खुद लेखक के हाथों मिली है. अब मैं उनका दूसरा उपन्यास पलटनिया भी पढ़ना चाह रहा हूँ, मगर मिल नहीं रही. इससे पहले उनका एक और उपन्यास चिरंजीव पढ़ चुका हूँ, वह भी करीब-करीब इतना ही मोटा है. दिलचस्प है कि उस उपन्यास को मैंने 24 घंटे की रेल यात्रा में पढ़कर खत्म कर दिया था. उस उपन्यास में मुझे सूरदास की कविताओं जैसा माधुर्य मिला था. उनकी कहानियां ‘हिंगवा घाट पर पानी रे’ और ‘नकबेसर कागा ले भागा’ पढ़ लीजिये, उनके कथा रस के दीवाने होकर रह जाएंगे.
बहरहाल, यहां जिक्र सात फेरे का है. इसमें रस कम है, व्यंग्य अधिक. इसको पढ़ते हुए आपको मशहूर उपन्यास डॉन क्विग्जोट की याद आएगी. जिस उपन्यास में एक मसखरा खुद को बहुत बड़ा योद्धा समझता है और बार-बार दुनिया जीतने की जंग लड़ने निकल जाता है. वह कल्पनाओं में जीता है और खुद को महान योद्धा समझता है. अपने सेवक के साथ वह कई यात्राओं पर निकलता है और हर बार बुरी तरह पिट कर लौटता है.
चंद्रकिशोर जायसवाल ने इस फार्मेट का इस्तेमाल कोसी अंचल के पुरोहितवाद की बखिया उधेड़ने में किया है. मडल कमीशन लागू होने के बाद कोसी के ग्रामीण समाज में जो बदलाव आए हैं और नई सामाजिक संरचना बनी है, वह इस उपन्यास की पृष्ठभूमि है. इस पृष्ठभूमि में एक अति पिछड़ा धानुख जाति का धनाढ्य अधेड़ है, जिसकी तीन पत्नियां उसे निःसंतान छोड़ कर अकाल कलवित हो चुकी हैं. वह चौथा विवाह करना चाहता है. इस काम में उसे एक नकारा पुरोहित मैथिल ब्राह्मण युवक का सहयोग मिलता है. वे सात बार विवाह की इच्छा से अपने गांव से अलग-अलग इलाकों की तरफ निकलते हैं और हर बार अलग-अलग किस्म की मुसीबत में फंसते हैं, फिर मार खाकर लौटते हैं.
कहानी का यह ढांचा है, जिस पर चंद्रकिशोर जायसवाल अपनी खास शैली में घटनाओं और कल्पनाओं का मुलम्मा चढ़ाते हैं. और कथोपकथन के जरिये उसे आगे बढ़ाते हैं. दिलचस्प है कि तरह-तरह के खुराफातों में लगे रहने वाले उपन्यास के ये दोनों केंद्रीय चरित्र निगेटिव शेड्स में नहीं हैं. अपनी स्वार्थ पूर्ति में जुटे ये दोनों निहायत भोले और अनुभवहीन लोग हैं, जो अपनी इन्हीं कमजोरियों की वजह से हर जगह से पिट कर आते हैं.
इनमें धानुख तिहेजू बैद्यनाथ मंडल तो अत्यंत सीधा है. वह हर किसी की सलाह मान लेने वाला और उसपर तत्काल काम शुरू कर देने वाला व्यक्ति है. वह हर किसी ऐरी गैरी महिला से ब्याह करने के लिये तैयार है और ब्याह के नाम पर कुछ भी कर सकता है. उसका मार्गदर्शक पलटू झा एक असफल पुरोहित है. उसके दिमाग में कई तरह की योजनाएं चलती रहती हैं, मगर वह उन्हें अपनी अनुभवहीनता की वजह से ठीक से कार्यान्वित नहीं कर पाता है.
पलटू झा, उसके पिता और दिल्ली में किसी मंदिर में पुजारी का काम करने वाला पलटू का साला सहदेव झा, इन तीनों चरित्रों के सहारे जायसवाल जी ने कोसी के अत्यंत गरीब इलाके में सक्रिय पुरोहितवाद के मिज़ाज को बहुत बारीकी से पकड़ा है. असफल पलटू का कैरियर बनाने के लिये ये दोनों किस तरह की सलाह हमेशा पलटू को देते रहते हैं, यह जानना बहुत रोचक है. हालांकि खुद को होशियार समझने वाला पलटू कभी इन दोनों की सलाह को दिल से नहीं मानता. इनके चंगुल से भागने की कोशिश करता रहता है.
मुझे व्यक्तिगत रूप से इस उपन्यास का थीम लगातार खारिज हो रहे पुरोहितवाद की विद्रूपताओं से परिचित कराना लगता है. हालांकि साथ-साथ कई दुर्लभ कथाएं चलती रहती है. कभी ये दोनों किसी रैली में भाग लेने पटना चले जाते हैं तो उस रैली के जरिये स्थानीय राजनीति के रेशे खुलते हैं. कभी वे किसी पार्टी के चुनाव अभियान का हिस्सा बन जाते हैं और पिछड़ों की उस राजनीतिक दल में पलटू झा जैसा ब्राह्मण स्टार प्रचारक बन जाता है. उसके जैसा स्वार्थी व्यक्ति अचानक से ब्राह्मणवाद को गालियां देने लगता है.
कभी ये दोनों बाढ़ राहत अभियान का हिस्सा बन जाते हैं और मौत को बहुत करीब से देखते हैं. साथ ही राहत अभियान की जो अपनी घृणित राजनीति है उससे हमारा परिचय कराते हैं. कभी लाश का अभिनय करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ जाते हैं, कभी ब्यूटी पार्लर जाते-जाते मसाज पार्लर में पहुँच जाते हैं. कभी रोजगार के लिये दिल्ली चले जाते हैं, जहां एक तरफ पलटू का साला बैद्यनाथ मंडल को भिखारी बनने का लाभ बताता है. तो दूसरी तरह पलटू एक प्राइवेट अस्पताल के हत्थे चढ़ जाता है और वहां से जान छुड़ा कर भागता है. इस बीच बैद्यनाथ मंडल के परिचित उसके लिये दिल्ली से एक लड़की को भगाने में जुटे रहते हैं.
कभी उनका पाला अश्लील थिएटर में नाचने वाली लड़कियों से उनका पाला पड़ जाता है, तो कभी पलटू झा खुद को धोबी बताकर धोबियों का संगठन खड़ा कर लेता है. इन तमाम अनुभवों से गुजरते हुए हम अलग अलग दुनिया की सच्चाइयों से अवगत होते हैं.
इसके साथ ही जायसवाल जी का इस समाज का अपना अध्ययन है, जो पण्डितवादी श्लोकों से लेकर, चुड़िहाडी गीतों और बाढ़ के वक़्त कोसी की आराधना में गाये जाने वाले गीतों तक में परिलक्षित होता है और इस उपन्यास से गुजरते हुए हम इन जानकारियों से समृद्ध होते हैं.
जायसवाल जी को मूलतः रेणु की परंपरा का उत्तराधिकारी माना जाता है. और इस दायित्व का उन्होंने बखूबी निर्वाह किया है. इतना ही नहीं वे इसे आगे ले जाते हैं. चुकी उनका लगभग पूरा जीवन इसी इलाके में गुजरा है, तो उनकी ग्रामीण समाज की समझ अद्भुत है. अत्यंत गरीब और भिखारियों तक के जीवन की उनकी समझ बहुत सहज है.
उन्होंने अपनी एक लेखन शैली विकसित की है, जो कथोपकथन पर आधारित है. कभी पात्रों के मन में विचारों की श्रृंखला उमड़ती है, कभी वे सामने वाले से सवाल दर सवाल पूछते जाते हैं. पहले उनकी रचनाएं पारिवारिक जीवन की समस्याओं पर केंद्रित हुआ करती थीं, बाद के दिनों में उन्होंने मण्डलोत्तर ग्रामीण समाज के बदलावों को अपनी लेखनी का विषय बनाया.
समाज कैसे पलट गया, इसको लेकर उन्होंने एक और महत्वपूर्ण उपन्यास ‘पलटनिया’ लिखा है. दुःखद यह है कि विश्व स्तर की इन महत्वपूर्ण रचनाओं पर जिनका काफी महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय महत्व है, पर हिंदी पट्टी में नहीं के बराबर चर्चा होती है. उसकी एक बड़ी वजह यह है कि वे किसी लेखक संगठन से नहीं जुड़े हैं. दलित और पिछड़ा साहित्य की बात करने वालों की निगाह भी उन पर नहीं है. एक वजह यह भी है कि उनके उपन्यास का आधार कोई राजनीतिक नारा नहीं है. वे बहुत सहजता से समाज की तस्वीर पेश करते हैं. उनकी रचनाओं में न कोई नायक है, न कोई खलनायक.
ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित उपन्यास ‘सात फेरे’ भी इन्हीं विडंबनाओं का शिकार हुआ है. हाल के वर्षों में ग्रामीण समाज की जातीय संरचनाओं में जो बदलाव आया है, उसका यह महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसके बावजूद यह साहित्यिक- सामाजिक बहसों का हिस्सा नहीं बन पाया है.
आपके आस्वादन के लिए इस उपन्यास के कुछ उद्धरणों को मैंने यहां पेश किया है-
1.
अगर यहां किसी से पूछा जाता कि इस इलाके का सबसे बड़ा झूठ क्या है, तो उसे जवाब मिलता, ‘एक मर्द अपनी औरत की मौत पर रो रहा था, जार-जार रो रहा था.
इलाके के इस महाझूठ की मिट्टी पलीद कर दी फुलकाहा के बैजनाथ मंडल ने. नामाकूल अपनी औरत की मौत पर सचमुच रो रहा था, जार-जार रो रहा था. यह सच है कि मरने वाली उसकी तीसरी बीवी थी, पर थी तो एक औरत ही. पैसे सेर के हिसाब से यहां औरत मिलती रहती है या नहीं.
2.
फुलमतिया की मां महंथ की शिकायत लेकर महंथ की मां के पास पहुंची. तो उस मां ने जवाब दिया, मेरा बेटा बालब्रह्मचारी है. जीवन में एक बार उसका फिसलना जरूरी था, नहीं तो उसका ब्रह्मांड फट जाता. अब वह फिर नहीं फिसलेगा. तुम्हारी बेटी ने मेरे बेटे की जान बचाई है, मैं उसका उपकार मानती हूँ. मेरा बेटा भी उसे जीवन भर मां ही मानेगा.
फुलमतिया मठ की दासिन बनी रही, मगर फिर वह कीचड़ में धँसती चली गयी. अपने को बचा नहीं सकी. इस इलाके के मठों में जिन-जिन महन्थों और साधुओं का ब्रह्मांड फटने को था और जिन्हें फुलमतिया ने बचा लिया, उनमें से कुछ अभी इस मठ में उपस्थित हैं.
3.
बैठते ही गोदपरनी ने अपनी टनकदार आवाज में गाया.
उतरहिं राज से आइलै गोदपरनी रे जान
जान, बैठि गेलै चंदन के बिरिछिया तर रे जान.
किसी मुंहफट जनाना ने टोक दिया, हे गोदपरनी, जिसके तर बैठी हो, वह कदम्ब का गाछ है, चंदन का नहीं.
गोदपरनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, हे बहिनो. जिस किसी गाछ के नीचे गोदपरनी नट्टिन बैठ जाये, उससे चंदन की सुगंध आने लगती है. वह गाछ चंदन का हो जाता है. यह गौर पार्वती का आशीर्वाद है. आ रही है न सुगंध?
4.
पलटू झा ने कहा, मैंने सोचा है, इस बार हम सिर्फ कौवे पर ध्यान केंद्रित करेंगे.
कौवे पर?
हां.
करना क्या होगा?
कुछ करना नहीं है, पलटू बोला, सिर्फ कौवों पर नजर रखनी है. अभी से रीतलाल को इस काम पर तैनात कर दीजिये. बुलाइये उसे.
बैजनाथ मंडल ने हांक देकर रीतलाल को तुरंत बुला लिया और पलटू झा उससे कहने लगा, तुम्हें अभी से कौवों की बोली पर ध्यान देना है. ध्यान इस बात पर भी देना है कि कौवा ब्राह्मण जाति का हो.
ब्राह्मण जाति का हो?
हां, शकुन विचार के लिए ब्राह्मण कौवा सर्वश्रेष्ठ माना गया है.
मैं तो ब्राह्मण आदमी को भी नहीं पहचान पाता हूँ, रीतलाल ने असमर्थता जाहिर की, ब्राह्मण कौवे को कैसे पहचानूंगा?
ब्राह्मण कौवा का, पलटू ने बताया, मुंह लम्बा, चोंच लम्बी, शरीर लम्बा, देह भारी और शब्द गंभीर होता है.
5.
अगर आपको रातोरात नेता बनना है तो कल सुबह किसी का खून कीजिये, शाम तक बड़ा नेता बनाने की जिम्मेदारी मेरी.
खून करने से मैं बड़ा नेता कैसे बन जाऊंगा? बैजनाथ ने पूछा.
खून करते ही आप खूंखार मान लिए जाएंगे. हर जाति अपने लिये एक खूंखार नेता चाहती है. धानुख समाज झट आपको नेता मान लेगा. उन्हें यह बताया जाएगा कि आपने अपनी जाति पर हुए अत्याचारों के बदला लेने के लिये खून किया है. किसी नामी बाबू- बबुआन का खून आपको करना पड़ेगा.
6.
पोदन दास को गुस्सा आ गया, कुंवारी नहीं है और कोई सतवंती भी नहीं है यह कोशिका. उछल धक्का है, मरद के लिये छुछुआती फिरती है. गिन लीजिये उसके भतार. पहला भतार रन्नू सरदार. दूसरा भतार रैया रणपाल. तीसरा भतार झिमला मल्लाह. चौथा भतार…. जय शिव, जय शिव हो महादेव. लोग मानते हैं कि कोशिका की शादी सिंहेश्वर के महादेव से भी हुई थी. उसने महादेव को भी नहीं बख्शा, शिव मंदिर में ही कटनिया लगा दिया.
7.
नाव खुलने को हुई तो एक आदमी दौड़ता हुआ आया और उमाशंकर से पूछा, बाबूजी आपके पास एक बीड़ी है?
उमाशंकर को गुस्सा आ गया, आपको अभी बीड़ी चाहिये?
नहीं, अपने लिये नहीं मांग रहा.
तो फिर किसके लिए मांग रहे हैं?
रामधन के लिये.
कहाँ है वह?
वह तो मर गया.
मर गया. फिर उसके लिये बीड़ी क्यों मांग रहे?
मेरे ही गाछ पर बैठा था. गाछ से गिर कर पानी में बह जाने से पहले उसने बीड़ी मांगी थी. मैं उसे बीड़ी पिला कर इस बगीचे से जाना चाहता हूँ.
8.
कब तक चाहिये लाश?
कल-परसों तक.
बहुत कम समय दे रहे हैं भैया, सुशील बोला, इतनी जल्दी लाश का प्रबंध कैसे होगा?
कैसी बात कर रहे हो सुशील, नेताजी कुछ बिफरे, इतनी बड़ी बाढ़ आई, एक लाश भी नहीं मिल रही तुम्हें?
अगर सात दिन पहले कहते तो लाशों का अंबार लगा देता भैया. अब तो सब बह कर चली गयी होंगी.
तो ऐसा करो, कुर्सी से उठते हुए नेताजी ने कहा, कि कहीं से एक मरियल को पकड़ लाओ और उसका गला दबा कर लाश बना दो.
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One comment

  1. पढ़ कर मज़ा आ गया । इतनी अच्छी किताब लिखी जाय और चर्चा न हो यह दुःखद है । निश्चित ही चंद्रकिशोर जायसवाल जी रेणु की पीढ़ी के कथाकार हैं।

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